बुधवार, 19 सितंबर 2012

बाबू बालमुकुन्द गुप्त

Anamika 7577 की प्रोफाइल फोटोआदरणीय गुणी जनों को  अनामिका का सादर प्रणाम  ! अगस्त माह  से मैंने एक नयी शृंखला  का आरम्भ किया है जिसमे आधुनिक काल के प्रसिद्ध कवियों और  लेखकों के जीवन-वृत्त, व्यक्तित्व, साहित्यिक महत्त्व, काव्य सौन्दर्य और उनकी भाषा शैली पर प्रकाश डालने का प्रयास किया जा रहा  है और विश्वास करती हूँ कि आप सब के लिए यह एक उपयोगी जानकारी के साथ साथ हिंदी राजभाषा के साहित्यिक योगदान में एक अहम् स्थान ग्रहण करेगी.

लीजिये आज चर्चा करते हैं  श्री बालमुकुन्द गुप्त  जी की ...

श्री बालमुकुन्द गुप्त



जन्म  सं. 1922 ( सन 1805 ई.),  मृत्यु सं. 1964 ( सन 1894 ई.)

परिचय

बाबू बालमुकुन्द गुप्त भारतेंदु युग और द्विवेदी युग को जोड़ने वाली कड़ी हैं. इनके निबंधों में यदि एक ओर भारतेंदु युग का राष्ट्र-प्रेम, जन जागरण और सामाजिक नव निर्माण की लालसा मुखरित हुई है तो दूसरी ओर द्विवेदी युगीन भाषा सौष्ठव भी विद्यमान है. इस प्रकार भारतेंदु युगीन आत्मा और द्विवेदी युगीन कलेवर को धारण कर इनके निबंध पार्दुभूर्त हुए हैं. इनकी प्रतिभा बहुमुखी थी. ये हिंदी के प्रमुख निबंधकार, पत्रकार, आलोचक तथा कवि थे. हिंदी गद्य के उन्नायकों में इनका गौरवशाली स्थान है.

जीवन वृत्त

श्री बालमुकुन्द गुप्त जी का जन्म सं. 1922 वि. में पंजाब के रोहतक जिले के गुरयानी नामक गाँव में हुआ. गुप्त जी के पिता का नाम लाला पूरनमल था और माता अत्यंत धर्मशील महिला थी तथा सत्संग आदि में विशेष रूचि रखती थीं, अतः गुप्त जी में भी अपने धर्म के प्रति बड़ी आस्था थी. इनकी प्रारंभिक शिक्षा ग्रामीण पाठशाला में ही हुई पर पांचवीं कक्षा में उत्तीर्ण होते ही इनकी पढाई रुक गयी, क्योंकि इसी वर्ष इनके पिता और पितामह की मृत्यु हो गयी. इन्होने घर पर ही उर्दू और फ़ारसी का अध्ययन किया तथा कुछ समय उपरान्त दिल्ली के एक हाई स्कूल से मिडिल की परीक्षा उत्तीर्ण की.

इन्होने प्रारंभ में उर्दू में लिखना आरम्भ किया और 22 वर्ष की आयु में मिर्जापुर से निकलने वाले उर्दू अखबार 'अखबारे-चुनर' का सम्पादन-भार संभाला तथा कुछ समय बाद लाहौर से निकलने वाले 'कोहेनूर' नामक पत्र के सम्पादक बनाये गए. पं. मदनमोहन मालवीय और पं. प्रतापनारायण मिश्र की प्रेरणा से यह हिंदी की ओर अग्रसर हुए और हिंदी का ज्ञान प्राप्त किया. यह अपने समय के सर्वाधिक अनुभवी संपादक थे और इन्होने हिन्दुस्तान, बंगवासी, भारत मित्र आदि पत्रों में कार्य किया. भारत मित्र के तो यह संपादक ही नहीं सर्वेसर्वा थे और इस पत्र द्वारा इन्होने आठ वर्षों से अधिक  हिंदी की सेवा की.

गद्य साधना

गुप्तजी एक सफल संपादक और पत्रकार के साथ साथ उत्कृष्ट निबंध लेखक भी थे और बालमुकुन्द निबंधावली तथा शिवशम्भू का चिटठा इनके निबंध संग्रह ही हैं. गुप्तजी ने राजनैतिक या सामाजिक समस्याओं पर निबंध लिखा हैं पर विचारात्मक और वर्णात्मक निबंधों की अपेक्षा भावात्मक और कथात्मक निबंधों की संख्या ही अधिक है. 'शिवशम्भू का चिटठा' के निबंध कथात्मक ही हैं और उन पर गुप्त जी की भावात्मकता की भी अनूठी छाप है. इनके विचारों में गंभीरता, दुरूहता और उलझन की अपेक्षा भावावेग की अधिक मात्र है तथा हास-परिहास व् व्यंग्य विनोद का भी प्रसंगानुकूल समावेश है.  इसी प्रकार इन्होने  तत्कालीन भाषा शैली  और साहित्यिक कृतियों के सम्बन्ध में साहित्यिक निबंध भी लिखे हैं तथा अंग्रेजी शासन की व्यंग्यात्मक आलोचना भी की है. इन्होने आत्माराम नाम से भी आलोचनाएँ प्रस्तुत की हैं और इनके विचारों का जनता में अच्छा स्वागत हुआ है.

भाषा शैली

गुप्तजी एक नूतन भाषा शैली के प्रवर्तक थे और इनकी भाषा सर्वथा व्याकरणनुमोदित   रही है. भारतेंदु युग में जो भाषा की अव्यवस्था, अनेकरूपता, अव्यावहारिकता व शिथिलता दीख पड़ती है और विराम चिन्हों का अशुद्ध प्रयोग मिलता है उन सबसे गुप्तजी की  भाषा बिलकुल अछूती है. चूंकि वह उर्दू से हिंदी में दीख पड़ती है और इनकी  भाषा में जाफरानी, मौल, ख्याली, तरक्की, करम, अमल, लिबास दिल्लगी, कलम, फरियाद, तबियत, तुल-अरज, आवाज आदि उर्दू, फ़ारसी शब्दों के साथ साथ अभ्रस्पर्शी, अनंत, नवजात आदि संस्कृत के तत्सम शब्द भी दृष्टिगोचर होते हैं. इन्होने मुहावरों का भी सफल प्रयोग किया है और भाषा में प्रवाह इनका प्रधान लक्ष्य था.

गुप्तजी की शैली  में सामान्यतः तीन रूप दीख पड़ते हैं -

- आलोचनात्मक शैली

- व्यंग्यात्मक शैली

- परिचयात्मक शैली

कृतियाँ

गुप्त जी के मौलिक ग्रंथों में स्फुट कविता, शिव शम्भू का चिटठा, हिंदी भाषा, चिट्ठे और ख़त, खिलौना, खेल तथा तमाशा  तथा सर्पाघात चिकित्सा का उल्लेखनीय स्थान है. इनके  निबंधों का एक संग्रह 'बालमुकुन्द गुप्त निबंधावली' नाम से प्रकाशित भी हो चुका है. इसके अतिरिक्त माडेल-भागिनी, हरिदास, रत्नावली नाटिका आदि इनकी अनूदित कृतियाँ हैं.

बाबू बालमुकुन्द गुप्त जी का हिंदी गद्य के उन्नायकों में एक विशिष्ट स्थान है. हिंदी साहित्य करण में भारतेंदु जी के अस्त होने और महावीर प्रसाद द्विवेदी के उदय होने के मध्य की संक्रमण बेला में ये शुक्र तारे की भाँती चमके और सर्वत्र अपना आलोक विकीर्ण किया. हिंदी के साहित्यिक इतिहास में गुप्त जी सदा स्मरणीय रहेंगे. हिंदी को प्रवाहमयी और सर्वरूप बनाने की दिशा में इनके योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण हैं. गुप्त जी की मृत्यु सं. 1964 ( सन 1894 ई.) में हुई.

12 टिप्‍पणियां:

  1. सारगर्भित पोस्ट ...! बेहतर रहा यह परिचय भी ...!

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  2. गुप्तजी एक सफल संपादक और पत्रकार के साथ साथ उत्कृष्ट निबंध लेखक भी थे। इनके बारें आपने विस्तृत जानकारी दी। आभार आपका।

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  3. बहुमूल्य जानकारी के साथ सारगर्भित आलेख ! आभार आपका इसे हम सबसे शेयर करने के लिये !

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  4. बहुमूल्य जानकारी के साथ सारगर्भित आलेख ! आभार आपका

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  5. बहुत सुंदर एवं सर्वरूपेण और सर्वभावेन प्रशंसनीय प्रस्तुति। बालमुकुंद गुप्त जी के बारे में अच्छी जानकारी मिली। अपने उत्कृष्ट निबंधों के माध्यम से गुप्त जी ने हिंदी साहित्य-जगत में इस विधा को सितारों जड़ित करने का अदम्य प्रयास किया। इस तरह की सूचनापरक-सह-ज्ञानपरक प्रस्तुतियों के लिए आपका विशेष आभार। शुभ रात्रि।

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  6. आप बहुत अच्छा कर रही हैं जो हिन्दी साहित्य के इन आधारों से सब को परिचित करा रही हैं !

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  7. बाबू बालमुकुन्द गुप्त पत्रकारिता एवं साहित्य संरक्षण परिषद्,रेवाड़ी के संरक्षण में तथा बाबू बालमुकुंद गुप्त जी की यादगार में "बाबूजी का भारतमित्र" नामक साहित्यिक अर्धवार्षिक पत्रिका पिछले तीन वर्षों से प्रकाशित की जा रही है.यह संस्था समय समय पर साहित्यकारों को सम्मानित भी करती रहती है.पत्रिका एवं इस सम्बन्ध में अन्यान्य जानकारी हेतु निम्न पते पर संपर्क कर सकते हैं:-
    रघुविन्द्र यादव
    संपादक
    बाबूजी का भारतमित्र
    "प्रकृति भवन",नीरपुर,
    नारनौल(हरियाणा)

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  8. Here is the link for Babuji Ka Bharatmitra


    www.scribd.com/doc/105926320/Babu-Ji-Ka-Bharatmitra-Doha-Viseshank

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  9. जन्मतिथि और मृत्यु की तिथि में ई.सन् और संवत् का अन्तर तो सही कर लीजिए ! आपने इस बात का भी ध्यान नहीं रखा है कि 'बंग-विच्छेद' और 'लार्ड मिन्टो का स्वागत' निबन्ध १९०५ ई. में प्रकाशित हुआ था और आप के द्वारा दी गई जानकारी में उनकी मृत्यु १८९४ ई.में ही हो गयी थी !

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