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गुरुवार, 5 जुलाई 2012

समर शेष है

164323_156157637769910_100001270242605_331280_1205394_nसभी पाठकों  को   अनामिका का सादर नमन  !  साथियो अब हम दिनकर  जी के व्यक्तित्व  और कृतित्व पर आधारित इस साहित्यिक  शृंखला   के  अंतिम पड़ाव पर हैं  और इस अंक में देखते हैं उनकी पुस्तक 'शुद्ध कविता की खोज' पर उनके स्वयं के विचार ....




Dinkarदिनकरजी जीवन दर्पण -15

लीजिये चार पंक्तियाँ दिनकर जी के ही शब्दों में....
दबी सी आग हूँ भीषण क्षुधा की
दलित का मौन हाहाकार हूँ मैं,
सजग संसार तू निज को संभाले,
प्रलय का क्षुब्ध पारावार हूँ मैं.
आज के भारत की मनोव्यथा दिनकर जी के काव्य में अच्छी तरह प्रकट है. दिनकरजी ने कविताओं  के सिवा गद्य के भी कई हजार पृष्ठ लिखे हैं, जिनमे उनका अध्ययन बड़े ही प्रभावशाली ढंग से प्रकट हुआ है. 'संस्कृति के चार अध्याय' के समान ही उनके अन्य निबंध ग्रन्थ भी विचारोत्तेजक और पठनीय हैं. अर्धनारीश्वर, रेती के फूल, उजली आग, वेणुवन और वट-पीपल, ये ऐसे ग्रन्थ नहीं हैं जो रोज लिखे जाते हों. इन ग्रंथों में दिनकर जी का जो रूप प्रकट हुआ है वह अंतर्राष्ट्रीय धरातल के  चिन्तक का रूप है. विशेषतः, 'धर्म, नैतिकता और विज्ञान  के तीनों के तीनों निबंध अद्भुत, गंभीर और विचारोत्तेजक हैं. यदि दिनकर जी कविता की एक पंक्ति भी न लिखते, तो भी एक गद्यकार के रूप में हिंदी साहित्य जगत में अमर होते. वे बराबर कुछ न कुछ गंभीर अध्ययन करते थे और उसका फल पाठकों के सामने पेश करते थे। 'शुद्ध कविता की खोज' उनकी वह पुस्तक है जिससे चिन्तक के रूप में उनकी ख्याति में चार चाँद  लगे. हांलाकि उनकी सभी खोजों तथा मान्यताओं के साथ सहमत होना संभव नहीं है. उन्होंने अपनी पुस्तक का नाम ही 'शुद्ध कविता की खोज' रखा है, जिससे यह सूचित होता है कि अभी खोज जारी थी, कोई मान्यता रूढ़िग्रस्त नहीं हो पाई और उनके लिए रूढ़ि यहाँ तक कि आत्मसृष्ट  रूढ़ि  क्या करती जब वे भावना में सब भूल जाते.
थोड़े में कविता के सम्बन्ध में उनका विचार क्या है, उसकी भूमिका के रूप में वे कहते हैं -
"इस दृष्टि से विचार करने पर सभी कवि हमें दो श्रेणियों में विभक्त दिखाई देते हैं. एक श्रेणी उन कवियों की बनती है, जो अपनी आनंददायिनी कला का उपयोग मुख्यतः जीवन को प्रभावित करने के लिए करते हैं, सभ्यता को परिवर्तित करने अथवा उसके मूल्यों की रक्षा करने के लिए करते हैं. और दूसरी श्रेणी में वे कवि आते हैं, जिनका ध्येय मुख्यतः भावों का निरूपण, सौन्दर्य का चित्रण और अनुभूतियों का आख्यान है. बाल्मीकि, व्यास, तुलसीदास, इकबाल और क़ाज़ी नजरूल इस्लाम को हम पहली श्रेणी में रखेंगे और दूसरी श्रेणी में कालिदास, बाणभट्ट, अमरूक, जयदेव, रहस्यवादी कबीर, सूरदास, विद्यापति, बिहारीलाल, ग़ालिब और महादेवी आदि का स्थान होगा. यदि हम चाहें तो यह भी कह सकते हैं कि पहली श्रेणी के कवि कवि हैं और दूसरी श्रेणी के कवि कलाकार हैं. काव्यकला का विलक्षण उपयोग तो दोनों श्रेणियों के मनीषी करते हैं, किन्तु जिसके भीतर कर्तव्य  की चेतना होती है, उसकी रचना में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष कोई उद्देश्य भी होता है. किन्तु जो कवि केवल सौन्दर्य का प्रेमी है, वह शुद्ध कलाकार बन जाता है.”
दिनकरजी एक विशेष दर्शनशास्त्र के प्रतिपादक हैं. यह कोई नया दर्शनशास्त्र नहीं है. वर्तमान काल के इस दर्शन के प्रतिपादक राममोहन राय से लेकर राधाकृष्णन तक सभी रहे हैं, इसलिए दिनकरजी की यह खोज उतनी शुद्ध नहीं है, जितनी कि देखने में लगती है. वे साफ़ कहते हैं - धर्म और रहस्यवाद की  भावना मनुष्य से छीनी नहीं जा सकती. आदमी ज्ञान के रास्ते से चले या विज्ञान के रास्ते से, वह अंत में एक ऐसी जगह पहुंचकर रहता है, जहाँ बुद्धि काम नहीं करती, जहाँ की अनुभूतियों को हमारी भाषा आसानी से नहीं उठा सकती. विज्ञान जितना ही आगे बढेगा वह धर्म से दूर होता जाएगा, किन्तु एक दिन वह भी उस बिंदु पर पहुंचनेवाला है, जहाँ अधिभौतिकता  अथवा अंतर्मुखी वृत्ति की सत्ता स्वीकार कर लेगा. धर्म का दूसरा दौर बुद्धिवाद की निस्सहायता की अनुभूति से उत्पन्न होगा. वह बारी-बारी से कई रूपों से होकर गुजरेगा तब पश्चिम के लोग, विज्ञान का उपयोग करते हुए भी, उसे अपना मार्ग-दर्शक नहीं मानेंगे. मार्ग-दर्शन के लिए वे शायद किसी पैगम्बर या अवतार का  इंतजार करेंगे और अंत में उनकी अपनी ही इच्छाओं और आशाओं से एक या अनेक पैगम्बर उत्पन्न होंगे, जो उस संस्कृति का पथ प्रदर्शन करेंगे.
इस प्रकार का चिंतन रहस्यवादी-अध्यात्मवादी प्रतीत होने पर भी अन्ततोगत्वा पराजयवादी है और यह पराजयवाद उन्हीके द्वारा किये हुए इतिहास के मूल्यांकन में प्रकट है.
क्रमशः.
अब दिनकर जी की एक कविता
 
समर शेष है
ढीली करो धनुष की डोरी, तरकस का कास खोलो,
किसने कहा, युद्ध की बेला गयी, शांति से बोलो.
किसने कहा, और मत बढो हृदय वह्नी के शर से,
भरो भुवन का अंग कुसुम से, कुंकुम से, केशर से ?
कुंकुम लेपूँ किसे ? सुनाऊँ किसको कोमल गान ?
                तड़प रहा आँखों के आगे भूखा हिन्दुस्तान .
फूलों की रंगीन लहर पर ओ उतरानेवाले
ओ रेशमी नगर के वासी ! ओ छवि के मतवाले !
सकल देश में हालाहल है, दिल्ली में हाला है.
दिल्ली में रौशनी, शेष भारत में अंधियाला है.
मखमल के परदों के बाहर, फूलों के उस पार,
              ज्यों का त्यों है खड़ा आज भी मरघट का संसार !
वह संसार जहाँ पर पहुंची अब तक नही किरण है,
जहाँ क्षितिज है शून्य अभी तक अम्बर तिमिर वरण है.
देख जहाँ का दृश्य आज भी अतंस्तल हिलता है.
माँ को लज्जावसन और शिशु को न क्षीर मिलता है.
पूछ रहा है जहाँ चकित हो जन-जन देख अकाज
              सात वर्ष हो गए, राह में अटका कहाँ स्वराज ?
अटका कहां स्वराज ? बोल दिल्ली ! तू क्या कहती है ?
तू रानी बन गयी, वेदना जनता क्यों सहती है ?
सब के भाग दबा रक्खे हैं किसने अपने कर में ?
उतरी थी जो विभा, हुई बंदिनी, बता किस घर में ?
समर शेष, है यह प्रकाश बंदीगृह से छूटेगा.
              और नहीं, तो तुझपर पापिनी ! महावज्र टूटेगा !
समर शेष है, इस स्वराज्य को सत्य बनाना होगा.
जिसका है यह न्यास, उसे सत्वर पहुंचाना होगा.
धारा के मग में अनेक पर्वत जो खड़े हुए हैं,
गंगा का पथ रोक इंद्र के गज जो अड़े हुए हैं;
कह दो उनसे, झुके अगर तो जग में यश पायेंगे,
               अड़े रहे तो ऐरावत पत्तों से बह जायेंगे.
समर शेष है, जनगंगा को खुलकर लहराने दो,
शिखरों को डूबने और मुकुटों को बह जाने दो.
पथरीली, ऊंची जमीन है, तो उसको तोड़ोगे,
समतल पीटे बिना समर की भूमि नहीं छोड़ेंगे.
समर शेष है,  चलो ज्योतियों के बरसाते तीर .
               खंड - खंड हो गिरे विषमता की काली जंजीर .
समर शेष है,  अभी मनुज भक्षी हुंकार रहे हैं,
गांधी का पी लहू जवाहर पर फुंकार रहे हैं.
समर शेष है,  अहंकार इनका हारना बाकी है,
वृक को दंतहीन, अहि को निर्विश करना बाकी है.
समर शेष है,  शपथ धर्म की, लाना है वह काल,
               विचरें अभय देश में गांधी और जवाहरलाल.
तिमिर-पुत्र ये दस्यु कहीं कोई दुष्कांड रचे ना.
सावधान हो खड़ी देश भर में गांधी   की सेना.
बलि देकर भी बली ! स्नेह का यह मृदु व्रत साधो रे
मंदिर औ' मस्जिद, दोनों   पर एक  तार  बांधो  रे !
समर शेष है,  नहीं पाप  का भागी  केवल  व्याध,
               जो तटस्थ  है, समय लिखेगा उनका भी अपराध.
(परशुराम  की प्रतीक्षा  - 1954 )
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1. देवता हैं नहीं  2.  नाचो हे, नाचो, नटवर 3. बालिका से वधू  4. तूफ़ान  5.  अनल - किरीट 6. कवि की मृत्यु 7. दिगम्बरी 8. ओ द्विधाग्रस्त शार्दूल, बोल ! 9.दिल्ली 10. विपथगा 11. हिमालय  12 .हाहाकार  13. परशुराम की प्रतीक्षा 14.एक बार फिर स्वर दो !


गुरुवार, 14 जून 2012

हाहाकार

Anamika 7577 की प्रोफाइल फोटोसुधी जनों  को अनामिका का सादर नमन! आइये जानते हैं दिनकर जी जैसे साहित्यकार के  कान कैसे जनता के हृदय की बात सुन लेते हैं.


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१. देवता हैं नहीं २.  नाचो हे, नाचो, नटवर ३. बालिका से वधू ४. तूफ़ान ५.  अनल - किरीट ६. कवि की मृत्यु ७. दिगम्बरी 8. ओ द्विधाग्रस्त शार्दूल, बोल ! 9.दिल्ली 10. विपथगा 11. हिमालय
दिनकरजी जीवन दर्पण भाग - १२

दिनकर जी  लिखते हैं.....

मधुर जीवन हुआ कुछ प्राण ! जब से

लगा धोने व्यथा का भार हूँ मैं,

रुदन अनमोल धन कवि का, इसीसे

पिरोता आंसुओं का हार हूँ मैं.

राष्ट्रीय कवि के रूप में प्रसिद्धि दिनकरजी को रेणुका से ही प्राप्त हो गयी थी. हुंकार से उस प्रसिद्धि को प्रसार और व्यापक स्वीकृति-मात्र प्राप्त हुई. हुंकार की कविताओं से यह भी स्पष्ट हो गया कि छायावाद का पलायन भाव हिंदी के छायावाद्दोतर कवियों को पसंद नहीं था; कम से कम दिनकरजी ने तो यह स्पष्ट कर दिया था कि  कलाकार कहलाने के लिए यदि मात्र कल्पना में भटकना वांछनीय हो तो मुझे यह सुयश नहीं चाहिए. इससे अच्छा काम तो यह है कि कवि चारण और वैतालिक बन जाए.

अमृत-गीत तुम रचो कलानिधि !

बुनो कल्पना की जाली,

तिमिर-ज्योति की समर भूमि का

मैं चारण, मैं वैताली !

(हुंकार)

जहाँ तक शुद्ध क्रांतिकारी भावनाओं का प्रश्न है, हुंकार की कितनी ही पंक्तियाँ ऐसी हैं जिनके भीतर तत्कालीन युवकों की अदम्य उमंग और वीरता के भाव अत्यंत ओजस्वी रूप में प्रकट हुए हैं :

हटो व्योम के मेघ पंथ से,

स्वर्ग लूटने हम आते हैं,

दूध ! दूध ! ओ वत्स ! तुम्हारा

दूध खोजने हम जाते हैं.

(हाहाकार)

स्वाधीनता की प्राप्ति और समाज से वैषम्य हटाकर सबके लिए सुख खोजने की जो उमंग उस समय देशवासियों के हृदय में लहर ले रही थी, उसका पूरा विस्फोट इस कविता में आ गया है.

सन 1942  के बहुत पूर्व ही दिनकरजी के भीतर यह विश्वास उत्पन्न हो गया था कि क्रांति अब समीप आ गयी है और देश में विस्फोट होने ही वाला है.  और उनका यह विश्वास उनकी उस समय की अनेक कविताओं में प्रकट हुआ था. ये सभी कवितायें यह पक्का प्रमाण उपस्थित करती हैं कि कवि के कान सीधे जनता के हृदय से लगे हुए थे और वातावरण में जो गर्मी भरती जा रही थी उसे वह क्षण-क्षण समझ रहा था.

दिशा गूंजी, बिखरता व्योम में उल्लास लाया,

नये युग-देव का नूतन कटक, लो, पास आया !

पहन द्रोही कवच रण में युगों के मौन बोले,

ध्वजा पर चढ़ अनागत धर्म का हुंकार बोला !

नये युग की भवानी, आ गयी बेला प्रलय की,

दिगम्बरी ! बोल अम्बर में किरण का तार बोला !

(दिगम्बरी)

अब की अगस्त्य की बारी है, पापों के पारावार ! सजग,

बैठे 'विसूबियस' के मुख पर भोले अबोध संसार, सजग,

रेशों का रक्त कृशानु हुआ, ओ जुल्मी की तलवार, सजग,

दुनिया के नीरो, सावधान, दुनिया के पापी जार, सजग !

जाने किस दिन फुंकार उठे, पददलित कालसर्पों  के फन !

(विपथगा)

ले अंगडाई, उठ, हिले धरा,

कर निज विराट स्वर में निनाद,

तू शैलराज, हुंकार भरे,

फट जाए कुहा, भागे प्रमाद !

तू मौन त्याग कर सिंघनाद ,

रे तापी, आज तप का न काल,

नवयुग-शंख-ध्वनि जगा रही,

तू जाग, जाग , मेरे विशाल !

(हिमालय )

ओ मदहोश, बुरा फल है शूरों के शोणित पीने का,

देना होगा तुम्हें एक दिन गिन-गिन मोल पसीने का !

कल होगा इन्साफ यहाँ किसने क्या किस्मत पायी है,

अभी नींद से जाग रहा युग, यह पहली अंगडाई है !

(अनल किरीट)

फिर डंके पर चोट पड़ी है,

मौत चुनौती लिए खड़ी है,

लिखने चली आग, अम्बर पर कौन लिखायेगा निज नाम ?

(प्रगति )

हुंकार के बाद जब रसवंती निकली, प्रगतिवादी साहित्य के पक्षपाती दिनकरजी से निराश होने लगे. उन्हें लगा मानो दिनकर भी थककर बौद्धिक हस्तिदंत की मीनार में लौट रहे हैं. पर रसवंती और द्वन्द गीत  की छाया में किंचित विश्राम लेकर दिनकर फिर क्रांतिकारी काव्य की ओर लौट पड़े.

कुरुक्षेत्र का प्रकाशन रसवंती और द्वन्द गीत के प्रकाशन के बहुत बाद हुआ. जब कुरुक्षेत्र निकला, कट्टर गांधीवादी उस काव्य से विक्षुब्ध हो गए क्योंकि उसमे हिंसा का आंशिक समर्थन किया गया था. उस समय छिपे छिपे यह कानाफूसी भी चलती रही कि दिनकर अब उन लोगों के कवि हैं, जो गांधी जी  की अहिंसा में सच्चे मन से विश्वास नहीं करते. पर गांधीजी को छोड़कर अहिंसा में सच्चे मन से विश्वास और करता कौन था ? सबके  सब उसे निः शस्त्रिकृत राष्ट्र की नीति भर मानते थे. यह स्थिति सन १९४१ में ही स्पष्ट हो चुकी थी जब कांग्रेस ने यह प्रस्ताव किया था की अंग्रेज भारत को स्वराज्य दे दें, तो भारत मित्र-राष्ट्रों के वास्ते युद्ध करने को तैयार है. इसी प्रस्ताव के कारण गांधीजी ने कांग्रेस से इस्तीफ़ा दे दिया.

दिनकरजी के हिंसा-अहिंसा सम्बन्धी विचार कुरुक्षेत्र में आकर नहीं बदले. आरम्भ से ही वे यह सोचते आ रहे थे की अन्याय का प्रतिकार यदि अहिंसा से संभव न हो, तो हिंसा का आश्रय लेना पाप नहीं है. भारत का पतन राक्षसी गुणों के कारण नहीं प्रत्युत कोमलता, वैराग्य-साधना और कथित देव गुणों  के कारण हुआ, इस सत्य की अनुभूति उस समय प्राय समस्त शिक्षित समाज को हो रही थी और दिनकरजी आरम्भ से ही इस अनुभूति की कविता  बनाकर देश का हृदय हिलाते आ रहे थे. हिमालय नामक कविता में उन्होंने कहा था -

रे रोक युधिष्ठर को न यहाँ,

जाने दे उनको स्वर्ग धीर !

पर, फिर हमें गांडीव-गदा

लौटा दे अर्जुन-भीम वीर !

फिर हुंकार में तो उन्होंने स्पष्ट ही गांधीजी के अहिंसा-उपदेश से अपनी असहमति प्रकट  की थी. उस संग्रह की एक कविता में 'शास्ता' शब्द आया है. यह नाम बुद्ध को नहीं, प्रत्युत गांधीजी को ही सांकेतिक करता है.

ऊब गया हूँ देख चतुर्दिक अपने

अजा धर्म का ग्लानी-विहीन प्रवर्तन ;

युग-सत्तम सबुद्ध पुनः कहता है,

ताप कलुष है, शिखा बुझा दो मन की  !

मैं मनुष्य हूँ, दहन धरम है मेरा,

मृत्ति-साथ अग्निस्फुलिंग है मुझमे !

तुम कहते हो, 'शिखा बुझा दो,' लेकिन.

आग बुझी तो पौरुष शेष रहेगा ?

(कल्पना की दिशा, हुंकार )

और हिंसा का यह समर्थन क्यूँ ? सिर्फ इसलिए की हमारे चारों ओर हिंसक घूम रहे हैं.  जो दर्शन कुरुक्षेत्र में पल्लवित हुआ, उसका बीज हुंकार में ही गिरा था.

तृणाहार कर सिंह भले ही फूले,

परमोज्जवल देवत्व-प्राप्ति के मद में,

पर हिंसों के बीच भोगना होगा,

नख-रद के क्षय का अभिशाप उसे ही !

(कल्पना की दिशा, हुंकार )

कुरुक्षेत्र में आकर यही भाव सुस्पष्टता से लिखा गया -

त्याग,तप,करुणा, क्षमा से भीगकर

व्यक्ति का मन तो बलि होता, मगर

हिंस पशु जब घेर लेते हैं उसे,

काम आता है बलिष्ठ शरीर ही.

तथा

कौन केवल आत्मबल से जूझकर

जीत सकता देह का संग्राम है

पाशविकता खडग जब लेती उठा,

आत्मबल का एक बस चलता नहीं.

क्रमशः

लीजिये प्रस्तुत है दिनकर जी की ओजपूर्ण 'हाहाकार' रचना -

हाहाकार

दिव की ज्वलित शिखा सी उड़ तुम जब से लिपट गयी जीवन में,

तृषावंत मैं घूम रहा कविते ! तब से व्याकुल त्रिभुवन में !

उर में दाह, कंठ में ज्वाला, सम्मुख यह प्रभु का मरुथल है,

जहाँ पथिक जल की झांकी में एक बूँद के लिए विकल है.

घर, घर देखा धुआं पर, सुना, विश्व में आग लगी है,

'जल ही जल' जन-जन रटता है, कंठ-कंठ में प्यास जगी है.

सूख गया रस श्याम गगन का एक घुन विष जग का पीकर,

ऊपर ही ऊपर जल जाते सृष्टि-ताप से पावस सीकर !

मनुज वंश के अश्रु-योग से जिस दिन हुआ सिन्धु-जल खारा,

गिरी ने चीर लिया निज उर, मैं ललक पड़ा लाख जल की धारा.

पर विस्मित रह गया, लगी पीने जब वही मुझे सुधी खोकर,

कहती- 'गिरी को फाड़ चली हूँ मैं भी बड़ी विपासित होकर'.

यह वैषम्य नियति का मुझपर, किस्मत बढ़ी धन्य उन कवि की,

जिनके हित कविते ! बनतीं तुम झांकी नग्न अनावृत छवि की .

दुखी विश्व से दूर जिन्हें लेकर आकाश कुसुम के वन में,

खेल रहीं तुम अलस जलद सी किसी दिव्य नंदन-कानन में.

भूषन-वासन जहाँ कुसुमों के, कहीं कुलिस का नाम नहीं है.

दिन-भर सुमन-हार-गुम्फन को छोड़ दूसरा काम नहीं है.

वही धन्य, जिनको लेकर तुम बसीं कल्पना के शतदल पर,

जिनका स्वप्न तोड़ पाती है मिटटी नहीं चरण-ताल बजकर !

मेरी भी यह चाह विलासिनी ! सुन्दरता को शीश झुकाऊं,

जिधर-जिधर मधुमयी बसी हो, उधर वसंतानिल बन जाऊं !

एक चाह कवि की यह देखूं, छिपकर कभी पहुँच मालिनी तट,

किस प्रकार चलती मुनिबाला यौवनवती लिए कटी पर घाट !

.........

शोणित से रंग रही शुभ्र पट संस्कृति निठुर लिए करवालें,

जला रही निज सिंहपौर पर  दलित-दीन की अस्थि मशालें.

घूम रही सभ्यता दानवे, 'शांति ! शांति !' करती भूतल में,

पूछे कोई, भिगो रही वह क्यों अपने विष दन्त गरल में.

टांक रही हो सुई चरम पर, शांत रहें हम, तनिक न डोलें,

यही शान्ति, गर्दन कटती हो, पर हम अपनी जीभ न खोलें ?

बोले कुछ मत क्षुधित, रोटियां श्वान छीन खाएं यदि कर से,

यही शांति, जब वे आयें, हम निकल जाएँ चुपके निज घर से ?

चूस रहे हों दनुज रक्त, पर, हों मत दलित प्रबुद्ध कुमारी !

हो न कहीं प्रतिकार पाप का, शांति या कि यह युद्ध कुमारी !

जेठ हो कि हो पूस, हमारे कृषकों को आराम नहीं है,

छाते कभी संग बैलों का , ऐसा कोई याम नहीं है.

मुख में जीभ, शक्ति भुज में, जीवन में सुख का नाम नहीं है,

वसन कहाँ ? सूखी रोटी भी मिलती दोनों शाम नहीं है.

बैलों के ये बंधू वर्ष भर, क्या जाने, कैसे जीते हैं ?

बंधी जीभ, आँखे विषष्ण, गम खा, शायद आंसू पीते हैं.

पर, शिशु का क्या हाल, सीख पाया न अभी जो आंसू पीना ?

चूस-चूस सुखा स्तन माँ का सो जाता रो-विलप नगीना.

विवश देखती माँ, अंचल से नन्ही जान तड़प उड़ जाती,

अपना रक्त पिला देती यदि फटती  आज वज्र की छाती.

कब्र-कब्र में अबुध बालकों की भूखी हड्डी रोती है,

'दूध-दूध !' की कदम कदम पर सारी रात सदा होती है.

'दूध-दूध !' ओ वत्स ! मंदिरों में बहरे पाषाण यहाँ हैं,

'दूध-दूध !' तारे, बोलो, इन बच्चों के भगवान् कहाँ हैं ?

'दूध-दूध !' दुनिया सोती है, लाऊं दूध कहाँ, किस घर से ?

'दूध-दूध !' हे देव गगन के ! कुछ बूँदें टपका अम्बर से !

'दूध-दूध !' गंगा तू ही अपने पानी को दूध बना दे,

'दूध-दूध !' उफ़ ! है कोई, भूखे मुर्दों को जरा मना दे ?

'दूध-दूध !' फिर 'दूध !' अरे क्या याद दुख की खो न सकोगे ?

'दूध-दूध !' मरकर भी क्या टीम बिना दूध के सो न सकोगे ?

वे भी यहीं, दूध से जो अपने श्वानों को नहलाते हैं.

वे बच्चे भी यही, कब्र में 'दूध-दूध !' जो चिल्लाते हैं.

बेक़सूर, नन्हे देवों का शाप विश्व पर पड़ा हिमालय !

हिला चाहता मूल सृष्टि का, देख रहा क्या खड़ा हिमालय ?

'दूध-दूध !' फिर सदा कब्र की, आज दूध लाना ही होगा,

जहाँ दूध के घड़े मिलें, उस मंजिल पर जाना ही होगा !

जय मानव की धरा साक्षिणी ! जाय विशाल अम्बर की जय हो  !

जय गिरिराज ! विन्ध्यगिरी, जय-जय ! हिंदमहासागर की जय हो !

हटो व्योम के मेघ ! पंथ से, स्वर्ग लूटने हम आते हैं,

'दूध, दूध ! ...' ओ वत्स ! तुम्हारा दूध खोजने हम जाते हैं !

हुंकार (१९३७)

गुरुवार, 7 जून 2012

हिमालय

164323_156157637769910_100001270242605_331280_1205394_nआप सब को अनामिका का प्रणाम ! पाठक वृन्द चलिए आज जानते हैं  कि दिनकरजी की हुंकार और रेणुका जैसी कविताओं में निर्भीक और रंगात्मक उद्घोष कैसे हुआ ....

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१. देवता हैं नहीं २.  नाचो हे, नाचो, नटवर ३. बालिका से वधू ४. तूफ़ान ५.  अनल - किरीट ६. कवि की मृत्यु ७. दिगम्बरी 8. ओ द्विधाग्रस्त शार्दूल, बोल ! 9. दिल्ली 10. विपथगा


दिनकरजी जीवन दर्पण भाग - ११

दिनकर जी अपने बारे में लिखते हैं.....

जलन हूँ, दर्द हूँ, दिल की कसक हूँ,

किसी का हाय, खोया प्यार हूँ मैं.

गिरा हूँ भूमि पर नंदन विपिन से,

अमर-तरु का सुमन सुकुमार हूँ मैं.

 

जो भी हो, सरकारी नौकरी की विवशता और गुलामी को झेलते हुए भी दिनकरजी ने राष्ट्रीयता का जो निर्भीक एवं रंगात्मक उद्घोष किया था, वह विशेष दृष्टव्य है. रेणुका, हुंकार और सामधेनी की कविताओं ने हिंदी प्रान्तों में देश भक्ति की लहरें उठाने में बड़ा भारी योगदान दिया था और चूँकि ये कवितायें एक ऐसे कवि की लेखनी से आती थीं जो खुद सरकार के चुंगल में था, इसलिए इनकी  अपील कुछ और जोरदार थी. भारत के राष्ट्रीय कवियों में दिनकरजी का नाम बड़े आदर से लिया जाता है. आचार्य शिवपूजन सहाय का यहाँ तक कहना है कि मैथिलि-कोकिल विद्यापति के बाद बिहार में इतना प्रतिभाशाली कवि कोई और नहीं हुआ था.

दिनकरजी की पहली कविता सन १९२४ या २५ में छपी थी जब जबलपुर का 'छात्र सहोदर' नामक मासिक पत्र श्री नर्सिंघ्दास के संपादकत्व में दुबारा निकाला था. १९२९ में बारदोली-सन्देश नाम से उनके राष्ट्रीय गीतों का एक छोटा सा संग्रह निकला, जिनकी रचना बारदोली-सत्याग्रह को लेकर की गयी थी. मैट्रिक पास करने के पूर्व उन्होंने 'वीर बाला' और 'मेघनाद  वध'  नामक दो अधूरे खंड काव्य भी लिखे थे, जिनकी पांडुलिपियाँ अब अनुपलब्ध हैं. मैट्रिक करने के बाद एक छोटा सा खंड काव्य 'प्रणभंग  ' नाम से निकला, जिसकी एक प्रति कवि के पास संचित थी और जिसका उल्लेख रामचंद्र शुक्ल के इतिहास में भी हुआ है.

पर दिनकरजी के कवि जीवन का वास्तविक आरंभ सन १९३० ई. में होता है, जब से उनकी कवितायें पत्र-पत्रिकाओं में सर्वत्र छपने लगीं. और १९३५ में रेणुका के प्रकाशन के साथ तो वे हिंदी के एक उदीयमान कवि के रूप में सारे देश में विख्यात हो गए थे.  रेणुका, कुरुक्षेत्र, नील कुसुम  और उर्वशी दिनकर काव्य के चार मुख्य स्तम्भ हैं. रेणुका दिनकर जी की जवानी का उद्घोष है. उसकी कुछ कवितायें छायावाद की याद दिलाती हैं और कुछ उस दोपहरी के प्रकाश की जिसकी रचना कवि आगे चलकर करनेवाला था. या प्रकाश पूर्ण रूप से हुंकार में प्रकट हुआ. भारतीय विद्रोह की वाणी के रूप में हुंकार हिंदी ही नहीं, समस्त भारतीय भाषाओं में उल्लेख्य ग्रन्थ है. कुरुक्षेत्र उन भावनाओं का दर्शन प्रस्तुत करता है, जिनका विस्फोट रेणुका और हुंकार में हुआ था. कुरुक्षेत्र की रचना के पीछे उस द्वन्द का हाथ है जो हिंसा-अहिंसा को लेकर देश के अंतर्मन में चल रहा था. काव्य जब तक समस्त राष्ट्र की अव्यक्त पीड़ा का माध्यम नहीं बनता, जनता उसे सिर आँखों पर नहीं उठाती. कुरुक्षेत्र जब से प्रकाशित हुआ, वह बराबर जनता के द्वारा पढ़ा जा रहा है. उसका अनुवाद तेलगु और कन्नड़ भाषाओं में भी निकला है. किन्तु केवल दर्शन कह देने से कुरुक्षेत्र के साथ पूरा न्याय नहीं होता. वह पराधीन भारत के क्रोध की कविता है, उसके प्रतिशोध का विस्फोट और गहन द्वंदों का आख्यान है.

नील कुसुम की कवितायें सामाजिक उद्देश्यों को प्रधानता नहीं देती. उनकी भाषा बहुत मंजी हुई है और भाव काफी मर्मबेधी हैं, पर वे यह भी बताती हैं कि कवि का मन उस दिशा की ओर मुड रहा है, जिधर रसवंती का स्त्रोत था. फिर भी इस संग्रह की 'हिमालय का सन्देश' नामक कविता सामाजिकता से ओतप्रोत है. इस कविता का धरातल यद्यपि दार्शनिक हो उठा है, पर कवि की मुख्य चिंता यही है कि स्वाधीन भारत शांति-साधना के लिए क्या करे, वय व्यष्टि, समष्टि, प्रजासत्ता और अधिनायकवाद एवं हिंसा और अहिंसा के बीच समाधान कैसे प्राप्त करें.

रसवंती वाली  धारा का महान विस्फोट उर्वशी काव्य से हुआ है. इसमें प्रेम और श्रृंगार के भावों का चित्रण ऊँचे धरातल पर किया गया है. पुरुरवा वह मनुष्य है जो द्वंदों से पीड़ित है. वह सुख भोगता है और सुख को छोड़ना चाहता है. वह नारी प्रेम में पड़ता है और नारी का अतिक्रमण करना चाहता है. इसके विपरीत, उर्वशी देवी है, जिसमे कोई द्वन्द नहीं है. वह दैहिक सुख भोगने के उद्देश्य से पृथ्वी पर आई है. इन सारे द्वंदों के एकत्र हो जाने से उर्वशी अत्यंत गहन काव्य का कारण हो उठी है. पुस्तक के अंत में सती नारी की अवतारना करके क्या दिनकरजी ने यह सन्देश दिया है कि नर-नारी सम्बन्ध का समाधान सतियाँ ही लाती हैं, अप्सराएं नहीं ?

क्रमशः

लीजिये प्रस्तुत है दिनकर जी की हिमालय कविता

हिमालय

मेरे नगपति ! मेरे विशाल !

 

साकार, दिव्य, गौरव विराट

पौरुष  के  पुंजीभूत  ज्वाल !

मेरे जननी के हिम-किरीट !

मेरे  भारत  के दिव्य भाल !

 

मेरे नगपति !  मेरे विशाल !

युग-हग  अजेय,  निर्बन्ध, मुक्त,

युग-युग शुची, गर्वोन्नत महान,

निस्सीम  व्योम  में  तान  रहा,

 

युग से किस महिमा का वितान ?

कैसी  अखंड  यह  चिर  समाधि ?

यतिवर ! कैसा यह अमित ध्यान ?

तू   महाशून्य    में    खोज   रहा

 

किस जटिल समस्या का निदान?

उलझन  का  कैसा विषम जाल ?

मेरे  नगपति !  मेरे  विशाल !

ओ, मौन तपस्या लीन यति !

 

पल भर को तो कर दृगोंमेश !

रे  ज्वालाओं से दग्ध, विकल

है तड़प रहा पद पर सन्देश !

सुखसिंधु,   पंचनद,  ब्रह्मपुत्र,

 

गंगा, यमुना की अमिय-धार

जिस पुण्यभूमि की ओर बही

तेरी  विगलित करुणा उदार,

जिसके द्वारों पर खड़ा क्रांत

 

सीमापति !  तूने की पुकार,

पद-दलित इसे करना पीछे

पहले  ले  मेरे  सिर उतार !'

उस पुण्यभूमि पर आज तप !

 

रे,  आन  पड़ा  संकट  कराल,

व्याकुल  तेरे  सुत  तड़प  रहे,

डस रहे चतुर्दिक विविध व्याल !

मेरे  नगपति !   मेरे  विशाल !

 

कितनी मणियाँ लुट गयी ? मिटा

कितना   मेरा   वैभव  अशेष !

तू ध्यान -मग्न ही रहा, इधर

वीरान  हुआ  प्यारा सन्देश !

 

किन   द्रौपदियों  के   बाल  खुले ?

किन-किन कलियों का अंत हुआ ?

कह  हृदय  खोल  चित्तोर !   यहाँ

कितने  दिन  ज्वाल-वसंत  हुआ ?

 

पूछे सिकता-कण से हिम्पति !

तेरा  वह  राजस्थान  कहाँ ?

बन-बन स्वतंत्रता दीप लिए

फिरनेवाला बलवान कहाँ ?

 

तू  पूछ अवध  से,  राम  कहाँ ?

वृंदा  ! बोलो,  घनश्याम कहाँ ?

ओ मगध ! कहां मेरा अशोक ?

वह  चन्द्रगुप्त  बलधाम कहाँ ?

 

पैरों    पर  ही  है  पढ़ी  हुई

मिथिला भिखारिणी सुकुमारी

तू   पूछ   कहाँ   इसने  खोयी

अपनी अनंत निधियां सारी ?

 

री कपिलवस्तु ! कह, बुद्धदेव

के  वे  मंगल  उपदेश  कहाँ ?

तिब्बत, इरान, जापान, चीन

तक  गए  हुए सन्देश कहाँ ?

 

वैशाली  के   भग्नावशेष  से

पूछ   लिच्छवी-शान  कहाँ ?

ओ री उदास गण्डकी !  बता

विद्यापति कवि के गान कहाँ ?

 

तू  तरुण  देश  से  पूछ  अरे,

गूंजा यह  कैसा ध्वंस-राग ?

अम्बुधि-अंतस्तल-बीच छिपी

यह सुलग रही है कौन आग ?

 

प्राची    के   प्रांगन - बीच   देख,

जल रहा स्वर्ण-युग अग्नि-ज्वाल,

तू  सिंघनाद   कर  जाग  तापी !

मेरे नगपति ! मेरे विशाल !

 

रे, रोक युधिष्ठर को न यहाँ

जाने  दे  उसको स्वर्ग धीर,

पर,  फिर हमें गांडीव-गदा,

लौटा  दे  अर्जुन-भीम  वीर

 

कह  दे  शंकर  से, आज करें 

वे प्रलय-नृत्य फिर एक बार !

सारे   भारत   में   गूँज   उठे,

'हर-हर-बम का फिर महोच्चार !

 

ले   अंगडाई,  उठ,  हिले  धरा,

कर निज विराट स्वर में निनाद,

तू    शैल्रराट  !    हुंकार   भरे,

फट जाय कुहा, भागे प्रमाद !

 

तू  मौन  त्याग   कर  सिंहनाद,

रे तपी ! आज तप का न काल !

नव-युग शंख ध्वनि जगा रही,

तू  जाग,  जाग,  मेरे विशाल !

(रेणुका) ( १९३०)

गुरुवार, 24 मई 2012

दिल्ली

164323_156157637769910_100001270242605_331280_1205394_nसब पाठक गणों को  अनामिका का नमस्कार  ! दिनकरजी के साहित्यिक जीवन सफ़र में विद्रोहात्मक कविताओं की शुरुआत क्यों कर हुई आईये जानते हैं इसके पीछे की घटनाएं...

पिछले पोस्ट के लिंक

१. देवता हैं नहीं २.  नाचो हे, नाचो, नटवर ३. बालिका से वधू ४. तूफ़ान ५.  अनल - किरीट ६. कवि की मृत्यु ७. दिगम्बरी 8. ओ द्विधाग्रस्त शार्दूल, बोल !

दिनकरजी जीवन दर्पण -९

दिनकरजी खुद से ही सवाल करते हैं -

जिससे निशि खोजती तारे जलाकर,

उसी का कर रहा अभिसार हूँ मैं.

जनम कर सौ बार मर चुका लेकिन

अगम का पा सका क्या पार हूँ मैं ?

दिनकरजी के जीवन में यह विरोधाभास क्यूँ आया, इसकी ठीक व्याख्या नहीं मिलती. गांधीजी की आन्दोलन-सम्बन्धी दुविधा से वे कुपित थे. आन्दोलन छेड़े जाने के पक्ष में उन्होंने विद्रोहात्मक कविता लिखी थी जिसके कारण सरकार को उन्हें चेतावनी देनी पड़ी थी. सन बयालीस का आन्दोलन जब दबने लगा तब उन्होंने 'आग की भीख' नामक वह ज्वलंत कविता छपवाई जिसमे समरलग्न   भारत की विवशता और तड़प का बड़ा ही आकुल आख्यान मिलता है -

बेचैन  हैं  हवाएं,   हर   ओर   बेकली  है

कोई नहीं बताता, किश्ती किधर चली है

मंझधार है,  भवर  है  या पास है किनारा

या नाश आ रहा या सौभाग्य का सितारा ?

तमवेधिनी  किरण  का  संधान मांगता हूँ,

ध्रुव की कठिन घडी में पहचान मांगता हूँ.

आगे  पहाड़  को  पा  धारा  रुकी  हुई  है,

बलपुंज  केसरी  की  ग्रीवा  झुकी  हुई  है

निर्वाक  है  हिमालय,  गंगा  डरी  हुई  है.

निस्तब्धता निशा की दिन में  भरी हुई है.

पंचास्य-नाद भीषण विकराल  मांगता हूँ.

जड़ता विनाश का फिर भूचाल मांगता हूँ.

गति में प्रभंजनों का आवेग फिर सबल दे,

इस जांच की घडी में निष्ठा कड़ी, अचल दे.

हम  दे   चुके  लहू हैं, तू  देवता  विभा  दे,

अपने अनल-विशिख से आकाश जगमगा दे.

उन्मोद   बेकली   का   उत्थान  मांगता  हूँ,

विस्फोट    मांगता  हूँ,   तूफ़ान  मांगता हूँ.

१९४३ में देश जिस पीड़ा से छटपटा रहा था, इस कविता में उसका पूरा खाका उतर आया है. किन्तु इस दर्द को वही कवि लिख सकता था जिसकी नाडी के तार देश की छाती से लगे हों.

फिर उनकी वह कविता छपी जिसमे इन्होने सत्याग्रहियों को यह आश्वासन दिया था कि उनकी विजय समीप है. लक्ष्य के पास आकर थककर बैठ जाना वीरों का काम नहीं होता -

यह प्रदीप जो दीख रहा है झिलमिल, दूर नहीं है,

थककर बैठ  गए क्या भाई ,  मंजिल दूर नहीं है.

अपनी हड्डी  की  मशाल से ह्रदय चीरते तम का.

सारी रात चले तुम दुख झेलते कुलिश निर्मम का.

एक खेय है शेष, किसी विधि पार उसे कर जाओ,

वह देखो, उस पार चमकता है मंदिर प्रियतम का.

आकर  इतने  पास  फिरे  वह सच्चा शूर नहीं है,

थककर  बैठ गए  क्या भाई,  मंजिल दूर नहीं है.

(सामधेनी)

देश जितनी कुर्बानियां कर चुका था, उन्हें दिनकरजी ने इस कविता में यथेष्ट माना था और  उन्होंने यह आशा प्रकट की थी कि भगवान् भारत की और अधिक परीक्षा नहीं लेंगे. अचरज की बात है कि यह भविष्यवाणी भी सच ही निकली.

दिशा दीप्त हो उठी प्राप्त कर पुन्य प्रकाश तुम्हारा

लिखा जा चुका अनल - अक्षरों में इतिहास तुम्हारा.

जिस मिटटी  ने लहू  पिया  वह फूल  खिलाएगी ही ,

अम्बर  पर  धन  बन  छायेगा  ही उच्छ वास  तुम्हारा,

और  अधिक  ले  जांच,  देवता  इतना  क्रूर   नहीं  है.

थककर  बैठ   गए  क्या  भाई,  मंजिल  दूर  नहीं  है.

(सामधेनी)

१९४५ में ही उन्होंने 'दिल्ली और मास्को' नामक वह विख्यात कविता लिखी जिसमे मास्को की वन्दना उसी निष्ठा  और श्रद्धा के साथ की गयी, जिससे हिन्दू काशिधाम और मुसलमान मक्काशरीफ़ की करते हैं.  साथ ही अप्रत्यक्ष रूप से साम्यवादियों पर कुछ थोड़ा आक्षेप है कि उन्होंने सन बयालीश की क्रांति का साथ क्यों नहीं दिया. यह कविता दिनकरजी के उस समय के राजनीतिक विचारों की कुंजी है. वे साम्यवाद की प्रशंसा करते हैं, मास्को को 'लाल भवानी' कहकर पुकारते हैं और देश-देश में घटित होने वाली साम्यवादी क्रांतियों का स्वागत करते हैं. यह कविता ठीक उसी शैली में है जिसमें नयी दिल्ली की रचना की गयी थी, बल्कि आरंभिक पंक्तियों में भाषा और भाव का संयोग देखते ही बनता है.

जय   विधायिके  अमर  क्रांति की,  अरुण  देश  की रानी !

जवाकुसुम-धारिणी, जग-तारिणी, जय नव शिवे ! भवानी !

अरुण विश्व की काली, जय हो ,

लाल  सितारोंवाली,  जय  हो,

दलित, बुभुक्शु, विश्नुन  मनुज की

शिखा  रूद्र,   मतवाली  जय  हो,

जगज्योती, जय-जय, भविष्य की राह दिखाने वाली !

जय समत्व की शिखे, मनुज की प्रथम विजय की लाली !

भरे प्राण में आग, भयानक विप्लव का मद ढाले !

देश-देश  में  घूम  रहे  तेरे  सैनिक   मतवाले !

छीन-भिन्न हो रहीं मनुजता के बंधन की कड़ियाँ !

देश-देश में बरस रहीं आजादी की फुलझड़ियाँ !

किन्तु दिल्ली की याद आते ही कवि के हृदय पर चोट लगती है कि जो लोग मास्को की  वीरता के इतने प्रशंसक  हैं, वे दिल्ली के सत्याग्रहियों का साथ क्यों नहीं देते ?

एक देश है जहाँ विषमता

से अच्छी हो रही गुलामी,

जहाँ मनुज पहले स्वतंत्रता

से हो रहा साम्य का कामी.

चिल्लाते हैं 'विश्व ! विश्व !' कह जहाँ चतुर नर ज्ञानी,

बुद्धि -भीरु सकते न डाल जलते स्वदेश पर पानी !

जहाँ मास्को के रणधीरों के गुण गाये जाते,

दिल्ली के रुध्राक्त वीर को देख लोग सकुचाते !

दिनकरजी का मत था कि राष्ट्रीय स्वाधीनता की प्राप्ति किये बिना साम्यवादी समाज की रचना नहीं हो सकती, क्यूंकि गुलामी के नीचे केवल भारत का गौरव ही दबा हुआ नहीं है, उसकी आर्थिक समृद्धि भी उसी पहाड़ के नीचे है -

नगपति के पड़ में जब तक है बंधी हुई जंजीर,

तोड़ सकेगा कौन विषमता का प्रस्तर-प्राचीर ?

दिल्ली के नीचे मर्दित अभिमान नहीं केवल है,

दबा हुआ शत-लक्ष नरों का अन्न-वस्त्र, धन बल है !

दबी   हुई इसके  नीचे भारत  की लाल  भवानी,

जो तोड़े  यह  दुर्ग  वही  है समता  का अभिमानी .

क्रमशः

प्रस्तुत है दिनकरजी की हुंकार देती एक और रचना दिल्ली -

दिल्ली

यह कैसे चांदनी अमा के मलिन तमिस्त्र गगन में

कूक रही क्यों नियति व्यंग्य से इस गोधुली-लगन में ?

मरघट  में  तू  साज  रही  दिल्ली !   कैसे   श्रृंगार ?

यह बहार  का स्वांग अरि, इस उजड़े हुए चमन में !

इस उजाड़, निर्जन खंडहर में,

छिन-भिन्न उजड़े इस घर में,

तुझे  रूप  सजने  की  सूझी

मेरे   सत्यानाश   प्रहर  में !

डाल-डाल   पर  छेड़ रही कोयल मर्सिया तराना

और तुझे सूझा इस दम ही उत्सव हाय, मनाना;

हम धोते हैं गाव इधर सतलज के शीतल जल से,

उधर तुझे भाता है इनपर नमक  हाय, छिडकाना ?

महल कहाँ ? बस, हमें सहारा

केवल फूस-फांस, तृणदल का,

अन्न नहीं,  अवलंब  प्राण को

गम, आंसू  या  गंगाजल  का,

यह विहगों का झुण्ड लक्ष्य है

आजीवन बधिकों के फल का,

मरने  पर  भी  हमें  कफ़न है

माता  शैव्या  के  अंचल  का !

गुलंची निष्ठुर फेंक रहा कलियों को तोड़ अनल में,

कुछ सागर के पार और कुछ रावी-सतलज-जल में,

हम मिटते जा रहे, न ज्यों, अपना कोई भगवान् !

यह अलका छवि कौन भला देखेगा इस हलचल में.

बिखरी लत, आंसू छलके हैं,

देख, वन्दिनी हैं बिलखाती,

अश्रु  पोंछने  हम  जाते  हैं.

दिल्ली ! आह ! कलम रुक जाती !

अरि  विवश हैं,  कहो,  करें क्या ?

पैरों  में  जंजीर  हाय,  हाथों

में  हैं  कड़ियाँ  कस  जातीं !

और कहें क्या ? धरा न धंसती,

हुन्करता न गगन संघाती !

सुत की निष्ठुर बलि चढ़ जाती !

तड़प-तड़प हम कहो करें क्या ?

'बहै न हाथ, दहै रिसि छाती',

अंतर ही अंतर घुलते हैं,

'भा कुठार कुंठित रिपु घाती !'

अपनी गर्दन रेत-रेत असी की तीखी धारों पर

राजहंस  बलिदान  चढाते  माँ  के हुंकारों पर  !

पगली ! देख, जरा कैसे मर-मिटने की तैयारी ?

जादू चलेगा न धुन के पक्के इन बंजारों पर !

तू वैभव-मद में इठलाती

परकीया सी सैन चलाती,

री ब्रिटेन की दासी ! किसको

इन आँखों पर है ललचाती ?

हमने देखा यहीं पांडू-वीरों का कीर्ति-प्रसार,

वैभव का सुख -स्वप्न, कला का महा स्वप्न अभिसार

यही कभी अपनी रानी थी, तू ऐसे मत भूल,

अकबर, शाहजहाँ ने जिसका किया स्वयं श्रृंगार !

तू न ऐंठ मदमाती दिल्ली !

मत फिर यों  इतराती दिल्ली !

अविदित नहीं हमें तेरी

कितनी कठोर है छाती दिल्ली !

...........

(हुंकार )

गुरुवार, 17 मई 2012

ओ द्विधाग्रस्त शार्दूल, बोल !

164323_156157637769910_100001270242605_331280_1205394_nआप सब को अनामिका का प्रणाम ! आईये आज जानते हैं कि साहित्य की निस्वार्थ सेवा करने वाले हमारे महान लेखकों / कवियों/ साहित्यकारों को अपने परिवार, रोजी-रोटी और नौकरी की खट-पट के साथ-साथ अपने  जीवन में और  क्या -क्या पापड़ बेलने पड़ते हैं...

पिछले पोस्ट के लिंक

१. देवता हैं नहीं २.  नाचो हे, नाचो, नटवर ३. बालिका से वधू ४. तूफ़ान ५.  अनल - किरीट ६. कवि की मृत्यु ७. दिगम्बरी


दिनकर जी अपने बारे में कहते  हैं...

समाना चाहती है जो बीन उर में

विकल उस शून्य की झंकार हूँ मैं

भटकता खोजता हूँ, ज्योति तम में,

सुना है ज्योति का अंगार  हूँ मैं.

 

दिनकर जी पर एक बार एक मुसीबत 1940   में आई जब गाँधी जी क्रांतिकारी परिस्थिति की पुकार सुनी-अनसुनी करके इस दुविधा में पड़े थे कि आन्दोलन छेड़ा जाए या नहीं. उस समय बेनीपुरी और मथुराप्रसाद मिश्र  ' जनता'  नामक साप्ताहिक निकलते थे. उस पत्र का कोई विशेषांक निकलनेवाला था. बेनिपुरीजी ने दिनकरजी को तार दिया कि कोई कविता तुरंत भेजो. दिनकरजी ने गांधीजी की  द्विधा पर जोरदार कविता लिखी और उन्हें आन्दोलन छोड़ने को प्रेरित किया ( यह कविता वर्तमान संग्रह में -'ओ द्विधाग्रस्त शार्दूल, बोल' शीर्षक से मौजूद है, जो नीचे भी दी गयी है.). इस बार कविता प्रत्यक्ष रूप से सरकार के विरुद्ध थी, इसलिए लेखक की जगह उसमे दिनकर नहीं, बल्कि  अमिताभ नाम दिया गया था. किन्तु मथुरा बाबू के नाम जो पद्यबद्ध पत्र था उससे दिनकरजी का नाम प्रकट हो जाता था.

                                             यह तो दिनकर का कृत्य नहीं,

                                             अमिताभ देव का तुष्ट्कर्म !

संकेत यह था कि इसे दिनकर नहीं, अमिताभ के नाम से छापो. लेकिन यह लिफाफा डाकघर से सीधे सरकारी दफ्तर में पहुँच गया और 'जनता' ऑफिस में वह तब भेजा गया जब उसका फोटो लिया जा चुका था. कविता 'जनता' में अमिताभ नाम से ही छपी, पर कोई महीने भर बाद दिनकरजी के कानों में यह बात पहुंची कि कविता सेंसर हुई है. यह सूचना उन्हें पंडित केदारनाथ मिश्र 'प्रभात' से मिली थी, जो बिहार के प्रसिद्द कवि थे और पुलिस विभाग में नौकरी करते थे. लेकिन जानते हुए भी यह खबर बेनीपुरी जी ने दिनकरजी को नहीं भेजी. उल्टे मोतिहारी किसान सम्मलेन में भेंट होने पर दिनकरजी ने जब यह बात चलायी तब बेनिपुरीजी बोले - अरे, नौकरी छूट गयी तो हमारे गिरोह में आ मिलना. हम तो चाहते ही हैं कि तुम्हारी नौकरी छूट जाये.

लेकिन नौकरी तब भी नहीं छूटी. सरकार  ने फिर एक चेतावनी भिजवाई. इस बार दिनकरजी के जिला मजिस्ट्रेट खान बहादुर अमीर थे, जो अवकाश लेकर हजारीबाग में रहे. अमीर साहब से बात होने पर दिनकरजी ने कहा - गुमनाम चीज़ की जवाबदेही मुझपर क्यों डाली जाती है ?

अमीर साहब हंसकर बोले - आपका बचपना नहीं जाएगा - बिना प्रमाण के चेतावनी नहीं दी जाती. जरा संभलकर चला कीजिए. और बात वहीँ ख़त्म हो गयी. अवश्य ही जिला मजिस्ट्रेट ने दिनकर जी की रक्षा की होगी.

सरकार ने दिनकरजी को नौकरी से तो नहीं निकाला, पर तकलीफ उन्हें काफी दी गयी. जिसका एक रूप यह भी रहा कि चार साल के अन्दर इनके बाईस बार तबादले किये गए.  'कल्पना' में प्रकाशित अपने एक संस्मरण में दिनकर जी ने लिखा, "घबराहट में आकर कई बार मैंने सोचा कि नौकरी छोड़ दूँ. किन्तु तीन बातें थीं, जिनके कारण मैं नौकरी नहीं छोड़ सका. पहली तो यह कि नौकरी छूट गयी तो परिवार खायेगा क्या ? दूसरी यह कि हर तबादले के साथ मुझे चार-छह दिनों की छुट्टियाँ मिल जाती थीं जिन्हें मैं जायसवालजी के सानिध्य में बिताने को पटना चला जाता था. और तीसरी यह कि जयप्रकाश जी बराबर यह शह देते रहते थे कि अपेक्षा बरतरफ हो जाना ही श्रेष्ठ है".


दिनकरजी स्वयं नौकरी छोड़ने को तैयार नहीं थे. यदि वे बर्खास्त कर दिए गए होते तो इससे अंग्रेजों की निंदा तो होती, पर उससे दिनकर जी का अपरिमित उपकार हुआ होता जो शायद जयप्रकाशजी और बेनिपुरीजी का लक्ष्य था. लेकिन दिनकरजी का सौभाग्य इस सुयश से खाली रह गया और युद्ध के दो-तीन साल बीत जाने पर अंग्रेजी सरकार ने उनका तबादला युद्ध -प्रचार विभाग में कर दिया.

क्रमशः

लीजिये प्रस्तुत है दिनकर जी की एक और जोरदार कविता जो उन्होंने दुविधा में पड़े गांधी जी को आन्दोलन के लिए प्रेरित करते हुए लिखी थी...

ओ द्विद्विधाग्रस्त शार्दूल, बोल  !

हिल रहा  धरा  का  शीर्ण मूल

जल   रहा  दीप्त  सारा खगोल,

तू सोच रहा क्या अचल मौन ?

ओ  द्विधाग्रस्त शार्दूल, बोल  !

जाग्रत जीवन की चरम ज्योति

लड़  रही  सिन्धु  के आर-पार ;

संघर्ष      सब     ओर,     एक

हिमगुहा-बीच घन- अन्धकार !

प्लावन  के  खा   दुर्जय   प्रहर

तब  रहे  सकल  प्राचीर  कांप,

जब  तू  भीतर  क्या सोच रहा

है  क्लीव-धर्म  का पृष्ठ  खोल ?

क्या पाप-मोक्ष  का भी प्रयास

ओ द्विधाग्रस्त शार्दूल, बोल  !

बुझ गया ज्वलित पौरुष प्रदीप

या  टूट  गए नख-रद कराल ?

या  तू लख कर भयभीत हुआ

लपटें चारों दिशी लाल-लाल ?

दुर्लभ  सुयोग,  यह  वह्नी-वाह

धोने     आया    तेरा   कलंक

विधि का यह नियत विधान तुझे,

लड़  कर  लेना  है मुक्ति मोल !

किस असमंजस में अचल मौन

ओ  द्विधाग्रस्त  शार्दूल, बोल  !

संसार  तुझे  दे  क्या  प्रमाण ?

रक्खे सम्मुख किसका चरित्र ?

तेरे    पूर्वज   कह   गए   "युद्ध

चिर अनघ और शाश्वत पवित्र !"

तप से खिंच आकर विजय पास

है  मांग  रही   बलिदान  आज,

"मैं    उसे   वरूँगी,   होम  सके

स्वागत में जो वन-प्राण आज ! "

है  दहन  मुक्ति  का  मन्त्र  एक

सुन,  गूँज  रहा  सारा  खगोल ;

तू सोच रहा क्या अचल मौन

ओ द्विधाग्रस्त शार्दूल, बोल  !

नख दन्त देख मत ह्रदय हार,

गृह  भेद  देख  मत हो अधीर;

अंतर  की  अतुल  उमंग  देख,

देखे,   अपनी    जंजीर   वीर !

यह  पवन परम अनुकूल देख,

रे,  देख भुजा का बल अथाह,

तू  चले   बेड़ियाँ   तोड़  कहीं;

रोकेगा    आकर  कौन  राह ?

डगमग धरणी पर दमित तेज

सागर   पारे    सा   उठे  डोल;

उठ जाग, समय अब शेष नहीं,

भारत  माँ  के  शार्दूल , बोल  !

१९४०

गुरुवार, 3 मई 2012

कवि की मृत्यु


सभी पाठक-वृन्द को अनामिका का सादर नमस्कार ! लीजिये जी आ गया वृहष्पतिवार और ख़तम हुआ इंतज़ार !  प्रस्तुत हैं दिनकर जी के जीवन के लेखन और संघर्ष की कुछ और बातें....

पिछले पोस्ट के लिंक

१. देवता हैं नहीं २.  नाचो हेनाचोनटवर ३. बालिका से वधू ४. तूफ़ान ५.  अनल - किरीट


                                      
दिनकर जी जीवन दर्पण - भाग - 6


दिनकर जी को जनता का प्यार राष्ट्रीय कविताओं के कारण मिला, सम्मान उन्हें 'कुरुक्षेत्र' महाकाव्य से प्राप्त हुआ और श्रद्धा के भाजन वे 'संस्कृति के चार अध्याय' गद्य ग्रन्थ लिखकर हुए. उनके सुयश के प्रसार में उनके 'रश्मिरथी' खंडकाव्य का भी बड़ा हाथ है जो शहरों से अधिक ग्रामों में कहीं अधिक उत्साह के साथ पढ़ा जाता है.

एक जगह उन्होंने लिखा है - "सुयश तो मुझे हुंकार से मिला लेकिन आत्मा मेरी रसवंती में बसती है " ! यह कथन आंशिक रूप से ही सत्य है, जैसा कि ‘उर्वशी’ लिखकर शुद्ध कविता के अल्लाह पर ईमान लाने  के बाद चीनी आक्रमण के जवाब में उन्होंने 'परशुराम की प्रतीक्षा' लिखी जिसमे गांधीवाद और शुद्ध कविता दोनों के बुत ढह बह गए. पर उन्हें इसकी परवाह नहीं रही.

'रसवंती' दिनकरजी के श्रृंगार-काव्य अथवा रस गीतों का संग्रह है, जो 'हुंकार' के तुरंत बाद 1940 में निकली थी. उस धारा का पूरा विकास उनके काव्य 'उर्वशी' से हुआ है. 'उर्वशी' दिनकरजी की काव्यकृतियों में सर्वोत्तम व सर्वश्रेष्ठ समझी गयी. हिंदी में श्रृंगार काव्य का यह एक बेजोड़ उदाहरण है. पर प्रश्न है कि क्या श्रृंगार-मयी  कविता ही शुद्ध कविता है ?

'हुंकार' की भूमिका में दिनकर के व्यक्तित्व का बिश्लेषण करते हुए बेनीपुरी जी ने एक सूक्ति कही थी - "अंगारे' जिनपर इन्द्रधनुष खेल रहे हैं "!  'रेणुका' , हुंकार, सामधेनी, कुरुक्षेत्र और रश्मिरथी में दहकते अंगारों का तेज है. इन्द्रधनुषी रंग रसवंती में छिटका था. उर्वशी में वह मध्यान्ह सूर्य के उभार पर पहुँच गया है.

दिनकर जी का समस्त जीवन संघर्ष का रहा और इसलिए संघर्ष दिनकर जी के जीवन का मुख्य भाग बन गया. इन संघर्षों में दिनकर जी को सफलता भी मिली, इसीलिए संघर्ष की कटुता से दिनकरजी का व्यक्तित्व विशृंखलित और पथभ्रष्ट नहीं हुआ, दिनकरजी के अन्दर की सात्विकता और कल्याण की भावना को ठेस नहीं पहुंची. लेकिन साथ-साथ यह भी सत्य है कि इन संघर्षों ने दिनकरजी को किसी हद तक कठोर अवश्य बना दिया था.

जब दिनकर जी संसद में राज्यसभा के सदस्य थे, उन्होंने हिंदी भाषा के लिए लगातार प्रयत्न किये. पर सफल व्यक्तित्व वाले स्वाभाविक संतुलन को उन्होंने एक क्षण  के लिए भी नहीं छोड़ा.

दिनकर जी उन्मुक्त स्वभाव के व्यक्ति हैं - उनका मुख्य गुण है भावना अभिव्यक्ति. कला का साज-सिंगार उनमे नहीं है. अनुभूति-जनित तीव्र भावना ही इनका क्षेत्र रहा है. कला का क्षेत्र साज-सिंगार हो सकता है, लेकिन भावना  को हमेशा से कला के प्रमुख स्थान मिला है, भावना ही तो कला का प्राण है.

......... इसी सबके साथ हमें यह स्वीकार करना ही पड़ेगा कि दिनकर जी हमारे इस युग के यदि एकमात्र नहीं तो सबसे अधिक प्रतिनिधि कवि हैं.

लेकिन बहुत अचरज की बात  है कि इस कवि के जीवन के सर्वोत्तम दिन और उन दिनों के भी सर्वोत्तम भाग जरूरतमंद परिवार के लिए रोटी कमाने  में निकल गए.  दिनकर जी भी विलाप करते हैं, "साहित्य समझने और लिखने का मुझे समय कब मिला? दिन तो नौकरी में जाता था, हाँ जिस समय अफसर बैडमिन्टन या ताश खेलते थे, उस समय घर में बंद होकर मैं पंक्तियाँ जोड़ता था. ऐसी अधूरी कवितायें भी मेरी कापियों में बहुत हैं जिनकी दो-चार पंक्तियाँ ही लिखी जा सकीं, क्यूंकि दफ्तर जाने का समय आ गया और मैं कविता पूरी न कर सका ! "

पूंजीवादी व्यवस्था के अन्दर कवियों, चिंतकों और कलाकारों का जो बुरा हाल होता है, जवानी भर दिनकरजी भी उसी बुरे हाल में रहे. नौकरी की खट-पट, रोटी की चिंता, भतीजियों और बेटियों के ब्याह के लिए दर-दर की ठोकरें और हर रोज़ नए अभावों से संघर्ष, यह वह वातावरण नहीं है जिसमे कवि का आंतरिक व्यक्तित्व खिल सकता हो. फिर भी, दिनकरजी की प्रायः सभी कवितायें इसी वातावरण में लिखी गयी. यदि आरम्भ से ही जनता का प्यार उन्हें न मिला होता, तो इस दमघोंटू वातावरण में उनका कवि जीवित भी रहता या नहीं इसमें काफी संदेह है. जनता के इसी प्रेम के कारण दिनकरजी का ह्रदय उस आग से नहीं जला, जो द्वेष करने वालों की ओर से उनपर सदैव बरसाई जाती रही.

क्रमशः 

इन्ही मार्मिक हालातों से जूझते हुए कवि मन से निकली एक पुकार प्रस्तुत है ...

कवि की मृत्यु 

जब   गीतकार  मर  गया, चाँद रोने आया,
चांदनी  मचलने  लगी  कफ़न बन जाने को 
मलयानिल ने शव को कन्धों पर उठा लिया,
वन  ने  भेजे  चन्दन  श्री-खंड  जलाने को !

सूरज  बोला,   यह   बड़ी  रोशनीवाला  था
मैं भी न जिसे भर सका कभी उजियाली से,
रंग  दिया आदमी के भीतर की दुनियां को,
इस  गायक  ने  अपने गीतों की लाली से !

बोला बूढा आकाश, ध्यान जब यह धरता,
मुझमे यौवन का नया वेग जम जाता था.
इसके  चिंतन  में  डुबकी  एक लगाते ही,
तन कौन कहे,मन भी मेरा रंग जाता था.

देवों ने कहा, बड़ा सुख था इसके मन की
गहराई   में   डूबने    और   उतराने   में.
माया बोली,  मैं  कई  बार थी भूल गयी,
अपने ही  गोपन  भेद  इसे  बतलाने में !

योगी था, बोला सत्य, भागता मैं फिरता,
वह   जान बढ़ाये  हुए  दौड़ता चलता  था,
जब-तब लेता यह पकड़ और हंसने लगता,
धोखा  देकर  मैं अपना रूप बदलता था !

मर्दों  को आई  याद  बांकपन  की  बातें,
बोले, जो हो,  आदमी  बड़ा अलबेला था.
जिसके  आगे तूफ़ान  अदब से झुकते हैं,
उसको  भी  इसने  अहंकार से  झेला था !

नारियां  बिलखने लगीं, बांसुरी के भीतर
जादू  था  कोई अदा  बड़ी  मतवाली थी.
गर्जन में  भी थी  नमी, आग से भरे हुए,
गीतों में भी कुछ चीज रुलाने वाली थी !

वे   बड़ी बड़ी  आँखें  आंसू   से  भरी  हुई,
पानी  में   जैसे   कमल  डूब  उतराता हो,
वह  मस्ती  में   झूमते हुए उसका आना,
मानो, अपना ही तनय झूमता आता हो !

चिंतन में  डूबा  हुआ  सरल  भोला-भाला,
बालक था, कोई दिव्य  पुरुष अवतारी था,
तुम तो कहते हो मर्द, मगर, मन के भीतर,
यह  कलावंत  हमसे भी  बढ़कर नारी था.

चुपचाप जिन्दगी भर इसने जो जुल्म सहे,
उतना  नारी  भी  कहाँ मौन हो सकती है ?
आँखों के  आंसू  मन के  भेद  जता  जाते,
कुछ सोच समझ जिह्वा चाहे चुप रहती है !

पर,  इसे  नहीं रोने  का भी अवकाश मिला,
सारा  जीवन कट  गया  आग  सुलगाने  में,
आखिर,वह भी सो गया जिन्दगी ने जिसको,
था  लगा  रखा  सोतों  को  छेड़ जगाने में !

बेबसी  बड़ी  उन बेचारों  की क्या कहिये ?
चुपचाप जिन्हें जीवन भर जलना होता है
ऊपर   नीचे   द्वेषों   के   कुंत   तने   होते,
बचकर उनको बेदाग़  निकलना होता है !

जाओ, कवि, जाओ मिला तुम्हे जो कुछ हमसे 
दानी  को  उसके  सिवा  नहीं  कुछ  मिलता है,
चुन-चुन  कर  हम  तोड़ते  वही  टहनी  केवल,
जिस  पर  कोई अपरूप कुसुम आ खिलता है !

विष के प्याले का मोल और क्या हो सकता ?
प्रेमी   तो   केवल   मधुर  प्रीत  ही   देता  है,
कवि  को  चाहे  संसार  भेंट  दे  जो,  लेकिन,
बदले  में  वह  निष्कपट  गीत  ही  देता  है !

आवरण  गिरा,  जगती  की  सीमा शेष हुई,
अब  पहुँच  नहीं तुम तक इन हा-हाकारों की,
नीचे  की  महफ़िल उजड़ गयी, ऊपर कल से
कुछ  और चमक  उठेगी  सभा  सितारों की.

(नील कुसुम)