संगीता स्वरूप
सत्यम शिवम की कविताएँ पढ़ कर उनके काव्य संसार को जानने का अवसर मिला ..हांलांकि सत्यम पेशे से इंजीनियर हैं लेकिन मन के कोमल भावों को व्यक्त करने के लिए कल्पना संसार में भी गोते लगाते हैं
पुस्तक का नाम ---- मेरे बाद
संगीता स्वरूप
सत्यम शिवम की कविताएँ पढ़ कर उनके काव्य संसार को जानने का अवसर मिला ..हांलांकि सत्यम पेशे से इंजीनियर हैं लेकिन मन के कोमल भावों को व्यक्त करने के लिए कल्पना संसार में भी गोते लगाते हैं
पुस्तक का नाम ---- मेरे बाद विरासत
संगीता स्वरुप ( गीत )
ज़िन्दगी के हर मोड़ पर
मुझे मात मिली
तुम एक और मात दे दोगे
तो कोई बात नही ।
दिल का सागर भरा है
गम की लहरों से
तुम एक और लहर मिला दोगे
तो कोई बात नही।
धूल का गुबार ही
मेरी किस्मत में लिखा है
खुशियों के पीछे तुम भी
उसमें एक ज़र्रा मिला दोगे
तो कोई बात नही।
प्यासा दिल पानी की चाह में
न जाने कहाँ कहाँ भटक गया
तुम भी पानी दे कर छीन लोगे
तो कोई बात नही ।
हालत के हाथों मैं अक्सर
हो जाती हूँ मजबूर
तुम और मजबूर बना दोगे
तो कोई बात नही |
मेरी ज़िन्दगी की किरणों में
कहीं कोई चमक बाकी थी
तुम उसको भी छीन लोगे
तो कोई बात नही ।
इस उजाड़ , वीरान सी ज़िन्दगी से
क्या शिकवा ?
तुम नेह का बादल हटा दोगे
तो कोई बात नही।
बस बात है तो केवल इतनी कि
गर हो मेरी ज़िन्दगी में
कोई चाहत , तम्मनाएं औ खुशी
वो सब तुझे मेरी विरासत में मिलें
ज़िन्दगी की इस कठोर धरती पर
तेरे लिए खुशी का हर फूल खिले .
रेखा श्रीवास्तव जी की पोस्ट निर्धारित थी, उसे कल शनिवार को प्रस्तुत करेंगे।
आज भारत की तीसरी प्रधान मंत्री श्रीमती इन्दिरा प्रियदर्शिनी गांधी (१९ नवंबर १९१७-३१ अक्तूबर १९८४) का जन्म दिन है। १९६६ से १९७७ तक लगातार तीन कार्यकाल के लिए और १९८० से सन् १९८४ में उनकी हत्या तक वो भारत की प्रधानमंत्री थीं। वे कुल पंद्रह साल तक इस पद पर रही एवम् अब तक भारत की प्रधानमंत्री होने वाली एकमात्र महिला हैं।
राजभाषा हिंदी के प्रति अपने विचार रखते हुए उन्होंने कहा था,
“देश की भाषाओं के बीच हिंदी को संपर्क भाषा के रूप में कार्य करना है। इसे इसलिए मान्यता नहीं मिली है कि यह सबसे अधिक विकसित भाषा है वरन् इसलिए कि इसे अहिंदी भाषी लोगों ने अंगीकार किया है”।
विश्वभाषा के रूप में भी उन्होंने हिंदी को देखा और कहा,
“हम सब की एक समान इच्छा है कि हिंदी सम्पूर्ण विश्व में मित्रता की पताका फहराकर सह अस्तित्व, शांति और अहिंसा का संदेश विश्व के हर हिस्से में फैला दे”।
हिंदी बनाम अंग्रेज़ी के सवाल पर उनका कहना था,
“किसी एक प्रदेश के अंग्रेज़ी हठ के कारण समस्त देश में हिंदी की प्रगति को रोका नहीं जा सकता”।
आज उनको याद करते हुए हम विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं और साथ ही प्रस्तुत करते हैं संगीता स्वरूप जी की कविता।

इन्दिरा प्रियदर्शिनी गांधी
संगीता स्वरूप
प्रियदर्शनी तुम प्रियदर्शी
थीं राष्ट्र के प्रति समर्पित
अग्रणी बने हिंद विश्व में
रहीं सदा इस पर गर्वित
समित सार्क सम्मलेन कर
तुमने क्या क्या कर डाला
हरित क्रांति का शंख बजाकर
देश का रूप बदल डाला .

जिधर तुम निकल जातीं थीं
जनता पीछे चल पड़ती थी
एक झलक पाने को तुम्हारी
आँखें उनकी व्याकुल रहती थीं .
जाति- पांति से दूर सदा ही
बहाई समता की निर्मल धारा
शोषित वर्ग का हो उत्थान
दिया ‘गरीबी हटाओ’ का नारा .
संकट आया देश पर जब भी
निज कौशल से दिया सहारा
मातृभूमि पर आंच न आई
हर मुसीबत से इसे उबारा.
नदियों पर बांधों का बंधन
रेत में नहरों का स्पंदन
हरे भरे खेतों का वर्धन
भारत के माथे पर चन्दन .
मंदिर –मस्जिद-गुरुद्वारे जाकर
माथा टेका हर चौखट पर
माना सब धर्म है एक समान
यही था राष्ट्रीय एकता का गान .
तुमने अखंड देश बनाने को
तन खंड - खंड कर डाला
ख़ूनी प्यास बुझाने को
अपना लहू बहा डाला .
रहे देश में सदा एकता
कर डाला जीवन बलिदान
पर हाय ! भाग्यहीन भारतवासी
क्या दे पाय कुछ प्रतिदान ?
घर-घर , आँगन द्वार- द्वार
मार - काट मची हुई है
ये हिंदू है और ये है मुस्लिम
यही चेतना जगी हुई है .
धर्म के नाम पर जबतक
हम कौमों को बांटेंगे
भाई की गर्दन कबतक
अपने हाथों ही काटेंगे .
कौम एक है हम सबकी
हर भारतीय को समझना होगा
तभी राष्ट्रीय एकता का स्वप्न
हम सबके लिए सफल होगा.
समझ का फेर
|
|
बहू कि कर्कश आवाज़ आई - “क्या हुआ?” वो सहमी सी खड़ी थी यही सोचती हुई कि `पहले बहू आएगी फिर बेटा.’ यही हुआ . बहू आग्नेय नेत्रों से देख रही थी! बेटा झुंझला के बोला - "माँ ! तुमको कितनी बार कहा है कि अपने कमरे में रहा करो . कुछ ना कुछ तोड़ - फोड़ करती रहती हो , ये नही कि आराम से कमरे में बैठो . पर तुमको कुछ समझ आए तब ना. " बचपन में ना जाने क्या क्या तोड़ दिया करता था . जब ये बोलना भी नही सीखा था तब इसकी बात मैं इशारे से समझ जाती थी , आज कह रहा है कि मैं इसकी बात समझती नही .यह सोचते सोचते उसके कदम अपने कमरे की ओर बढ़ गये -- |
|
|
यह देख अक्सर एक ख्याल आता है मन में क्या हम सच में स्वतंत्र हैं?
राष्ट्रीय धर्म निभाने की और इस तरह ध्वज फहराने की . पर क्या यही कर्तव्य है हमारा ? आज हम स्वयं को
आज हम अँग्रेज़ों से स्वाधीन
जब तक एक सप्ताह को
|
|
|
| हे कृष्ण - आओ तुम एक बार लेकर कल्की अवतार!
पापियों को मुक्ति दी आज पापों के बोझ से अवनि है धंस रही फ़ैल रहा दसों दिशाओं में अपरिमित भ्रष्टाचार हे कृष्ण - तुम आओ एक बार !
था स्वयं को अर्पित किया आज यहाँ हर चौराहे पर स्त्रीत्व खंडित हो रहा संवेदनाएं प्रस्तर हुयीं हुआ असीमित व्याभिचार हे कृष्ण - आओ तुम एक बार !
श्राप गांधारी का लिया आज धरती पर है अधर्म का दिया जला धर्मांध बने हुए सब कर रहे एक दूजे पर प्रहार हे कृष्ण - आओ तुम एक बार ! ले कर कल्की अवतार!! |
जन्माष्टमी के पावन अवसर पर राजभाषा हिन्दी परिवार की तरफ़ से आपको और आपके परिवार के सभी सदस्यों को हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई! |