बुधवार, 9 नवंबर 2011

हिन्दी के पाणिनि - आचार्य किशोरीदास बाजपेई-8

अंक-8

हिन्दी के पाणिनि - आचार्य किशोरीदास बाजपेई

आचार्य परशुराम राय

पिछले अंक में आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी जी द्वारा अपनी साहित्यिक विरासत नागरी प्रचारिणी सभा काशी को सील बन्द बंडलों में इस निर्देश के साथ दी गयी थी कि वब उनकी मृत्यु के बाद खोली जाए।

इसके बाद 1939 में साहित्य-सम्मेलन का अधिवेशन नागरी प्रचारिणी सभा काशी के परिसर में आयोजित किया गया। जिसमें पं. अम्बिका प्रसाद वाजपेयी अध्यक्ष थे। इस अधिवेशन में बाबू श्यामसुन्दर दास आदि महानुभाव भी उपस्थित थे। स्वयं आचार्य किशोरीदास वाजपेयी भी अधिवेशन में भाग लेने के लिए वाराणसी पहुँचे थे। इसी अधिवेशन के दौरान आचार्य जी ने नागरी प्रचारिणी सभा के अधिकारियों/पदाधिकारियों से उन बंडलों के विषय में पूछताछ की, पर सभी ने उससे अपनी अनभिज्ञता ही व्यक्त की। अन्त में आचार्य वाजपेयी ने एक प्रस्ताव तैयार कर साहित्य-सम्मेलन के लोगों के सामने रखा कि आचार्य द्विवेदी जी के साहित्यिक दस्तावेजों को सबके सामने खोले जाएँ, ताकि सभी लोग उसे देखें। लेकिन यह प्रस्ताव सम्मेलन के लोगों को ठीक नहीं लगा, क्योंकि साहित्य-सम्मेलन और नागरी प्रचारिणी सभा दोनों अलग-अलग संस्थाएँ हैं और एक दूसरे के काम में दखल देना ठीक नहीं। पर आचार्य वाजपेयी जी को उनकी बातें अच्छी नहीं लगीं। लेकिन राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन की बात वे न टाल सके और अपना प्रस्ताव फाड़कर फेंक दिए।

अपना प्रस्ताव फाड़ने के बाद वे वहाँ से उठकर सीधे एक प्रेस गए और एक पर्चा छपवाए। पर्चे में छपा था कि आचार्य द्विवेदी ने जो कागजात प्रचारिणी सभा को सौंपे थे, उन्हें इस अवसर पर खोला जाए। अधिवेशन में पर्चों को आचार्य जी ने तुरन्त वितरित कर दिया। जिसके परिणाम स्वरूप अधिवेशन में कानाफूसी शुरु हो गयी। पर कोई परिणाम सामने नहीं आया।

इसके बाद काशी से लौटने के बाद उन्होंने अपनी माँग विभिन्न पत्रों में भी प्रकाशित करा दी। प्रत्युत्तर में नागरी प्रचारिणी सभा की ओर से भी पत्रों में प्रकाशित करवाया गया कि आचार्य द्विवेदी जी ने एक बंडल में कुछ रुपये अभिवादन महोत्सव पर दिए थे और वे उनके आदेशानुसार खर्च कर दिए गए। उनके दिए और कोई बंडल सभा के पास नहीं है। इस लिफाफा आन्दोलन पर अनेक पत्र-पत्रिकाओं में लोग आचार्य वाजपेयी की बातों को निरर्थक सिद्ध करने के लिए अपनी-अपनी बातें प्रकाशित करवाने लगे। यहाँ तक कि बाबू गुलाब राय जी ने भी आगरा से निकलनेवाले साहित्य-संदेश के सम्पादकीय में नागरी प्रचारिणी सभा के पक्ष का काफी जोरदार ढंग से समर्थन किया था। इससे आचार्य वाजपेयी की स्थिति बिलकुल किंकर्तव्यविमूढ़ सी हो गयी थी।

इसी बीच आगरा से प्रकाशित होने वाले साहित्यिक पत्र मराल के संचालक महोदय ने कनखल में आचार्य जी से मिलकर इसके प्रधान सम्पादक के रूप में काम करने का आग्रह किया। आचार्य जी को भी इस समय एक पत्रिका के सहारे की आवश्यकता थी। अतएव बात इस पर तय हो गयी कि आचार्य जी कनखल से ही सम्पादकीय लिखकर भेज दिया करेंगे और सम्पादन का शेष कार्य डॉ. श्यामसुन्दर दीक्षित देखेंगे। इसके बदले जो भी उन्हें मिलेगा, स्वीकार्य होगा।

आचार्य वाजपेयी जी इस पत्र में आचार्य द्विवेदी जी द्वारा सभा को दिए गए बडलों और उनके गायब होने के लिए नागरी प्रचारिणी सभा के विरुद्ध आरोपात्मक बातें लगातार लिखते लगे। जिसका विरोध प्रयाग से प्रकाशित होनेवाले इंडियन प्रेस के देशदूत नामक पत्र में किया गया था। जिसपर आचार्य जी ने मराल में लिखा कि देशदूत इंडियन प्रेस का पत्र है और सभा का प्रकाशन कार्य करता है। अतएव दबाव देकर मालिकों के इशारे पर यह सबकुछ प्रकाशित करवाया गया होगा। इसमें बेचारे सम्पादक क्या करें। परिणाम स्वरूप देशदूत के सम्पादकों ने आचार्य जी को अदालती नोटिस भेजा कि उनकी टिप्पणी से इंडियन प्रेस के मालिकों का अपमान हुआ है, अतएव वे उनसे क्षमा माँगें, नहीं तो अदालत में मानहानि का दावा किया जायगा।

आचार्य जी ने भी उसका जबाब देते हुए चुनौती दे डाली कि ठीक है, अब सब अदालत में ही देखा जाएगा। पर वह केवल बन्दर-घुड़की ही सिद्ध हुई। कोई कहीं नहीं गया। हाँ, मराल का प्रकाशन अवश्य बन्द करवा दिया गया।

इस कार्य के कारण अचार्य वाजपेयी जी की काफी फजीहत हुई। कोई भी पत्र इस सम्बन्ध में उनकी कोई चीज प्रकाशित करने को तैयार नहीं था। लेकिन वे अपने उद्देश्य से विचलित नहीं हुए। वे इस कार्य को गुरु ऋण की तरह मानते थे। उनके हृदय में आचार्य द्विवेदी जी के प्रति असीम श्रद्धा थी। उन दिनों लाहौर से विश्वबन्धु नामक साप्ताहिक पत्र निकलता था। अतएव उन्होंने इस विषय में कुछ न कुछ लिखकर वहाँ से प्रकाशित कराना शुरु कर दिया। जब नागरी प्रचारिणी सभा ने उसपर अपनी आपत्ति की, तो इस पत्र के सम्पादक ने सभा को लिखा कि वाजपेयी जी की बातें तर्क-संगत हैं और सभा को कुछ कहना हो, तो वह लिखकर दे। वे उसे भी प्रकाशित करेंगे। लेकिन एक ही बात को घुमाफिरा कर कितना लिखा जा सकता था, अतएव यहाँ इस मामले को उन्हें विराम देना पड़ा।

इसके बाद तभी आचार्य जी को सभा के प्रधानमंत्री श्री रामबहोरी लाल शुक्ल का एक पत्र मिला, जिसमें लिखा गया था कि सभा के रिकार्ड के अनुसार द्विवेदी जी के कागज-पत्रों का कुछ पता नहीं है और न ही यहाँ के पुराने अधिकारी कुछ बता रहे हैं। लेकिन सभा के दूसरे प्रधानमंत्री उन दस्तावेजों की खिल्ली उड़ा रहे थे। आचार्य जी की आर्थिक स्थिति भी काफी खराब थी। किसी तरह बाल-बच्चों के लिए रूखी-सूखी रोटी जुटा पा रहे थे। वे लिखते हैं कि उनका काफी धन इस ऋषि-श्राद्ध में लग चुका था। इसके बाद भी कोई रास्ता न निकल पाया था और न ही कोई रास्ता सूझ रहा था।

एक दिन इसी ऊहापोह में अपनी आलमारी में पड़ी सरस्वती का द्विवेदी स्मृति अंक उन्होंने निकाला और कई दिन तक वे उसी को उलटते-पुलटते रहे। अन्त में उन्हें उसमें एक लेख पढ़ने को मिला, जिसमें लेखक ने लिखा था कि आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के भेंट किए कागज-पत्रों के बंडल उनकी मृत्यु के बाद उनके (लेखक के) और उनके मित्र की उपस्थिति में खोले गए थे और वे बड़े ही काम के हैं। लेखक ने हिन्दी जगत से इस बहुमूल्य सामग्री का सदुपयोग करने के लिए अपील की थी।

अब तो मानो आचार्य वाजपेयी जी के हाथों ब्रह्मास्त्र लग गया था। आचार्य जी ने तुरन्त उस लेख को आधार बनाकर नागरी प्रचारिणी सभा को एक अदालती नोटिस दे डाली। नोटिस पंजीकृत डाक से नागरी प्रचारिणी सभा के प्रधानमन्त्री के नाम से भेजी गयी। इस नोटिस का असर जादू की तरहा हुआ। एक सप्ताह में ही आचार्य जी को उसका जबाब आ गया, जिसमें लिखा था कि द्विवेदी जी के सभी कागज-पत्र सभा में सुरक्षित हैं और कोई भी सभा में आकर उन्हें देख सकता है। आचार्य जी लिखते हैं कि इस प्रकार यह यज्ञ पूर्णरूपेण सफल हुआ। आचार्य जी ने काशी जाकर उन दस्तावेजों को देखा भी।

पहले तो इस विषय को संक्षेप में लिखना चाहता था। लेकिन बाद में लगा कि जो कार्य आचार्य किशोरीदास वाजपेयी जी के लिए ऋषि-श्राद्ध, गुरु-ऋण और यज्ञ के तुल्य था, तो क्यों न इसके लिए उनके द्वारा किए गए भगीरथ प्रयास को थोड़ा विस्तार से लिखा जाय। इसलिए इसे एक अंक के रूप में प्रस्तुत किया गया है।

अगले अंक में फिर कुछ और।

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10 टिप्‍पणियां:

  1. माहावीर प्रसाद द्विवेदी जी के प्रति असीम श्रद्धा और सम्मान का दर्शन होता है आचार्य जी में…

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  2. आचार्य जी! यह जीवन चरित बस सुनानते रहने को जी चाहता है!!

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  3. अच्छी जानकारी ज्ञानवर्धक पोस्ट , बधाई .
    आगे भी प्रेम से मिलते रहेंगें .

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  4. बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं!

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  5. बहुत ही रोचक और ज्ञानवर्धक श्रृंखला।

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  6. शुक्रिया टिप्पणी देने का तरीका बदलने के लिए। अब पाठक एक क्लिक पर टिप्पणी दे सकेंगे। ऊपर महावीर की जगह माहावीर हो गया है, भूल के लिए क्षमाप्रार्थी हूँ।

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  7. आप भी एक साहित्यिक ऋण से उरिण हुए !

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