बुधवार, 5 सितंबर 2012

प्रताप नारायण मिश्र

Anamika 7577 की प्रोफाइल फोटोआदरणीय गुणी जनों को  अनामिका का सादर नमस्कार  ! अगस्त माह  से मैंने एक नयी श्रृंखला का आरम्भ किया है जिसमे आधुनिक काल के प्रसिद्ध कवियों और  लेखकों के जीवन-वृत्त, व्यक्तित्व, साहित्यिक महत्त्व, काव्य सौन्दर्य और उनकी भाषा शैली पर प्रकाश डालने का प्रयास किया जा रहा  है और विश्वास करती हूँ कि आप सब के लिए यह एक उपयोगी जानकारी के साथ साथ हिंदी राजभाषा के साहित्यिक योगदान में एक अहम् स्थान ग्रहण करेगी.

लीजिये भारतेन्दु हरिशचंद्र जी, श्री बद्रीनारायण  चौधरी 'प्रेमघन' जी, श्री नाथूराम शर्मा 'शंकर' , श्रीधर पाठक जी की और पं. बालकृष्ण भट्ट  जी की चर्चा के बाद आज चर्चा करते हैं  पं. प्रताप नारायण मिश्र जी की ...


प्रताप नारायण मिश्र

                                        जन्म  सं. 1913 ( सन 1856 ई.),  मृत्यु सं. 1951 ( सन 1894 ई.)

परिचय


हिंदी - साहित्य के उन्नायकों की पंक्ति में पं. प्रतापनारायण मिश्र जी का विशिष्ट स्थान है, ये भारतेंदु युग के देदीप्यमान विभूति थे. मिश्र जी ने कवि, निबंधकार और नाटककार आदि अनेक रूपों में हिंदी साहित्य की सेवा की है. ब्राह्मण पत्र का इन्होने अनेक वर्षों तक सफल सम्पादन किया है. इनके निबंधों के निष्कपट विचार हृदय से निःस्तृत होने के कारण पाठकों के हृदय  में सीधे प्रविष्ट हो जाते हैं. यही इनके निबंधकार रूप की सबसे बड़ी सफलता है.

जीवन वृत्त


पं. प्रतापनारायण मिश्र जी का जन्म उन्नाव जिले के बैजे गाँव में संवत 1913 वि. (सन 1856 ई. ) को हुआ था. इनके पिता पं. संकटा प्रसाद मिश्र ज्योतिष के प्रसिद्द विद्वान थे और 14 वर्ष की अवस्था में कानपुर आकर बस गए थे. उनकी अभिलाषा अपने पुत्र को ज्योतिर्विंद बनाने की थी पर मिश्र जी की रूचि उस ओर न थी अतः इन्हें अंग्रेजी पाठशाला में पढने भेज दिया. मिश्र जी का मन पाठशाला में नहीं लगता था और पिता की मृत्यु हो जाने से इनका पढना एकदम रुक गया. इन्होने  घर पर ही हिंदी, उर्दू, संस्कृत और फ़ारसी आदि भाषाओं का ज्ञान प्राप्त किया.

मिश्र जी बचपन से ही भावुक थे और कविता से इन्हें प्रेम था. इनके बाल कवि हृदय पर भारतेंदु जी की 'कवि-वचन-सुधा' नामक पत्रिका की काव्य रचनाओं का अत्यधिक प्रभाव पड़ा. इसी प्रकार इन्हें लावनियों में भी बड़ा रस मिलता था और कानपुर के तत्कालीन प्रसिद्द कवि पं. लालिता प्रसाद शुक्ल 'ललित' से छंदशास्त्र के नियम सीख कर इन्होने काव्य रचना भी प्रारंभ की. यह समाचार पत्र प्रेमी भी थे और अपने मित्रों की सहायता से इन्होने ब्राह्मण नामक मासिक पत्र भी प्रकाशित किया.  इस पत्र के बंद होने पर यह कालाकांकर  से प्रकाशित होने वाले 'हिंदी हिन्दोस्तान' के सहकारी संपादक भी नियुक्त हुए लेकिन इस पद पर यह अधिक दिनों तक कार्य ना कर सके.

यह अपने समय के उत्साही हिंदी साहित्य-सेवी थे और हिंदी, हिंदी-हिन्दोस्तान के प्रबल समर्थक थे. भारतेंदु जी पर इनकी विशेष  श्रद्धा थी और देशभक्ति का इनके हृदय में अत्यंत ऊंचा स्थान था. गोरक्षा के यह बड़े पक्षपाती थे और फक्कडपन, अक्खडपन व् मनमौजीपन इनके स्वभाव की मूल विशेषताएं थीं. आत्मश्लाधा  और आत्मसम्मान की मात्रा  अधिक होते हुए भी इनमे आत्मीयता भी थी.

गद्य साधना


मिश्र जी की प्रतिभा का विकास कई दिशाओं में हुआ है और इन्होने उपन्यास, निबंध, नाटक, कविता आदि विविध क्षेत्रों में इसे अपनाया है. इन्होने अनेक प्रकार के निबंध लिखे जिनके शीर्षक देखने मात्र से ही यह प्रतीत हो जाता है कि मिश्र जी सभी प्रकार के सामान्य व् गंभीर विषयों पर लिख सकते थे. भौं, दांत, नाक, पेट, आप, बात, दान, वृद्ध, अपव्यय, जुवा, छत, स्वार्थ, विश्वास, भलमंसी, नास्तिक , शिवमूर्ति, सोने का डंडा, मनोयोग मन, चिंता, टेढ़ जानी संका सब काहू, होली है अथवा होरी है आदि शीर्षक हमारे कथन के प्रमाण हैं. किसी भी विषय पर लिखते समय मिश्र जी मूल विषय के साथ पाठक  में धर्म, इतिहास, समाज, साहित्य, राजनीति और सामयिक परिस्थितियों के प्रति सजगता भी उत्पन्न कर देते थे.

भाषा शैली


मिश्र जी जनसुलभ भाषा के पक्षपाती थे, अतः इनकी भाषा में अनेकरूपता, अस्थिरता, ग्रामीणता और स्खलन आदि त्रुटियाँ भी दीख पड़ती हैं, परन्तु आत्मीयता, सशक्तता, रोचकता, चुलबुलापन आदि गुण भी हैं.  कहावतों और मुहावरों के तो यह धनि थे. अपनी भाषा शैली में मिश्र जी ने सामान्यतः दो शैलियों को अपनाया.

व्यंग्यात्मक शैली

विचारात्मक शैली

कृतियाँ

मिश्र जी ने कई पुस्तकें लिखी तथा कई का हिंदी में अनुवाद भी किया है. इनकी उल्लेखनीय कृतियों की तालिका इस प्रकार  हैं.

मौलिक - कलिप्रभाव, हठी हमीर, गोसंकट, कलिकौतुक, भारत दुर्दशा और जुआरी खुआरी रूपक व प्रहसन. निबंध नवनीत और काव्य कानन में आलोचनाएँ हैं. प्रताप-लहरी कविता संग्रह है तथा वर्णमाला, शिशुज्ञान और स्वास्थ्य रक्षा मौलिक ग्रन्थ हैं.

अनुदित - राजसिंह, इंदिरा, राधारानी, युगालान्गुरीय, चरिताश्टक, पंचामृत, नीति रत्नावली, कथा-माला, संगीत शाकुंतल, वर्ण परिचय सेन वंश और सूबे बंगाल का भूगोल.

मिश्र जी का निधन सं. 1951 (सन १1894 ई. ) वि. में हुआ. इनके असामयिक निधन से क्षुब्ध होकर बाबु बाल मुकुंद गुप्त जी ने लिखा था -

"हिंदी साहित्य के आकाश में हरिश्चंद्र के उदय होने के थोड़े ही दिन पश्चात ऐसा चमकता हुआ तारा उदय हुआ था जिसकी चमक दमक को देखकर लोग इसे  दूसरा चन्द्र कहने लगे थे. उस  चन्द्र के अस्त हो जाने के बाद प्रान तारे के ज्योति और भी बढ़ी. बड़े हर्ष के साथ कितनों ही के मुख से यह ध्वनि निकलने लगी, यही उस चन्द्र की जगह लेगा". पर दुख की बात है की वैसा होने से पहले ही कुछ दिनों बाद यह उज्जवल नक्षत्र भी अस्त हो गया जिसका नाम प्रतापनारायण मिश्र था.

5 टिप्‍पणियां:

  1. आदिकालीन हिन्दी साहित्य की विभूतियों से परिचित कराने का महत्वपूर्ण कार्य संपन्न कर रही हैं आप !

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  2. सहेजने लायक पोस्ट............. आभार

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  3. हिन्दी साहित्य की विभूतियों से परिचित कराने का महत्वपूर्ण कार्य संपन्न कर रही हैं आप !
    सहेजने लायक पोस्ट !
    आभार!!

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