रविवार, 22 अप्रैल 2012

प्रेरक प्रसंग-33 : बरबादी की वेदना

प्रेरक प्रसंग-33

बरबादी की वेदना

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प्रस्तुत कर्ता : मनोज कुमार

हम एक ग़रीब देश के निवासी हैं। कोई भी उपयोगी चीज़ नष्ट करना राष्ट्र की हानि ही है। उसमें खाने-पीने की चीज़ की हानि तो पाप ही माना जाना चाहिए।

बात 1930 की है। बापू की दांडी यात्रा शुरू हो चुकी थी। बापू जहां पहुंचते हज़ारों लोग एकत्र होते और उनका संदेश सुनते। गरमी के दिन थे। तरबूजों का मौसम था। एक पड़ाव पर लोग गाड़ियों में भर-भर कर तरबूज लाए। फल इतने थे कि लोग बरबाद कर रहे थे। आधे खाकर फेक दे रहे थे। बापू ने यह सब देखा। उन्हें दुख हुआ। वे गम्भीर हो गए। उनके प्रवचन का समय आया। हज़ारों स्त्री-पुरुष उनकी बातें सुनने को इकट्ठे थे। बापू ने मंच से कहना शुरू किया,

“मैंने भारत के वाइसराय को पत्र लिखा है कि जनता की आमदनी जब प्रतिदिन दो आना है, तब आपका रोज़ाना सात सौ रुपए वेतन लेना ठीक नहीं है। यहां तो एक रुपए में आठ लोगों की गुजर होती है। आपके सात सौ रुपए में कम से कम पांच-छह हज़ार लोगों का पेट भर जाएगा। यानी आप पांच-छह हज़ार लोगों का खाना छीनते हैं। मैंने वाइसराय के पास देश की ग़रीबी की बात कही। उनकी फिजूलख़र्ची की आलोचना की। लेकिन यहां क्या देखता हूं?

“सैंकड़ों फल बरबाद हुए। साथियों के लिए फल लाना था तो थोड़े से लाते। लेकिन गाड़ी भर-भर कर लाए। अब मैं वाइसराय की आलोचना किस मुंह से करूं? यों फिजूलखर्च करना पाप है। आप लोगों ने मेरा सर नीचा कर दिया। देश में एक तरफ़ भुखमरी है, आधा पेट खाकर जीनेवाले लोग हैं और यहां मेरी स्वातन्त्र्य-यात्रा में इस तरह की बरबादी होती है। अपनी वेदना मैं कैसे व्यक्त करूं? फिर से ऐसा पाप नहीं करना।”

बापू जब चुप हुए तो लोगों का सिर झुका हुआ था। अनेक लोगों की आंखों से आंसू बह रहे थे।

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4 टिप्‍पणियां:

  1. गांधी जी की वेदना, साहब का सत्कार ।
    आधी आबादी जहाँ, है भूखी लाचार ।


    है भूखी लाचार, करे बर्बादी कितना ।
    भूखे खांय हजार, फेंक देते हैं जितना ।

    प्रासंगिक यह लेख, बढ़ी है पुरकस व्याधी ।
    बर्बादी ले रोक, समझ जो बोले गांधी ।।

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  2. बापू की बातें अच्छी सीख देती हैं ॥ प्रेरक प्रसंग

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  3. एक ऐसी समस्या जिसे बापू ने उस समय ही महसूस किया था.. एक ओर भूख और दूसरी ओर अनाज की बर्बादी!! सचमुच प्रेरक!!

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  4. आज भी तो ऐसा हो रहा है कहीं अनाज सड़ रहा है तो कहीं...

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