सोमवार, 16 मई 2011

अर्धनारीश्वर


स्त्री - पुरूष
समान रूप से
एक दूसरे के पूरक
सुनते आ रहे हैं
न जाने कब से
लेकिन क्या सच में ही
दोनों में कोई समानता है?
एक के बिना
दूसरा अधूरा है ।
फिर भी कई मायनों में
पुरूष पूरा के पूरा है
अर्धांगनी नारी ही कहाती है।
पुरूष बलात
अपना हक जताता है
और नारी अपने मन से
समर्पित भी नही हो पाती है ।
नारी भार्या बन
सम्मानित होती है
माँ बन कर
गौरवान्वित होती है
लेकिन जब
परित्यक्ता होती है तो
लोलुप निगाहें बिंध डालती हैं
उसकी अस्मिता को
और कोई
बलात्कार से पीड़ित हो तो
सबके लिए घृणित हो जाती है
यहाँ तक कि
ख़ुद का दोष न होते हुए भी
अपनी ही नज़रों से गिर जाती है ।
सामाजिक मूल्यों
खोखले आदर्शों
और थोथे अंधविश्वासों के बीच
नारी न जाने कब से
प्रताडित और शोषित
होती आ रही है
आज नारी को ख़ुद में
बदलाव लाना होगा
उसको संघर्ष के लिए
आगे आना होगा
पुरूष आकर्षण बल से
मुक्त हो
ख़ुद को सक्षम बनाना होगा ।
और फिर एक ऐसे समाज की
रचना होगी
जिसमें नर और नारी की
अलग - अलग नही
बल्कि सम्मिलित संरचना
निखर कर आएगी
और यह कृति
अर्धनारीश्वर कहलाएगी .

 

23 टिप्‍पणियां:

  1. आज या कहे किसी भी युग में स्त्री पुरुष एक दूसरे के बिना अधूरे थे, है, व रहेंगें।

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  2. जिसमें नर और नारी की
    अलग - अलग नही
    बल्कि सम्मिलित संरचना
    निखर कर आएगी
    और यह कृति
    अर्धनारीश्वर कहलाएगी

    bahut khoob...aabhar..

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  3. सामाजिक मूल्यों
    खोखले आदर्शों
    और थोथे अंधविश्वासों के बीच
    नारी न जाने कब से
    प्रताडित और शोषित
    होती आ रही है

    सही कहा है .....आज भी नारी को उस सम्मान की दृष्टि से नहीं देखा जाता ...जिस की वह वास्तविक हकदार है .!

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  4. अर्धनारीश्वर की नई परिभाषा। बधाई।

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  5. नर - नारी नहीं केवल पति - पत्नी एक दूसरे के पूरक हैं . नर नारी को एक दूसरे का पूरक समझना गलत हैं क्युकी पुरुष और स्त्री अनेक संबंधो मै एक दूसरे से जुड़े होते हैं . भाई और बहिन एक दूसरे के पूरक नहीं हो सकते . यही सोच पुरुष को "बलात" होने का अधिकार देती हैं . इस सोच को बदलना है और इस बदलाव के आते ही समाज में बदलाव निश्चित हैं .
    अर्धनारीश्वर इश्वर का वो रूप जिस में स्त्री और पुरुष दोनों के गुण हो यानि एक समान होना . जब हम अर्धनारीश्वर को स्वीकार करते हैं तो समानता को भी करना चाहिये . लिंग विभेद को ख़तम करना जरुरी हैं और इसके लिये इस विभेद से ऊपर उठ कर सोचने का समय हैं .
    लोग आज भी स्त्री को देवी तो मान सकते हैं पर इंसान नहीं मानते और उसको बेड़ियों में जकड कर पुरुष को निरंकुश रहने देते हैं

    हां कविता अच्छी हैं

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  6. परित्यक्ता होती है तो
    लोलुप निगाहें बिंध डालती हैं
    उसकी अस्मिता को
    और कोई
    बलात्कार से पीड़ित हो तो
    सबके लिए घृणित हो जाती है
    यहाँ तक कि
    ख़ुद का दोष न होते हुए भी
    अपनी ही नज़रों से गिर जाती है ।
    ....कटु सत्य
    अर्द्धनारीश्वर का अर्थ है आधी नारी आधा ईश्वर ... और सही मायनों में यही सत्य है . हमने हिसाब को तोड़ मरोड़ दिया अपनी स्वेक्षा से . घर और बाहर बंटा हुआ था , पर स्वयं को स्वयं ही श्रेष्ठ बना लिया गया - तो सबकुछ गड़बड़ हो गया . व्यवस्था से जवाब मांगती रचना

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  7. सच तो यही है की दोनो एक दूजे के पूरक हैं ... पर सत्य में कोई इस बात को मानता नही ...

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  8. एक नयी परिकल्पना....कविता अच्छी है!

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  9. समाज की खोखली आदर्शवादी गर्वोक्तियों की बखिया उधेड़ती एक बहुत ही संवेदनशील रचना ! नारी को नारी मान कर उसे वह सम्मान और अधिकार दे दिए जायें जिसकी वह वास्तव में हकदार है यही उसके प्रति सच्चा न्याय होगा ! पुरुष उसके बिना कितना पंगु है और अधूरा है यह तो सर्वविदित है ही ! बस उसका अहम उसे यह स्वीकारने से रोकता है ! और कदाचित इसीलिये अपने अधूरेपन के पूर्णत्व प्रदान करने के लिये वह विनय के स्थान पर क्रूरता को अपना हथियार बनाकर नारी को प्रताड़ित करता है ! एक गहन सोच के लिये प्ररित करती बहुत ही सार्थक रचना ! मेरी बधाई स्वीकार करें !

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  10. अर्धनारीश्वर को नया रूप देने की कल्पना बहुत ही सुन्दर है……सुन्दर अभिव्यक्ति।

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  11. ये रचना मैने आपकी पहले भी पढी थी और ये कहा था ………और उस वक्तव्य पर आज भी कायम हूं किस सोच को नयी दिशा देनी ही होगी।
    sangeeta ji
    aaj aap ki ye kavita padhi .........ise kavita kahkar iska moolya kam nahi karna chahti kyunki aapne yahan kavita nahi ki hai ye to nari jivan ka satya pragat kiya hai jise aaj ka samaaj sweekarna nahi chahta aaj bhi apni purani roodhivadi bediyon mein hi jakda huaa hai......aaj bhi apni jad soch se mukt nahi ho paya hai kyunki ye sanskar unhein ghutti mein ghot kar pilaye gaye hain .........sirf shabd banaya huaa hai ardhnarishwar magar iska arth aaj tak koi nahi samajh paya hai..........jis din iska arth samajh aa jayega us din se nari ke halat apne aap badalne shuru ho jayenge .........aur iske liye sabhi ko miljul kar sarthak prayas karne honge.

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  12. संगीता जी कि यह कविता कल्पना नहीं एक यथार्थ है...एक सत्य जिससे हम चाहें तो मुंह मोड सकते हैं पर झुठला नहीं सकते.
    एक बेहतरीन सोच की बेहतरीन रचना.जिसे जितनी बार पढ़ती हूँ एक सुकून का सा अहसास होता है.

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  13. परिभाषाएं तो बदलने लगी हैं , हमीं उनको आलोचनाओं का शिकार बनाये फिरते हैं. इस नई परिकल्पना से ही सार्थक होगी नारी की सही भूमिका.

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  14. नारी किससे संघर्ष करे? संघर्ष में एक पक्ष की जय और दूसरे की पराजय निश्चित है। क्या ऐसे परिणाम से ही नर-नारी की सम्मिलित संरचना होगी?

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  15. कुमार राधा रमण जी ,

    नारी को संघर्ष खुद से करना है किसी दूसरे से नहीं ...अपनी स्थिति में सुधार तब ही ला पायेगी जब वो खुद सक्षम होगी ...

    उसको संघर्ष के लिए
    आगे आना होगा
    पुरूष आकर्षण बल से
    मुक्त हो
    ख़ुद को सक्षम बनाना होगा ।

    हमेशा पुरुषों पर आश्रित होते हुए अपनी शक्ति की पहचान खो चुकी है ...यहाँ किसी के जय पराजय की बात नहीं है ..

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  16. 'और यह कृति
    अर्धनारीश्वर कहलाएगी '
    ......................यथार्थ चिंतन भाव की रचना
    ...................ऐसा ही हो ...

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  17. एक विचारोत्तेजक स्तरीय कविता।

    स्त्री पर स्तरीय कविताएं, कम ही मिलती हैं। जो उस तक पहुंचने का राह बताती हुई हो। स्त्री देह भर है तो उसके लिए हर तरफ़ जगह है, लेकिन यदि प्रेम है तो कहीं नहीं। विडम्बना यह है कि प्रेम करना उसका स्त्रीत्व है और प्रेम में रीतते जाना इस पुरुषसत्तात्मक समाज में उसकी नियति।

    घिसते जाने के बीच अपने को सिरजने की स्त्री की मौन जद्दोजहद को आपने परिचित बिंबों से उतारा है।

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  18. चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी प्रस्तुति मंगलवार 17 - 05 - 2011
    को ली गयी है ..नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..

    http://charchamanch.blogspot.com/

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  19. एक वाजिब सवाल..एक नई सोच..एक नई आशा!!

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  20. पुरुष और स्त्री- दोनों अगर एक दूसरे के आकर्षण-बल से मुक्त हो सकें,तो एक नए जगत की रचना संभव है।
    स्त्री जिस दिन स्वयं को बदल लेगी,वह न तो स्त्री रह पाएगी,न पुरूष। हां,उस पुरुष से अधिक क्रूर अवश्य हो सकती है जिससे प्रताड़ित-शोषित होने का उसे मलाल है।
    मुझे तो स्त्री "प्रेम" प्रतीत होती है। यद्यपि यह प्रेम भी निरपेक्ष नहीं है,तथापि,किंचित अर्थों में बदलने की वास्तविक ज़रूरत पुरूषों को है।

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  21. प्रभावशाली प्रस्तुति - इसी सोच और गद्लाव की आवश्यकता है

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  22. एक नयी और अच्छी व्याख्या .......

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