मंगलवार, 3 मई 2011

परिकल्पना सम्मान २०१० और एक बैक बेंचर ब्लोगर की रिपोर्ट

                                                  अरुण रॉय



विगत एक माह से हिंदी ब्लॉग जगत के एक कुनबे में परिकल्पना सम्मान के साथ-साथ अंतर्राष्ट्रीय ब्लोगर सम्मलेन की खूब चर्चा थी. ज्यों ज्यों यह तिथि निकट आ रही थी प्रचार प्रसार की गति भी अपने चरम पर पहुंच रही थी. जैसे आज कल एक के साथ एक फ़्री होता है, वैसे ही अचानक इस सम्मान के साथ 'हिंदी साहित्य सम्मलेन' की स्वर्ण जयंती की बात भी जुड़ गयी. इस सम्मलेन के प्रचार में आधुनिक तकनीक का खूब उपयोग हो रहा था .. दिन में कई कई बार न सिर्फ़ एक ही सूचना के मेल प्राप्त हो रहे थे बल्कि वही एक ही सूचना कई कई ब्लोगर मित्र से भी प्राप्त हो रहे थे. यूं कहिये कि मीडिया जिस तरह किसी भी घटना को सनसनीखेज बना देती है वैसे ही इस समारोह को सनसनीखेज बनाने की पूरी कोशिश की गई!

अपनी स्वाभाविक वेशभूषा को थोड़ा बेहतर रूप और रंग देकर जब मैं ३० अप्रैल २०१०. को साढ़े चार बजे हिंदी भवन के सभागार में पहली मजिल पर प्रवेश कर रहा था तो सामने दरवाज़े पर लिखा था सीट क्षमता १६१. (ठीक से याद नहीं, उस वक़्त तो अपनी क्षमता का उपयोग कर पहले सीट लेने की फ़िक्र थी!). मैं यही सोचते सोचते सभागार में प्रवेश कर ही रहा था कि सीट भी मिलेगी कि नहीं, पर जब अंदर पहुंचा और सीटों को हमारा इंतज़ार करते पाया, तो राहत की एक लम्बी सांस ली!

अपनी फ़ितरत ने वहां भी मेरा पीछा नहीं छोड़ा। अपनी ज़िन्दगी में हमेशा से मैं बैक बेंचर रहा हूँ, इसलिए पीछे की सीट पर ही सहज रहता हूँ! इसलिए कोई खास चिंतित नहीं था! आपको बता दूं, सभागार के सबसे पीछे कोने में खड़े होके किसी सम्मलेन को देखने का आनंद कुछ और ही होता है! एक तो समग्रता से सम्मलेन दिखता है, उस पर से मंच और दर्शक दोनों दीखते हैं यहाँ से, और वह भी दिख जाता है, जो कुछ लोग न दिखाना चाहते, साथ ही वह भी जो कुछ लोग न देखना चाहते।

जो सबसे पहले मुझे दिखा वह यह कि .. आधे से अधिक सीट तो खाली थी. यानी आयोजक और ब्लोगर (अंतर्राष्ट्रीय भी!) और उनके परिवार के सदस्यों.. तीनो को  मिला के सौ से अधिक लोग नहीं! मुझे क्या, मुझे तो बैक बेंच मिल ही गई थी।

पूरे सम्मलेन को दो सत्रों में बांटा गया था. पहले सत्र में 'हिंदी साहित्य निकेतन' की यात्रा पर चर्चा और ब्लोगरों का सम्मान होना था जबकि दूसरे सत्र में हिंदी ब्लोगिंग पर चर्चा होनी थी. मैं पहचान तो नहीं पाया लेकिन सुना कि पुण्य प्रसून वाजपेयी और उनके साथ कुछ और नामी गिरामी ब्लोगर वहां मौजूद रहने वाले हैं. इन ब्लोगर के बारे में यह सबको पता है कि ये चाहते हैं कि इनकी बात हिंदी ब्लोगिंग दुनिया में सुनी जाये लेकिन वे स्वयं कितने ब्लॉग तक जाते हैं, कितने ब्लोगर को पढ़ते हैं इसके बारे में मुझे संशय है क्योंकि विगत दो वर्षों से हिंदी ब्लॉग जगत में रहने के बाद भी नामी गिरामी ब्लोगर अभी तक मेरे ब्लॉग पर नहीं पहुचे हैं न ही मेरे अन्य ब्लोगर साथियों के ब्लॉग पर उनकी उपस्थिति कभी दिखी है. मुझे क्या, मैं तो बैक बेंच पर था।

मैं तो उन्हीं बलोगरों को अपनी निगाह से टटोल रहा था जो हम जैसे साधारण ब्लोगर के साथ ब्लोग जगत में अलाप-वार्तालप कर लेते हैं, और वो मुझ दिख भी रहे थे। … और मेरे मन से बेसाख्ता निकल भी रहा था … अरे ये ‘वो’ है …! जो बड़े और नामी गिरामी लोगों को (पु.प्र.वा. टाइप के) खोज रहे थे उन्हें, पता नहीं मेरी तरह का उद्गार (अरे ये ‘वो’ है) प्रकट करने का मौक़ा मिला या नहीं …?! मुझे क्या मेरा बैक बेंच तो सुरक्षित था ही।

… मैं तो मन ही मन अपने साथी ब्लॉगर्स को देख कर खुश भी हो रहा था उनसे बातें भी कर रहा था, (जी हां, मन ही मन)।

जैसा कि आम है, उत्तराखंड के माननीय मुख्यमंत्री महोदय निशंक जी, देर से पहुंचे. उनके आने में, (देर से) ब्लोगर का कोई योगदान नहीं था, ना ही वे ब्लोगर के लिए आये थे, (?!) नहीं समझे, वे तो  'हिंदी साहित्य निकेतन' और अपनी पुस्तक के विमोचन के लिए आये थे. ऐसे में गत एक माह से जो प्रचार अभियान ब्लॉग जगत में चल रहा था वह बेमानी लगा. कुछ हद तक लगा कि ब्लोगर समुदाय को अँधेरे में भी रखा गया था. वे अपने राज्य को बेच गए राजनीतिज्ञ की तरह.

मुझे क्या बैक बेंच पर रहने वाले को इससे कोई फ़र्क़ पड़ता है क्या?

इस पूरे प्रकरण में जो सबसे दुखद और अपमान जनक था वह था श्री रामदरश मिश्र , वरिष्ठ साहित्यकार और श्री प्रभाकर  श्रोत्रिय जी की अवहेलना. हास्य व्यंग्य कवि श्री अशोक चक्रधर जो वर्तमान में दिल्ली सरकार के हिंदी अकादमी के उपाध्यक्ष भी हैं, की उपस्थिति चौंकाने वाली थी लेकिन बाद में पता चला कि यह उनका पारिवारिक कार्यक्रम सा था वरना लाल किले के प्राचीर से गणतंत्र दिवस कवि सम्मलेन, अकादमी के अन्य साहित्यिक कार्यक्रमों में उनका तेज़ अलग ही रहता है. फिर बिजनौर के प्रकाशक के लिए हिंदी भवन का आवंटन चक्रधर जी के कारण ही हुआ होगा. अशोक हैं, ब्लॉगर भी हैं, नामी-गिरामी और बड़े टाइप के, तो बहुतों का शोक हरण करने की योग्यता रखते हैं, और जबसे बड़ा पद मिल गया है, क्षमता भी रखने लगे हैं। बैक बेंचर की सुध न भी लें तो मेरा क्या!

परिकल्पना सम्मान पूरी तरह अव्यवस्था के माहौल में हुआ. किसी का पुरस्कार किसी अन्य को मिल गया. मुझे क्या ….

हिंदी साहित्य निकेतन के ५० वर्षों की यात्रा गाथा की प्रस्तुतिकरण के बाद ब्लोगर बंधुओं को लगा कि सबका अपने अपने संकलन का सपना यहीं पूरा हो जायेगा. (मेरे मन में भी कुलांचे तो थी ही, पर मेरी तरह वह भी बैक बेंचर ही था)।  लेकिन जब एक वरिष्ठ ब्लोगर ने प्रकाशक महोदय से बात करने की कोशिश की तो पुस्तक प्रकाशन की दर सूची वहीँ बता दी गई. व्यापारियों से मित्रता भले चले व्यापार में मित्रता नहीं चलती। इसलिए मेरे अरमानों और मन के मुराद को बैक बेंचर रहने में ही भलाई थी।

यह सब होते होते रात के आठ बज गए थे. इसलिए हिंदी ब्लोगिंग को समर्पित सत्र को ख़त्म कर दिया गया. अकसरहां लोग यह कहते ही हैं कि  ‘अब आज कल लोग समर्पित होकर ब्लोगिंग करते ही नहीं।’ इसलिए भी ऐसे सत्र केवल समय ही अधिक लेता और हमारा जो वहां पर होने वाला सबसे महत्वपूर्ण और रोचक कार्यक्रम था (डिनर) और भी लेट हो जाता।

अंत में एनएसडी के दल द्वारा आकर्षक नाट्य प्रस्तुति की गई और पूरे कार्यक्रम की यह सबसे बड़ी उपलब्धि रही. 

बेंच की बैक पर बैठ कर मुझ जैसे बैक बेंचर को जो दिखा वह यह कि हिंदी ब्लॉग जगत के प्रतिष्ठित ब्लोगर पूरे कार्यक्रम के दौरान बस एक दर्शक से अधिक नहीं थे. चाहे वे खटीमा से पधारे श्री रूप चन्द्र शास्त्री जी हो या पुणे से पधारी रश्मि प्रभा जी  या क्षमा जी हो. 

रविन्द्र प्रभात जी और अविनाश वाचस्पति जी जो इस कार्यक्रम के सूत्रधार थे काफी मेहनत करते दिख रहे थे लेकिन यदि उन्हें भी इस बात का भान होता कि ब्लोगर के नाम पर जुटी भीड़ को प्रकाशक महोदय द्वारा अपहृत कर बस इस्तेमाल कर लिया जायेगा तो शायद परिकल्पना सम्मान और ब्लोगर सम्मलेन कभी और और कहीं और होता.


नामी-गिरामी बड़े ब्लॉगर, पुप्रवा की तरह के, तो सभागार को प्रवेश करने लायक भी नहीं समझे, शायद वहां आम ब्लॉगर ज़्यादा दिख गए होंगे उन्हें, जो इंतज़ार भी कर लेता है, झेल भी लेता है, (अब इस झेलाऊ को परिभाषित और स्पष्ट करने मत कहिएगा … मैं तो बैक … बेंचर हूं)।

बाकी  मुझ जैसे बैक बेंचर को सभी ब्लोगर मित्रों से कभी, कहीं और किसी पारिस्थिति में मिलना अच्छा ही लगता है. सो मुझ बैक बेंचर को बहुत ही अच्छा लगा। अधिकांश ब्लोगरों से मैं पहली बार ही मिल रहा था और लगा कि आभासी दुनिया के सम्बन्ध सर्वदा अधूरे ही रहते हैं . …


इसलिए …
एक बार फिर बैक बेंच पर बैठकर ब्लोगिंग की आभासी दुनिया को साक्षात देखने का अनुभव अनूठा रहा!

हाँ ! …. अहा ..! डिनर स्वादिष्ट था!!!
(बैक बेंचर होने का फ़ायदा … सबसे पहले पहुंच गया और वहां सबसे आगे था …)

61 टिप्‍पणियां:

  1. मनोज जी, आप की रिपोर्ट यथार्थ है। पर और भी यथार्थ शेष हैं।

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  2. लेकिन मनोज भाई स्वादिष्ट भोजन का स्वाद फीका हो गया\ जब आप सब को देख रहे थे तो आपने अपनी बहिन से मिलना भी गवारा नही किया। अब कहीं कभी सामने पद गये तो कान जरूर खीँचूँगी। रिपोर्ट बिलस्कुल सही है। शुभकामनायें।

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  3. एक बार फिर उपेक्षा तो हिन्दी की हुई.
    गत दिनों इंडियन सोसाइटी फॉर टेक्नीकल एजुकेसन के एक सम्मलेन में मुझे बोलने मौका नही मिल पाया क्योंकि मैं हिंदी में बोलना चाहता था.

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  4. अरुण जी ,

    बैक बेंचर रह कर काफी कुछ सार्थक लिख दिया ...भीड़ तो १०० से ज्यादा ही होगी ...

    आपकी यह बात ---- "रविन्द्र प्रभात जी और अविनाश वाचस्पति जी जो इस कार्यक्रम के सूत्रधार थे काफी मेहनत करते दिख रहे थे लेकिन यदि उन्हें भी इस बात का भान होता कि ब्लोगर के नाम पर जुटी भीड़ को प्रकाशक महोदय द्वारा अपहृत कर बस इस्तेमाल कर लिया जायेगा तो शायद परिकल्पना सम्मान और ब्लोगर सम्मलेन कभी और और कहीं और होता. " -- विचारणीय है ...

    आपसे छोटी सी मुलाक़ात अविस्मरणीय है ...आभार

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  5. @ निर्मला दीदी
    दीदी,
    प्रणाम!

    ऐसी धृष्टता मैं कर ही नहीं सकता।
    ये रिपोर्ट अरुण की है।
    मैं तो दिल्ली जा ही नहीं पाया।

    सादर,
    मनोज

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  6. इस आयोजन की हकीकत से परिचित करवाने के लिए धन्यवाद मनोज जी और बधाई अरुण रॉय जी को इस बेबाक रिपोर्ट के लिए।

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  7. लोग अक्सर पोस्ट करने वाले का नाम देखकर टिप्पणी करते हैं, ब्लॉग पोस्ट पढ़कर नहीं।
    हिंदी भवन में आयोजित किसी कार्यक्रम के दौरान उपजे विवाद और ब्लॉगिंग की दुनिया को अलविदा कहने वाले सुदीप सहगल के बारे में पूर्वांचल ब्लॉगर्स एसोसिएशन पर पढ़ा। क्या हिंदी भवन राजनाति का अड्डा है?
    अरुण जी! आपकी रिपोर्ट रोचक लगी।

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  8. मनोज जी,

    सहज पर्यवेक्षण!! तरल यात्रा वृतांत ;))


    ______________________

    सुज्ञ: ईश्वर सबके अपने अपने रहने दो

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  9. ... आपकी रिपोर्ट बिलस्कुल सही है।

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  10. लो भय्ये आ गए बड़े और नामी गिरामी ब्लॉगर यह कहने कि आपकी रिपोर्ट केवल सत्य है सत्य के सिवा कुछ भी नहीं ।
    वोटख़ोर नेता और सूदख़ोर पूँजीपति हमेशा से इसी तरह लोगों को महज़ एक तमाशाई भीड़ में बदल देते हैं लेकिन फिर भी आपको हिंदी भवन में हुई नौटंकी पसंद आई तो हमें भी आई ।
    शुक्रिया ।
    अपनी बैक बेंचर मंडली की सूची भेजने का कष्ट करें , सबको 'देख लूंगा।'
    हा हा हा

    न , न , न डरिए नहीं ।
    tobeabigblogger.blogspot.com

    पर ताज़ा माल पड़ा है ।

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  11. अरुण जी, आपने जो महसूसा बहुत दूर से महसूसा इसलिए बिल्‍कुल गलत महसूस गए। कई बार कानों से सुना और आंखों से देखा भी सही नहीं होता है। बिना विवेक के प्रयोग के जब आप एकतरफीय हो जाते हैं तो तफरीह के अलावा कुछ नहीं लिखा जाता।
    आपको मैं स्‍पष्‍ट कर दूं कि हिन्‍दी साहित्‍य निकेतन, बिजनौर का 50 वर्षीय इतिहास ऐसी मिसालों से भरा हुआ है। जब उन्‍होंने किसी भी विधा के उन्‍नयन के लिए अथक प्रयास किए हैं। शोध की स्थिति और उस पर इंटरनेट के कार्यों के बारे में भी मंच से काफी जानकारी दी गई थी परंतु आप जानते ही नहीं है कि शोध क्‍या होता है, तो बाकी चर्चा करने का कोई लाभ नहीं है।
    वहां ब्‍लॉगरों का बिल्‍कुल भी इस्‍तेमाल नहीं हुआ है। जैसा कि आपको गलतफहमी हुई है। सभागार की सीटों की क्षमता 161 नहीं 275 से भी अधिक की थी। उपस्थिति का यह जलवा था कि सभागार को खचाखच भरा ही कहा जा सकता है। कारण, काफी लोग बाहर पुस्‍तकों में व्‍यस्‍त थे। निकेतन ने अपने प्रकाशन की एक एक प्रति प्रत्‍येक दर्शक को बतौर उपहार दी थी और अपनी पत्रिका शोध दिशा की प्रति भी। किसी भी समारोह में इस प्रकार की पुस्‍तकें फ्री में देने का चलन नहीं है। जबकि निकेतन अपने समारोहों में सदा से इस संस्‍कृति का अनुपालन करता रहा है। इसका कारण यह है कि निकेतन के सचिव डॉ. गिरिराजशरण अग्रवाल स्‍वयं प्रतिष्ठित साहित्‍यकार हैं और उनकी स्‍वयं की 200 से अधिक पुस्‍तकें प्रकाशित हैं।
    परिवारवाद तो राजनीति में भी आप देखते ही हैं परंतु साहित्यिक परिवारवाद में कुछ गलत नहीं होता है। प्रोफेसर अथवा लेखक की संतान साहित्‍य में बिना प्रतिभा के स्‍थापित नहीं हो सकती हैं। ऐसा ही सिनेमा और राजनीति और अन्‍य विधाओं में भी होता है। सिर्फ दुकानदारी इसका अपवाद है।
    हिंदी ब्‍लॉगरों के सम्‍मानों को निकेतन के साथ संपृक्‍त करने की वजह भी यही रही है कि उनकी साहित्यिक उपलब्धियां। उनसे जुड़ने से विधा को लाभ ही हुआ है। आज जब प्रकाशक किसी पुस्‍तक को बिना लाभ प्राप्ति के ध्‍येय को सामने रख आकलन किए बिना नहीं प्रकाशित करते हैं। निकेतन से यह जोखिम लिया है और पुस्‍तक को जितना उपयोगी और बेहतर रूप में प्रकाशित किया है। उसमें डॉ. अग्रवाल और उनके परिवार का श्रम भी जुड़ा हुआ है।
    अभी हाल फिलहाल में इस तरह की मूल्‍यांकनपरक पुस्‍तक अगले तीन साल में तो प्रकाशित होने से रही थी, जैसी की यह प्रकाशित हुई है। इसकी उपयोगिता का अहसास कीजिए, उपयोग कीजिए फिर देखिएगा आपकी सभी भ्रांतियों का निवारण स्‍वयं हो जाएगा।
    जहां तक पैसे लेकर पुस्‍तक प्रकाशित करने की बात है, वो तो हमारे हिंदी ब्‍लॉग जगत में कुछ ब्‍लॉगर ऐसा कर रहे हैं और हो सकता है कि आपका संपर्क उनसे हो गया हो। मैं इससे बिल्‍कुल इंकार नहीं करता कि यह प्रवृत्ति इन दिनों काफी बढ़ी है, पर क्‍यों ब्‍लॉगर बंधु चालीस दिन कविताएं लिखकर और कोरी वाहवाही पाकर यह सोचने लग जाते हैं कि वे एक महान कवि का दर्जा पाने के अधिकारी हो गए हैं। जबकि मैं अभी तक सभी क्षेत्रों में सीख रहा हूं और सीखते ही रहना चाहता हूं।
    आप एक बार खुले मन से अपनी पोस्‍ट को दोबारा से पढ़ें और स्‍वयं से प्रश्‍न करें कि क्‍या आप अकारण ही उद्वेलित नहीं हो गए हैं और आपने तो मुझसे भी बात करे बिना सिर्फ कल्‍पना के आधार पर इतना सनसनीखेज बना दिया है कि इस संबंध में और अधिक कहना इसे बेवजह तूल देना ही होगा।

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  12. अरुण जी,
    हिंदी साहित्य निकेतन के स्थापना दिवस के 50 वर्ष पूरे होने पर ये आयोजन था जिसके साथ ब्लोगेर सम्मलेन भी था.इस अवसर पर हिंदी साहित्य निकेतन ने निकेतन की पत्रिका,शोध दिशा, का दोहा विशेषांक भी प्रकाशित किया है.इसमें पृष्ठ 19 पर मेरे 11 दोहे, मेरी फोटो, संक्षिप्त विवरण के साथ छपे हैं.शायद ये पत्रिका उस सभागार में सबको दी गई हो.अगर आपको मिली हो तो देखिएगा.
    आपने उस आयोजन की बिलकुल तटस्थ होकर विस्तृत समीक्षा की है. जब मुख्य आयोजन के साथ अन्य आयोजन जुड़ जाता है या जोड़ दिया जाता है तो अन्य आयोजन का ऐसा हश्र स्वाभाविक हो जाता है.मैं तो वहां जाना पसंद करता हूँ जहाँ प्यार से बुलाया जा रहा हो. भेड़ चाल मुझे पसंद नहीं.आपका बैक बेंचर होना और स्पष्ट बोलना आपके अंतर्मुखी व्यक्तित्व का परिचायक है.आप इसे बरकरार रखियेगा.पढ़कर अच्छा लगा.

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  13. हम तो बैक बेंचर भी न थे. पर रिपोर्ट तो पढ़ने को मिल ही गई हमें क्या :)

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  14. अरुण जी,

    एक दम दिल से लिखी गई रचना। जिसमें आपने किसी का पक्ष नहीं लिया है, यानी ... बिल्कुल निष्पक्ष।

    बात जो सच है, उसे स्वीकार करना चाहिए। ब्लोगर को बुलाकर किसी प्रकाशन समूह को मंच दे देना ... मुझे तो तर्क संगत नहीं लगा। काफ़ी लोग ठगे से महसूस कर रहे हैं।

    इन बैसाखियों पर चलने की ब्लोग जगत को ज़रूरत है क्या? मुझे तो नहीं लगता। मुझे छपास रोग नहीं लगा है। बल्कि मैंने पाया है कि कई छपाई धन्धे वाले खुद मुझसे कहते हैं कि ये रचना हमें दे दीजिए।

    कुछ पोजिटिव चीज़ें भी इस सम्मेलन से उभर कर आई हैं। उन्हें संजोना चाहिए और कुछ ठोकरे भी हमने खाई हैं।

    हमें संभलना चाहिए ...

    मैं न निराश हूं, न हतोत्साहित। ब्लॉग जगत के उत्थान के सभी प्रयास में साथ दूंगा ... और अविनाश भाई ने जिन डॉ. गिरिराजशरण अग्रवाल (संयोग से अभी एक किताब उनकी पढ़ रहा हूं, अपने विचार ब्लोग के गांधी जी संबंधित आलेख के लिए, ‘गांधी ने कहा था’) की तारीफ़ में शब्द कहे हैं, उनकी ही कुछ पंक्तियां एक ग़ज़ल की समर्पित है,
    वो राही, तुम सोचो किस तरह पहुँचेगा मंज़िल पर
    जिसने ठोकरें खाकर सँभल जाना नहीं सीखा

    बदलते हैं, मगर यह देखकर कितना बदलना है
    हवाओं की तरह हमने बदल जाना नहीं सीखा

    सफ़र में हर क़दम हम काफ़िले के साथ हैं,
    हमने सभी को छोड़कर आगे निकल जाना नहीं सीखा

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  15. jo bhi ho.........hamne enjoy kiya!! aur logo ko puruskar grahan karte dekh kar khushi mahsoos kar rahe the...:)

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  16. aadarniy sir
    is sammelan ki charcha to kafi dino se ho rahi thi.man me utsukata bhi thi ki kisi ki riport is sandarbh me jarur aayegi to sabse pahle aapse hi vahan ka vistrit haal mila.padh kar thoda dukh bhi hua ki aisa nahi hona chahiye tha par hua jaisa ki aamtour hota hi rata hai .
    par aapne jis khoobsurati ke saath v majedaar dhang se uska ullekh kiya to dukh ki jagah aanand ne le li .
    vaise aapki back -benchar wali baat mujhe bahut bhai .kabhi kabhi peeche rahne ka bhi bada hi fayada mil jaata hai.
    bahut hi rochak v behtreen prastuti
    hardik naman
    poonam

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  17. .

    बहुत ही रोचक अंदाज़ में बयान किया है आपने सब कुछ । जबरदस्त रिपोर्टिंग है । वैसे एक बात सच है - " बैक बेन्चेर होने के बहुत से लाभ हैं "

    खैर हमें क्या ? हम तो बैठे-बैठे मुफ्त में बढ़िया रिपोर्ट पढ़ रहे हैं।

    .

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  18. अरुण जी
    आपके नज़रिये के तो सभी कायल रहे है शुरु से…………आप वहां से देखना शुरु करते है जहां सब देखना बंद कर देते हैं और यही आपको सबसे अलग करता है………जहां तक आयोजन की बात है तो हर आयोजन मे कुछ ना कुछ कमियां होती ही हैं वैसे आपने बिल्कुल सही जज किया है मगर हम ब्लोगर्स को मिलने का अवसर मिला हम तो उसी से खुश हैं बाकि ये आप भी जानते है और हम भी कि पुरस्कार पाने से ही सब कुछ नही हो जाता उसके लिये वैसी ही कटिबद्धता हमेशा बनी रहनी चाहिये वो ही सफ़ल लेखन का परिचायक है…………और हम ब्लोगर्स को अपने लेखन पर ही ध्यान रखना चाहिये और इन आयोजनो को सिर्फ़ सबसे मिलने की दृष्टि से देखना ही उचित है बाकि यदि हम कमियो की तरफ़ देखने लगेंगे तो इससे हमारा लेखन प्रभावित होगा जो हम नही चाहते…………लेकिन आपने जिस तरह एक एक चीज़ को निरीक्षण किया है वो काबिल-ए-तारीफ़ है क्योंकि आपकी कही बात भी अपनी जगह बिल्कुल सही है…………फिर भी यही कहूंगी …………जाने भी दो यारों……………ये ज़िन्दगी है इसमे सब चलता है।

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  19. आदरणीय अविनाश जी
    यदि मैं आज कविता लिख रहा हूँ अपने ब्लॉग पर तो उसका श्रेय आपको ही जाता है. मुझे याद है कि आप मेरे पहले पाठक थे. आप से कई मुलाकात भी हुई. आप हिंदी ब्लोगिंग के गाँधी है. आज एक रचनाकार, व्यंगकार ही नहीं बल्कि एक सहज, सरल और हिंदी के प्रति समर्पित ब्लोगेर के रूप में जो आपकी छवि मेरे मन में हैं वह किसी अन्य की नहीं है. ३० अप्रैल को मेरा वहां पहुँचने का कारण भी आप ही थे. आपके आग्रह पर मैं कई अन्य स्थानों पर भी ब्लोगर सम्मलेन में पहुंचा हूँ.
    आज ब्लॉग एक वैकल्पिक मीडिया के रूप में स्थापित हो गया है. लेकिन हमें नहीं भूलना चाहिए कि मुद्रक, प्रकाशक और पारंपरिक मीडिया हमारे प्रतिस्पर्धी हैं और ब्लॉग मीडिया उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती है. आज इन्टरनेट के युग में ब्लॉग के आने के बाद सबसे अधिक कोई प्रभावित हुआ है तो वे प्रकाशक ही हैं. ऐसे में प्रकाशक के साथ मंच साझा करना था हिंदी ब्लोगर को बराबरी पर क्योंकि आपके आह्वान पर ही सब ब्लोगर पहुंचे थे वरना प्रकाशक के लिए दिल्ली जैसे स्थान पर ऑडिएंस पाना थोडा मुश्किल है. इसका उदहारण पुस्तक मेला हैं. खैर.. मैं तो दिल्ली में ही हूँ सो मेरे लिए कुछ नहीं लेकिन जो निराशा बाहर से आये ब्लोगर को हुई होगी उसके बारे में सोचिये... वे आये थे हिंदी ब्लोगिंग:वैकल्पिक मीडिया विषय पर चर्चा करने. लेकिन समय आभाव के कारण उसे रद्द करना पड़ा आपको. एक ब्लोगर के नाते मुझे लगा कि उस सत्र को जारी रखना चाहिए था लेकिन चूँकि हिंदी साहित्य निकेतन का कार्य पूरा हो गया था और सम्पूर्ण कार्यक्रम उनके द्वारा ही प्रायोजित था सो आपकी मजबूरी भी थी. वरिष्ठ साहित्यकार और वरिष्ठ व्लोगर बंधु (आप सहित) हाशिये पर थे इस से आपकी अंतरात्मा भी इनकार नहीं करेगी.

    बाकी आपने कहा है कि "शोध की स्थिति और उस पर इंटरनेट के कार्यों के बारे में भी मंच से काफी जानकारी दी गई थी परंतु आप जानते ही नहीं है कि शोध क्‍या होता है, तो बाकी चर्चा करने का कोई लाभ नहीं है" .. इस बारे में मैं क्या कहूं. हिंदी और अंग्रेजी साहित्य में एम ए हूँ.. वित्त यानि फाइनांस में एम बी ए हूँ... मॉस कोम में पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा हूँ... सरकारी नौकरी के साथ साथ अपनी विज्ञापन एजेंसी का सञ्चालन कर रहा हूँ... दो इन्टरनेट पोर्टल एक रियल एस्टेट और एक विज्ञापन हेल्पलाइन का सञ्चालन कर रहा हूँ.. तो ऐसे में मुझे कहाँ ज्ञान होगा शोध और इन्टरनेट का.

    ज्ञान कम है ना, सो जो देखा सो कह गया !

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  20. सम्मेलन में,अरूणजी से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। उनकी रिपोर्ट मानो समारोह का लाईव टेलीकास्ट कर रही है।

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  21. वाह. क्या कमेंटरी दी है.

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  22. अरुण भाई कमाल किया है आपने.
    पहले बिना लाग लपेट के एक सुन्दर
    आँखों देखी,यथार्थ पर आधारित ब्लोगर्स
    की मनोदशा को दर्शाती रिपोर्ट पेश की है,
    फिर बिना झिझके आदरपूर्वक टिपण्णी
    करके मन जीत लिया है आपने.
    आपके और कुछ अन्य ब्लोगरजन के
    दर्शन हुए और मुलाकात हुई
    आपसे,यह मै इस सम्मलेन की सबसे
    बड़ी उपलब्धि समझता हूँ.
    बहुत बहुत आभार आपका और मनोज जी का भी
    इस शानदार प्रस्तुति के लिए.

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  23. @माननीय अविनाश वाचस्पति जी, आपने कहा कि-निकेतन ने अपने प्रकाशन की एक एक प्रति प्रत्‍येक दर्शक को बतौर उपहार दी थी और अपनी पत्रिका शोध दिशा की प्रति भी। किसी भी समारोह में इस प्रकार की पुस्‍तकें फ्री में देने का चलन नहीं है।

    शोध दिशा का पुराना अंक (अक्तूबर-दिसंबर 2010) था. उसका अवलोकन करने पर पता चला कि-पत्रिका त्रेमासिक है और उसके बाद जनवरी-मार्च 2011 व अप्रैल-जून 2011 भी प्रकाशित हो चुकी हैं. इसके अलावा डॉ. योगेन्द्रनाथ शर्मा "अरुण" की ग़ज़लों वाली किताब "बहती नदी हो जाइए" भी 2006 में प्रकाशित हो चुकी थीं. अब पुराना माल तो कोई भी दे सकता है, कुछ थोड़ा-बहुत नया मिला भी तो "वटवृक्ष" त्रेमासिक पत्रिका है,वो उनकी नहीं है.

    हम ब्लोगिंग जगत के "अजन्मे बच्चे" हैं और ब्लोगिंग जगत की गुटबाजी के जानकार भी नहीं है, लेकिन ब्लोगिंग जगत का अनपढ़, ग्वार यह नाचीज़ इंसान प्यार, प्रेम और इंसानियत की अच्छी भावना के चलते एक ब्लॉगर के बुलाने(आपके अनुसार बिन बुलाये) चला आया था. वैसे मेरे पेशेगत गलत भी नहीं था, क्योंकि जहाँ कहीं चार-पांच व्यक्ति एकत्रित होकर देश व समाजहित में कोई चर्चा करें. तब वहां बगैर बुलाये जाना बुरा नहीं होता है. बाकी हमारा तो गरीबी में आटा गिला हो गया हो. इन दिनों कुछ निजी कारणों से हमें भूलने की बीमारी है और उसी के चलते ही हम अपने डिजिटल कैमरे के एक सैट सैल(दो) और उसको चार्जर बिजली के प्लग में लगाये ही भूल आये क्योंकि हमें संपूर्ण कार्यक्रम की रुपरेखा की जानकारी नहीं थीं. हमने सोचा शायद कार्यक्रम अभी और चलने वाला है. तब क्यों विक सैलों को चार्जर कर लिया जाये. घर पहुंचकर याद आया तो आपको मैसेज किया और अगले दिन आपके 9868xxxxxx पर छह बार और 9717xxxxxx पर दो बार फ़ोन किया. मगर हमारी उम्मीदों के मोती बरसात के बुलबलों की तरह तुरंत खत्म हो गए.एक फ़ोन कई घंटों तक व्यस्त रहा और दूसरा रिसीव नहीं हुआ. अगले दिन हमें श्री अन्ना हजारे के इण्डिया गेट की कवरेज करने जाना था. जो उम्मीदों का टूटने का सदमा सहन नहीं कर पाने और सैल का सैट के साथ चार्जर तुरंत न खरीद(इन दिनों आर्थिक स्थिति डावाडोल है) पाने की व्यवस्था के चलते संभव नहीं पाया. अब यह तो पता नहीं कि-हमारा कैमरा कब दुबारा चित्र लेना शुरू करेगा, मगर उसकी कुछ "गुस्ताखी माफ़ करें" पोस्ट मेरे ब्लॉग डब्लूडब्लूडब्लू.सिरफिरा.ब्लागस्पाट.कॉम पर पढना न भूले.

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  24. आदरणीय अरुण जी चूँकि इस तरह के किसी समारोह में मैं पहली बार गया था ..और..दूजे मैं वहां केवल रश्मि दीदी से मिलने के लोभ के कारण गया था....तीजा यह की मैं...कई जगह आपसे असहमत भी हूँ.....जब कोई आयोजन होता है तो कुछ ना कुछ कमियां छिद्रान्वेषी लोग ढूंढ ही लेते हैं..
    इसलिए क्षमा प्रार्थी हूँ ...सकारात्मक भी शायद कुछ हुआ हो,...
    मगर जैसा की मैंने पहले ही कहा मैं इस दुनिया में एकदम नया हूँ....
    इस लिए छोटा मुह और बड़ी बात करने से हमेशा बचता हूँ !
    आशा है आप जैसा उदारमना मेरी इस टिप्पड़ी को कोई महत्व नही देगा !

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  25. अरुण जी ,
    यूं तो अब इस विषय पर न तो कुछ पढने का मन था न ही लिखने का लेकिन बातें हर बार कुछ ऐसी हो जाती है कि मजबूर होकर लिखना पडता है । आपने लिखा एक बैक बैंचर की रिपोर्ट ..पूछ सकता हूं कि बैक बैंचर होना ही क्यों चुना आपने जबकि आगे भी बैठने से किसी ने निश्चित रूप से आपको रोका नहीं होगा ....हां जानता हूं कारण आप दे चुके हैं और चूंकि मैं भी स्कूल के दिनों में बैक बैंचर ही रहा हूं इसलिए समझ सकता हूं कि इन कारणों के अलावा एक मुख्य कारण या फ़ायदा ये होता है बैक बैंचर होने का कि आप बाद में आराम से चुपचाप बैठ कर ऐसे आयोजनों की बखिया उधेड सकते हैं ...आखिर आपकी कौन सी जिम्मेदारी थी वहां जो आपको टेंशन रहती ..। आप कुछ बातों को सिरे से गायब कर गए रिपोर्ट में जो मुझे याद है कि आपने भी जरूर देखीभाली होंगी ..शुरूआत ही ब्लॉग दिग्गज ..श्रीश शर्मा उर्फ़ ई पंडित , जाकिर अली रजनीश , श्री चंडीदत्त शुक्ला , श्री दिनेश राय द्विवेदी जी के बोलों से हुई थी आप कहेंगे कि वो तो शायद समय बिताने के लिए करना है कुछ काम जैसा था ./...जारी

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  26. चलिए मान लिया कि ऐसा भी था तो भी क्या ब्लॉगर सचमुच ही इतने उपेक्षित दिखे या लगे आपको ...पहले भी इस बात को कह चुका हूं कि मुझे तो कोई चेहरा मलिन या अचंभित और क्षुब्ध सा नहीं दिखा ..और तो और पुरस्कार लेकर और उसे लेने से पहले सभी मजे में उस वातानुकूलित हॉल से बाहर आ जा रहे थे । कोई रोक टोक नहीं थी ...आपने हॉल के सीटों की संख्या तो देख ली मगर क्या कभी ये सोचा कि आज ब्लॉग पोस्टों पर टिप्पणियों की संख्या कितनी होती है ..जब पाठक जो कि ब्लॉगर ही हैं उन्हें टिप्पणी करने तक का समय नहीं है तो फ़िर सीटें भरने के लिए तो साक्षात दर्शन देने होते ।

    अब बात प्रकाशन परिवार की ..क्या ब्लॉगर सम्मान समारोह की उपस्थिति के बिना हिंदी साहित्य निकेतन अपनी पचासवीं वर्षगांठ नहीं मनाता , क्या मुख्यमंत्री निशंक , अशोक चक्रधर , पंडित रामदरस मिश्र जी ने खामख्वाह ही डेढ घंटे तक खडे होकर एक एक ब्लॉगर को न सिर्फ़ पुरस्कार दिया बल्कि उन्हें शुभकामनाएं भी दी और फ़ोटो भी खिंचवाई ..क्या इससे निशंक का वोट बैंक बढ जाएगा अब ...क्या अशोक चक्रधर जी के ब्लॉग पर अब करोडों टिप्पणियां आएंगी ..तो क्या थी आखिर ये वजह कि वे सम्मान करते रहे ब्लॉंगिंग का , ब्लॉगर्स का ....ज़ारी .....

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  27. अरूण भाई ,
    सच तो ये है कि बैक बैंचर होकर या फ़िर आगे बैठकर भी सिर्फ़ आनंद लेकर , सबसे मेल मुलाकात के इस अवसर का भरपूर लाभ उठाने के बाद घर पहुंचकर आसानी से ऐसे किसी भी आयोजन की कमियां तलाशना , उसमें मीन मेख निकालना जितना आसान है उतना ही कठिन है आयोजक की भूमिका निभाना ..अरे निभाना छोडिए सिर्फ़ एक किसी भी जिम्मेदारी को संभालना ..खुद को आयोजक की जगह पर रख कर सोचिएगा शायद आप समझ सकें कि मैं किस भावना से कह रहा हूं । चलिए खट्टी मीठी यादों के सहारे ही तो जीवन चलता है ...सो इस बार यादें खट्टी ही सही ...उम्मीद है कि स्नेह बनाए रखिएगा । शुक्रिया

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  28. क्या कहें.. काफी जानकारी मिली ...आभार

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  29. बैक बेंचर होने का फायदा ये होता है कि...निगाह से कुछ भी नहीं छूटता
    आपकी इस पोस्ट ने ये जाहिर कर दिया

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  30. अजय जी
    निशंक जी ना तो अपना वोट बैंक बढ़ाने आये थे ना ही ब्लोगर सम्मलेन में.. वे आये थे अपनी पुस्तक के विमोचन पर और निकेतन के पचासवी वर्षगाँठ के मौके पर. इसमें ब्लोगर का कोई योगदान नहीं है. ये बात मुझसे बेहतर आप जानते हैं. अशोक चक्रधर जी अपने साढू के कार्यक्रम में आये थे. ब्लोगर वैकल्पिक मीडिया पर प्रस्तावित सत्र को स्क्रैप करना ब्लोगिंग के महत्व को प्रकाशक और आयोजक की नज़र में कम होना है... और जितनी सहानुभूति आपको अविनाश जी से है उससे अधिक मुझे है... यह उनके प्रति विश्वासघात है. बाकी आप तो जल्दी आ गए थे.. मैं अंत तक अविनाश जी के साथ था. और हमारा आपका स्नेह पहले से अधिक होगा.. हमारा आपका सम्बन्ध पहले अधिक प्रगाढ़ होगा..

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  31. आप कहते हैं की एक महीने से इस कार्यक्रम का प्रचार हो रहा था पर मुझे तो इसके बारे में सहगल जी की विदाई पोस्ट से पता चला. मेरे भी लच्छन पुरे के पुरे नॉन सीरियस ब्लोगेर के हैं. खैर आपका अंदाजे बयां अच्छा लगा.

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  32. १-आपका रिपोर्ट लिखने का अंदाज बढ़िया लगा |
    २- इस आयोजन के बारे में जितनी पोस्ट लिखी गयी उनमे साफ़ लिखा था आयोजन हिंदी साहित्य निकेतन कर रहा है |
    ३- बेशक आयोजन एक परिवार का था पर हमें तो एसा लग रहा था जैसे हिंदी ब्लोगर्स ने इस आयोजन को हैक कर लिया हो |
    ३- आयोजन की शुरुआत ही ब्लोगर्स के बोलने से हुई , अविनाश वाचस्पति घूम घूम कर ब्लोगर्स से पूछ रहे थे कि जिसे बोलना है बताएं |
    ४- इतने सारे ब्लोगर्स को सम्मानित करने के लिए मुख्यमंत्री निशंक खड़े रहे | इतना समय शायद ही कोई राजनेता दे |
    ५- कुछ लोगों को भाजपा के मुख्यमंत्री का आना हजम नहीं हुआ | इसी वजह से प्रसून वाजपेयी भाग गया | शायद उसकी सेकुलारता पर आंच आ सकती थी , इस समारोह में कोई कांग्रेस का नेता होता तो शायद प्रसून वहां दूम हिलाता कई घंटे खड़ा रहता तब उसे टाइम मेनेजमेंट पर भाषण भी नहीं झाड़ना पड़ता |

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  33. दिल्ली में ब्लागिंग पर एक कार्यक्रम क्या हुआ लगा तमाम नालायक लोग पो पो करने लगे हिंदी
    चिट्ठाकारिता करना ठग्गू के लड्डू जैसा हो गया खाओ तो पछताओ न खाओ तो पछताओ. एक महाशय को गम हो गया बच्चों जैसे मचलते हुए हिंदी ब्लागिंग से कूच कर गए (वैसे संभावनाओं के द्वार खोल कर गए है जैसे किसी कोटेवाली का अड्डा हो की कभी भी आओ और मन करे तो फूट लो ). अनवर जमाल को मजा आ गया धडाधड पोस्ट फेच्कुरिया कर (ऐसी पोस्टें दो चार लाइन में ही दम तोड़ जाती है) हाफ हाफ कर अपने को बड़ा ब्लागर मनवाने पर तुला है यहाँ तक कि वह टट्टी कैसे करता है इसको भी ब्लागिंग से जोड़ कर बता रहा
    है.
    दूसरी और यह रवीन्द्र प्रभात और अविनाश वाचस्पति को बढ़ाई देता है हद हो गयी दोगलेपन की.
    खत्री अलबेला छिला हुआ केला कि तरह या यूं कहे नंगलाल कि तरह पुंगी बजाने में रत है. अरे इन खब्तियों को कौन बताये की ये शुरू के छोटे छोटे कार्यक्रम आगे वृहद रूप धारण करेगी. कार्यक्रम में खामिया होगी पर उसमे सकारात्मकता देखने से ही सकारात्मक ब्लागिंग हो सकती है.
    गिरते है मैदाने जंग में शाह सवार ही
    वो तिल्फ़ क्या गिरेगे जो घुटनों पे चलते है.
    कार्य्रकम के आयोजको को बधाई

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  34. आप बैक बेंच पर थे और प्रथम पंक्ति में डा. सरोजिनी प्रीतम भी थीं, जिनकी चर्चा तक न हुई.. मुझे तो उनकी तरफ से यह भी अपमानजनक लगा!!

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  35. अरूण जी, वाद प्रतिवाद अपनी जगह पर, मैं तो दूर बैठा मुज़रा देख रहा हूँ , क्योंकि....
    क्योंकि मैं भी एक लो-प्रोफ़ाइल बैकबेंचर हूँ !

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  36. अरूण जी,
    आपकी रिपोर्ट की प्रस्तुति अच्छी लगी किंतु ब्लागरों की उपोक्षा के कारण मन अवसाद से भर गया।

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  37. जो शोध को समझता है
    वो यह भी जानता है
    कि अकारण क्रोध
    विवेकहीनता को ही
    स्‍पष्‍ट करता है।

    आप सिर्फ एक छोटा सा
    आयोजन कीजिए
    फिर देखिए
    ऐसे कितने ही शोध
    कोई भी सहज ही कर देगा
    जिसे करके आप
    इतनी टिप्‍पणियां पाकर
    फूले नहीं समा रहे हैं।

    आप स्‍वीकारते हैं कि
    मैंने आपको इस विधा में
    सक्रिय किया
    जबकि मैं इसे नहीं मानता
    क्‍योंकि यह मन की बात है
    आपका मन किया
    आप सक्रिय हुए
    आपके मन ने कहा
    और आपने उधेड़ दी बखिया
    असलियत से आंखें मूंद कर
    और विघ्‍नसंतोषियों की तो
    कमी है ही नहीं
    किसी भी क्षेत्र में।

    आप बहुत महान कवि हैं
    आपने अहसान किया है
    कार्यक्रम में शामिल होकर
    और हमने बुलाकर सबको
    खूब कमाई कर ली है।

    आप भी कर लें
    पाप कमाई
    पुण्‍य के साथ मिलकर
    राह नवीन अपनायें।

    उत्तर देंहटाएं
  38. चलिए आप उपस्थित हुए, बेंच मिली, बैक ही सही। हम तो ब्लॉगों के मात्र रीडर ही हुए। जानकारी देने के लिए आभार।

    उत्तर देंहटाएं
  39. इस कार्यक्रम में भिलाई के मेरे चार परिचित भी गए थे अपने खर्च पर। उन्होंने मुझे भी चलने के लिए कहा था परंतु अपने कार्यक्रम में व्यस्त रहने के कारण मैंने मना कर दिया था। उनमें से एक ललित शर्मा जी ने तो टिप्पणी भी की है। उन्हीं चारों में से एक मित्र से इस बारे में पूछा तो उनका कहना था कि यह आयोजन प्रकाशक द्वारा प्रायोजित था। फिर भी 64 ब्लॉगरों को सम्मानित किया गया और सारा खर्च आयोजकों द्वारा किया गया। अब यदि आयोजन उनका था और मंच का उपयोग उन्होंने किया तो इसमें क्या बुराई है? भला तो हिंदी का ही हुआ। इसी भावना से इस आयोजन को सराहा जाना चाहिए।

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  40. रिपोर्ट अच्छी है. मुद्दों को इस तरह से भी देखना चाहिए. मैं तो ब्लॉगिंग को एक स्वतन्त्र विधा मानती हूँ और ये मानती हूँ कि ये जैसी है वैसी ही इसे रहने देना चाहिए. यह नेट पर एक आम आदमी की अभिव्यक्ति है. यहाँ कोई बड़ा या छोटा नहीं. हाँ नया पुराना हो सकता है और नए लोगों के लिए पहचान बनाना बिना एग्रीगेटर के थोड़ा मुश्किल हो गया है. मुझे लगता है कि ये सब समारोह छोड़कर एक एग्रीगेटर बनाने की ओर ध्यान देना चाहिए ताकि नए लोगों को अपनी जगह बनाने के लिए सबको 'ई-मेल' भेजकर सूचित ना करना पड़े.

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  41. @ अरुण राय

    काफी बाते ठीक कह रहे हो अरुण राय ....मगर

    -क्या इससे आयोजकों को आप हतोत्साहित नहीं कर रहे हो ?

    - क्या आप नकारात्मक विचारधारा का प्रतिनिधित्व नहीं कर रहे हो ?

    आशा करता हूँ कि आप बुरा नहीं मानेंगे और इस टिप्पणी को सकारात्मक भाव से लेंगे !

    निस्संदेह इस आयोजन में भूले और भेदभाव हुआ है मगर यह एक बड़े आयोजन में स्वाभाविक ही है !

    क्या पता अविनाश और रविन्द्र प्रभात की क्या मजबूरियां रही होंगी मगर यह लोग अभी बहुतों से अच्छे हैं !

    मेरी तरफ से उन्हें शुभकामनायें !

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  42. @ ब्‍लॉगर बंधु चालीस दिन कविताएं लिखकर और कोरी वाहवाही पाकर यह सोचने लग जाते हैं कि वे एक महान कवि का दर्जा पाने के अधिकारी हो गए हैं।

    *** मैंने किसी ब्लॉगर बंधु को ऐसा क्लेम करते नहीं देखा, सुना या पढ़ा।

    जहां तक अरुण की बात है, वो तो इतना ‘डाउन टु अर्थ’ है कि जो उसे मिलना चाहिए उसे भी स्वीकार करने से झिझकता है।

    रही उसके काव्य की बात, तो आज तक जो उसने ब्लॉग जगत को दिया है, उसके आधार पर, जो विविधता है, जो विषय का विस्तार है, जो शिल्प, समझ, और विन्यास है, वो दिन दूर नहीं जब उसको अन्य श्रेणी से विशिष्ट श्रेणी मिल जाएगा।

    इस विषय पर उसने अपने मन की बातें लिखी हैं, बिना किसी की व्यक्तिगत आलोचना किए।

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  43. @ ब्‍लॉगर बंधु चालीस दिन कविताएं लिखकर और कोरी वाहवाही पाकर यह सोचने लग जाते हैं कि वे एक महान कवि का दर्जा पाने के अधिकारी हो गए हैं।
    दुबारा इस परिचर्चा में लौटने पर अचानक मनोज जी की इस टिप्पणी पर ध्यान चला गया. अगर यह वक्तव्य अरुण जी के लिए है तो मेरा बस इतना ही कहना है कि जिन उपेक्षित, जी मैं दोहरा रहा हूँ, उपेक्षित बिम्बों को लेकर जिन सार्थक कविता का सृजन उन्होंने किया है वह चकित करने वाला है. और इसके बावजूद भी उन्होंने कभी महाकवि होने का दावा नहीं किया.. व्यवहार में इतनी सरलता और वाणी में इतनी सरसता कि अगर वो किसी विषय पर तीखा कहें तो सोच लेना चाहिए उस तीखेपन की तीव्रता क्या होगी..
    मैं असाहित्यिक एवं अकवि हूँ,लेकिन कविता का मर्म अपने दिल से समझता हूँ!!!
    मैं तो शाकाहारी हूँ और मीट से दूर रहता हूँ वो चाहे ब्लोगर्स मीट ही क्यों न हो. पर अविनाश जी के आमंत्रण पर गया. उनका भी धन्यवाद!! उनसे कोइ शिकायत नहीं!!

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  44. अरुण
    कोई आप के ब्लॉग पर आया या नहीं आया इसका प्रमाण टिपण्णी नहीं होती हैं
    आप का लिखा पसंद आया बज कर दिया .

    ये एक प्रायोजित मीट थी यानी एक प्राइवेट पार्टी इसका ब्लॉग की दुनिया से बस इतना लेना देना था की रविन्द्र प्रभात ने परिकल्पना पर अपनी पसंद के लोगो का समूह बनया और उनको पुरस्कार देने के लिये प्रायोजक खोजे . अविनाश वाचस्पति सरकारी महकमे मे हिंदी के किसी विभाग से जुड़े हैं और हिंदी को "प्रोतसाहित " कर रहे हैं . अब इस बीच मे अगर बहती गंगा मे उन्होने भी हाथ धो लिये और अपना नाम किताब में डलवा लिया तो इस मे कोई नयी बात नहीं हैं

    ये सब प्रयोजन नेट वर्क बनाए jaane के लिये ही होते हैं . कितनो को मुख्यमत्री जी अपने यहाँ कोई काम दे दे क्या पता . शायद बायोग्राफी लिखवा ले . कुछ नहीं तो भाषण देने के लिये किराये समेत बुलवा ले .

    @ ब्‍लॉगर बंधु चालीस दिन कविताएं लिखकर और कोरी वाहवाही पाकर यह सोचने लग जाते हैं कि वे एक महान कवि का दर्जा पाने के अधिकारी हो गए हैं।

    अविनाश अपनेआप जिस तरह कविता लिखते हैं मुझे उनके इस वक्तव्य पर कोई आश्चर्य नहीं हैं .

    इन ब्लॉग मीट मे आप को कुछ जाने पहचाने चेहरे हर मीट मे दिख जायेगे . मे तो उनकी तारीफ़ ही करुँगी क्योकि उन्ही की वजह से हिंदी ब्लोगिंग , हिंदी ब्लोगिंग हैं यानी एक परिवार जहां टी वी सीरियल की तरह एपिसोड दर एपिसोड नाच गाना पार्टी होती हैं .

    पर कोई प्रायोजित कर के पार्टी करवा ले तो अकल्मन्द हुआ की नहीं . हड लगे ना फिटकरी , पार्टी की पार्टी , तालुकात के तालुकात और बाकी ब्लोगर पर अहसान " हिंदी ब्लोगिंग को आगे बढ़ा दिया ""

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  45. रिपोर्ट लिखने का तरीका मार्मिक है यथार्थ के पीछे कुछ विवाद सा लगता है चश्मा अपना अपना है सार्थक वही है जिस पर पढने के बाद बहुत सी टिप्पणियां आयी हो वो भी लम्बी लम्बी .

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  46. जो सबसे पहले मुझे दिखा वह यह कि .. आधे से अधिक सीट तो खाली थी. यानी आयोजक और ब्लोगर (अंतर्राष्ट्रीय भी!) और उनके परिवार के सदस्यों.. तीनो को मिला के सौ से अधिक लोग नहीं! मुझे क्या, मुझे तो बैक बेंच मिल ही गई थी।


    sahi hai asa hota hai bhahar kuch aur andar kuch aur

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  47. "प्रोतसाहित " = प्रोत्साहित

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  48. यह तो बड़ा ही रोचक और मज़ेदार अंदाज़ में लिखा वाकया है। इसके भीतर जो बीच बीच में हास्य का पुट आपने डाला है वह तो और भी मज़ेदार है। इसके कारण विवरण और भी रोचक बन गया है।

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  49. वे तो 'हिंदी साहित्य निकेतन' और अपनी पुस्तक के विमोचन के लिए आये थे. ऐसे में गत एक माह से जो प्रचार अभियान ब्लॉग जगत में चल रहा था वह बेमानी लगा. कुछ हद तक लगा कि ब्लोगर समुदाय को अँधेरे में भी रखा गया था.

    आदरणीय अरुण जी, मेरे ख्याल से, ३० अप्रैल के कार्यकर्म की एक संतुलित और यथार्थपरक रिपोर्ट आपने ही पेश की. बहुत बहुत साधुवाद....

    एक कवी के रूप में आप स्थापित थे, पर इस रिपोर्ट ने आपके व्यक्तित्व का एक और पक्ष सामने
    आया है.

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  50. समग्र सार है यथातथ्य

    आधा मिथ्या आधा सत्य..


    रिपोर्ट रोचक लगी।

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  51. श्रीमान जी,मैंने अपने अनुभवों के आधार ""आज सभी हिंदी ब्लॉगर भाई यह शपथ लें"" हिंदी लिपि पर एक पोस्ट लिखी है. मुझे उम्मीद आप अपने सभी दोस्तों के साथ मेरे ब्लॉग www.rksirfiraa.blogspot.com पर टिप्पणी करने एक बार जरुर आयेंगे.ऐसा मेरा विश्वास है.

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  52. परिकल्पना सम्मान 2010 और एक बैक बेंचर ब्लॉगर की रिपोर्ट पसंद आयी। मेरे मित्र जो वहां उपस्थित थे, ने भी कुछ इसी तरह का ब्यां किया था।

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  53. अरुण जी,

    आज पहुंची आपकी रिपोर्ट पर , सही है आपसे मुलाकात हुई और कई और लोगों से तो मेरी यात्रा तो सफल हो गयी. संग्रह प्रकाशन के लिए बात करने की बात मन में लेकर तो मैं भी ई थी लेकिन वंदना से यथार्थ दर्शन के बाद पीछे हट गयी. फिर चालीस दिन हुए भी नहीं हैं.
    आयोजन तो अच्छा था लेकिन जैसी कल्पना की थी उससे कुछ इतर था और समय प्रबंधन गड़बड़ होने के करण पूरे कार्यक्रम का यानि की डिनर तक रुक भी नहीं सके. वैसे सभी लोगों से परिचित होकर यात्रा सफल हो गयी और आगमन भी.

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  54. चलिए, इस आयोजन पर आपका नज़रिया भी पढ़ लिया.

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  55. "बुरा जो देखन मैं चला..सब बुरा ही बुरा नज़र आया मुझे"...
    पुरानी कहावत...नया रूप...

    अगर आप पहले से ही सोच के चलते हैं कि हमें कमियाँ ही ढूंढनी हैं तो एक नहीं हज़ार मिल जाएंगी...
    परफैक्ट तो इस दुनिया में कुछ भी नहीं होता दोस्त....
    जानबूझ कर खूबियां देखने के बजाए अगर कमियाँ ढूँढने लगें तो बीवी को अपने पति में और पति को अपनी बीवी में भी अनेक दिख जाएंगी लेकिन क्या ऐसा करना सही है?....
    साकारात्मक सोचिये मित्र..

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  56. यहां देर से पहुंचा पर हां ये मेरे शब्द हैं :-
    "... इस बात का भान होता कि ब्लोगर के नाम पर जुटी भीड़ को प्रकाशक महोदय द्वारा अपहृत कर बस इस्तेमाल कर लिया जायेगा तो शायद परिकल्पना सम्मान और ब्लोगर सम्मलेन कभी और और कहीं और होता."

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  57. हाँ ! …. अहा ..! डिनर स्वादिष्ट था!!!
    chalo kuch to ahha laga..
    badiya prastuti hetu abhar!

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  58. गाफिल जी हैं व्यस्त, चलो चलें चर्चा करें,
    शुरू रात की गश्त, हस्त लगें शम-दस्यु कुछ ।

    आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति
    सोमवारीय चर्चा-मंच पर है |

    charchamanch.blogspot.com

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  59. सुनीता जी की नई पुरानी हलचल से एक बार फिर यहाँ आकर अच्छा लगा.
    मुझे याद आया आपके साथ आगे से पांचवीं छठी लाइन में ही तो बैठे थे हम.
    फिर बैक बेंचर कहाँ हुए आप?
    पर यह तो अपने अपने मानने की बात है.
    हम तो अपने को अग्रिम बेच पर बैठा हुआ मानेंगें जी.

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