गुरुवार, 1 दिसंबर 2011

उर में पावस दृग में विहान !

उर में पावस दृग में विहान!

164323_156157637769910_100001270242605_331280_1205394_nअनामिका

आदरणीय पाठक वृन्द को अनामिका का नमस्कार. आज आप सब के सहयोग से हम महादेवी जी की इस श्रृंखला के अंतिम पड़ाव पर आ चुके हैं और अब इस सिन्धु में अंतिम गोता लगाते हुए अंतिम छिपे माणिकों को दृष्टि गोचर करते हैं  ....

उत्कृष्ट मौलिक सृजन के साथ इन्होने अनुवाद का भी बहुत बड़ा कार्य किया है. काव्यमयी वैदिक ऋचाओं से लेकर वाल्मीकि, थेरगाथा, अश्वघोष, कालिदास, भवभूति एवं जयदेव सदृश उद्दात-सरस काव्य विभूतियों का काव्यमय हिंदी रूपांतर 'सप्तपर्णा' में प्रकाशित हुआ है, परन्तु अभी तक अनुवाद का अधिकांश अप्रकाशित ही है. कालिदास के महाकाव्य 'कुमार संभव' तथा 'रघुवंश' और अश्वघोष के महाकाव्य 'बुद्धचरित' का सम्पूर्ण अनुवाद भी इन्होने काव्यमय रूप में ही किया है. अनुवाद में मूलकवि की अनुभूतियों और संवेदनाओं के साथ महादेवीजी का सहज तादाम्य पाया जाता है. एक नहीं, अनेक कवियों के साथ तादाम्य की यह क्षमता जिस व्यापक विरत प्रतिभा की अपेक्षा रखती है, वह इन्हें प्राप्त है. इन्होने स्वीकार किया है कि अनुवाद मूल आत्मा का नवीन अवतरण है, अस्तु उसकी सार्थकता आत्मा के न बदलने और शरीर के नवीन रहने पर ही चरितार्थ होती है. इनके अनुवाद में भाषा की ध्वनि, संकेत, प्रतीक और अभिव्यंजना की प्रणाली में चाहे जो भी अंतर हो, कवि की मूल भावना को यथावत अक्षुशण्ण रखने में वे सर्वथा सफल हैं.

प्रायः अर्द्धशती की अवधि में महादेवीजी ने एकनिष्ठ होकर अबाध गति से अपने भावमय सृजन और कर्ममय जीवन की साधना में साथ साथ संलग्न रहकर अपनी इस घोषणा को सार्थक बनाया है -

'कला के पारस का स्पर्श पा लेनेवाले का कलाकार के अतिरिक्त कोई नाम नहीं, साधक के अतिरिक्त कोई वर्ग नहीं, सत्य के अतिरिक्त कोई  पूँजी नहीं, भाव-सौन्दर्य के अतिरिक्त कोई व्यापार नहीं और कल्याण के अतिरिक्त कोई लाभ नहीं !'

संतोष के साथ उन्होंने यह भी कहा है -

'जीवन के तुतले उपक्रम से लेकर अब तक मेरा मन अपने प्रति विश्वासी ही रहा है. मार्ग चाहे जितना अस्पष्ट रहा, दिशा चाहे जितनी कुहराच्छ्न्न रही, परन्तु भटकने, दिग्भ्रांत होने और चली राह में पग पग गिन कर पश्चाताप करते हुए लौटने का अभिशाप मुझे नहीं मिला है. मेरी दिशा एक और मेरा पथ एक रहा है, केवल इतना ही नहीं, वे प्रशस्त से प्रशस्ततर और स्वच्छ से स्वच्छतर होते गए हैं !'

यह इनके अखंड और सुगठित व्यक्तित्व का ही प्रमाण है - 'कथनी, करनी और रहनी की यह एकता जो रचना, विचार और जीवन के रूप में अविरोधी जन पड़े, कोई सामान्य विशेषता नहीं है. महादेवी जी के लेखन की सच्चाई और स्थायित्व के विषय में हमें निश्शंक होना चाहिए !'

साहित्यिकों और सहित्यिक संस्थानों ने, समाज और सरकार ने - सम्पूर्ण राष्ट्र ने इनकी विजय यात्रा की उपलब्धियों की महत्ता को स्वीकार करते हुए इन्हें सम्मानित और अभिनंदित किया है, यह किसीसे छिपा नहीं.

अस्तु, 'रजकणों में खेलती विराज विधु की चांदनी' महादेवीजी का व्यक्तित्व समात्मभाव की साधना से जितना सरल, मधुर, करूण और कोमल है, उनका कृतित्व उतना ही उद्दात, व्यापक, विरत एवं महान है. हिमालय को संबोधित करते हुए इन्होने जैसे अपने व्यक्तित्व और कृतित्व का अनायास ही उदघाटन कर दिया है -

हे चिर महान !

मेरे जीवन का आज मूक तेरी छाया से हो मिलाप,

तन तेरी साधकता छू ले मन ले करुणा के थाह नाप ;

उर में पावस दृग में विहान !

वास्तव में महादेवी के व्यक्तित्व और कृतित्व से तुलना करने के लिए हिमालय ही सबसे अधिक उपयुक्त है. वही उन्नत और दिव्य रूप, वही विरत तथा विशाल प्रसार, वही अमल-धवल एवं अटल-अचल धीरता-गंभीरता, वही पर-दुःख कातरता, करुणा तथा स्नेहसिक्त तरलता और सबसे बढ़कर वही सर्व सुखद शुभ्र-मुक्तहास - यही तो महादेवी हैं.

हमें उनका यह सन्देश स्मरण रखना चाहिए - ' इस युग का कवि हृदयवादी हो या बुद्धिवादी, स्वप्नदृष्टा हो या यथार्थ का चित्रकार, अध्यात्म से बंधा हो या भौतिकता का अनुगत, उसके निकट यही एक मार्ग शेष है कि वह अध्ययन से मिले जीवन कि चित्रशाला से बाहर आकर, जड़ सिद्धांतों का पाथेय छोड़कर अपनी सम्पूर्ण संवेदना शक्ति के साथ जीवन में घुल-मिल जाए. उसकी केवल व्यक्तिगत सुविधा-असुविधा आज गौण है, उसकी केवल व्यक्तिगत हार-जीत आज महत्त्व नहीं रखती, क्योंकि उसके सारे व्यष्टि-गत सत्य की आज समष्टिगत परीक्षा है. उसे स्वप्नदृष्टा भी होना है, जीवन के निम्न स्तर तक मानसिक खाद्य भी पहुंचाना है, तृषित मानवता को संवेदना का जल भी देना है और सबके अज्ञान का भार भी सहना है.

सारांश यह है कि आज के कवि को अपने लिए अनागरिक होकर भी संसार के लिए गृही, अपने प्रति वीतराग होकर भी सबके प्रति अनुरागी, अपने लिए संन्यासी होकर भी सबके लिए कर्मयोगी होना होगा, क्योंकि आज उसे अपने को खोकर पाना है.

अस्तु...

जयन्ति ते सुकृतिन : रससिद्धा : कवीश्वराह !

नास्ति येषां यशः काये ज़रामरणजं भयं !!

इति ..

24 टिप्‍पणियां:

  1. अनामिका जी,
    महादेवी वर्मा जी की अंतस की अभिव्यक्तियों को आप जिस तरह से प्रस्तुत करती आई हैं, उसका एक अलग ही महत्व है । इनकी कविता ,संस्मरण, कहानी साहित्य के हर संदर्भों में मानवीय मूल्यों एवं मनोभावों को पाठकवृंद की संवेदनाओं के साथ न चाहते हुए भी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से बरबस ही सरोकार करने के लिए वाध्य कर देती हैं । विद्या और विनय की अप्रतिम प्रतिमूर्ति को किसी भी साहित्य प्रेमी द्वारा भुलाया नही जा सकता । इस प्रस्तुति के लिए आपको धन्यवाद ।

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  2. अपने प्रति वीतराग होकर भी सबके प्रति अनुरागी, अपने लिए संन्यासी होकर भी सबके लिए कर्मयोगी होना होगा, क्योंकि आज उसे अपने को खोकर पाना है.
    सार्थक ...मार्गदर्शन ...आभार ....अनामिका जी ..!

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  3. मेर नए पोस्ट 'राही मासूम रजा' पर आकर मेरा मनोबल बढ़ाएं। धन्यवाद।

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  4. आज के कवि को अपने लिए अनागरिक होकर भी संसार के लिए गृही, अपने प्रति वीतराग होकर भी सबके प्रति अनुरागी, अपने लिए संन्यासी होकर भी सबके लिए कर्मयोगी होना होगा, क्योंकि आज उसे अपने को खोकर पाना है.bahut hi sarthak abhivyakti.thanks.

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  5. आज के कवि को अपने लिए अनागरिक होकर भी संसार के लिए गृही, अपने प्रति वीतराग होकर भी सबके प्रति अनुरागी, अपने लिए संन्यासी होकर भी सबके लिए कर्मयोगी होना होगा, क्योंकि आज उसे अपने को खोकर पाना है.sahi sandesh...

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  6. श्रृंखला महादेवी-प्रेमियों के लिए अच्छी रही और बाकी के लिए भी…

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  7. महादेवी जी के काव्य का बढ़िया परिचय हुआ... सुन्दर...

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  8. प्रस्तुति इक सुन्दर दिखी, ले आया इस मंच |
    बाँच टिप्पणी कीजिये, प्यारे पाठक पञ्च ||

    cahrchamanch.blogspot.com

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  9. Aapke aalekh pe tippanee dene ke liye mere paas hamesha alfaaz kam hote hain....kya likhun? Abhibhoot ho jatee hun!

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  10. आज जब इन महान् कवि एवं चिन्तकों को असामयिक मान कर खारिज करने लगे हैं लोग ,अनामिका जी ,आपने यह शृंखला देकर सिद्ध कर दिया कि सच्चा साहित्य न कभी पुराना होता है न जीवन से दूर .साथ ही अपनी अध्य़यनशीलता एवं तत्व-ग्राहिता को भी प्रमाणित कर दिया.
    समापन में लगभग सभी सूत्रों को पिरो कर प्रस्तुत किया गया सारांश भी महादेवी जी के व्यापक कार्य-क्षेत्र क संक्षिप्त निरूपण ही है .
    आपका अभिनन्दन करती हूँ !

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  11. आज के कवि को अपने लिए अनागरिक होकर भी संसार के लिए गृही, अपने प्रति वीतराग होकर भी सबके प्रति अनुरागी, अपने लिए संन्यासी होकर भी सबके लिए कर्मयोगी होना होगा, क्योंकि आज उसे अपने को खोकर पाना है.
    सार्थक संदेश के साथ समापन किया आपने इस श्रंखला का अनामिका जी ! महादेवी जी के अनमोल कृतित्व एवं व्यक्तित्व से इतना आत्मीय परिचय कराने के लिये आपका आभार एवं धन्यवाद !

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  12. यह श्रृंखला समाप्त हो गयी... ऐसा प्रतीत होता है मानो अभी बहुत कुछ कहना बाकी रह गया हो... महादेवी वर्मा जी के चरणों में सादर नमन!! स्वयं को गौरवान्वित मानता हूँ कि बिहार हिन्दी साहित्य सम्मलेन, पटना में (जो शायद अब मृत घोषित किया जा चुका है या किया जाने वाला है)उन्हें सुनने का अवसर प्राप्त हुआ... अनामिका जी इस पूरी श्रृंखला के लिए आभार आपका!

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  13. आपकी कृपा से महादेविजी के बारे विस्तारपूर्वक जानने का मौका मिला ....आभार

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  14. आपके साथ इस श्रृंखला को पढ़ना एक सुखद अनुभव रहा। इसमें कई नई बातें जानने को मिली।
    अगली श्रंखला शीघ्र शुरु होगी ... आशा है।

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  15. महादेवी जी पर अच्छी शृंखला चल रही है। यह अंक भी अन्य अंकों की तरह रोचक व ज्ञानवर्धक है। आभार।

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  16. सुंदर प्रस्तुति।महादेवी जी के अद्भुत कृत्यों से परिचय कराने हेतु आभार।

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  17. बहुत बढ़िया .... संग्रहणीय पोस्ट के लिए आभार

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  18. अच्‍छी जानकारी भरा लेख।
    आभार...

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  19. आज के कवि को अपने लिए अनागरिक होकर भी संसार के लिए गृही, अपने प्रति वीतराग होकर भी सबके प्रति अनुरागी, अपने लिए संन्यासी होकर भी सबके लिए कर्मयोगी होना होगा, क्योंकि आज उसे अपने को खोकर पाना है.

    ....बहुत सार्थक सन्देश...एक रोचक और ज्ञानवर्धक श्रंखला के लिये आभार...

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  20. महादेवीजी के साथ ही आपका गहन अध्ययन उनकी साहित्यिकता और आध्यात्मिकता को भली भांति प्रकट करता है !

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  21. itne sari sahitykaron ko sath lekar chalana sachmuch adbhud hai . Vah singh sahab ...vah

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  22. पूरी श्रृंखला प्रभावशाली रही ..आभार

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