सोमवार, 28 फ़रवरी 2011

अहम्


ये आसमान और मेरे अरमान
दूरी दोनों की एक जितनी सम्भव
जब - जब आसमान तक निगाह उठी
अरमानों का रेला सामने चला आता है।


ये तारे और मेरी चाहतें
दोनों की एक जितनी संख्या सम्भव
जब - जब तारे गिनने की कोशिश की
मेरी चाहतों का ढेर लग जाता है।






ये नदिया और मेरी कल्पनाएँ
दोनों का स्वभाव एक जैसा सम्भव
जब - जब लहरों को गिनना चाहा
मेरी कल्पना का समुद्र सामने आ जाता है ।




तुम और मैं , मैं और तुम
एक जैसे सम्भव
जब भी तुम तक पहुँचने की कोशिश की
मेरा " मैं " मेरे सामने आ जाता है|



संगीता स्वरुप

19 टिप्‍पणियां:

  1. आपको पढना एक सुखद अहसास होता है . कल्पनाओ के लोक में विचरण करते हुए भी पांव धरती पर होते है और . क्या लिखूं ?

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  2. आज तो बडी ही ज़बरदस्त रचना लिखी है……………गज़ब के भाव और अहम का चित्रण बखूबी किया है……………बहुत पसन्द आई।

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  3. ओह हो आज तो एक एक शब्द हकीकत सा लिख डाला है और चित्रों का साथ उन्हें और भी प्रभावी बना रहा है .
    बहुत अच्छी लगी ये रचना.

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  4. क्या बात है? बहुत खूबसूरती से तुलना कर गयी और भावों को उतर दिया सबके दिल में.
    बहुत सुंदर रचना.

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  5. ये नदिया और मेरी कल्पनाएँ
    दोनों का स्वभाव एक जैसा सम्भव
    जब - जब लहरों को गिनना चाहा
    मेरी कल्पना का समुद्र सामने आ जाता है ।
    aapki soch paripakw kahun yaa tarashi hui

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  6. वाह वाह वाह ! कमाल के साम्य ढूंढ निकाले आज तो संगीता जी ! बेहद खूबसूरत पन्क्तियाँ हैं ! आज लगता है सबके जज़्बात आपकी कलम से कागज़ पर उतर आये हैं ! बहुत ही सुन्दर रचना है ! बधाई और शुभकामनायें स्वीकार करिये !

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  7. चारों कवितायें चित्रों के अनुरूप ,अर्थपूर्ण हैं.

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  8. बहुत अच्छी लगी ये रचना

    "मेरे मैं" की बात अच्छी लगी.सच क्यों ये जब तब आगे आ ही जाता है. कब नियंत्रण करना सीख पायेगे

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  9. चारो कवितायेँ सुन्दर हैं... छोटी कविता लेकिन बहुत प्रभावपूर्ण.. खास तौर पर अंतिम कविता...

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  10. मानवीय वासनाओं का अन्तरिक्ष बनाते हुए , सुखद अनुभूति

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  11. तुम और मैं , मैं और तुम
    एक जैसे सम्भव
    जब भी तुम तक पहुँचने की कोशिश की
    मेरा " मैं " मेरे सामने आ जाता है|
    ehsas aur aham ka sunder mishran....

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  12. ये नदिया और मेरी कल्पनाएँ
    दोनों का स्वभाव एक जैसा सम्भव
    जब - जब लहरों को गिनना चाहा
    मेरी कल्पना का समुद्र सामने आ जाता है ।
    ...wah!waah!...kyaa baat hai!

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  13. अद्भुत सामंजस्य स्थापित किया है प्रकृति और मानव हृदय की भावनाओं के मध्य... और अंत में एक कड़वा सच!! बहुत अच्छी प्रस्तुति!!

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  14. तुम और मैं , मैं और तुम
    एक जैसे सम्भव
    जब भी तुम तक पहुँचने की कोशिश की
    मेरा " मैं " मेरे सामने आ जाता है|
    --
    सभी शब्दचित्र सशक्त और सुन्दर हैं!

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  15. एक ही तार में पिरोए चारों खंड सार्थक हैं ,केन्द्रीय भाव की गहनता द्योतित करते हुए.
    सुन्दर !

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  16. ॐ नमः सिवाय
    महाशिवरात्रि की आपको शुभकामनायें

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