बुधवार, 21 मार्च 2012

यह पपीहे की रटन है


हरिवंशराय बच्चन

11. यह पपीहे की रटन है

यह पपीहे की रटन है !

बादलों  की घिर घटाएं
भूमि की लेती बलाएं ,
खोल दिल देती दुआएं देख किस उर में जलन है?
यह पपीहे की रटन है !

जो  बहा  दे, नीर आया,
आग का फिर तीर आया,
वज्र भी बेपीर आया कब रुका इसका वचन है?
यह पपीहे की रटन है !

यह न पानी से बुझेगी,
यह न पत्थर से दबेगी,
यह न शोलों से डरेगी, यह वियोगी की लगन है!
यह पपीहे की रटन है !
***

17 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही बेहतरीन और प्रशंसनीय प्रस्तुति....
    इंडिया दर्पण की ओर से शुभकामनाएँ।

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  2. बहुत ही बेहतरीन और प्रशंसनीय प्रस्तुति....
    इंडिया दर्पण की ओर से शुभकामनाएँ।

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  3. आपकी पोस्ट कल 22/3/2012 के चर्चा मंच पर प्रस्तुत की गई है
    कृपया पधारें
    http://charchamanch.blogspot.com
    चर्चा - 826:चर्चाकार-दिलबाग विर्क

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  4. यह न पानी से बुझेगी,
    यह न पत्थर से दबेगी,
    यह न शोलों से डरेगी, यह वियोगी की लगन है!
    यह पपीहे की रटन है !
    ***bahut achcha lga padhkr......

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  5. बहुत खूबसूरत....
    बच्चन साहब का कोई जवाब नहीं...
    सांझा करने का शुक्रिया मनोज जी.

    सादर.

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  6. इस रचना को यहाँ पढ़वाने के लिए आभार ...

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  7. बच्चन तो आखिर बच्चन ही हैं -यह पपीहे की रटन है !

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  8. यह न पानी से बुझेगी,
    यह न पत्थर से दबेगी,
    यह न शोलों से डरेगी, यह वियोगी की लगन है!
    यह पपीहे की रटन है !
    दर्द नशा है इस मदिरा का, विगत स्मृतियाँ साकी हैं

    पीड़ा में आनंद जिसे हो ,आये मेरी मधुशाला .
    वही सर्व व्यापी पीड़ा की अभियक्ति यहाँ भी है .

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  9. बहुत सुन्दर शब्दों का संसार!...सुन्दर प्रस्तुति!

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