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मंगलवार, 19 जून 2012

बादल को घिरते देखा है

बादल को घिरते देखा है

नागार्जुन


अमल धवल गिरि के शिखरों पर,
बादल को घिरते देखा है।

छोटे-छोटे मोती जैसे
उसके शीतल तुहिन कणों को,
मानसरोवर के उन स्वर्णिम
कमलों पर गिरते देखा है,
बादलों को घिरते देखा है



तुंग हिमालय के कंधों पर
छोटी बड़ी कई झीलें हैं,
उनके श्यामल नील सलिल में
समतल देशों से आ-आकर
पावस की ऊमस से आकुल
तिक्त-मधुर बिसतंतु खोजते
हंसों को तिरते देखा है।
बादल को घिरते देखा है।

मंगलवार, 23 अगस्त 2011

कालिदास

 

बाबा नागार्जुन की कविताएं-5

कालिदास

कालिदास, सच-सच बतलाना !
इन्दुमती के मृत्युशोक से
अज रोया या तुम रोये थे?
कालिदास, सच-सच बतलाना!

शिवजी की तीसरी आँख से
निकली हुई महाज्वाला में
घृत-मिश्रित सूखी समिधा-सम
कामदेव जब भस्म हो गया
रति का क्रंदन सुन आँसू से
तुमने ही तो दृग धोये थे
कालिदास, सच-सच बतलाना
रति रोयी या तुम रोये थे ?

 

वर्षा ऋतु की स्निग्ध भूमिका
प्रथम दिवस आषाढ़ मास का
देख गगन में श्याम घन घटा
विधुर यक्ष का मन जब उचटा
खड़े-खड़े तब हाथ जोड़कर
चित्रकूट से सुभग शिखर पर
उस बेचारे ने भेजा था

जिनके ही द्वारा संदेशा
उन पुष्करावर्त मेघों का
साथी बनकर उड़ने वाले
कालिदास, सच-सच बतलाना
पर पीड़ा से पूर-पूर हो
थक-थककर औ' चूर-चूर हो
अमल-धवल गिरि के शिखरों पर
प्रियवर, तुम कब तक सोये थे ?
रोया यक्ष कि तुम रोये थे ?
कालिदास, सच-सच बतलाना !

गुरुवार, 28 जुलाई 2011

अकाल और उसके बाद


बाबा नागार्जुन की कविताएं - 3
30 जून 1911 - 5 नवंबर, 1998


अकाल और उसके बाद

कई  दिनों  तक  चूल्हा  रोया,  चक्की रही उदास
कई दिनों तक  कानी  कुतिया  सोई  उनके  पास
कई दिनों तक लगी भीत पर छिपकलियों की गश्त
कई  दिनों  तक  चूहों की भी हालत रही शिकस्त

दाने  आए  घर  के  अंदर  कई  दिनों  के  बाद
धुआँ उठा आँगन  से  ऊपर  कई  दिनों  के  बाद
चमक  उठी  घर  भर की आँखें कई दिनों के बाद
कौए  ने   खुजलाई  पाँखें  कई  दिनों  के  बाद।

गुरुवार, 21 जुलाई 2011

घिन तो नहीं आती है ?

बाबा नागार्जुन
30 जून 1911 - 5 नवंबर, 1998
घिन तो नहीं आती है ?

पूरी स्पीड में है ट्राम
खाती है दचके पै दचका
सटता है बदन से बदन
पसीने से लथपथ।
छूती है निगाहों को
कत्थई दाँतों की मोटी मुस्कान
बेतरतीब मूँछों की थिरकन
सच-सच बतलाओ
घिन तो नहीं आती है ?
जी तो नहीं कुढ़ता है ?

कुली-मज़दूर हैं
बोझा ढ़ोते हैं, खींचते हैं ठेला
धूल-धुआँ-भाफ से पड़ता है साबक़ा
थके-माँदे जहाँ-तहाँ हो जाते हैं ढ़ेर
सपने में भी सुनते हैं धरती की धड़कन
आकर ट्राम के अंदर पिछले डब्बे में
बैठ गए हैं इधर-उधर तुमसे सटकर
आपस में उनकी बतकही
सच-सच बतलाओ
नागवार तो नहीं लगती है ?
जी तो नहीं कुढ़ता है ?
घिन तो नहीं आती है ?

दूध-सा धुला सादा लिबास है तुम्हारा
निकले हो शायद चौरंगी की हवा खाने
बैठना था पंखे के नीचे, अगले डब्बे में
ये तो बस इसी तरह
लगाएँगे ठहाके, सुरती फाँकेंगे
भरे मुँह बातें करेंगे अपने देस-कोस की
सच-सच बतलाओ
अखरती तो नहीं इनकी सोहबत ?
जी तो नहीं कुढ़ता है ?
घिन तो नहीं आती है ?

रविवार, 10 जुलाई 2011

तन गई रीढ़

बाबा नागार्जुनbaba Nagarjun 2

30 जून 1911 - 5 नवंबर, 1998

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झुकी पीठ को मिला

किसी हथेली का स्पर्श

तन गई रीढ़

 

महसूस हुई कंधों को

पीछे से,

किसी नाक की सहज उष्ण निराकुल साँसें

तन गई रीढ़

 

कौंधी कहीं चितवन

रँग गए कहीं किसी के होंठ

निगाहों के ज़रिए जादू घुसा अंदर

तन गई रीढ़

 

गूँजी कहीं खिलखिलाहट

टूक-टूक होकर छितराया सन्नाटा

भर गए कर्णकुहर

तन गई रीढ़

 

आगे से आया

अलकों के तैलाक्त परिमल का झोंका

रग-रग में दौड़ गई बिजली

तन गई रीढ़