रविवार, 29 अप्रैल 2012

एक माँ को मिला बेटा


प्रेरक प्रसंग-34

एक माँ को मिला बेटा
 प्रस्तुत कर्ता : मनोज कुमार
मृत्यु से किसे भय नहीं लगता। लेकिन जीवन-मृत्यु तो ईश्वर  के हाथ है। गांधी जी मृत्यु को ईश्वर की कृपा मानते थे। अपने उपवास के दौरान उन्होंने कई बार यह बात कही, “यदि मैं मर जाऊँ तो इसे भी ईश्वर की कृपा मानिए।”

बात 1917 की है। बिहार प्रांत के चम्पारण ज़िले में गांधी जी किसानों के अन्दोलन को नेतृत्व प्रदान कर रहे थे। गोरे ज़मिन्दार सरकार की मदद से उन पर भारी जुल्म ढाया करते थे। एक बार एक जवान किसान को लाठी से पीटा गया। उसका सिर फूट गया। बाद में उसकी मृत्यु हो गई।

उसकी मां बूढ़ी थी। वह उसका इकलौता बेटा था। उसके ऊपर तो दुखों का पहाड़ ही टूट पड़ा। वह बापू के पास गई और फूट-फूट कर रोने लगी। बोली, “मेरा इकलौता बेटा चला गया। आप तो महात्मा हैं। उसे किसी तरह जिला दीजिए।”

गांधी जी क्या कर सकते थे? उन्होंने गम्भीर स्वर में कहा, “माँ, मैं तुम्हारे बेटे को कैसे ज़िन्दा कर दूँ? मुझमें ऐसी शक्ति कहां है? हां जो कर सकता हूं वह ज़रूर करूंगा। मैं उसके बदले तुम्हें दूसरा बेटा दूँगा।”

इतना कह कर बापू ने उस बूढ़ी माँ के कांपते हाथ अपने सिर पर रख लिए और उससे कहा, “लो लाठी-चार्ज में गांधी मर गया। तुम्हारा बेटा ज़िन्दा है और वह तुम्हारे सामने खड़ा है, तुम्हारा आशीर्वाद मांग रहा है।”

उस माँ की आंखों से झर-झर आंसू बहने लगे। उसने बापू को पास खींच लिया और अपने कलेजे से लगा लिया। उनका सिर अपनी गोद में लेकर बोली, “मेरे बापू! मेरे लाल! तुम सौ साल जियो!”
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10 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर वाह!
    आपकी यह ख़ूबसूरत प्रविष्टि कल दिनांक 30-04-2012 को सोमवारीय चर्चामंच-865 पर लिंक की जा रही है। सादर सूचनार्थ

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  2. प्रेरक ...मर्मस्पर्शी प्रसंग ...
    आभार ...

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  3. प्रेरक और मर्मस्पर्शी भी

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  4. डॉ, साहब आज भी ऐसे ही स्नेहसिक्त ,संकल्पित प्रेरणा की जरुरत है ,प्रश्न है की गाँधी कहाँ से लायें , ......मांएं इंतजार में हैं ....... आभार

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  5. बापू के अनेक रूपों से परिचय करने के लिए आभार

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