गुरुवार, 26 जनवरी 2012

गणतंत्र दिवस के अवसर पर …

26 जनवरी 1950 को भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने 21 तोपों की सलामी के साथ भरतीय राष्ट्रीय ध्वज को फहराकर भारतीय गणतंत्र के जन्म और धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक राष्ट्र की घोषणा की। आइए इसके कुछ ऐतिहासिक पहलुओं को याद करते चलें। दो दशक पूर्व इसी दिन (26 जनवरी) हमारे देश के तत्कालीन नेताओं, स्वतंत्रता सेनानियों, ने एक सपना करोड़ों देशवासियों के मन में जगाया था।

कलकत्ता अधिवेशन और डोमिनियन स्टेटस का प्रस्ताव

31 दिसंबर 1929 की मध्य रात्रि में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के लाहौर सत्र के दौरान राष्ट्र को स्वतंत्र बनाने की जो पहल की गई थी, उसका एक अलग इतिहास है। 1928 में कांग्रेस का अधिवेशन कलकत्ता (कोलकाता) में हुआ था। पं. मोतीलाल नेहरू सभापति थे। इसमें एक सर्वदलीय सम्मेलन भी हुआ। उसके सामने नेहरू कमिटी की रिपोर्ट पेश की गई। साइमन कमीशन भारत पहुंच गया था। इसलिए भारत के सभी दलों को यह साबित करना कि वे एकमत हैं, और भी ज़रूरी हो गया था। इस अधिवेशन में नेहरू रिपोर्ट के डोमिनियन स्टेटस के लक्ष्य को एक शर्त के साथ स्वीकार कर लिया गया।

सम्मेलन में जो प्रस्ताव लाया गया, वह था – बरतानी हुक़ूमत को अविलंब भारत को डोमिनियन स्टेटस (औपनिवेशिक स्वराज्य) दे देना चाहिए। कुछ लोग तो पूर्णस्वराज के सिवा कुछ नहीं मांग करने के पक्षधर थे, फिर भी विचार-विमर्श के बाद यह तय किया गया कि एक वर्ष के भीतर यदि ब्रिटिश गवर्नमेंट डोमिनियन स्टेटस दे देगी तो उसे मंज़ूर कर लिया जाएगा, पर यदि उसने इस मांग को 31 दिसंबर 1929 तक मंज़ूर न किया, तो कांग्रेस अपना ध्येय बदल लेगी, यानी कांग्रेस सविनय अवज्ञा आंदोलन और ‘पूर्ण स्वतंत्रता’ घोषित कर देगी, फिर उसके बाद डोमिनियन स्टेटस मिले भी, तो उसे वह मंज़ूर नहीं करेगी। पं. जवाहरलाल नेहरू और श्री श्रीनिवास आयंगर ने तो इस प्रस्ताव को मान लिया, पर श्री सुभाषचंद्र बोस ने इसका विरोध किया।

1929 तक कांग्रेस के विभिन्न गुट फिर से एक हो चुके थे। वे सक्रिय होने के लिए बेचैन थे। नेतृत्व के लिए वे महात्मा गांधी की ओर देख रहे थे। कांग्रेस के इस अधिवेशन में जब गांधी जी ने खुद एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव लाकर यह स्पष्ट कर दिया कि वे ब्रिटिश शासन को खुली चुनौती देने के लिए जनता का नेतृत्व करने को फिर से तैयार हैं।

लाहौर कांग्रेस अधिवेशन

31 दिसंबर 1929 आ गया। भारत को डोमिनियन स्टेटस नहीं मिला। उस साल का कांग्रेस का अधिवेशन लाहौर में हुआ। लाहौर सत्र की अध्यक्षता पंडित जवाहरलाल नेहरू ने की थी। इस दिन कलकत्ता कांग्रेस की प्रस्तावित अवधि समाप्त हो रही थी, लेकिन ऐसा लग नहीं रहा था कि वाइसराय लॉर्ड इरविन भारत को उपनिवेश राज्य का दर्ज़ा देने वाला हो। 23 दिसंबर को गांधी-इरविन भेंट में संधि-वार्ता भी टूट चुकी थी। वाइसराय ने कांग्रेस की शर्तें मानने से इंकार कर दिया था। लाहौर की उस बैठक में पूर्ण स्वतंत्रता वाला प्रस्ताव गांधी जी ने लाया। उपस्थित स्वतंत्रता सेनानियों ने भारत को अंगरेज़ सरकार के क़ब्ज़े से आज़ाद कराने का संकल्प लेते हुए उस प्रस्ताव को मंज़ूर किया। यह भी निश्चय किया गया कि इसके लिए सत्याग्रह किया जाए। लाहौर की हाड़ कंपा देने वाली ठंड में 31 दिसंबर के अरुणोदय के समय रावी नदी के तट पर आखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस महासमिति ने स्वतंत्र भारत की घोषणा की और आज़ाद हिंद का तिरंगा देश के युवा नेता पंडित जवाहरलाल नेहरू ने लहराया। लोगों ने “वंदेमातरम्‌” पूरी निष्ठा और उल्लास से झंडावंदन करते हुए गाया। ‘इंक़लाब ज़िंदाबाद’ के नारे लगाए गए।

स्वराज्य की घोषणा तो हो गई लेकिन फ़िरंगियों को देश और सत्ता से निकालना अभी बाक़ी था। प्रस्ताव पास हो जाने के बाद यह तय हुआ कि आगे उठाए जाने वाले क़दमों के कार्यक्रम की योजना अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी बनाएगी। मतलब साफ़ था कि यह काम गांधी जी को ही करना था। गांधी जी ने वहीं पूर्णस्वराज्य की प्रतिज्ञा लिख डाली। यह निर्णय हुआ कि किसी सुनिश्चित दिन इस प्रतिज्ञा को सार्वजनिक रूप से पढ़ा जाएगा। पंडित मोतीलाल नेहरू ने सुझाया कि वसंत पंचमी के दिन सुबह दस बजे का मुहूर्त बड़ा ही शुभ है। उस साल (1930) वसंत पंचमी का दिन 26 जनवरी को पड़ता था।

26 जनवरी 1930 को पूरी तरह से देश को स्वतंत्र कराने के लिए पूरे देश में प्रतिज्ञा ली गई। तब से 26 जनवरी हमारे देश के इतिहास की महत्वपूर्ण तारीख़ बन गई। उसी के बाद से यह दिन स्वाधीनता दिवस के रूप में मनाया जाने लगा। यह प्रतिज्ञा ली गई, “ग़ुलामी सहन करना ईश्वर और देश के प्रति द्रोह है। सल्तनत के मातहत, देश का राजनीतिक-आर्थिक शोषण हुआ है। सामाजिक, नैतिक और आध्यात्मिक पतन हुआ है, इसलिए हम प्रण करते हैं कि जब तक पूर्ण स्वराज्य नहीं मिलेगा, तब तक हम इस अधम सत्ता का अहिंसक असहयोग करेंगे और क़ानून का सविनय भंग करेंगे।”

उस दिन पूरे देश में प्रभात फेरी निकाली गई। सभाएं की गईं। प्रतिज्ञा ली गईं। एक नई आशा और उत्तेजना जगी। सबकी आंखें भविष्य और गांधी जी पर टिक गईं। फिर स्वतंत्रता आंदोलन अपने विभिन्न चरणों से गुज़रता हुआ आगे बढ़ता गया। सविनय अवज्ञा आंदोलन, नमक सत्याग्रह, शोलापुर विद्रोह, चटगांव की क्रांति, द्वितीय असहयोग आंदोलन, पूना पैक्ट, लीग का दो राष्ट्र सिद्धांत, भारत सरकार अधिनियम, प्रांतीय सरकारों का गठन, अगस्त प्रस्ताव, क्रिप्स मिशन, भारत छोड़ो आंदोलन, आज़ाद हिंद फ़ौज़ का गठन, वेबेल योजना, कैबिनेट मिशन, प्रत्यक्ष कार्रवाई दिवस, माउंट बेटन योजना आदि चरणों से गुज़रते हुए भारत आज़ाद हुआ।

स्वतंत्र भारत और उसका संविधान

कैबिनेट मिशन योजना के अनुसार स्वतंत्र भारत के संविधान की रचना के लिए 1946 में संविधान सभा का गठन किया गया। भारतीय संविधान सभा की पहली बैठक 9 दिसंबर 1946 को नई दिल्ली में हुई, जिसमें भरतीय नेताओं के साथ कैबिनेट मिशन ने भाग लिया। इसकी अध्यक्षता डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा ने की थी। बाद में डॉ. राजेन्द्र प्रसाद संविधान सभा के अध्यक्ष बनाए गए। संविधान सभा के अन्य प्रमुख सदस्य थे डॉ. बी.आर. आंबेदकर, टी.टी. कृष्णमाचारी और डॉ. एस. राधाकृष्णन। डॉ. बी.आर. आंबेदकर ड्राफ़्टिंग कमेटी के चेयरमैन थे। पं. जवाहरलाल नेहरू और सरदार वल्लभभाई पटेल अंतरिम सरकार के प्रधानमंत्री और गृहमंत्री के रूप में इसमें शामिल हुए।

भारत को एक संविधान देने के विषय में कई चर्चाएं, सिफ़ारिशें और वाद-विवाद किया गया। कई बार संशोधन के बाद भारतीय संविधान को अंतिम रूप दिया गया। भारत का संविधान तैयार करने में इस सभा को तीन वर्ष लगे। इसकी बैठकें 11 अधिवेशनों में 165 दिन हुईं। 21 फरवरी, 1948 को संविधान का प्रारूप तैयार हुआ और अध्यक्ष की हैसियत से डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने 26 नवम्बर 1949 को इस पर हस्ताक्षर किए। 26 जनवरी, 1950 से यह संविधान लागू किया गया। इसके अनुसार भारत एक ‘सर्वप्रभुत्वसंपन्न लोकतंत्रात्मक गणराज्य’ बन गया। संविधान के अनुसार नए चुनाव 1952 में हुए। इसके पहले अंतरिम सरकार ही कार्यरत रही।

 

हमारे राष्ट्रीय ध्वज के इतिहास के बारे में जानने के लिए कृपया इस लिंक (तिरंगे का ग़लत इस्तेमाल न करें…!) पर देखें।

9 टिप्‍पणियां:

  1. गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनायें.

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  2. गणतंत्र दिवस पर सार्थक जानकारी देती अच्छी पोस्ट ..

    गणतंत्र दिवस की शुभकामनायें

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  3. बहुत ही अच्छी जानकारी दी आपने.. एक पूरा इतिहास.. लेकिन आज के अखबार में एक बात पर बड़ा अफ़सोस हुआ. इंडिया दैट इज भारत तो पता था लेकिन यह आज ही पता चला कि संविधान सभा में इंडिया और भारत के नाम पर वोटिंग की गयी और ५१ वोटों के खिलाफ ३८ वोटों से भारत हार गया!
    कोई बात नहीं!! गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं!!

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  4. ..बढ़िया वृतांत... गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामना

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  5. आज के दिन के लिए सार्थक और जानकारी परक आलेख.
    गणतंत्र दिवस की शुभकामनाये.
    --

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  6. गणतंत्र दिवस के अवसर पर आपको भी शुभकामनाएं लेकिन अंत मे यही कहना चाहूंगा कि-

    "लमहों ने खता की थी लेकिन सदियों ने सजा पाई।"
    इस सामयिक पोस्ट के लिए धन्यवाद।.

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    1. आज के चर्चा मंच पर आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति
      का अवलोकन किया ||
      बहुत बहुत बधाई ||

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  7. बेहद रोचक जानकारी ... तथ्यात्मक...स्पष्ट और प्रवाहमयी भाषा।

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  8. बहुत बेहतरीन और प्रशंसनीय.......
    मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है।

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