मंगलवार, 27 सितंबर 2011

हिंदी दिवस के बाद भी...

हिंदी दिवस के बाद भी...
(अरुण चन्द्र रॉय )

अभी १४ सितम्बर के आसपास हिंदी, हिंदी दिवस, हिंदी की गिरती उठती अवस्था पर खूब चर्चा हो रही थी. फिर अचानक यह चर्चा बंद हो गई है. लगता है कि मुद्दा ही ख़त्म हो गया है. हिंदी दिवस मानाने को लेकर सरकार के प्रति नाराज़गी भी देखी गई इन चर्चाओं में. लेकिन क्या भाषा के प्रति क्या सरकार की अकेली जिम्मेदारी है ? मुझे लगता है कि बाज़ार के प्रभाव के इतर जब तक हिंदी में काम काज नहीं होगा हिंदी की प्रगति सच्ची नहीं होगी. पता नहीं आपको मालूम है कि नहीं लेकिन हिंदी में बनाने वाले विज्ञापनों के स्क्रिप्ट रोमन में लिखे जाते हैं. फिल्मों जिन्हें हिंदी को बढ़ाने का श्रेय दिया जाता है वहां अधिकांश काम/स्क्रिप्टिंग, निर्देश आदि आदि  रोमन में होते  है. इस से हिंदी कमजोर हो रही है.


अरे मैं तो मुद्दे से भटक गया. हुआ यूं कि चीन की एक बड़ी रेडीमेड ब्रांड यिशिनो पिछले साल भारत के बाज़ार में आई है. अभी इस कंपनी के कोई दस स्टोर भारत के विभिन्न शहरों में हैं. जल्दी ही कम्पनी १०० नए स्टोर लाने वाली है. इस सिलसिले में उन्हें विज्ञापन कंपनी की जरुरत थी. कई प्रतुतिकरण के बाद हमें उनका काम करने का अवसर मिला. भारत में यिशिनो की मार्केटिंग मैनेज़र बोनी है. उस से मिलने के बाद मुझे भाषा के प्रति चीन के नज़रिए की एक झलक मिली जो मुझे तो प्रेरित कर गई.


बोनी एक २३-२४ साल की लड़की है. उसने चीन से फैशन में एम बी ए किया है. अंग्रेजी बोलती और समझती है. उच्चारण में थोड़ी समस्या है. पिछले छः महीनो से भारत में है. हिंदी भी समझने लगी है. हमारी पहली मीटिंग में उसने अपनी कंपनी का प्रोफाइल चीनी भाषा में ही दिया जिसमे चित्रों और सब टाईट्ल्स की वजह से समझ सका. लेकिन बोनी को कतई परेशानी नहीं थी कि चीनी भाषा में कार्पोरेट प्रेजेंटेशन से मैं चीज़ों को समझ नहीं सका हूं. और वो ठीक भी थी क्योंकि हमने उसके कार्पोरेट प्रेजेंटेशन को चीनी में अनुवाद कराया और फिर दूसरी मीटिंग में उसके लिए प्रिंट मीडिया की रणनीति लेकर गए थे. उसकी भाषा के प्रति स्वाभिमान ने हमें चीनी में अनुवाद करने पर मजबूर किया. और यिशिनो कोई सरकारी कंपनी नहीं है. वह एक लाभ कमाने वाली कंपनी है और भाषा के प्रति उसकी कोई जिम्मेदारी नहीं है.  लेकिन चीन में ऐसा नहीं है. वहां आम चीनी में अपनी भाषा के प्रति सम्मान है.


दूसरी मीटिंग में उसने हमने अपनी कंपनी के विभिन्न स्टोरों और प्रोडक्ट की सूची दी जो द्विभाषी थी. ये अंग्रेजी और चीनी भाषा में थी . यह एक आश्चर्य कम न था मेरे लिए.  अपने यहाँ केवल सरकार में द्विभाषी काम होता है. केवल संसद के काम हिंदी और अंग्रेजी में होते हैं. कार्पोरेट सेक्टर जो कि अपने उत्पाद तो हिंदी बोलने वाले के बीच खपाते हैं... हिंदी भाषी के बीच अपनी पैठ बनाने के लिए हिंदी में विज्ञापन करते हैं, लेकिन उन्हें किसी कारपोरेट को कार्यालय स्तर पर हिंदी में काम करते नहीं देखा है. यह जानते हुए कि हमें चीनी भाषा नहीं आती है बोनी ने अपनी भाषा को नहीं छोड़ा. बाद में उनके वाईस प्रेसिडेंट श्री ज्हाओ ज़ुज्हतो से मिलना हुआ. उनके साथ भी भाषाई अनुभव एक सा ही रहा. ज़ुज्हतो पहले चीनी भाषा में बोल रहे थे और बाद में उसे स्वयं ही अंग्रेजी में अनुवाद कर हमसे बात कर रहे थे. यिशिनो चीन की एक बड़ी रिटेल कंपनी है और दुनिया के बीसियों देशों में उसके रिटेल आउटलेट हैं. इस कंपनी से मिलने के बाद हिंदी में काम करने के प्रति मेरा नज़रिया बदला है और निश्चय और अधिक दृढ हुआ है.


अगली मीटिंग में बोनी मुस्कुरा रही थी. मेरा मीडिया प्लान भी द्विभाषी था. 
हिंदी दिवस ख़त्म नहीं हुआ है. इसे हर रोज़ मनाइये.

13 टिप्‍पणियां:

  1. प्रेरक प्रसंग ... जागरूक करने वाली पोस्ट

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  2. वाह....बोनी का अपनी भाषा के प्रति प्यार देख बहुत ही अच्छा लगा...काश उनलोगों से कुछ प्रेरणा लें..हमारे देशवासी भी.

    आपने भी द्विभाषी प्लान बना कर काबिल-ए-तारीफ़ कार्य किया..बधाई

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  3. हिंदी दिवस ख़त्म नहीं हुआ है. इसे हर रोज़ मनाइये.
    ....आपकी आशा पुष्पित-पल्लवित हो....

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  4. आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल बुधवार के चर्चा मंच पर भी की गई है!
    यदि किसी रचनाधर्मी की पोस्ट या उसके लिंक की चर्चा कहीं पर की जा रही होती है, तो उस पत्रिका के व्यवस्थापक का यह कर्तव्य होता है कि वो उसको इस बारे में सूचित कर दे। आपको यह सूचना केवल इसी उद्देश्य से दी जा रही है! अधिक से अधिक लोग आपके ब्लॉग पर पहुँचेंगे तो चर्चा मंच का भी प्रयास सफल होगा।

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  5. अच्छा जी। चीनी से लेकर फिलिस्तीनी तक, सब ऐसे ही हैं, सिवाय भारतीयों के।

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  6. क्षमा जी ने रोमन में टिप्पणी लिख कर यहीं साबित कर दिया कि हम नहीं सुधरेंगे।

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  7. अरुणजी, साधुवाद, बहुत अच्छा और काफी प्रेरक प्रसंग है। हिन्दी को लेकर काफी लोग हाय-तोबा मचाते रहते हैं। बहुत अच्छा आपने लिखा है कि रोज क्यों न हिन्दी दिवस मनाया जाए। बहुत अच्छा।

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  8. बहुत ही प्रेरक प्रसंग है।

    आपकी शैली ने संस्मरण को काफ़ी रोचक ढंग से प्रस्तुति दी है।

    मैं तो यही कोशिश करता हूं कि हर दिन हिन्दी दिवस हो। पर ‘ग’ क्षेत्र में काम करने की मज़बूरी कि क्षेत्रीय भाषा में दिन भर पचास प्रतिशत से अधिक काम करना पड़ता है (बातचीत के रूप में)।

    इसी प्ररिप्रेक्ष्य में यह भी विश्लेषण करना कम रोचक नहीं होगा कि चीन या उस जैसे देश रूस या जापान में उनकी मुख्य भाषा मेंडरीन आदि के अलावे कितनी अन्य भाषाएं हैं, कितनी अन्य लिपियां हैं और उन भाषाभाषी लोगों की संख्या कितनी है।

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  9. राय बाबू ! हिन्दी के प्रति आपकी संवेदनशीलता अनुकरणीय है . पर हम क्या करें, हमारी तो आदत ही हो गयी है बरसात में टर्राने की. बाकी समय हम निष्क्रियता में पड़े रहते हैं.
    बहरहाल, सुश्री बोनी की एक बात अच्छी लगी और एक बात बुरी. अच्छी यह कि उसे अपनी भाषा के व्यावहारिक स्वरूप से प्रेम है और बुरी यह कि दूसरी बैठक में उसने जो द्विभाषी सूची प्रस्तुत की उसमें चीनी के अतिरिक्त अंगरेजी थी हिन्दी नहीं. हिन्दी को स्थान न दे कर या तो उसने हिन्दी का अपमान किया है या फिर उसने हमें दर्पण दिखाया है कि देखो यदि तुम खुद हिन्दी का सम्मान नहीं करोगे तो दूसरा कोई क्यों करे.
    राय बाबू ! आपसे निवेदन है कि जिस तरह सुश्री बोनी ने बड़े ही आत्मविश्वास के साथ आप लोगों से चीनी में बात की उसी तररह आप भी उससे हिन्दी में ही बात कीजिएगा. जिस तरह आप उसकी चीनी समझे उसी तरह वह भी आपकी हिन्दी समझ जायेगी. बाद में भले ही आप चीनी सीख लें या फिर वह हिन्दी सीख ले पर कृपया बीच में अंगरेजी को मत लाइयेगा.

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  10. काश, ऐसा ही रुझान हिंदी भाषा-भाषियों में होता. मैं अपनी भाषा के प्रति समर्पित और अद्यतन संलग्न उस व्यतित्व से प्रभावित और अभिभूत हूँ. सलाम उसकी सोच और जिजीविषा को. आपको भी बधाई इस बात को उद्घतिक करने के लिए. कम से कम हम लोग एक उदाहरण के तौर पर अपनी बात को दृढ़ता से रख तो सकतें हैं. भाई बहुत बड़ा काम किया है आपने इस प्रस्तुत कर. गर्व है आप पर, आप की सोच और लेखनी पर.

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  11. मनोज जी और कौशलेन्द्र जी की बातों से भी सहमत. कौशलेन्द्र जी ने ठीक कहा है की बोनी ने हमें दर्पण दिखलाया है. हमे तो आदत सी पद गयी है मेढकों वाली. सर्व प्रथम हमे ही सुधरना होगा, अपना उदहारण स्वयं बनना पड़ेगा. कोई बहन नहीं चलेगा, यदि हमी आप मजबूरी गिनाने लगें तो औरों को तो मौका मिल ही जाएगा.

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