बुधवार, 16 फ़रवरी 2011


मैं सुदामा प्रसाद ,’धूमिल’ जी की बहुचर्चित रचना ‘कविता’ पोस्ट कर रहा हूं, इस आशा और विश्वास के साथ की यह रचना आपके अंतर्मन को सप्तरंगी भावनाओं के धरातल पर आंदोलित करने के साथ उनके तथा मेरे प्रति भी आप सब के दिल में थोड़ी सी जगह पा जाए। मुझे आशा ही नही अपितु पूर्ण विश्वास है कि आप सब अपना COMMENT देकर मुझे प्रोत्साहित करने के साथ-साथ अपनी प्रतिक्रियाओं को भी एक नयी दिशा और दशा देंगे। धन्यवाद।।

प्रेम सागर सिंह
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कविता

उसे मालूम है कि शव्दों के पीछे
कितने चेहरे नंगे हो चुके हैं
और हत्या अब लोगों की रूचि नही-
आदत बन चुकी है

वह किसी गँवार आदमी की उब से
पैदा हुई थी और
एक पढ़े लिखे आदमी के साथ
शहर में चली गयी

एक संपूर्ण स्त्री होने के पहले ही
गर्भाधान की क्रिया से गुजरते हुए
उसने जाना कि प्यार
घनी आबादीवाली बस्तियों में
मकान की तलाश है
लगातार बारिस में भींगते हुए
उसने जाना कि हर लड़की
तीसरे गर्भपात के बाद धर्मशाला हो जाती है और कविता।
हर तीसरे पाठ के बाद

नही-अब वहां अर्थ खोजना व्यर्थ है
पेशेवर भाषा के तस्कर-संकेतों
और बैलमुत्ती इबारतों में
अर्थ खोजना व्यर्थ है
हाँ, हो सके तो बगल से गुजरते हुए आदमी से कहो-
लो, यह रहा तुम्हारा चेहरा,
यह जुलुस के पीछे गिर पड़ा था
इस वक्त इतना ही काफी है

वह बहुत पहले की बात है
जब कही, किसी निर्जन में
आदिम पशुता चीखती थी और
सारा नगर चौंक पड़ता था
मगर अब-
अब उसे मालूम है कि कविता
घेराव में
किसी बौखलाए हुए आदमी का
संक्षिप्त एकालाप है।
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8 टिप्‍पणियां:

  1. धूमिल जी की कविताओं में भाषा के अलग तेवर देखने को मिलते हैं। यही कारण है कि उनको न चाहने वाले भी उनकी प्रशंसा करते हैं।

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  2. निसंदेह एक प्रशंसनीय प्रस्तुति !

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  3. एक महान कवि की कालजयी रचना!! प्रेम सागर जी धन्यवाद!!

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  4. इस रचना के प्रसंशा ko शब्द ढूंढ पाना असंभव है....

    अद्वितीय....

    बेजोड़....

    आभार कि पढने का सुअवसर दिया...

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  5. इस अर्थ गहन कविता पढवाने के लिए आभार।

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  6. संवेदनाओं पर अच्छा प्रहार है ...धूमिल जी की रचना पढवाने के लिए आभार

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  7. बहुत सुन्दर भाव लिए रचना |पढवाने के लिए आभार
    आशा

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  8. कई बार पढ़ी है धूमिल जी की यह रचना लेकिन इसमें कुछ ऐसा है कि हर बार नई लगती है । इसे फिर से पढ़वाने के लिए धन्‍यवाद

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