रविवार, 11 मार्च 2012

प्रेरक प्रसंग-27 : अपने मन को मना लिया

प्रेरक प्रसंग-27

प्रेरक प्रसंग – 1 : मानव सेवा, प्रेरक-प्रसंग-2 : सहूलियत का इस्तेमाल, प्रेरक प्रसंग-3 : ग़रीबों को याद कीजिए, प्रेरक प्रसंग-4 : प्रभावकारी अहिंसक शस्त्र, प्रेरक प्रसंग-5 : प्रेम और हमदर्दी, प्रेरक प्रसंग-6 : कष्ट का कोई अनुभव नहीं, प्रेरक प्रसंग-7 : छोटी-छोटी बातों का महत्व, प्रेरक प्रसंग-8 : फूलाहार से स्वागत, प्रेरक प्रसंग-९ : बापू का एक पाप, प्रेरक-प्रसंग-10 : परपीड़ा, प्रेरक प्रसंग-11 : नियम भंग कैसे करूं?, प्रेरक-प्रसंग-12 : स्वाद-इंद्रिय पर विजय, प्रेरक प्रसंग–13 : सौ सुधारकों का करती है काम अकेल..., प्रेरक प्रसंग-14 : जलती रेत पर नंगे पैर, प्रेरक प्रसंग-15 : वक़्त की पाबंदी,प्रेरक प्रसंग-16 : सफ़ाई – ज्ञान का प्रारंभ, प्रेरक प्रसंग-17 : नाम –गांधी, जाति – किसान, धंधा ..., प्रेरक प्रसंग-18 : बच्चों के साथ तैरने का आनंद, प्रेरक प्रसंग-19 : मल परीक्षा – बापू का आश्चर्यजनक..., प्रेरक प्रसंग–20 : चप्पल की मरम्मत, प्रेरक प्रसंग-21 : हर काम भगवान की पूजा,प्रेरक प्रसंग-22 : भूल का अनोखा प्रायश्चित, प्रेरक प्रसंग-23 कुर्ता क्यों नहीं पहनते? प्रेरक प्रसंग-24 : सेवामूर्ति बापू प्रेरक प्रसंग-25 : आश्रम के नियमों का उल्लंघन प्रेरक प्रसंग–26 :बेटी से नाराज़ बापू

अपने मन को मना लिया

प्रस्तुतकर्ता : मनोज कुमार

बात फिनिक्स आश्रम की है। एक दिन सवेरे के भोजन के बाद क़रीब ग्यारह बजे रावजी भाई मणिभाई पटेल और गांधी जी खाने के टेबुल पर बैठे थे। जब सब खा लेते थे तब गांधी जी अपना खाना शुरू करते थे। गांधी जी भोजन कर रहे थे और उनके पास उनके परिवार के एक बुजुर्ग कालिदास गांधी बैठे थे। बा खड़ी-खड़ी रसोई घर में सफ़ाई का काम कर रही थीं। दक्षिण अफ़्रीका में एक मामूली व्यापारी के यहां भी रसोईघर का काम और सफ़ाई के लिए नौकर रहते थे। यहां उन्होंने बा को काम करते देखा तो उन्हें आश्चर्य हुआ। उन्होंने गांधी जी से कहा, “भाई, तुमने तो जीवन में बहुत हेरफेर कर डाला। बिल्कुल सादगी अपना ली। इन कस्तूरबाई ने भी कोई वैभव नहीं भोगा”

बापू ने खाते-खाते जवाब दिया, “मैंने इसे वैभव भोगने से रोका कब है?”

यह सुनकर बा ने हंसते हुए ताना मारा, “तो तुम्हारे घर में मैंने क्या वैभव भोगा है?”

गांधी जी ने उसी लहजे में हंसते-हंसते कहा, “मैंने तुझे गहने पहनने से या अच्छी रेशमी साड़ी पहनने से कब रोका है, और जब तूने चाहा तब तेरे लिए सोने की चूड़ियां भी बनवा लाया था न?”

बा कुछ गंभीर होकर बोलीं, “तुमने तो सभी कुछ लाकर दिया, लेकिन मैंने उसका उपयोग कब किया है? देख लिया कि तुम्हारा रास्ता जुदा है। तुम्हें तो साधु-संन्यासी बनना है। तो फिर मैं मौज-शौक मनाकर क्या करती? तुम्हारी तबीयत को जान लेने के बाद मैंने तो अपने मन को मना लिया।”

बा के इस कथन में “मैंने तो अपने मन को मना लिया” उनके सम्पूर्ण जीवन की सफलता की कूंजी है। बा बापू की साधना और उनके महाव्रतों के पालन में कभी भी बाधक नहीं बनीं। उलटे धीरे-धीरे वे बापू के व्रतों, आदर्शों और सिद्धांतों को अपनाती गईं और उनपर आचरण किया। बा की महात्वाकांक्षा बापू की तरह अपने जीवन को पूर्ण बनाने की नहीं थी। उनका एक सहज स्वभाव था बापू के अनुकूल होकर रहने का। अपनी इच्छा-अनिच्छा का त्याग करके अनेक कठिनाइयों और परिवर्तन को सहकर पति के रास्ते चलना आसान नहीं है। इसके लिए बहुत बड़े आत्म-बल और अद्भुत समर्पण की भावना ज़रूरी है। बा में ये दोनों बातें थीं।

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15 टिप्‍पणियां:

  1. वाकई मन को मना लेने में ही जीवन का सार निहित है. प्रेरक प्रसंग.

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  2. अपने मन को ली मना, बा को सतत प्रणाम |

    बापू करते कब मना, सामन्जस परिणाम ||

    सामन्जस परिणाम, आत्म-बल प्रेम समर्पण |

    सत्य अहिंसा तुल्य, नियंत्रित कर ली तर्षण |

    बापू बड़े महान, जोड़ते भारत जन को |

    उनमें बा के प्राण, भेंटती अपने मन को ||

    दिनेश की टिप्पणी : आपका लिंक
    dineshkidillagi.blogspot.com

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  3. प्रेरक प्रसंग |मनुष्य तो सामाजिक प्राणी है ही |सामंजस्य होना जीवन में बहुत आवश्यक है |तभी जीवन सुचारू रूप से चलता है |

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  4. “मैंने तो अपने मन को मना लिया”apne mn ko manana hi to badi bat hai baa ke jivn ki har ghatna hme sikh deti hai bahut achchi prastuti manoj jee thanks nd aabhar.

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  5. “मैंने तो अपने मन को मना लिया”…………प्रेम ,त्याग और समर्पण वो भी एक स्त्री का ………उसके बिना कोई भी पुरुष ज़िन्दगी मे कुछ नही बन पाया…………फिर चाहे बुद्ध हों या गांधी मगर यदि इसकी जगह वो खुद होते और स्त्री इस पथ पर चली होती तो शायद ज़िन्दगी मे कभी भी ऐसा ना कर पाते ………बस यही फ़र्क होता है स्त्री और पुरुष होने मे।

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  6. भारतीय स्त्रियाँ अक्सर अपने मन को मना ही लेती हैं .... बा ने शायद सम्पूर्ण रूप से मना लिया था अपना मन ...प्रेरक प्रसंग

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  7. मन को मन लेना ..
    अक्सर परिस्थितियों में ऐसा कर पाना ही उचित होता है ..
    प्रेरक प्रसंग..!

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  8. परिस्थितियों के अनुरूप मन को ढाल लेना और जिनसे आप प्रभावित हों उनके अनुरूप आचरण से बढाकर प्रेरक कुछ भी नहीं.. अनुकरणीय!!

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  9. बहुत ही बेहतरीन और प्रशंसनीय प्रस्तुति....
    शुभकामनाएँ

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  10. गाफिल जी हैं व्यस्त, चलो चलें चर्चा करें,
    शुरू रात की गश्त, हस्त लगें शम-दस्यु कुछ ।

    आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति
    सोमवारीय चर्चा-मंच पर है |

    charchamanch.blogspot.com

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  11. अनुकरणीय प्रसंग ....जीवन में सामंजस्य बिठाना तो आना ही चाहिए ,बा तो महान थीं ही .

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  12. यही हमारी भारतीय नारी की महानता है अपने मन को मनाकर सत्य के मार्ग का अनुसरण करना ओर त्याग ओर बलिदान की सर्वोच्च भावना युक्त जीवन दर्शन .........

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