सोमवार, 14 फ़रवरी 2011

मुखरित मौन


जब व्यापता है
मौन मन में
बदरंग हो जाता है
हर फूल उपवन में
मधुप की गुंजार भी
तब श्रव्य होती नहीं
कली भी गुलशन में
कोई खिलती नहीं ।
शून्य को बस जैसे
ताकते हैं ये नयन
अगन सी धधकती है
सुलग जाता है मन ।
चंद्रमा की चांदनी भी
शीतलता देती नहीं
अश्क की बूंदें भी
तब शबनम बनती नहीं ।
पवन के झोंके आ कर
चिंगारी को हवा देते हैं
झुलसा झुलसा कर वो
मुझे राख कर देते हैं .

हो जाती है स्वतः ही
ठंडी जब अगन
शांत चित्त से फिर
होता है कुछ मनन
मौन भी हो जाता है
फिर से मुखरित
फूलों पर छा जाती है
इन्द्रधनुषी रंजित
अलि की गुंजार से
मन गीत गाता है
विहग बन गगन  में
उड़ जाना चाहता है ..

संगीता स्वरुप

21 टिप्‍पणियां:

  1. प्रेम जब गहरा जाता है... मौन भी मुखर हो जाता है.. सुन्दर कविता...

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  2. क्या मौन में प्रेम मर जाता है ...

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  3. क्या मौन में प्रेम मर जाता है ...

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  4. प्रेम जब गहरा जाता है... मौन भी मुखर हो जाता है---- सुन्दर भाव। अच्छी रचना के लिये बधाई।

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  5. मौन के मुखर होने की सुन्दर अभिव्यक्ति बेहद उम्दा है दिल को छूती है।

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  6. मौन मुखरित हुआ , हम झांक आये . मन प्रफुल्लित हुआ इस उत्कृष्ट कविता से .

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  7. हो जाती है स्वतः ही
    ठंडी जब अगन
    शांत चित्त से फिर
    होता है कुछ मनन
    मौन भी हो जाता है
    फिर से मुखरित ... gahri abhivyakti

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  8. मन गीत गाता है
    विहग बन आसमान में
    उड़ जाना चाहता है ..
    --
    जी हाँ मन ऐसा ही होता है!
    बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति!

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  9. मौन मौन भी रहे तो बहुत कुछ कह जाता है, मौन जब मुखरित होता है तो फिर जो कहता है - वह अद्भुत होता है.
    बहुत सुंदर भाव.

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  10. सुन्दर भावपूर्ण अभिव्यक्ति.

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  11. सच है सब मन के भाव हैं...मौन को मुखरित होते देर नहीं लगती ..सुन्दर कविता .

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  12. यह मुखरित मौन ....इसको कैसे अभिव्यक्त करें ....

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  13. प्रेम पूरित मोवस्था ka बड़ा ही प्रभावशाली निरूपण किया है आपने...

    मर्मस्पर्शी अतिसुन्दर कविता...

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  14. हो जाती है स्वतः ही
    ठंडी जब अगन
    शांत चित्त से फिर
    होता है कुछ मनन


    सुंदर रचना -
    मन के बदले हुए भावों से बदल जाता है दृष्टिकोण -

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  15. .

    मौन भी हो जाता है
    फिर से मुखरित ....

    वाह ! उम्दा अभिव्यक्ति !

    .

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  16. मौन की आवाज बड़ी तीव्र होती है. इतनी तीव्र कि हमारे सामान्य कान उसे सुन नहीं पाते. जो सुन पाते है उनकी बात दुनिया वाले नहीं मानते. यही द्वंद है जो सदियों से चल रहा है और आगे भी चलेगा अनवरत..लगातार...लेकिन सुनना तो पडेगा मौन को ही क्योकि वही मूल स्वर, मूल एहसास है.

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  17. मेरे लिये तो बस ही मौन ही आज सर्वोत्तम टिप्पणी है!!

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  18. मौन ही मुखर होकर कविता में पुष्पित हो जाता है - सुन्दर विचार !

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  19. Mummmma

    bahut sunder kavita..:)
    badhayi aur shukriya bahut sara..

    :)

    pranaam mumma.....

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