सोमवार, 17 सितंबर 2012

त्रिवेणियाँ / गुलज़ार

जन्म -- 18 अगस्त 1936 

1.
उड़ के जाते हुए पंछी ने बस इतना ही देखा
देर तक हाथ हिलती रही वह शाख़ फ़िज़ा में 

अलविदा कहने को ? या पास बुलाने के लिए ?

2.
क्या पता कब कहाँ मारेगी ?
बस कि मैं ज़िंदगी से डरता हूँ

मौत का क्या है, एक बार मारेगी


3.
सब पे आती है सब की बारी से 
मौत मुंसिफ़ है कम-ओ-बेश नहीं 

ज़िंदगी सब पे क्यों नहीं आती ?

4.
भीगा-भीगा सा क्यों है अख़बार
अपने हॉकर को कल से चेंज करो 

"पांच सौ गाँव बह गए इस साल"

5
चौदहवें चाँद को फिर आग लगी है देखो 
फिर बहुत देर तलक आज उजाला होगा 

राख हो जाएगा जब फिर से अमावस होगी  

Triveni.jpg



10 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर....
    गुलज़ार की त्रिवेणियाँ बड़ी रोचक होती हैं.....
    सादर
    अनु

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  2. गुलज़ार साहब के द्वारा इस विधा के बारें में कोई जानकारी नही थी। जानना अच्छा लगा।

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  3. गुलजार की त्रिवेणियों का जबाब नहीं.

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  4. क्या बात है? त्रिवेणी का प्रवाह तो बन ही पड़ा है. गुलज़ार साहब का एक नया रूप

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  5. त्रिवेणियाँ पढना नया अनुभव है । वैसे गुलजार जी के काव्य और गीतों में जो अनूठापन है माधुर्य और ताजगी है उसकी तुलना में ये उन्नीस ही हैं ।

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  6. वाकई त्रिवेणी का जवाब नहीं ...बेहतरीन

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