मंगलवार, 17 जनवरी 2012

भारत और भुखमरी

भारत और भुखमरी

arunpicअरुण चन्द्र रॉय

कुछ माह पूर्व इसी ब्लॉग पर इसी शीर्षक से मेरा एक आलेख प्रकाशित हुआ था. बाद में किसी अखबार ने उसे प्रकाशित कर दिया. ब्लॉग जगत में लोग जिन मुद्दों पर लिखते हैं मुझे भी लग रहा था कि ये क्या मैंने लिख दिया. वास्तव में ब्लॉग जगत एक ऐसी आभासी दुनिया हैं जहाँ से ज़मीनी हक़ीक़त दिखता नहीं शायद. खैर. अभी एक सम्मलेन में प्रधानमंत्री जी ने कहा कि देश में कुपोषण और भुखमरी की हालत शर्मनाक है. हम कई अफ़्रीकी देशों से भी नीचे हैं. लेकिन अफ़सोस कि इतने बड़े मुद्दे को ऐसे ढक दिया गया कि इस पर एक दिन भी चर्चा नहीं हुई. सारी चर्चाएं हाथियों को ढकने पर ही लगी रहीं.

एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार पांच साल के कम के अत्यंत कुपोषित बच्चों की कुल संख्या में से लगभग आधे बच्चे भारत में हैं. विश्व बैंक के मुताबिक दुनिया भर में 146  मिलियन बच्चे कुपोषित हैं और इनमे से लगभग 65 मिलियन बच्चे भारत में हैं. देश में पांच साल से कम के बच्चो में लगभग 46% बच्चो को नियमित भोजन प्राप्त नहीं होता है. एक और अध्ययन के अनुसार लगभग 19 लाख बच्चे जो पैदा तो जीवित होते हैं किन्तु अपना प्रथम जन्मदिन नहीं मना पाते हैं. भारत में प्रत्येक 1000 जीवित पैदा हुए बच्चों में से 32 बच्चे जन्म के कुछ ही माह के बाद कुपोषण का शिकार हो मर जाते हैं. और यह विडम्बनापूर्ण स्थिति केवल अफ़्रीकी देशों में ही है. बच्चो में कुपोषण के मामले में हम हैती, मंगोलिया और वियतनाम जैसे देशो के साथ खड़े हैं.

विश्व के अन्य देशो जहाँ कुपोषण और भुखमरी मौजूद है वह या तो प्रतिकूल प्राकृतिक अवस्था जैसे बाढ़, भूकंप हैं या फिर वे देश युद्ध जैसी परिस्थिति में रह रहे हैं. विडंबना यह है कि ऐसी स्थिति भारत में नहीं है फिर भी देश के आधे बच्चे भूखे रह रहे हैं. यह स्थिति मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखण्ड, ओड़िसा, बिहार और पूर्वोत्तर राज्यों में अधिक भयावह है. ये वही क्षेत्र हैं जहाँ सरकार की मशीनरी या तो नहीं पहुची है या पहुच कर भी प्रभावी नहीं रही है. राष्ट्रीय स्वस्थ्य सर्वेक्षण में मध्य्रदेश और छतीसगढ़ में बच्चो में कुपोषण की प्रतिशत 60% से भी अधिक है.

आश्चर्य है कि दहाई में जी ड़ी पी में वृद्धि, आर्थिक और सामरिक महाशक्ति का दावा करने वाले देश के प्रधानमंत्री जी को कुपोषण को राष्ट्रीय लज्जा मानना पड़ रहा है और कहना पड़ रहा है कि इस बारे में योजना बनाने की जरुरत है. अब कौन पूछेगा संसद और सरकार से कि इन पैंसठ सालों में सरकार इस बारे में कोई ठोस कदम क्यों नहीं उठा सकी ? योजना आयोग क्या कर रही थी इन वर्षो में ? चूँकि देश के ये बच्चे ना तो वोट बैंक हैं कि इन पर ध्यान रखा जाए,  न उपजाऊ ज़मीन कि इनके अधिग्रहण के लिए को योजना बने, न ही खनिज खान  कि इनसे राजस्व प्राप्त होगा, या फिर कोई स्पेक्ट्रम भी नहीं हैं ये बच्चे की नीलाम कर दिया जाये कौड़ी के भाव जल्दीबाजी में... !

18 टिप्‍पणियां:

  1. सुरसा के समान मुँह बाए खाड़ी इस समस्या को जिस तरह आपने प्रस्तुत किया है वह सोती हुई व्यवस्था की आँख खोलने के लिए पर्याप्त है!! लेकिन मीडिया भी इस ओर उदासीन है!!
    आभार आपका इस आलेख के लिए!!

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  2. arun bhtrin jankari bhtrin prstutikaran lekin afsos ke saath is blog pr hindi ke sthan pr angrezi lipi me tippani kr shrmindgi uthana pdh rhi hai me koshish krunga ke agli bar aesi shrmindigi mujhe na uthana pdhe ........akhtar kha akela kota rajsthan

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    1. भाई अख़्तर ख़ान अकेला जी,

      अपनी बात और भावनाएंप्रकट करना ज़रूरी है, चहे वह किसी भी लिपि में हो ।

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  3. ठीक कहा आपने ये न तो वोट बैंक हैं और न ही कोई स्पेक्ट्रम आदि आदि जो इनकी बोली लगे जाये तो क्यों इनका ध्यान दिया जाये

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  4. जो भी व्‍यक्ति आपके फायदे का हो बस उसी पर ध्‍यान दिया जाता है।

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  5. सार्थक लेख .. आदिवासी इलाके में लोग कंकाल की तरह दिखते हैं .

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  6. वाह!
    बहुत बढ़िया!
    अपनी सुविधा से लिए, चर्चा के दो वार।
    चर्चा मंच सजाउँगा, मंगल और बुधवार।।
    घूम-घूमकर देखिए, अपना चर्चा मंच
    लिंक आपका है यहीं, कोई नहीं प्रपंच।।
    आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल बुधवार के चर्चा मंच पर भी होगी!

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  7. हमारे आदरणीय नेताओं के पास आज -कल बच्चों और देश की जनता के बारे में सोचने की फुरसत ही कहाँ है ...सार्थक आलेख

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  8. सरकार और उसके नुमाइन्दों द्वारा आमतौर पर यह तर्क दिया जाता है कि कुपोषण की समस्या का मूल कारण आबादी है पर अगर हम अपनी तुलना चीन से करेंगे तो हमारी सरकार और उसके नुमाइन्दों का तर्क हमें खोखला और बेमानी लगने लगता है क्योंकि चीन की जनसंख्या हमारे देश से कहीं अधिक है। फिर भी वहां कुपोषण के शिकार बच्चे हमारे देश से छह गुणा कम है। सरकार नें बच्चों में कुपोषण को दूर करने के लिए कई योजनायें और जागरूकता कार्यक्रम भी चलायें हैं। छह वर्ष तक के बच्चों के स्वास्थ्य में सुधार लाने के लिए समेकित बाल विकास योजना शुरू कई गई। केन्द्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के अधीन खाद्य एवं पोषण बोर्ड लोगों को स्वास्थ्य के प्रति जागरूक बनाने के लिए हर प्रकार के दिशा निदेश दिए गए हैं .क्या इसे भूखनरी एवं कुपोषण दूर हो जाएगी ! आपका पोस्ट अच्छा लगा । .धन्यवाद ।

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  9. वे भी कम उत्तरदायी नहीं जिन्हें खुद का तो ठिकाना नहीं पर बच्चे पैदा कर छोड़ देते हैं सड़क पर कचरे में जीने के लिए .....भुखमरी और कुपोषण की समस्या का एक बहुत बड़ा कारण अज्ञानता भी है. पर सवाल यह भी है कि आखिर सरकार के उत्तरदायित्व क्या हैं ? एक कठोर बहस यह भी होनी चाहिए कि संतानोत्पादन के नैसर्गिक अधिकार पर शासन का कोई नियंत्रण क्यों नहीं होना चाहिए ?

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    1. आपका कहना हमें वैसा ही लग रहा है जैसे महान लोग कहते हैं कि गरीब गंदे होते हैं।

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  10. भारत में कुपोषण की समस्या पर सही और सटीक टिप्पणी...मीडिया को इस ओर ध्यान देना चाहिए.
    शायद सरकार इस तरफ गंभीरता से विचार करे...

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  11. मार्मिक होने के साथ साथ व्यंग्य की धार लिए है यह पोस्ट .आखिर प्रधान मंत्री हर मुद्दे पे सच बोलके अपनी फजीहत क्यों करवातें हैं .अपने साथ अर्थ शाश्त्र की भी ऐसी तैसी करवा रहें हैं .ऐसा काग भगोड़ा निगोड़ा है किस काम का ?झूठ बोलने के लिए राष्ट्रीय बंदर दिग्विजय सच बोलने के लिए सोनिया ने मनमोहन को नियुक्त किया है .

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  12. कलमकारों को मात दे दी आपने एक ही पोस्ट तमाम घोटाले समो के सहज रूप .बधाई .

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  13. अरुण जी
    ,
    समस्‍या बच्‍चों की तरफ ध्‍यान देने की नहीं, बल्कि हमारी खाद्य वितरण प्रणाली में खामी होने की है। इसलिए इसे केवल सरकार की नाकामी कहकर हवा में उड़ा देने से काम नहीं चलेगा। साथ ही बाकी टिप्‍पणीकार जिस तरह से टिप्‍पणी कर रहे हैं वह केवल समस्‍या को ऊपर से देख रहे हैं। बच्‍चों में कुपोषण की समस्‍या की जड़ें हमारी सामाजिक व्‍यवस्‍था में भी हैं। खैर यह एक लम्‍बे विमर्श का विषय है।

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  14. और केवल बच्‍चे ही नहीं बॉडी मास इंडेक्‍स के हिसाब से हमारी आबादी के 30 प्रतिशत वयस्‍क भी कुपोषित हैं।

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  15. विश्वबैंक के आँकड़े साफ गलत लग रहे हैं।

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