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शनिवार, 28 अप्रैल 2012

पुस्तक परिचय-27 : मेरे बाद

पुस्तक परिचय-27
मेरे बाद 
संगीता स्वरूप
Satyam Shivamसत्यम शिवम की कविताएँ पढ़ कर उनके काव्य संसार को जानने का अवसर मिला ..हांलांकि सत्यम पेशे से इंजीनियर हैं लेकिन मन के कोमल भावों को व्यक्त करने के लिए कल्पना संसार में भी गोते लगाते हैं
और कविता के रूप में मोती चुन लाते हैं ..साहित्य के प्रति उनका रुझान स्पष्ट दिखता है और इस क्षेत्र में बहुत कुछ करने के लिए कटिबद्ध हैं ..यह काव्यसंग्रह उनकी लगन का ही परिणाम है ..
सत्यम जी की कविताओं को पढ़ कर लगता है कि ईश्वर में उनकी गहन आस्था है .. इसकी एक झलक उनकी इस रचना में दिखाई देती है –
अश्रु से सींचित, ह्रदय फूल की,/माला गूँथ मै लाया हूँ। /श्रद्धा के धागों में पिरोकर,/भक्ति उपहार बनाया हूँ।/आज प्रभु तुमको तो आकर, /करनी होगी माला स्वीकार,/वरना निर्धन भक्त तुम्हारा, /सह ना पायेगा उर का ये विकार।
ऐसे ही एक रचना और है -- मस्जिद में लगे ध्वनि-विस्तारक यंत्रों से,/अजान का वो स्वर सूना है! ना कौम की चर्चा कही, /ना ही मजहब का वास्ता,
बस है खुदा उन बंदो का, /अपनाते है जो मोहब्बत का रास्ता! /मैने तो जाना मोहब्बत होती बड़ी , / आज भी धर्म और मजहब से कई गुना है!
भक्ति रस में डूबी ‘साईं कृपा’ , ‘ तुझे पा लिया ‘गणपति वन्दना ‘ईश्वर के प्रति आस्था के अनुपम उदाहरण हैं .
युवा मन प्रेम के भाव में आकंठ डूब कर कुछ यूँ वर्णित कर रहा है –
है पता तुमको समर्पण,
उन रातों की बेसुधी का आलम,
प्राण का उस प्रीत की धुन पर,
निःस्वार्थ,बेवजह हर बार अर्पण।
यादों के बादल में तुमने छुपाया प्रेम मेरा,
और उसके बिन जहाँ में आज मै कितना अकेला।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर लिखी एक कविता पूरा दृश्य दिखा रही है अर्जुन के मन में उठने वाली शंकाओं को -
बस भौतिक राज्य और यश वैभव,
इस महायुद्ध का है उदघोष,
ना चाहिए कुछ भी अब मुझको,
ना कर पाऊँगा अपनों से रोष।
कवि सामजिक सरोकार को भी नहीं भूल है ..एक सार्थक सन्देश देता हुआ कह उठा है –
टूट कर बिखरोगे जो तुम,
क्या मिलेगा टूटने पर,
तुम ही होगे कल के सपने,
टूटते को जोड़ दो गर।
इसलिए हे पथिक! मत थक,
दूर तक तू हँस के चल ले।
पारिवारिक रिश्तों पर भी कवि कि लेखनी खूब चली है ... माँ , अर्धांगनी  कुछ ऐसी ही कविताएँ हैं जिनको पढने से कवि के हृदय में नारी के प्रति सम्मान कि भावना स्पष्ट दिखाई देती है . पिता के दुःख को भी कवि ने अपने शब्द दिए हैं .
कहीं कहीं स्वयं से जूझते हुए कवि का कोमल हृदय हताशा की  ओर मुड गया है –कहीं वो अपने दुर्भाग्य की बात कहता है तो कभी आज के ज़माने का नहीं होने की .. कहीं कहीं उनके मन की कश्मकश भी साफ़ दृष्टिगोचर होती है –
सूरज की पहली किरण हूँ,
या सूर्यास्त की लालिमा हूँ।
दिन का ऊजाला हूँ,या रात की कालिमा हूँ।
इस प्रश्न पर आज क्यों मौन हूँ,
न जाने मै कौन हूँ?
सत्यम जी की कविताओं में प्रवाह है , लय है .. पढते हुए पाठक खुद को इनसे जुड़ा हुआ महसूस करता है ..इस काव्यसंग्रह के लिए उनको बधाई और साहित्याकाश में वो उभरते सितारे हैं .उनकी चमक दूर दूर तक पहुंचे इसके लिए शुभकामनायें .
पुस्तक का नाम ---- मेरे बाद
रचनाकार ---- सत्यम शिवम
प्रकाशक --- उत्कर्ष प्रकाशन ,142,शाक्य पुरी , कंकरखेड़ा  मेरठ
मूल्य ---- 150 /
ISBN ---978-81-921666-9-8
पुस्तक इस मेल आई डी से 100/ रुपए में  प्राप्त  की जा सकती है
<satyamshivam95@gmail.com>, 

पुराने पोस्ट के लिंक
1. व्योमकेश दरवेश, 2. मित्रो मरजानी, 3. धरती धन न अपना, 4. सोने का पिंजर अमेरिका और मैं, 5. अकथ कहानी प्रेम की, 6. संसद से सड़क तक, 7.मुक्तिबोध की कविताएं, 8. जूठन, 9. सूफ़ीमत और सूफ़ी-काव्य, 10. एक कहानी यह भी, 11. आधुनिक भारतीय नाट्य विमर्श, 12. स्मृतियों में रूस13. अन्या से अनन्या 14. सोनामाटी 15. मैला आंचल 16. मछली मरी हुई 17. परीक्षा-गुरू 18.गुडिया भीतर गुड़िया 19. स्मृतियों में रूस 20. अक्षरों के साये 21. कलामे रूमीपुस्तक परिचय-22 : हिन्द स्वराज : नव सभ्यता-विमर्श पुस्तक परिचय-23 : बच्चन के लोकप्रिय गीत पुस्तक परिचय-24 : विवेकानन्द 25. वह जो शेष है 26. ज़िन्दगीनामा

मंगलवार, 21 फ़रवरी 2012

संत कबीर

इस शुक्रवार से राजभाषा ब्लॉग पर कबीर दास की शृंखला प्रारम्भ करने का प्रयास किया जा रहा है ..... आज की कड़ी में उनका जीवन परिचय ----
हिंदी साहित्य में कबीर का व्यक्तित्व अनुपम है। गोस्वामी तुलसीदास को छोड़ कर इतना महिमामण्डित व्यक्तित्व `कबीर' के सिवा अन्य किसी का नहीं है।
जीवन परिचय

कबीर के जन्म के संबंध में अनेक किंवदन्तियाँ हैं। कुछ लोगों के अनुसार वे जगद्गुरु रामानन्द स्वामी के आशीर्वाद से काशी की एक विधवा ब्राह्मणी के गर्भ से उत्पन्न हुए थे। ब्राह्मणी उस नवजात शिशु को लहरतारा ताल के पास फेंक आयी। उसे नीरु नाम का जुलाहा अपने घर ले आया। उसीने उसका पालन-पोषण किया। बाद में यही बालक कबीर कहलाया।
कतिपय कबीर पन्थियों की मान्यता है कि कबीर का जन्म काशी में लहरतारा तालाब में उत्पन्न कमल के मनोहर पुष्प के ऊपर बालक के रूप में हुआ। एक प्राचीन ग्रंथ के अनुसार किसी योगी के औरस तथा प्रतीति नामक देवाङ्गना के गर्भ से भक्तराज प्रल्हाद ही संवत १४५५ ज्येष्ठ शुक्ल १५ को कबीर के रूप में प्रकट हुए थे।
कुछ लोगों का कहना है कि वे जन्म से मुसलमान थे और युवावस्था में स्वामी रामानन्द के प्रभाव से उन्हें हिंदु धर्म की बातें मालूम हुईं। एक दिन, एक पहर रात रहते ही कबीर पञ्चगंगा घाट की सीढ़ियों पर गिर पड़े। रामानन्द जी गंगास्नान करने के लिये सीढ़ियाँ उतर रहे थे कि तभी उनका पैर कबीर के शरीर पर पड़ गया। उनके मुख से तत्काल `राम-राम' शब्द निकल पड़ा। उसी राम को कबीर ने दीक्षा-मन्त्र मान लिया और रामानन्द जी को अपना गुरु स्वीकार कर लिया। कबीर के ही शब्दों में- हम कासी में प्रकट भये हैं, रामानन्द चेताये। अन्य जनश्रुतियों से ज्ञात होता है कि कबीर ने हिंदु-मुसलमान का भेद मिटा कर हिंदु-भक्तों तथा मुसलमान फकीरों का सत्संग किया और दोनों की अच्छी बातों को हृदयंगम कर लिया।

जनश्रुति के अनुसार उन्हें एक पुत्र कमल तथा पुत्री कमाली थी। इतने लोगों की परवरिश करने के लिये उन्हें अपने करघे पर काफी काम करना पड़ता था। साधु संतों का तो घर में जमावड़ा रहता ही था। कबीर पढ़े-लिखे नहीं थे- मसि कागद छूवो नहीं, कलम गही नहिं हाथ।
कृतियाँ
संत कबीर ने स्वयं ग्रंथ नहीं लिखे, मुँह से भाखे और उनके शिष्यों ने उसे लिख लिया। आप के समस्त विचारों में रामनाम की महिमा प्रतिध्वनित होती है। वे एक ही ईश्वर को मानते थे और कर्मकाण्ड के घोर विरोधी थे। अवतार, मूर्त्ति, रोज़ा, ईद, मसजिद, मंदिर आदि को वे नहीं मानते थे।
कबीर के नाम से मिले ग्रंथों की संख्या भिन्न-भिन्न लेखों के अनुसार भिन्न-भिन्न है। एच.एच. विल्सन के अनुसार कबीर के नाम पर आठ ग्रंथ हैं। विशप जी.एच. वेस्टकॉट ने कबीर के ८४ ग्रंथों की सूची प्रस्तुत की तो रामदास गौड ने `हिंदुत्व' में ७१ पुस्तकें गिनायी हैं। कबीर की वाणी का संग्रह `बीजक' के नाम से प्रसिद्ध है। इसके तीन भाग हैं-
रमैनी
सबद
सारवी
यह पंजाबी, राजस्थानी, खड़ी बोली, अवधी, पूरबी, व्रजभाषा आदि कई भाषाओं की खिचड़ी है।
कबीर परमात्मा को मित्र, माता, पिता और पति के रूप में देखते हैं। यही तो मनुष्य के सर्वाधिक निकट रहते हैं। वे कभी कहते हैं- हरिमोर पिउ, मैं राम की बहुरिया तो कभी कहते हैं, हरि जननी मैं बालक तोरा उस समय हिंदु जनता पर मुस्लिम आतंक का कहर छाया हुआ था। कबीर ने अपने पंथ को इस ढंग से सुनियोजित किया जिससे मुस्लिम मत की ओर झुकी हुई जनता सहज ही इनकी अनुयायी हो गयी। उन्होंने अपनी भाषा सरल और सुबोध रखी ताकि वह आम आदमी तक पहुँच सके। इससे दोनों सम्प्रदायों के परस्पर मिलन में सुविधा हुई। इनके पंथ मुसलमान-संस्कृति और गोभक्षण के विरोधी थे।
कबीर को शांतिमय जीवन प्रिय था और वे अहिंसा, सत्य, सदाचार आदि गुणों के प्रशंसक थे। अपनी सरलता, साधु स्वभाव तथा संत प्रवृत्ति के कारण आज विदेशों में भी उनका समादर हो रहा है।
वृद्धावस्था में यश और कीर्त्ति की मार ने उन्हें बहुत कष्ट दिया। उसी हालत में उन्होंने बनारस छोड़ा और आत्मनिरीक्षण तथा आत्मपरीक्षण करने के लिये देश के विभिन्न भागों की यात्राएँ कीं। इसी क्रम में वे कालिंजर जिले के पिथौराबाद शहर में पहुँचे। वहाँ रामकृष्ण का छोटा सा मन्दिर था। वहाँ के संत भगवान गोस्वामी जिज्ञासु साधक थे किंतु उनके तर्कों का अभी तक पूरी तरह समाधान नहीं हुआ था। संत कबीर से उनका विचार-विनिमय हुआ। कबीर की एक साखी ने उन के मन पर गहरा असर किया-
बन ते भागा बिहरे पड़ा, करहा अपनी बान।
करहा बेदन कासों कहे, को करहा को जान।।

वन से भाग कर बहेलिये के द्वारा खोये हुए गड्ढे में गिरा हुआ हाथी अपनी व्यथा किस से कहे ? सारांश यह कि धर्म की जिज्ञासा सें प्रेरित हो कर भगवान गोसाई अपना घर छोड़ कर बाहर तो निकल आये और हरिव्यासी सम्प्रदाय के गड्ढे में गिर कर अकेले निर्वासित हो कर असंबाद्य्य स्थिति में पड़ चुके हैं। मूर्त्ति पूजा को लक्ष्य करते हुए उन्होंने एक साखी हाजिर कर दी-
पाहन पूजे हरि मिलैं, तो मैं पूजौंपहार।
था ते तो चाकी भली, जासे पीसी खाय संसार।।

११९ वर्ष की अवस्था में उन्होंने मगहर में देह त्याग किया।


क्रमश:

सोमवार, 14 नवंबर 2011

कुरुक्षेत्र …. प्रथम सर्ग ( भाग – 1 )

नमस्कार , आज इस ब्लोग की यह 700 वीं  पोस्ट है , तो मैंने इस ब्लॉग के संचालक मनोज जी से कहा कि दो साल से कम के समय में 700 पोस्ट का होना कोई छोटी उपलब्धि नहीं है।  क्यों न इस अवसर को यादगार बनाने के लिए कुछ नया किया जाए ? उन्होंने कहा कि मन तो मेरा भी है। मैंने उनके समक्ष प्रस्ताव रखा कि क्यों न हम राष्ट्रीय कवि दिनकर की कृति कुरुक्षेत्र को प्रस्तुत करें ? उनको यह विचार पसंद आया  तो
आप सभी गुणी पाठकों के समक्ष राष्ट्रीय कवि  रामधारी सिंह “ दिनकर “ की काव्य – कृति  ‘ कुरुक्षेत्र ‘ ले कर आई हूँ …आशा है आप इसे पसंद करेंगे …
कुरुक्षेत्र …. प्रथम सर्ग ( भाग – 1 )
File:Ramdhari Singh 'Dinkar'.JPG 
  1908 ----- 1974

वह कौन रोता है वहाँ-
इतिहास के अध्याय पर,
जिसमें लिखा है, नौजवानों के लहू का मोल है
प्रत्यय किसी बूढे, कुटिल नीतिज्ञ के व्याहार का;
जिसका हृदय उतना मलिन जितना कि शीर्ष वलक्ष है;
जो आप तो लड़ता नहीं,
कटवा किशोरों को मगर,
आश्वस्त होकर सोचता,
शोणित बहा, लेकिन, गयी बच लाज सारे देश की?

और तब सम्मान से जाते गिने
नाम उनके, देश-मुख की लालिमा
है बची जिनके लुटे सिन्दूर से;
देश की इज्जत बचाने के लिए
या चढा जिनने दिये निज लाल हैं।
ईश जानें, देश का लज्जा विषय
तत्त्व है कोई कि केवल आवरण
उस हलाहल-सी कुटिल द्रोहाग्नि का
जो कि जलती आ रही चिरकाल से
स्वार्थ-लोलुप सभ्यता के अग्रणी
नायकों के पेट में जठराग्नि-सी।

विश्व-मानव के हृदय निर्द्वेष में
मूल हो सकता नहीं द्रोहाग्नि का;
चाहता लड़ना नहीं समुदाय है,
फैलतीं लपटें विषैली व्यक्तियों की साँस से।
हर युद्ध के पहले द्विधा लड़ती उबलते क्रोध से,
हर युद्ध के पहले मनुज है सोचता, क्या शस्त्र ही-
उपचार एक अमोघ है
अन्याय का, अपकर्ष का, विष का गरलमय द्रोह का!

लड़ना उसे पड़ता मगर।
औ' जीतने के बाद भी,
रणभूमि में वह देखता है सत्य को रोता हुआ;
वह सत्य, है जो रो रहा इतिहास के अध्याय में
विजयी पुरुष के नाम पर कीचड़ नयन का डालता।
उस सत्य के आघात से
हैं झनझना उठ्ती शिराएँ प्राण की असहाय-सी,
सहसा विपंचि लगे कोई अपरिचित हाथ ज्यों।
वह तिलमिला उठता, मगर,
है जानता इस चोट का उत्तर न उसके पास है।

सहसा हृदय को तोड़कर
कढती प्रतिध्वनि प्राणगत अनिवार सत्याघात की-
'नर का बहाया रक्त, हे भगवान! मैंने क्या किया
लेकिन, मनुज के प्राण, शायद, पत्थरों के हैं बने।
इस दंश का दुख भूल कर
होता समर-आरूढ फिर;
फिर मारता, मरता,
विजय पाकर बहाता अश्रु है।

यों ही, बहुत पहले कभी कुरुभूमि में
नर-मेध की लीला हुई जब पूर्ण थी,
पीकर लहू जब आदमी के वक्ष का
वज्रांग पाण्डव भीम का मन हो चुका परिशान्त था।
और जब व्रत-मुक्त-केशी द्रौपदी,
मानवी अथवा ज्वलित, जाग्रत शिखा प्रतिशोध की
दाँत अपने पीस अन्तिम क्रोध से,
रक्त-वेणी कर चुकी थी केश की,
केश जो तेरह बरस से थे खुले।

और जब पविकाय पाण्डव भीम ने
द्रोण-सुत के सीस की मणि छीन कर
हाथ में रख दी प्रिया के मग्न हो
पाँच नन्हें बालकों के मूल्य-सी।
कौरवों का श्राद्ध करने के लिए
या कि रोने को चिता के सामने,
शेष जब था रह गया कोई नहीं
एक वृद्धा, एक अन्धे के सिवा।


क्रमश:…


अगला भाग

सोमवार, 10 अक्टूबर 2011

विरासत

विरासत

संगीता स्वरुप ( गीत )

ज़िन्दगी के हर मोड़ पर
मुझे मात मिली
तुम एक और मात दे दोगे
तो कोई बात नही ।

दिल का सागर भरा है
गम की लहरों से
तुम एक और लहर मिला दोगे
तो कोई बात नही।

धूल का गुबार ही
मेरी किस्मत में लिखा है
खुशियों के पीछे तुम भी
उसमें एक ज़र्रा मिला दोगे
तो कोई बात नही।

प्यासा दिल पानी की चाह में
न जाने कहाँ कहाँ भटक गया
तुम भी पानी दे कर छीन लोगे
तो कोई बात नही ।

हालत के हाथों मैं अक्सर
हो जाती हूँ मजबूर
तुम और मजबूर बना दोगे
तो कोई बात नही |

मेरी ज़िन्दगी की किरणों में
कहीं कोई चमक बाकी थी
तुम उसको भी छीन लोगे
तो कोई बात नही ।

इस उजाड़ , वीरान सी ज़िन्दगी से
क्या शिकवा ?
तुम नेह का बादल हटा दोगे
तो कोई बात नही।

बस बात है तो केवल इतनी कि
गर हो मेरी ज़िन्दगी में
कोई चाहत , तम्मनाएं औ खुशी
वो सब तुझे मेरी विरासत में मिलें
ज़िन्दगी की इस कठोर धरती पर
तेरे लिए खुशी का हर फूल खिले .

शुक्रवार, 19 नवंबर 2010

इन्दिरा प्रियदर्शिनी गांधी :: संगीता स्वरूप जी की कविता।

रेखा श्रीवास्तव जी की पोस्ट निर्धारित थी, उसे कल शनिवार को प्रस्तुत करेंगे।  

आज भारत की तीसरी प्रधान मंत्री श्रीमती इन्दिरा प्रियदर्शिनी गांधी (१९ नवंबर १९१७-३१ अक्तूबर १९८४) का जन्म दिन है। १९६६ से १९७७ तक लगातार तीन कार्यकाल के लिए और १९८० से सन् १९८४ में उनकी हत्या तक वो भारत की प्रधानमंत्री थीं। वे कुल पंद्रह साल तक इस पद पर रही एवम् अब तक भारत की प्रधानमंत्री होने वाली एकमात्र महिला हैं।

राजभाषा हिंदी के प्रति अपने विचार रखते हुए उन्होंने कहा था,

“देश की भाषाओं के बीच हिंदी को संपर्क भाषा के रूप में कार्य करना है। इसे इसलिए मान्यता नहीं मिली है कि यह सबसे अधिक विकसित भाषा है वरन्‌ इसलिए कि इसे अहिंदी भाषी लोगों ने अंगीकार किया है”।

विश्वभाषा के रूप में भी उन्होंने हिंदी को देखा और कहा,

“हम सब की एक समान इच्छा है कि हिंदी सम्पूर्ण विश्व में मित्रता की पताका फहराकर सह अस्तित्व, शांति और अहिंसा का संदेश विश्व के हर हिस्से में फैला दे”।

 

हिंदी बनाम अंग्रेज़ी के सवाल पर उनका कहना था,

“किसी एक प्रदेश के अंग्रेज़ी हठ के कारण समस्त देश में हिंदी की प्रगति को रोका नहीं जा सकता”।

 

 

आज उनको याद करते हुए हम विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं और साथ ही प्रस्तुत करते हैं संगीता स्वरूप जी की कविता।

 

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इन्दिरा प्रियदर्शिनी गांधी

संगीता स्वरूप

प्रियदर्शनी तुम प्रियदर्शी  

थीं राष्ट्र के प्रति समर्पित

अग्रणी बने हिंद विश्व में

रहीं सदा इस  पर गर्वित

समित सार्क सम्मलेन कर

तुमने क्या क्या कर डाला

हरित क्रांति का शंख बजाकर

देश का रूप बदल डाला .

जिधर तुम निकल जातीं थीं

जनता पीछे चल पड़ती थी

एक झलक पाने को तुम्हारी

आँखें उनकी व्याकुल रहती थीं .

जाति- पांति से दूर सदा ही

बहाई समता की निर्मल धारा

शोषित वर्ग का हो उत्थान

दिया ‘गरीबी हटाओ’ का नारा .

संकट आया देश पर जब भी

निज कौशल से दिया सहारा

मातृभूमि पर आंच न आई

हर मुसीबत से इसे उबारा.

नदियों पर बांधों का बंधन

रेत में नहरों का स्पंदन

हरे भरे खेतों का वर्धन

भारत के माथे पर चन्दन .

मंदिर –मस्जिद-गुरुद्वारे जाकर

माथा टेका हर चौखट पर

माना सब धर्म है एक समान

यही था राष्ट्रीय एकता का गान .

तुमने अखंड देश बनाने को

तन खंड - खंड कर डाला

ख़ूनी प्यास बुझाने को

अपना लहू बहा डाला .

रहे देश में सदा एकता

कर डाला जीवन बलिदान

पर हाय ! भाग्यहीन भारतवासी

क्या दे पाय कुछ प्रतिदान ?

घर-घर , आँगन द्वार- द्वार

मार - काट मची हुई है

ये हिंदू है और ये है मुस्लिम

यही चेतना जगी हुई है .

धर्म के नाम पर जबतक

हम कौमों को बांटेंगे

भाई की गर्दन  कबतक

अपने हाथों ही काटेंगे .

कौम एक है हम सबकी

हर भारतीय को समझना होगा

तभी राष्ट्रीय एकता का स्वप्न

हम सबके लिए सफल होगा.

सोमवार, 20 सितंबर 2010

समझ का फेर

समझ का फेर

संगीता स्वरुप

कब तक वो इस छोटे से कमरे में अकेली बैठे ? `देखूं बाहर क्या हो रहा है,’ यही सोच कर वो रसोई में पहुँची. अचानक उसके हाथ से काँच का गिलास गिर कर टूट गया.

बहू कि कर्कश आवाज़ आई - “क्या हुआ?”

वो सहमी सी खड़ी थी यही सोचती हुई कि `पहले बहू आएगी फिर बेटा.’

यही हुआ . बहू आग्नेय नेत्रों से देख रही थी!

बेटा झुंझला के बोला - "माँ ! तुमको कितनी बार कहा है कि अपने कमरे में रहा करो . कुछ ना कुछ तोड़ - फोड़ करती रहती हो , ये नही कि आराम से कमरे में बैठो . पर तुमको कुछ समझ आए तब ना. "

बचपन में ना जाने क्या क्या तोड़ दिया करता था . जब ये बोलना भी नही सीखा था तब इसकी बात मैं इशारे से समझ जाती थी , आज कह रहा है कि मैं इसकी बात समझती नही .यह सोचते सोचते उसके कदम अपने कमरे की ओर बढ़ गये --

सोमवार, 13 सितंबर 2010

एक वचन लेना ही होगा!

एक वचन लेना ही होगा!


संगीता स्वरुप

आज हम स्वतंत्र भारत के नागरिक
जब स्वतंत्रता दिवस मनाते हैं
ध्वज में चन्द पुष्प रख
राष्ट्रध्वज फहराते हैं .

यह देख अक्सर

एक ख्याल आता है मन में

क्या हम सच में स्वतंत्र हैं?

 

 

किसी मुख्य अतिथि का आना
डोरी खींचना , पुष्पों का गिरना
हमारा ताली बजाना
और राष्ट्रीय गीत गाना .
मात्र एक औपचारिकता

राष्ट्रीय धर्म निभाने की

और इस तरह

ध्वज फहराने की .

पर क्या यही कर्तव्य है हमारा ?

आज हम स्वयं को
स्वतंत्र मानते हैं
पर कितने स्वतंत्र हैं
यह कभी जाना?

आज हम अँग्रेज़ों से आज़ाद
पर अँग्रेज़ी के गुलाम हैं
जो दो बोल अँग्रेज़ी बोलता है
समाज में उसी की शान है
हमारे भारत के स्वतंत्र नागरिक
प्रगतिशील हो गये हैं
राष्ट्रीय भाषा नही अपितु
अंतरराष्ट्रीय भाषा के ग्याता बन गये हैं .
अँग्रेज़ी में गि ट - पिट कर
स्वयं को उँचा मानते हैं
जो भारती के ग्याता हैं
वो हीनता के गर्त में
गोते खाते हैं .

आज हम अँग्रेज़ों से स्वाधीन
पर अँग्रेज़ियत में जकड़े हुए हैं
भाषा के क्षेत्र में अभी तक
पराधीनता को पकड़े हुए हैं.

इस स्वतंत्र भारत में
अपनी राष्ट्र भाषा का
कैसा गौरव बढ़ा रहे हैं ?
पूरे वर्ष में
हिन्दी की प्रगति के लिए
केवल एक सप्ताह मना रहे हैं.

जब तक एक सप्ताह को
बावन ( एक साल ) सप्ताह में नही बदल पाएँगे
तब तक हिन्दी दिवस का अर्थ
सही अर्थों में नही समझ पाएँगे
जब भाषा में ही स्वतंत्र ना हो पाए
तो इस स्वतंत्रता का क्या अर्थ है
जब इस ध्वज का सम्मान ना कर पाए
तो ध्वज फहराने का क्या अर्थ है?

नही--अब वक़्त नही-
अब तो कुछ करना होगा
आज इस क्षण हमें
एक वचन लेना होगा .
क्यों कर अँग्रेज़ी आगे है
क्यों भारती पिछड़ रही है
क्यों भाषा का अपमान हुआ
क्यों हिन्दी सिसक रही है ?
कुछ तो कहना होगा
कुछ तो करना होगा
भाषा की स्वतंत्रता के लिए
एक वचन लेना ही होगा!
--

गुरुवार, 2 सितंबर 2010

हे कृष्ण …!

हे  कृष्ण …!


संगीता स्वरूप

जन्माष्टमी के पावन अवसर पर राजभाषा हिन्दी परिवार की तरफ़ से आपको और आपके परिवार के सभी सदस्यों को हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई!

हे  कृष्ण -

आओ  तुम एक बार

लेकर  कल्की  अवतार!

 

पापों का नाश कर  तुमने

पापियों को मुक्ति  दी

आज पापों के बोझ से

अवनि  है धंस रही

फ़ैल  रहा दसों दिशाओं में

अपरिमित  भ्रष्टाचार

हे कृष्ण -

तुम आओ  एक बार !

 

सतीत्व  की रक्षा को तुमने

था स्वयं को अर्पित किया

आज यहाँ हर चौराहे पर

स्त्रीत्व  खंडित  हो रहा

संवेदनाएं  प्रस्तर हुयीं

हुआ  असीमित व्याभिचार

हे कृष्ण -

आओ तुम एक बार !

 

धर्म रक्षा  हेतु तुमने

श्राप गांधारी का लिया

आज धरती पर है

अधर्म का दिया  जला

धर्मांध बने हुए सब

कर रहे एक दूजे पर प्रहार

हे कृष्ण -

आओ तुम एक बार !

ले कर कल्की अवतार!!

जन्माष्टमी के पावन अवसर पर राजभाषा हिन्दी परिवार की तरफ़ से आपको और आपके परिवार के सभी सदस्यों को हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई!