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मंगलवार, 1 मई 2012

युद्ध-विराम – अज्ञेय


युद्ध-विराम – अज्ञेय



नहीं, अभी कुछ नहीं बदला है।

अब भी
ये रौंदे हुए खेत
हमारी अवरुद्ध जिजीविषा के
सहमे हुए साक्षी हैं ;
अब भी
ये दलदल में फँसी हुई मौत की मशीनें
उन के अमानवी लोभ के
कुण्ठित, अशमित प्रेत :
अब भी
हमारे देवदारु-वनों की छाहों में
पहाड़ी खोहों में
चट्टानों की ओट में
वनैली खूँखार आँखें
घात में बैठी हैं :
अब भी
दूर अध-दिखती ऊँचाइयों पर
जमे हैं गिद्ध
प्रतीक्षा के बोझ से
गरदनें झुकाये हुए।

नहीं, अभी कुछ नहीं बदला है :
इस अनोखी रंगशाला में
नाटक का अन्तराल मानो
समय है सिनेमा का :
कितनी रील ?
कितनी क़िस्तें ?
कितनी मोहलत ?

कितनी देर
जलते गाँवों की चिरायँध के बदले
तम्बाक़ू के धुएँ का सहारा ?
कितनी देर
चाय और वाह-वाही की
चिकनी सहलाहट में
रुकेगा कारवाँ हमारा ?

नहीं, अभी कुछ नहीं बदला है :
हिम-चोटियों पर छाये हुए बादल
केवल परदा हैं –--
विराम है, पर वहाँ राम नहीं हैं :
सिंचाई की नहरों के टूटे हुए कगारों पर
बाँस की टट्टियाँ धोखे की हैं :
भूख को मिटाने के मानवी दायित्व का स्वीकार नहीं,
मिटाने की भूख की लोलुप फुफकार ही
उन के पार है।

बन्दूक के कुन्दे से
हल के हत्थे की छुअन
हमें अब भी अधिक चिकनी लगती,
संगीन की धार से
हल के फाल की चमक
अब भी अधिक शीतल,
और हम मान लेते कि उधर भी
मानव मानव था और है,
उधर भी बच्चे किलकते और नारियाँ दुलराती हैं,
उधर भी मेहनत की सूखी रोटी की बरकत
लूट की बोरियों से अधिक है ---
पर
अभी कुछ नहीं बदला है
क्योंकि उधर का निज़ाम
अभी उधर के किसान को
नहीं देता
आज़ादी
आत्मनिर्णय
आराम
ईमानदारी का अधिकार !

नहीं, अभी कुछ नहीं बदला है :
कुछ नहीं रुका है।
अब भी हमारी धरती पर
बैर की जलती पगडण्डियाँ दिख जाती हैं,
अब भी हमारे आकाश पर
धुएँ की रेखाएँ अन्धी
चुनौती लिख जाती  हैं :
अभी कुछ नहीं चुका है।
देश के जन-जन का
यह स्नेह और विश्वास
जो हमें बताता है
कि हम भारत के लाल हैं ---
वही हमें यह भी याद दिलाता है
कि हमीं इस पुण्य-भू के
क्षिति-सीमान्त के धीर, दृढ़व्रती दिक्पाल हैं।

हमें बल दो, देशवासियो,
क्यों कि तुम बल हो :
तेज दो, जो तेज्‌स हो,
ओज दो, जो ओज्‌स हो,
क्षमा दो, सहिष्णुता दो, तप दो
हमें ज्योति दो, देशवासियो,
हमें कर्म-कौशल दो :
क्यों कि अभी कुछ नहीं बदला है,
अभी कुछ नहीं बदला है ...
***  ***  ***

बुधवार, 25 अप्रैल 2012

हथौड़ा अभी रहने दो – अज्ञेय


हथौड़ा अभी रहने दो – अज्ञेय


सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय

हथौड़ा अभी रहने दो
अभी तो हन भी हम ने नहीं बनाया।
धरा की अन्ध कन्दराओं में से
अभी तो कच्चा धातु भी हम ने नहीं पाया।

और फिर वह ज्वाला कहाँ जली है
जिस में लोहा तपाया-गलाया जाएगा –-
जिस में मैल जलाया जाएगा?

आग, आग, सब से पहले आग !
उसी में से बीनी जाएंगी अस्थियाँ;
धातु जो जलाया और बुझाया जाएगा

बल्कि जिस से ही हन बनाया जाएगा –-
जिस का ही तो वह हथौड़ा होगा
जिस की ही मार हथियार को
सही रूप देगी, तीखी धार देगी।

हथौड़ा अभी रहने दो :
आओ, हमारे साथ वह आग जलाओ
जिस में से हम फिर अपनी अस्थियाँ बीन कर लाएंगे,
तभी हम वह अस्त्र बना पाएंगे
जिस के सहारे
हम अपना स्वत्व – बल्कि अपने को पाएंगे।

आग – आग --- आग दहने दो :
हथौड़ा अभी रहने दो !

बुधवार, 18 अप्रैल 2012

कितनी नावों में कितनी बार - अज्ञेय


कितनी नावों में कितनी बार - अज्ञेय



कितनी दूरियों से कितनी बार
कितनी डगमग नावों में बैठ कर
मैं तुम्हारी ओर आया हूं
ओ मेरी छोटी-सी ज्योति !
कभी कुहासे में तुम्हें न देखता भी
पर कुहासे की ही छोटी-सी रुपहली झलमल में
पहचानता हुआ तुम्हारा ही प्रभा-मंडल।

कितनी बार मैं,
धीर, आश्वस्त, अक्लान्त –-
ओ मेरे अनबुझे सत्य ! कितनी बार ...
और कितनी बार कितने जगमग जहाज
मुझे खींच कर ले गए हैं कितनी दूर
किन पराए देशों की बेदर्द हवाओं में
जहां नंगे अंधेरों को
और भी उघाड़ता रहता है
एक नंगा, तीखा, निर्मम प्रकाश –-
जिस में कोई प्रभा-मंडल नहीं बनते
केवल चौंधियाते हैं, तथ्य, तथ्य -– तथ्य –-
सत्य नहीं, अन्तहीन सच्चाइयां –-
कितनी बार मुझे
खिन्न, विकल, संत्रस्त –-
कितनी बार !

मंगलवार, 10 अप्रैल 2012

उन्होंने घर बनाए - अज्ञेय

अज्ञेय की कविताएं-10

उन्होंने घर बनाए

उन्हों ने

घर बनाये

और आगे बढ़ गये

जहां वे

और घर बनायेंगे।

हम ने

वे घर बसाये

और उन्हीं में जम गये;

वहीं नस्ल बढ़ायेंगे

और मर जायेंगे।

 

इस से आगे

कहानी किधर चलेगी?

खडहरों पर क्या वे झंडे फहरायेंगे

या कुदाल चलायेंगे,

या मिट्टी पर हमीं प्रेत बन मँडरायेंगे

जब कि वे उस का गारा सान

साँचों में नयी ईंटें जमायेंगे?

 

एक बिन्दु तक

कहानी हम बनाते हैं

जिस से आगे

कहानी हमें बनाती है :

उस बिन्दु की सही पहचान

क्या हमें आती है?

मंगलवार, 13 सितंबर 2011

तुम्हे क्या

अज्ञेयअज्ञेय की कविताएं

9. तुम्हे क्या

तुम्हे क्या
अगर मैं दे देता हूँ अपना यह गीत
उस बाघिन को
जो हर रात दबे पाँव आती है
आस-पास फेरा लगाती है
और मुझे सोते सूँघ जाती है,
वह नींद, जिसमे मैं देखता हूँ सपने
जिन में ही उभरते हैं सब अपने
छंद तुक ताल बिंब
मौतों की भट्ठियों में तपाए हुए,
त्रास की नदियों के बहाव में बुझाए हुए ;
मिलते हैं शब्द मुझे आग में नहाए हुए !


और तो और
यही मैं कैसे मानूँ
कि तुम्ही हो वधू, राजकुमारी,
अगर पहले यह न पहचानूँ
कि वही बाघिन है मेरी असली माँ !
कि मैं उसी का बच्चा हूँ !
अनाथ, वनैला .........
देता हूँ, उसे
वासना में डूबे,अपने लहू में सने,
सारे बचकाने मोह और भ्रम अपने .....
गीत सब मन सूबे, सपने
इसी में सच्चा हूँ:
अकेला.......
तुम्हे क्या, तुम्हे क्या, तुम्हे क्या .....

शुक्रवार, 12 अगस्त 2011

रह गये

अज्ञेय की कविता-7
रह गये

सब
अपनी-अपनी
कह गये :
हम
रह गये।

ज़बान है
पर कहाँ है बोल
जो तह को पा सके ?
आवाज़ है
पर कहाँ है बल
जो सही जगह पहुँचा सके ?
दिल है
पर कहाँ है जिगरा
जो सच के मार खा सके ?

यों सब
जो आये
कुछ न कुछ
कह गये :
हम
अचकचाये
रह गये।

मंगलवार, 2 अगस्त 2011

औद्योगिक बस्ती – अज्ञेय

अज्ञेयअज्ञेय की कविताएं 7. औद्योगिक बस्ती

पहाड़ियों से घिरी हुई इस छोटी-सी घाटी में

ये मुँहझौंसी चिमनियाँ बराबर

धुआँ उगलती जाती हैं।

 

भीतर जलते लाल धातु के साथ

कमकरों की दुःसाध्य विषमताएँ भी

तप्त उबलती जाती हैं।

 

बँधी लीक पर रेलें लादे माल

चिहुँकती और रँभाती अफराये डाँगर-सी

ठिलती चलती जाती हैं।

 

उद्यम की कड़ी-कड़ी में बँधते जाते मुक्तिकाम

मानव की आशाएँ ही पल-पल

उसको छलती जाती हैं।

रविवार, 17 जुलाई 2011

तुम्हारी पलकों का कँपना।

अज्ञेय

पलकों का कँपना

तुम्हारी पलकों का कँपना।
तनिक-सा चमक खुलना, फिर झँपना।
तुम्हारी पलकों का कँपना।

मानो दीखा तुम्हें लजीली किसी कली के
खिलने का सपना।
तुम्हारी पलकों का कँपना।

सपने की एक किरण मुझको दो ना,
है मेरा इष्ट तुम्हारी उस सपने का कण होना।
और सब समय पराया है।
बस उतना क्षण अपना।
तुम्हारी पलकों का कँपना।

शुक्रवार, 15 जुलाई 2011

परंपरा भंजक अज्ञेय : एक महाकाव्य सा जीवन

परंपरा भंजक अज्ञेय : एक महाकाव्य सा जीवन
(जन्म शती पर विशेष)
    (जन्म 07 मार्च, 1911 देवरिया जनपद (उ.प्र।)
   

प्रेमसागर सिंह
इस हसीन जिंदगी के सप्तरंगी इंद्रधनुष की तरह अज्ञेय जी की रचनाओं के रंग भी बेशुमार हैं। जिंदगी को जितने रंगों में जिया जा सकता है,अज्ञेय को उससे कहीं ज्यादा रंगों मे कहा जा सकता है। उनकी रचनाओं का चोला कुछ इस अंदाज का है कि जिंदगी का बदलता हुआ हर एक रंग उस पर सजने लगता है और उसकी फबन में चार चाँद लगा देता है। इसीलिए साहित्य जगत में एक लंबी दूरी तय करने तथा पर्दा करने के बाद भी अज्ञेय आज भी ताजा दम हैं, हसीन हैं और दिल नवाज भी। "
                                    
                                   प्रेम सागर सिंह


अज्ञेय हिंदी कविता के ऐसे पुरूष हैं जिनकी जड़े हिंदी कविता में बड़े गहरे समाई हैं। 1937 ई. में अज्ञेय ने सैनिक पत्रिका और पुन: कोलकाता से निकलने वाले विशाल भारत के सम्पादन का कार्य किया। हिंदी साहित्य जगत में पदार्पण के पूर्व सचिदानंद हीरानंद वात्सयायन अज्ञेय  सन 1943 में सेना में भर्ती हो गए लेकिन सन 1947 में सेना की नौकरी छोड़ कर प्रतीक नामक हिंदी पत्र के संपादन कार्य में जुट गए और अपना संपूर्ण जीवन हिंदी साहित्य के चतुर्दिक विकास के लिए समर्पित कर दिया। इसी पत्रिका के माध्यम से वे सचिदानंद हीरानंद वात्सयायन के नाम से साहित्यजगत में प्रतिष्ठित हुए। ज्ञानपीठ पुरस्कार मिलने के अवसर पर आयोजित समारोह में अपने वक्तव्य में उन्होंने कहा था –“ लेखक परंपरा तोड़ता है जैसे किसान भूमि तोड़ता है। मैंने अचेत या मुग्धभाव से नही लिखा :जब परंपरा तोड़ी है तब यह जाना है कि परंपरा तोड़ने के मेरे निर्णय का प्रभाव आने वाली पीढियों पर भी पड़ेगा इस तरह अपने को परंपराभंजक कहे जाने के आरोप को भी साधार ठहराने वाले अज्ञेय का व्यक्तित्व कालजयी है।

अज्ञेय हिंदी कविता में नए कविता के हिमायती ऐसे कवियों में हैं, जिन्होंने कविता के इतिहास पर युगव्यापी प्रभाव छोड़ा है। कविता, कथा साहित्य, उपन्यास, निबंध, संस्मरण, यात्रा-वृत, सभी विधाओं में एक सी गति रखने वाले अज्ञेय अपने जीवन में साहित्य की ऐसी किंवदंती बन गए थे, जिनकी शख्सियत, विचारधारा और काव्यात्मक फलश्रुति को केंद्र मे रख कर एक लंबे काल तक बहसें चलाई गई हैं।  हिंदी कविता जिस तरह प्रगतिवाद मार्क्सवादी दर्शन की अवधारणाओं को रचनाधार बनाकर सामने आई, उसी तरह अज्ञेय ने पश्चिम के कला-आंदोलनों की भूमि पर प्रयोगवाद की नींव स्थापित की। प्रगतिवादी कविता को कलात्मक मानदंडों के निकष पर खारिज करने वाले अज्ञेय ने 1943 में सात कवियों का एक प्रयोगवादी काव्य-संकलन तारसप्तकशीर्षक से संपादित किया। इसी क्रम में दूसरा सप्तक (1957), तीसरा सप्तक (1959) तथा चौथा सप्तक (1979) का प्रकाशन हुआ। इन सप्तकों को लेकर उनके और प्रगतिवादी खेमे के साहित्यकारों के बीच लगातार खिंचाव बना रहा। इनकी निम्नलिखित रचनाएं इन्हे एक सजग रूपवादी कलाकार सिद्ध करती हैं।
    
काव्य- भग्नदूत, चिंता, इत्यलम, हरी घास पर छड़ भर, बावरा अहेरी, इंद्र धनुष रौंदे हुए थे, अरी ओ करूणा प्रभामय, आँगन के पार-द्वार, कितनी नावों में कितनी बार, क्योंकि उसे मैं जानता हूँ, सागर मुद्रा, महावृक्ष के नीचे, पहले मैं सन्नाटा बुनता हूँ,।
    
उपन्यास- शेखर एक जीवनी (दो भाग), नदी के द्वीप, अपने-अपने अजनबी।

कहानीसंग्रह- विपथगा, परंपरा, कोठरी की बात, शरणार्थी, जय दोल, ये तेरे प्रतिरूप आदि।

 गीति-नाट्य- उत्तर प्रियदर्शी

 निबंध-संग्रह- त्रिशंकु, आत्मनेपद, हिंदी साहित्य : एक आधुनिक परिदृश्य, सब रंग और कुछ राग, भवन्ती, अंतरा, लिखी कागद कोरे, जोग लिखी, अद्यतन, आल-बाल, वत्सर आदि।

यात्रा-वृतांत- अरे यायावर रहेगा याद, एक बूँद सहसा उछली।

अनुवाद- त्याग पत्र (जैनेन्द्र) और श्रीकांत (शरतचंद्र) उपन्यासों का अंग्रेजी अनुवाद।

लगभग पिछले छह दशकों तक अज्ञेय के प्रयोगवाद की काफी धूम रही है। इस बीच उनके कई काव्य-संग्रह प्रकाशित हुए। पूर्वा, इत्यलम, बावरा अहेरी, हरी घास पर छड़ भर, असाध्य वीणा, कितनी नावों में कितनी बार, क्योंकि उसे मैं जानता हूं, महावृक्ष के नीचे, पहले मैं सन्नाटा बुनता हूं, तथा ऐसा कोई घर आपने देखा है आदि। उनकी शेखर एक जीवनी तथा नदी के द्वीप तो उपन्यास साहित्य में इस शती की मानक कृतियाँ हैं। उनकी कहानियों, निबंधों एवं यात्रा संस्मरणों ने उनके व्यक्तित्व को एक अलग ही आभा दी है। प्रभूत लेखन के बावजूद प्राय: उनकी कलावादी प्रवृतियों के कारण उनके प्रति खास तरह के नकार का भाव भी साहित्यकारों में जड़ जमाए रहा है.परंतु प्रयोगवादी कविता को कोसते हुए अक्सर आलोचक इस तथ्य को नकार जाते हैं कि विषम परिस्थितियों में भी अज्ञेय ने प्रयोगवादी कविता की एक नयी जमीन तैयार की। छायावादी रूढ़ियों को तोड़ कर एक नयी लीक बनायी। हमें प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से स्वीकार करना होगा कि प्रयोगवादी कविता अपने वस्तु और रूप में पर्याप्त नयापन लेकर सामने आयी, यह और बात है कि प्रयोगवाद की भी अपनी सीमाएं थीं और अज्ञेय की भी। उनका कहना था कि आज की कविता का मुहावरा वक्तव्यप्रधान रहा है, जिसे साठोत्तर कविता के नायक धूमिल ने सार्थक काव्य-परिणति दी ।

सदैव बहसों के केन्द्र में रहे अज्ञेय के व्यक्तित्व की कृतियाँ नि:सदेह लोगों को आकृष्ट करती रही हैं। उनकी काव्य-यात्रा के साथ-साथ साहित्यिक सांस्कृतिक अंतर्यात्राएं-साहित्यिक गतिविधियाँ नवोन्मेष का परिचायक हैं। उनके अंतिम दिनों की कविता में एक खुलापन दिखाई देता है। अज्ञेय ने अपने अंतिम संकलन ऐसा कोई  घर आपने देखा है”–इस ओर संकेत भी किय़ा है।

मैं सभी ओर से खुला हूँ,
वन-सा, वन-सा अपने में बंद हूँ,
शब्दों में मेरी समाई नही होगी,
मैं सन्नाटे का छंद हूँ।

अज्ञेय जैसे कवि युग की धरोहर हैं। युग का तापमान हैं। ऐसे कवि कभी मरते नही। वे तो बस दूसरा शरीर धारण करते हैं। अज्ञेय ने काल पर अपनी एक ऐसी सनातन छाप छोड़ी है जो सदियों तक मिटने वाली नही है। वे निरंतर अपने शिल्प को तोड़ कर आगे बढते हैं, यहाँ तक की जटिलता तथा नव्यतम प्रयोगों से भरी पूरी उनकी कविता ऐसा कोई घर आपने देखा है-के कुछ अंश नीचे दिए गए हैं।

फिर आउंगा मै भी
लिए झोली में अग्निबीज
धारेगी जिसको धरा
ताप से होगी रत्नप्रसू।.

उनकी एक कविता कलगी बाजरे की का नीचे दिया गया एक अंश उनके सप्तरंगी उदगार को कितना प्रभावित कर जाता हैं-

अगर मैं तुमको ललाती साँझ की नभ की अकेली तारिका 
अब नही कहता,
या शरद के भोर की नीहार-न्हायी कुँई,
टटकी कली चंपे की, वगैरह तो
नही कारण कि मेरा हृदय उथला या सूना है
या कि मेरा प्यार मैला है।
बल्कि केवल यही : ये उपमान मैले हो गए हैं।
देवता इन प्रतीकों के कर गए हैं कूच।

अज्ञेय के जीवन काल से ही उन्हे और मुक्तिबोध को आमने-सामने खड़ा कर देखने की कोशिशें की जाती हैं। यह सच है कि मुक्तिबोध की आलोचनात्मक स्थापनाएं साहसिक एवं सामयिक हैं तथा उनकी कविताओं में युगीन विसंगतियों का प्रभाव देखने को मिलता है। उन्होंने अपने हर अनुभव को वागर्थ की मार्मिकता से संपन्न करना चाहा है, अर्थ के नए स्तरों को स्पर्श करना चाहा है तथा ऐसा कर पाने में वे सफल रहे हैं। अज्ञेय इस भववादी संसार में जीवन के आखिरी छोर पर पहुँच कर ऐसे अद्वितीय, अज्ञेय प्रश्नों से टकराने लगे थे, जिनके उत्तर सहजता से पाए नही जा सकते। एक महाकाव्य की तरह फैले अज्ञेय के जीवन और रचना फलक की भले ही आज अनदेखी की जा रही हो, यह सच है कि अज्ञेय के रचना संसार ने एक  ऐसा अद्वितीय अनुभव-लोक रचा है जिसकी प्रासंगिता सदैव रहेगी।
विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ।

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