रविवार, 6 मई 2012

प्रेरक प्रसंग-35 : पश्चाताप


प्रेरक प्रसंग-35
पश्चाताप

बात 1926 की है। गांधी जी उन दिनों साबरमती आश्रम में रहा करते थे। दीनबंधु सी.एफ़. एण्ड्रूज़ भी उन दिनों वहीं थे। दीनबन्धु दया के सागर थे, दूसरों का दुख देख वे द्रवित हो जाते थे।

एक दिन मालाबार की ओर से कांग्रेस कमेटी का मंत्री गांधी जी के पास आया। उसने सार्वजनिक कोष का बहुत-सा धन लोकसेवा में ख़र्च किया था। लेकिन हिसाब-किताब में वह कच्चा था। सारा जमा-ख़र्च वह ठीक से पेश न कर पाया। हजार रुपये की बात थी। स्थानीय कार्यकारिणी का निर्णय था, “जमा-ख़र्च पेश करो या फिर पैसे भरो।”

उसने कहा, “इतने पैसे कहां से दूं?”

सदस्य ने कहा, “हम क्या बताएं? सार्वजनिक काम का हिसाब-किताब ठीक से रखना चाहिए था।”

उसने कहा,“बापू के पास जाता हूं। वे कह दें, तब तो मानोगे?”

सदस्य ने कहा, “हां मान लेंगे।”

वह मंत्री गांधी जी के पास पहुंचा। उनको उसने सारी बातें बताकर बोला, “बापू! मैं स्कूल की नौकरी छोड़कर सार्वजनिक सेवा के लिए अपने आपको समर्पित कर चुका हूं। मैंने एक भी पैसा अपने काम में नहीं लगाया है।”

गांधी जी ने कहा, “तुम जो कह रहे हो वह सच हो सकता है। लेकिन तुम्हें पैसे भरने चाहिए। सार्वजनिक काम में व्यवस्थितता बहुत ज़रूरी है।”

मंत्री बोला, “मुझसे भूल हो गई। इसका मेरे मन में पश्चाताप है। ग़लती तो हो गई, लेकिन अब क्या हो?”

गांधी जी बोले, “पैसा भरना ही एक मात्र उपाय है।”

वह युवक रोने लगा। पास ही दीनबन्धु खड़े थे। वे दुखी होकर बोले, “बापू! यह आदमी पश्चाताप कर रहा है। आप उससे इतनी कठोरता से क्यों बोलते हैं।”

गांधी जी ने कहा, “पश्चाताप केवल मन में होने से क्या लाभ? दोष का परिमार्जन हो, तो ही कहा जा सकेगा कि वास्तविक पश्चाताप हुआ। यह कुछ नहीं। इस युवक को अपनी भूल सुधारनी चाहिए। जनसेवक है यह।”

गांधी जी प्रेम-सागर थे। लेकिन समय आने पर वे कर्तव्य-निष्ठुर हो जाते थे। कभी-कभी तो कठोरता के साथ किये गए इंकार में ही अपार करुणा होती है।
***

9 टिप्‍पणियां:

  1. दोष का परिमार्जन हो, तो ही कहा जा सकेगा कि वास्तविक पश्चाताप हुआ। यह कुछ नहीं। इस युवक को अपनी भूल सुधारनी चाहिए। जनसेवक है यह।”

    और आज के जनसेवक ????????

    बहुत प्रेरक प्रसंग

    उत्तर देंहटाएं
  2. गांधी जी सिद्धांत विहीन पुरूष नही थे । उनका निर्णय सही था । हम सबको अपने सामाजिक एवं व्यक्तिगत जीवन में भी उनके फैसले को न्यायालयों की Rulings की तरह स्वीकार्य करना चाहिए । कानून का ज्ञाता होने के कारण उन्हे पता था कि पैसा न भरने के कारण वह व्यक्ति गबन(Embezzlement)का अपराधी माना जाएगा । इस प्रेरक प्रसंग को जीवन के सही संदर्भों में अपनी स्मृतियों में अहर्निश अक्षुण्ण बनाए रखना ही उस महापुरूष के प्रति हम सबकी सच्ची श्रद्धांजलि होगी । प्रेरक प्रसंग अच्छा लगा । धन्यवाद ।

    उत्तर देंहटाएं
  3. महात्मा गांधी जी के जीवन से जुडा हुआ प्रेरक प्रसंग!...आभार!

    उत्तर देंहटाएं
  4. So fas as i think ... Gandhi jee was right .. coz only accepting the wrongful deeds.. is not only the solution /

    उत्तर देंहटाएं
  5. प्रेरक प्रसंग!!!! i don,t think so.this shows vision of gandhi. instead of doing this if gandhi help that जनसेवक that was better.

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. Mr/ Mrs Bobby bha.

      Since, you have commented in English language, I Would like to say that you have not
      understood the meaning as to why Gandhi ji gave the decision which was binding in each and every respect about the said man with regard to his involvement in Embezzlement case. Please take it easy . Thanks.

      हटाएं
  6. Pretty nice post. I just stumbled upon your weblog and
    wanted to say that I have truly enjoyed browsing your blog posts.
    After all I'll be subscribing to your rss feed and I hope you write again soon!
    My homepage :: as quoted here

    उत्तर देंहटाएं

आप अपने सुझाव और मूल्यांकन से हमारा मार्गदर्शन करें