सोमवार, 27 अगस्त 2012

यह दिया बुझे नहीं / गोपाल सिंह नेपाली

घोर अंधकार हो,
चल रही बयार हो,
आज द्वार–द्वार पर यह दिया बुझे नहीं
यह निशीथ का दिया ला रहा विहान है ।

शक्ति का दिया हुआ,
शक्ति को दिया हुआ,
भक्ति से दिया हुआ,
यह स्वतंत्रता–दिया,
रूक रही न नाव हो
जोर का बहाव हो,
आज गंग–धार पर यह दिया बुझे नहीं,
यह स्वदेश का दिया प्राण के समान है ।

यह अतीत कल्पना,
यह विनीत प्रार्थना,
यह पुनीत भावना,
यह अनंत साधना,
शांति हो, अशांति हो,
युद्ध¸ संधि¸ क्रांति हो,
तीर पर, कछार पर, यह दिया बुझे नहीं,
देश पर, समाज पर, ज्योति का वितान है ।

तीन–चार फूल है,
आस–पास धूल है,
बांस है –बबूल है,
घास के दुकूल है,
वायु भी हिलोर दे,
फूंक दे¸ चकोर दे,
कब्र पर मजार पर, यह दिया बुझे नहीं,
यह किसी शहीद का पुण्य–प्राण दान है।

झूम–झूम बदलियाँ
चूम–चूम बिजलियाँ
आंधिया उठा रहीं
हलचलें मचा रहीं
लड़ रहा स्वदेश हो,
यातना विशेष हो,
क्षुद्र जीत–हार पर¸ यह दिया बुझे नहीं,
यह स्वतंत्र भावना का स्वतंत्र गान है ।

शुक्रवार, 24 अगस्त 2012

साखी ----- भाग - 26 / संत कबीर

जन्म  --- 1398

निधन ---  1518


कबीरा राम रिझाइ लै, मुखि अमृत गुण गाइ । 

फूटा नग ज्यूं जोड़ि मन, संधे संधि मिलाइ ॥ 251 ॥



लंबा मारग, दूरिधर, विकट पंथ, बहुमार ।

कहौ संतो, क्यूं पाइये, दुर्लभ हरि-दीदार ॥ 252 ॥



बिरह-भुवगम तन बसै मंत्र न लागै कोइ । 

राम-बियोगी ना जिवै जिवै तो बौरा होइ ॥ 253 ॥ 




यह तन जालों मसि करों, लिखों राम का नाउं । 

लेखणि करूं करंक की, लिखी-लिखी राम पठाउं ॥ 254 ॥



अंदेसड़ा न भाजिसी, सदैसो कहियां । 

के हरि आयां भाजिसी, कैहरि ही पास गयां ॥ 255 ॥



इस तन का दीवा करौ, बाती मेल्यूं जीवउं ।

लोही सींचो तेल ज्यूं, कब मुख देख पठिउं ॥ 256 ॥



अंषड़ियां झाईं पड़ी, पंथ निहारि-निहारि । 

जीभड़ियाँ छाला पड़या, राम पुकारि-पुकारि ॥ 257 ॥



सब रग तंत रबाब तन, बिरह बजावै नित्त ।

और न कोई सुणि सकै, कै साईं के चित्त ॥ 258 ॥



जो रोऊँ तो बल घटै, हँसो तो राम रिसाइ । 

मन ही माहिं बिसूरणा, ज्यूँ घुँण काठहिं खाइ ॥ 259 ॥



कबीर हँसणाँ दूरि करि, करि रोवण सौ चित्त ।

बिन रोयां क्यूं पाइये, प्रेम पियारा मित्व ॥ 260 ॥