बुधवार, 29 अगस्त 2012

पं. बालकृष्ण भट्ट

Anamika 7577 की प्रोफाइल फोटोआदरणीय गुणी जनों को  अनामिका का सादर नमस्कार  ! अगस्त माह  से मैंने एक नयी श्रृंखला का आरम्भ किया है जिसमे आधुनिक काल के प्रसिद्ध कवियों और  लेखकों के जीवन-वृत्त, व्यक्तित्व, साहित्यिक महत्त्व, काव्य सौन्दर्य और उनकी भाषा शैली पर प्रकाश डालने का प्रयास किया जा रहा  है और विश्वास करती हूँ कि आप सब के लिए यह एक उपयोगी जानकारी के साथ साथ हिंदी राजभाषा के साहित्यिक योगदान में एक अहम् स्थान ग्रहण करेगी.

लीजिये भारतेन्दु हरिशचंद्र जी, श्री बद्रीनारायण  चौधरी 'प्रेमघन' जी  और श्री नाथूराम शर्मा 'शंकर' , श्रीधर पाठक जी की चर्चा के बाद आज चर्चा करते हैं  पं. बालकृष्ण भट्ट  जी की ...


 


पं. बालकृष्ण भट्ट

                                                      जन्म  सं. 1901 (1885 ई.),  मृत्यु 1916 ई.


परिचय

भारतेंदु युगीन निबंधकारों में पं. बालकृष्ण भट्ट का एक विशिष्ट स्थान है. निबंधकार, पत्रकार, कथाकार, उपन्यासकार, नाटककार, शैलीकार एवं आलोचक आदि वीविध रूपों में आपने हिंदी साहित्य की विविध रूपों में सेवा की.  लगभग बत्तीस वर्षों तक 'हिंदी प्रदीप' का संपादन कर आप  अपने विचारों का व्यक्तिकरण करते रहे. भट्ट जी भारतेंदु युग की देदीप्यमान मौन विभूति होने के साथ साथ द्विवेदी युग के लेखकों के मार्ग-दर्शक  और प्रेरणा स्त्रोत भी रहे.

जीवन वृत्त

भट्टजी का जन्म प्रयाग में सं. 1901 (सन 1885 ई. ) में हुआ था. इनके पिता का नाम पं. वेनिप्रसाद था और शिक्षा की ओर इन्हें विशेष रूचि थी तथा इनकी पत्नी भी विदुषी थीं. अतः भट्टजी की शिक्षा पर विशेष ध्यान दिया गया. प्रारंभ में इन्हें घर पर संस्कृत की शिक्षा दी गयी और 15-16 वर्ष की अवस्था तक इनका यही क्रम रहा. इसके उपरान्त इन्होने माता के आदेशानुसार स्थानीय मिशन के स्कूल में अंग्रेजी पढना प्रारंभ किया और दसवीं कक्षा तक अध्ययन किया. विद्यार्थी जीवन में इन्हें बाईबिल परीक्षा में कई बार पुरस्कार भी प्राप्त हुए. मिशन स्कूल छोड़ने के उपरान्त यह पुनः  संस्कृत, व्याकरण और साहित्य का अध्ययन करने लगे.

कुछ समय के लिए यह जमुना मिशन स्कूल में संस्कृत के अध्यापक भी रहे, पर अपने धार्मिक विचारों के कारण इन्हें पद  त्याग करना पड़ा. विवाह हो जाने पर जब इन्हें अपनी  बेकारी खलने लगी तव यह व्यापार करने की इच्छा से कलकत्ते भी गए, परन्तु वहां से शीघ्र ही लौट आये और संस्कृत साहित्य के अध्ययन तथा हिंदी साहित्य की सेवा में जुट गए. यह स्वतंत्र रूप से लेख लिखकर हिंदी साप्ताहिक और मासिक पत्रों में भेजने लगे तथा कई वर्ष तक प्रयाग में संस्कृत के अध्यापक रहे.

यह  प्रयाग से 'हिंदी प्रदीप' मासिक पत्र का निरंतर घाटा सहकर 32 वर्ष तक उसका सम्पादन करते रहे. हिंदी प्रदीप बंद होने के बाद  हिंदी शब्दसागर का संपादन का काम भी इन्होने कुछ समय तक देखा पर अस्वस्थता के कारण इन्हें यह कार्य छोड़ना पड़ा. सं. 1971 में प्रयाग में इनका  स्वर्गवास हो गया. प्रयाग का भारती भवन पुस्तकालय इन्होने ही स्थापित किया है और वह इनकी पुण्य स्मृति का स्तम्भ है.

महत्वपूर्ण स्थान

हिंदी के निबंधकारों   में पं. बालकृष्ण भट्ट का महत्वपूर्ण स्थान है. निबंधों के प्रारंभिक युग को हम निःसंकोच भाव से भट्ट युग के नाम से अभिहित कर सकते हैं. व्यंग्य विनोद संपन्न शीर्षकों और लेखों द्वारा एक ओर तो ये  प्रताप नारायण मिश्र के पास बैठे हैं और गंभीर विवेचन एवं विचारात्मक निबंधों के लिए आचार्य शुक्ल के पास. यह अपने युग के न केवल सर्वश्रेष्ठ निबंधकार थे अपितु इन्हें सम्पूर्ण हिंदी साहित्य में प्रथम श्रेणी का निबंध लेखक माना जाता  है.  इन्होने साहित्यिक, सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक, दार्शनिक, नैतिक और सामयिक आदि सभी विषयों पर विचार व्यक्त किये हैं. इन्होने तीन सौ से अधिक निबंध लिखे हैं.  इनके निबंधों का कलेवर अत्यंत संक्षिप्त है तथा तीन प्रष्टों में  ही समाप्त हो जाते हैं.  इन्होने मूलतः विचारात्मक निबंध ही लिखे हैं और इन विचारात्मक निबंधों को चार श्रेणियों में विभाजित किया है -

व्यवहारिक जीवन से सम्बंधित

साहित्यिक विषयों से समबन्धित

सामयिक विषयों से सम्बंधित

हृदय की वृतियों पर आधारित

भाषा शैली

भट्टजी का झुकाव  संस्कृतनिष्ठ भाषा की ओर अधिक था पर परिस्थिति व् आवश्यकतानुसार अरबी, फ़ारसी के औलाद, मुहब्बत, नालिश, दुरुस्त, ऐयाशी, आमदनी, कसरत, पैदाइश और बेकदर तथा अंग्रेजी के फिलासफी, कैरेक्टर, सोसाइटी, स्पीच, नेशनेलिटी, स्टेंडर्ड, पुलपिट, नेचुरल, गिफ्ट, मोरेल आदि शब्द इनकी भाषा में मिलते हैं.  कहीं कहीं तो निबंधों के शीर्षक अंग्रेजी में दिए गए हैं जैसे - Are the nation and individual two different things. इसी प्रकार ब्रिज भाषा के शब्दों की भी कमी नहीं है और विभक्तियों व् क्रियाओं को बहुलता से प्रयोग किया गया है.

कृतियाँ

भट्ट जी भारतेंदु युग के देन थे और भारतेंदु मंडली के प्रधान सदस्य थे. संवत 1934 में प्रयाग में इन्होने हिंदी प्रवर्द्धिनी नामक सभा की स्थापना  कर हिंदी प्रदीप  प्रकाशित करते रहे.  इसी पत्र में इनके अनेक निबंध दृष्टिगोचर होते हैं और हिंदी साहित्य सम्मेलन प्रयोग में इनके कुछ निबंधों का संग्रह निबंधावली नाम से प्रकाशित भी करवाया. नूतन ब्रहमचारी और सौ अजान एक सुजान इनके उपन्यास हैं तथा साहित्य सुमन निबंध संग्रह हैं - शिक्षा, दान, प्रभावती, शर्मिष्ठा, दमयंती, स्वयंवर, कलिराज की सभा, रेल का विकट खेल, बाल विवाह आदि इनकी नाट्य-कृतियाँ हैं. हिंदी प्रदीप में इनके अनेक  उत्कृष्ट  सशक्त व्यंग्य , गहन अर्थ और अभिव्यंजना शक्ति के साथ मुहावरों व् कहावतों का भी प्रचुर प्रयोग है. भट्टजी अपने समय के उत्कृष्ट शैलीकार भी थे और व्यास व् समास दोनों प्रकार की शैलियों को इन्होने कुशलतापूर्वक अपनाया है.  इनकी शैली को चार रूपों में बांटा जा सकता है.

1. विचारात्मक शैली

2. वर्णात्मक शैली

3. भावात्मक शैली

4. व्यंग्यात्मक शैली

सन 1916 ई. में इनकी मृत्यु हो गयी.

5 टिप्‍पणियां:

  1. बहुमूल्य जानकारी .. ब्लॉग के माध्यम से कम से कम इतना जानने को तो मिलता है जो रोज़मर्रा में जानना आसान नहीं ...
    शुक्रिया पंडित बालकृष्ण जी के बारे में विस्तार से लिखने का ...

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  2. प. बालकृष्ण भट्ट पर बहुत ही ज्ञानवर्धक आलेख लिखा है आपने अनामिका जी ! हिन्दी साहित्य जगत् के इतने महत्वपूर्ण स्तंभ के बारे में इतनी विशिष्ट जानकारी हम सबके साथ बाँटने के लिये आपका ह्रदय से आभार तथा धन्यवाद !

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  3. हिंदी के मूर्धन्य निबंधकार पं.बालकृष्ण भट्ट किसी परिचय के मुहताज नही है। निबंध विधा के आयाम के क्षितिज को इन्होंने जितना विस्तृत किया और इसके स्वरूप को जिस रूप में प्रस्तुत किया,उसके लिए आज भी इस विधा का अध्ययन करने वाले विद्यार्थी लाभान्वित हो रहे हैं। समय एवं विषयानुरूप इन्होंने जिस बारिकी से अरबी, फारसी एवं संस्कृतनिष्ठ शब्दों का प्रयोग अपनी लेखन शैली में किया है,उसे अन्य साहित्यकारों ने भी स्वीकार्य करने के साथ-साथ सराहा भी है। महावीर प्रसाद द्विवेदी जी की तरह इन्होंने भी नवोदित साहित्यकारों को उनकी लेखन शैली में आवश्यक सुधार करके उनके लेखन को सितारों-जड़ित करने का प्रयास किया। दसवीं कक्षा में इनके निबंध को पढ़ा था। उनका एक उपन्यास 'सौ अजान एक सुजान' एक प्रशंसनीय उपन्यास है।

    अनामिका जी,
    आपकी हर प्रस्तुति मुझे विद्यार्थी जीवन के बीते वासर में लेकर चली जाती है। आपके पोस्ट पर आना मेरे लिए हिंदी साहित्य के इन प्रकाश-स्तंभों से परिचय कराना जैसा है जिनकी स्मृतियां अब धूमिल पड़ती जा रही हैं। आपके परिश्रम,प्रयास एवं लगन की जितनी भी प्रशंसा की जाए,मेरी दृष्टि में कम है। आशा है भविष्य में भी आप इस तरह की निरंतरता बनाए रखेंगी। शुभ रात्रि।

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  4. हिन्दी गद्य के इतिहास में ,भट्ट जी का महत्वपूर्ण स्थान है .भाषा और साहित्य दोनो क्षेत्रों में उनका योगदान रहा है .आज के पाठकों को उनके विषय में जानकारी देने के लिये आप को धन्यवाद !

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