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शुक्रवार, 5 नवंबर 2010

एक ऐसा ही दीप जलाओ!




परमार्थ में जीवन को ही मिटा दे,
दीप सा दधीचि दूसरा हुआ कहाँ?
वह तो जल कर भस्म हुआ है,
हर मन में अभी उजाला कहाँ?

दीपक बन मैं भी जल जाऊं ,
गर कलुषित मन धुल जाएँ,
तड़प सुनें सूने मन-आँगन की,
 जिससे दिल उनके हिल जाएँ।

कितने घरों में बिखरा अँधेरा,
कल ही दीपक बुझा है घर का,
किसी का कुछ न बिगाड़ा  था,
बस चैन खोजने चला था घर का।

अब तो मनुज बन जाओ सब,
जलने दो बाती इन सब दीपों में,
बूढी आँखों का नूर बचाओ,
बच्चों की मुस्कान बचाओ |

इस दीवाली में सब हर घर में ,
एक सद्भावना का दीप जलाओ,
सुख-शान्ति की हो कामना जिसमें ,
विश्व शान्ति की अलख जलाओ।

हर घर आँगन रोशन हो जगमग,
मन में भी सबके उल्लास भरा हो,
वह दीप एक हो या दीपमाला हो,
बस रोशन घर का हर आला हो।

अब की सब ऐसी दीवाली मनाओ
खुशहाल घर के हर मन को बनाओ!