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सोमवार, 20 अगस्त 2012

कुरुक्षेत्र .... सप्तम सर्ग .... भाग - 14 /रामधारी सिंह दिनकर


प्रस्तुत संदर्भ  जब विजय के पश्चात युधिष्ठिर सभी बंधु- बंधवों की मृत्यु से  विचलित हो कहते हैं कि यह राजकाज  छोड़ वो वन चले जाएंगे उस समय पितामह भीष्म उन्हें समझाते  हैं ---

भोगो तुम इस भांति मृत्ति को 
दाग नहीं लग पाये 
मिट्टी में  तुम नहीं , वही 
तुममें विलीन हो जाये । 

और सिखाओ भोगवाद की 
यही रीति जन - जन को 
करें विलीन देह को मन में 
नहीं देह में मन को । 

मन का होगा आधिपत्य 
जिस दिन मनुष्य के तन पर 
होगा त्याग अधिष्ठित  जिस दिन 
भोग - लिप्त  जीवन पर । 

कंचन को नर साध्य  नहीं 
साधन जिस दिन जानेगा 
जिस दिन सम्यक  रूप मनुज का 
मानव पहचानेगा । 

वल्कल - मुकुट , परे दोनों के 
छिपा एक जो नर है 
अन्तर्वासी एक पुरुष जो 
पिंडों  से ऊपर है । 

जिस दिन देख  उसे पाएगा 
मनुज ज्ञान के बल से 
रह न जाएगी  उलझ दृष्टि जब 
मुकुट और वल्कल से । 

उस दिन होगा सुप्रभात 
नर के सौभाग्य उदय का 
उस दिन होगा शंख ध्वनित 
मानव की महा विजय का । 

धर्मराज , गंतव्य देश है दूर 
न देर लगाओ 
इस पथ पर मानव समाज को 
कुछ आगे पहुंचाओ । 

सच है , मनुज बड़ा पापी है 
नर का वध करता है 
पर , भूलो मत , मानव के हित
मानव ही मरता  है । 

लोभ , द्रोह , प्रतिशोध , वैर 
नरता के विघ्न  अमित  हैं 
तप , बलिदान , त्याग के संबल 
भी न किन्तु , परिमित हैं । 

प्रेरित करो इतर प्राणी को 
निज चरित्र  के बल  से 
भरो पुण्य की किरण प्रजा में 
अपने तप निर्मल से । 

मत सोचो दिन - रात पाप में 
मनुज निरत होता है 
हाय , पाप के बाद वही तो 
पछताता  रोता है । 

यह क्रंदन, यह अश्रु मनुज की 
आशा बहुत बड़ी है 
बतलाता है यह , मनुष्यता 
अब तक नहीं मरी है । 

सत्य नहीं  पातक की ज्वाला 
में मनुष्य  का जलना 
सच है बल समेट  कर उसका 
फिर आगे को चलना । 

नहीं एक अवलंब  जगत का 
आभा पुण्य व्रती  की 
तिमिर - व्यूह  में फंसी किरण भी 
आशा है धरती की । 

फूलों पर आँसू के मोती 
और अश्रु में आशा 
मिट्टी के जीवन की छोटी 
नपी - तुली परिभाषा । 

आशा के  प्रदीप को जलाए चलो धर्मराज , 
एक दिन होगी मुक्त  भूमि  रण - भीति से । 
भावना मनुष्य की न राग  में रहेगी लिप्त , 
सेवित रहेगा  नहीं जीवन  अनीति  से । 
हार से मनुष्य की न महिमा घटेगी और , 
तेज  न बढ़ेगा किसी मानव  की जीत से । 
स्नेह - बलिदान होंगे माप नरता के एक , 
धरती मनुष्य  की बनेगी  स्वर्ग प्रीति  से । 

समाप्त 
 

सोमवार, 13 अगस्त 2012

कुरुक्षेत्र ..... सप्तम सर्ग .... भाग - 13 / रामधारी सिंह दिनकर



प्रस्तुत संदर्भ  जब विजय के पश्चात युधिष्ठिर सभी बंधु- बंधवों की मृत्यु से  विचलित हो कहते हैं कि यह राजकाज  छोड़ वो वन चले जाएंगे उस समय पितामह भीष्म उन्हें समझाते  हैं ---

इसे  चाहिए अन्न , वसन , जल ,
इसे चाहिए आशा , 
इसे चाहिए सुदृढ़ चरण , भुज 
इसे चाहिए  भाषा । 

इसे चाहिए वह झांकी ,
जिसको तुम देख चुके हो , 
इसे चाहिए वह मंज़िल 
तुम आकर जहां रुके हो । 

धर्मराज , जिसके भय से तुम 
त्याग रहे जीवन को 
उस प्रदाह में  देखो जलते 
हुये समग्र भुवन को । 

यदि सन्यास शोध है इसका 
तो मत युक्ति छिपाओ 
सब हैं विकल, सभी को अपना 
मोक्ष मंत्र सिखलाओ । 

जाओ शमित करो निज तप से 
नर के रागानल  को 
बरसाओ पीयूष , करो 
अभिसिक्त  दग्ध भूतल को । 

सिंहासन का भाग छीन कर 
दो मत निर्जन वन को 
पहचानो निज कर्म युधिष्ठिर ! 
कड़ा  करो कुछ मन को । 

क्षत - विक्षत है भरत - भूमि का 
अंग - अंग  वाणों से 
त्राहि - त्राहि का नाद निकलता 
है असंख्य प्राणों से । 

कोलाहल है महा त्रास है , 
विपद आज है भारी , 
मृत्यु - विवर से निकल चतुर्दिक 
तड़प रहे नर -नारी । 

इन्हें छोड़ वन में जा कर तुम 
कौन शांति  पाओगे ?
चेतन की सेवा तज जड़ को 
कैसे अपनाओगे ? 

पोंछो  अश्रु , उठो , द्रुत जाओ 
वन में नहीं भुवन में 
होओ  खड़े  असंख्य  नरों की 
आशा बन जीवन में । 

बुला रहा निष्काम कर्म वह , 
बुला रही है गीता 
बुला रही है तुम्हें आर्त हो 
महि समर - संभीता । 

इस विविक्त , आहत वसुधा को 
अमृत पिलाना  होगा 
अमित लता - गुल्मों में फिर से 
सुमन खिलाना होगा । 

हरना होगा  अश्रु ताप 
हृत - बंधु अनेक नरों का 
लौटाना होगा सुहास 
अगणित - विषण्ण  अधरों का । 

मरे  हुओं  पर धर्मराज ,
अधिकार न कुछ जीवन का 
ढोना  पड़ता सदा 
जीवितों को ही भार भुवन का । 

मरा सुयोधन जभी , पड़ा 
यह भार तुम्हारे पाले 
संभलेगा  यह सिवा  तुम्हारे 
किसके और संभाले ? 

मिट्टी का यह भार संभालो 
बन कर्मठ सन्यासी 
पा सकता कुछ नहीं मनुज 
बन केवल व्योम  प्रवासी । 

ऊपर सब कुछ शून्य - शून्य  है , 
कुछ भी नहीं गगन में , 
धर्मराज ! जो कुछ है , वह है 
मिट्टी में , जीवन में । 

सम्यक विधि से इसे प्राप्त कर 
नर सब कुछ पाता है 
मृत्ति - जयी  के पास स्वयं ही 
अम्बर  भी आता है । 

क्रमश:


सोमवार, 6 अगस्त 2012

कुरुक्षेत्र ... सप्तम सर्ग ...भाग - 12 / रामधारी सिंह दिनकर


प्रस्तुत संदर्भ  जब विजय के पश्चात युधिष्ठिर सभी बंधु- बंधवों की मृत्यु से  विचलित हो कहते हैं कि यह राजकाज  छोड़ वो वन चले जाएंगे उस समय पितामह भीष्म उन्हें समझाते  हैं ---


मानो , निखिल सृष्टि यह कोई 
आकस्मिक घटना  हो 
जन्म साथ उद्देश्य  मनुज का 
मानों नहीं सना हो  ॰

धर्मराज  क्या दोष हमारा 
धरती यदि नश्वर  है ? 
भेजा गया , यहाँ पर आया 
स्वयं न कोई नर है । 

निहित  न होता भाग्य  मनुज का 
यदि मिट्टी नश्वर में 
चित्र - योनि धार मनुज जनमता 
स्यात , कहीं अम्बर में - 

किरण रूप , निष्काम , रहित हो 
क्षुधा - तृषा  के रुज  से 
कर्म-बंध  से मुक्त , हीं दृग , 
श्रवण , नयन , पद , भुज से । 

किन्तु , मृत्ति है कठिन , मनुज को 
भूख  लगा करती है 
त्वच से मन तक विविध भांति 
की तृषा जागा करती है । 

यह तृष्णा , यह भूख न देती 
सोने कभी मनुज को 
मन को चिंतन -ओर , कर्म की 
ओर भेजती भुज को । 

मन का स्वर्ग मृषा वह , जिसको 
देह न पा सकती है 
इससे तो अच्छा वह , जो कुछ 
भुजा बना सकती  है । 

क्यों कि  भुजा  जो कुछ लाती 
मन भी उसको पाता  है 
नीरा ध्यान , भुज क्या ? मन को भी 
दुर्लभ  रह जाता है ।

 सफल भुजा  वह , मन को भी जो 
भरे प्रमोद लहर से 
सफल ध्यान , अंकन असाध्य 
रह जाये न जिसका कर से । 

जहां भुजा का एक पंथ हो 
अन्य पंथ चिंतन का 
सम्यक रूप  नहीं खुलता उस 
द्वंद्व -ग्रस्त जीवन का । 

केवल ज्ञानमयी  निवृत्ति से 
द्विधा  न  मिट सकती है 
जगत छोड़ देने से मन की 
तृषा  न घट  सकती है । 

बाहर  नहीं शत्रु , छिप जाये 
जिसे छोड़ नर वन में 
जाओ जहां , वहीं पाओगे 
इसे उपस्थित  मन में । 

पर जिस अरि को  यती जीतता 
जग से बाहर जा कर 
धर्मराज , तुम उसे जीत 
सकते जग को अपना कर । 

हठयोगी  जिसका वध करता 
आत्महनन  के क्रम से 
जीवित ही तुम उसे स्व-वश में 
कर सकते संयम से। 

और जिसे पा कभी न सकता 
सन्यासी वैरागी 
जग में रह कर हो सकते तुम 
उस सुख के भी भागी । 

वह सुख जो मिलता असंख्य 
मनुजों का अपना हो कर 
हंस कर उसके साथ हर्ष में 
और दुख में रो कर । 

वह , जो मिलता  भुजा पंगु की 
ओर बढ़ा देने से 
कंधों पर दुर्बल - दरिद्र का 
बोझ उठा लेने से । 

सुकृत -भूमि वन ही न ; महि यह 
देखो बहुत बड़ी है 
पग - पग  पर साहाय्य -हेतु 
दीनता विपिन्न  खड़ी है । 

सोमवार, 30 जुलाई 2012

कुरुक्षेत्र ....सप्तम सर्ग ....भाग --- 11 / रामधारी सिंह दिनकर



प्रस्तुत संदर्भ  जब विजय के पश्चात युधिष्ठिर सभी बंधु- बंधवों की मृत्यु से  विचलित हो कहते हैं कि यह राजकाज  छोड़ वो वन चले जाएंगे उस समय पितामह भीष्म उन्हें समझाते  हैं ---

सोचेगा वह सदा , निखिल 
अवनीतल ही नश्वर है , 
मिथ्या यह श्रम - भार , कुसुम ही 
होता कहाँ अमर है ? 

जग  को छोड़ खोजता फिरता 
अपनी एक अमरता , 
किन्तु , उसे भी अभी लील 
जाती अजेय नश्वरता । 

पर, निर्विघ्न सरणि  जग की 
तब भी चलती रहती है 
एक शिखा ले भार अपर का 
जलती ही रहती है । 

झर जाते हैं कुसुम जीर्ण दल 
नए फूल खिलते हैं 
रुक  जाते कुछ , दल में फिर 
कुछ नए पथिक मिलते हैं । 

अकर्मण्य  पंडित हो जाता 
अमर नहीं रोने से 
आयु न होती क्षीण किसी की 
कर्म भार ढ़ोने  से । 

इतना भेद अवश्य  युधिष्ठिर ! 
दोनों में  होता है , 
हँसता  एक मृत्ति पर , 
नभ में एक खड़ा रोता है । 

एक सजाता है धरती का 
अंचल फुल्ल कुसुम  से , 
भरता  भूतल में समृद्धि - सुषमा 
अपने भुज बल से । 

पंक झेलता हुआ भूमि का 
त्रिविध ताप को सहता 
कभी खेलता हुआ ज्योति से 
कभी तिमिर में बहता । 

गम अतल को फोड़ बहाता 
धार मृत्ति के पय  की 
रस पीता, दुंदुभि  बजाता 
मानवता की जय की । 

होता विदा जगत से , जग को 
कुछ रमणीय  बना कर , 
साथ हुआ था जहां , वहाँ से 
कुछ आगे पहुंचा कर । 

और दूसरा  कर्महीन चिंतन 
का लिए सहारा 
अंबुधि में निर्यान  खोजता 
फिरता विफल किनारा । 

कर्मनिष्ठ  नर की भिक्षा पर 
सदा पालते तन को 
अपने को निर्लिप्त , अधम 
बतलाते निखिल भुवन  को । 

कहता फिरता  सदा , जहां तक 
दृश्य  वहाँ तक छल  है 
जो अदृश्य , जो अलभ , अगोचर 
सत्य  वही केवल है । 

मानों सचमुच ही मिथ्या हो 
कर्मक्षेत्र  यह काया 
मानों ,  पुण्य - प्रताप मनुज के 
सचमुच ही हों  माया । 

मानों , कर्म छोड़ सचमुच ही 
मनुज सुधर  सकता  हो , 
मानों , वह अम्बर पर तज कर 
भूमि ठहर सकता हो । 

कलुष निहित , मानों सच ही हो 
जन्म - लाभ लेने में 
भुज से दुख  का विषम भार 
ईषल्लघु  कर देने में । 

गंध , रूप , रस , शब्द , स्पर्श 
मानों , सचमुच फाटक हों 
रसना , त्वचा , घ्राण , दृग, श्रुति 
ज्यों मित्र नहीं घातक हों । 

मुक्ति - पंथ  खुलता हो ,मानों ,
सचमुच , आत्महनन से 
मानों , सचमुच ही , जीवन हो 
सुलभ नहीं जीवन से । 


सोमवार, 23 जुलाई 2012

कुरुक्षेत्र ..... सर्ग - सप्तम .....--- भाग - 10



प्रस्तुत संदर्भ  जब विजय के पश्चात युधिष्ठिर सभी बंधु- बांधवों  की मृत्यु से  विचलित हो कहते हैं कि यह राजकाज  छोड़ वो वन चले जाएंगे उस समय पितामह भीष्म उन्हें समझाते  हैं ---


यह विरक्ति निष्कर्म बुद्धि की 
ऐसी क्षिप्र  लहर है , 
एक बार जो उड़ा , लौट 
सकता न पुन:  वह घर है । 

यह अनित्य  कह - कह कर देती 
स्वाद हीन जीवन को 
निद्रा को जागृति  बताती 
जीवन अचल मरण को ।

सत्ता कहती अनस्तित्व को 
और लाभ खोने को ,
श्रेष्ठ  कर्म कहती निष्क्रियता , 
में विलीन  होने को । 

कहती सत्य उसे केवल , 
जो कुछ गोतीत , अलभ है 
मिथ्या कहती उस गोचर को 
जिसमें कर्म सुलभ  है । 

कर्म हीनता को पनपाती 
है विलाप के बल से 
काट गिराती जीवन के 
तरु को विराग के छल से । 

सह सकती  यह नहीं कर्म संकुल 
जग के कल - कल  को 
प्रशमित करती अत: , विविध विध
नर के दीप्त  अनल को । 

हर लेती आनंद - ह्रास 
कुसूमों का यह चुम्बन  से , 
और प्रगतिमय कंपन जीवित , 
चपल तुहिन  के कण से । 

शेष न रहते सबल गीत 
इसके विहंग के उर में , 
बजती नहीं बांसुरी  इसकी 
उदद्वेलन  के सुर में । 

पौधों से कहती यह , तुम मत 
बढ़ो , वृद्धि ही दुख है , 
आत्म नाश है मुक्ति महत्तम , 
मुरझाना ही सुख है । 

सुविकच , स्वस्थ , सुरम्य - सुमन को 
मरण भीति  दिखला कर , 
करती है  रस - भंग , काल का 
भोजन उसे बता कर । 

श्री , सौंदर्य , तेज , सुख 
सबसे हीन बना  देती है , 
यह विरक्ति मानव को दुर्बल , 
दीन बना देती है । 

नहीं  मात्र उत्साह - हरण 
करती नर के प्राणों से , 
लेती छीन प्रताप भुजा से 
और दीप्त बाणों  से । 

धर्मराज , किसको न ज्ञात  है 
यह कि अनित्य  जगत है 
जनमा  कौन , काल का जो नर 
हुआ नहीं अनुगत है ?

किन्तु , रहे पल - पल  अनियता 
ही जिस नर पर छाई 
नश्वरता  को छोड़ पड़े 
कुछ और नहीं दिखलाई । 

द्विधा मूढ़ वह कर्म योग से 
कैसे कर सकता  है 
कैसे हो सन्नद्ध जगत के 
रण  में  लड़ सकता  है ? 

तिरस्कार  कर वर्तमान 
जीवन के उदद्वेलन का 
करता रहता  ध्यान अहर्निश 
जो विद्रूप मरण का । 

अकर्मण्य वह पुरुष काम , 
किसके , कब आ सकता है ?
मिट्टी पर कैसे वह कोई 
कुसुम खिला सकता है ? ,



सोमवार, 16 जुलाई 2012

कुरुक्षेत्र .... सप्तम सर्ग ... भाग - 9 / रामधारीसिंह दिनकर




प्रस्तुत संदर्भ  जब विजय के पश्चात युधिष्ठिर सभी बंधु- बांधवों  की मृत्यु से  विचलित हो कहते हैं कि यह राजकाज  छोड़ वो वन चले जाएंगे उस समय पितामह भीष्म उन्हें समझाते  हैं ---

मरुद्भित प्रति काल छिपाती 
सजग , क्षीण - बल तप को 
छाया में डूबती छोड़ कर 
जीवन के आतप को । 

कर्म - लोक से दूर पलायन 
कुंज बसा कर अपना 
निरी कल्पना में देखा 
करती अलभ्य  का सपना । 

वह सपना , जिस पर अंकित 
उंगली  का दाग नहीं है , 
वह सपना , जिसमे ज्वलंत 
जीवन की आग नहीं है । 

वह सपनों का देश कुसुम ही 
कुसुम जहां खिलते हैं , 
उड़ती कहीं न धूल , न पथ में 
कंटक ही मिलते हैं । 

कटु की नहीं , मात्र सत्ता है 
जहां मधुर , कोमल की 
लौह पिघल कर जहां रश्मि 
बन जाता विधु - मण्डल की । 

जहां मानती  हुक्म  कल्पना 
का जीवन धारा है 
होता सब कुछ वही , जो कि
मानव - मन को प्यारा है ।

उस विरक्त से पूछो  , मन से 
वह जो देख रहा है , 
उस कल्पना जनित जग का 
भू पर अस्तित्व  कहाँ है ? 

कहाँ  वीथि है वह , सेवित है 
जो केवल फूलों से 
कहाँ पंथ  वह , जिस पर छिलते 
चरण नहीं  शूलों से ?

कहाँ वाटिका वह , रहती जो 
सतत प्रफुल्ल हरी है ?
व्योम खंड  वह कहाँ , 
कर्म - रज जिसमें  नहीं भरी है ? 

वह तो भाग छिपा चिंतन में 
पीठ फेर कर रण से , 
विदा हो गए , पर , क्या इससे 
दाहक दुख भुवन  से ? 

और , कहें  , क्या स्वयं उसे 
कर्तव्य  नहीं करना है ?
नहीं कमा कर सही , भीख से 
क्या न  उदर भरना  है   ? 

कर्म भूमि है निखिल महीतल 
जब तक नर की काया 
तब तक है जीवन के अणु - अणु 
में कर्तव्य  समाया । 

क्रिया धर्म को छोड़ मनुज 
कैसे निज  सुख पाएगा ?
कर्म रहेगा साथ , भाग वह 
जहां  कहीं जाएगा । 

धर्मराज , कर्मठ मनुष्य का 
पथ सन्यास नहीं है , 
नर जिस पर चलता , वह 
मिट्टी है  , आकाश नहीं है । 

ग्रहण कर रहे जिसे आज 
तुम निर्वेदाकुल मन से 
कर्म - न्यास वह तुम्हें दूर 
ले जाएगा जीवन से । 

दीपक का निर्वाण  बड़ा कुछ 
श्रेय नहीं जीवन का , 
है सद्धर्म  दीप्त रख उसको 
हरना तिमिर भुवन का । 

भ्रमा  रही तुमको विरक्ति जो , 
वह अस्वस्थ , अबल है , 
अकर्मण्यता की छाया , वह 
निरे ज्ञान का छल है । 

बचो युधिष्ठिर , कहीं डुबो दे 
तुम्हें न  यह चिंतन में , 
निष्क्रियता का धूम भयानक 
भर न जाये जीवन में । 


सोमवार, 9 जुलाई 2012

कुरुक्षेत्र ... सप्तम सर्ग .... भाग - 8 / रामधारी सिंह दिनकर


प्रस्तुत संदर्भ  जब विजय के पश्चात युधिष्ठिर सभी बंधु- बंधवों की मृत्यु से  विचलित हो कहते हैं कि यह राजकाज  छोड़ वो वन चले जाएंगे उस समय पितामह भीष्म उन्हें समझाते  हैं ----


माना  , इच्छित शांति तुम्हारी 
तुम्हें मिलेगी वन में
चरण चिह्न पर , कौन छोड़ 
जाओगे यहाँ भुवन में ? 

स्यात  दु:ख  से तुम्हें कहीं 
निर्जन में मिले किनारा 
शरण कहाँ पाएगा पर , यह 
दह्यमान   जग  सारा ।

और कहीं आदर्श तुम्हारा 
ग्रहण कर  नर- नारी 
तो फिर जाकर बसे विपिन में 
उखाड़ सृष्टि  यह सारी । 

बसी भूमि  मरघट बन जाये 
राजभवन हो सूना 
जिससे डरता यति , उसी का 
बन बन जाये नमूना । 

त्रिविध ताप में लगें वहाँ भी 
जलने यदि पुरवासी , 
तो फिर भागे उठा कमंडलु 
बन से  भी सन्यासी । 

धर्मराज , क्या यति भागता 
कभी गेह  या वन से ? 
सदा भागता फिरता है वह 
एक मात्र जीवन से । 

वह  चाहता सदैव मधुर रस , 
नहीं तिक्त  या लोना 
वह चाहता सदैव  प्राप्ति ही 
नहीं कभी कुछ खोना । 

प्रमुदित पा कर विजय , पराजय 
देख खिन्न  होता है 
हँसता देख  विकास , ह्रास को 
देख बहुत रोता है । 

रह सकता न तटस्थ,  खीझता,
रोता , अकुलाता है  , 
कहता , क्यों जीवन उसके 
अनुरूप न बन जाता है ।

लेकिन , जीवन जुड़ा हुआ है 
सुघर एक ढांचे  में 
अलग - अलग वह ढला करे 
किसके - किसके सांचें  में ?

यह अरण्य , झुरमुट  जो काटे ,
अपनी राह बना ले , 
क्रीतदास  यह नहीं किसी का 
जो चाहे , अपना ले । 

जीवन उनका नहीं युधिष्ठिर , 
जो उससे डरते हैं 
वह उनका , जो चरण  रोप 
निर्भय  हो कर लड़ते हैं । 

यह पयोधि सबका  मुख करता 
विरत लवण - कटु  जल से 
देता सुधा उन्हें , जो मथते 
इसे मंदराचल  से । 

बिना चढ़े  फुनगी  पर जो 
चाहता सुधाफल  पाना 
पीना रस पीयूष , किन्तु 
यह मन्दर नहीं उठाना ।

खारा  कह जीवन - समुद्र को 
वही छोड़ देता है 
सुधा - सुरा - मणि - रत्न कोष से 
पीठ  फेर लेता है । 

भाग खड़ा  होता जीवन से 
स्यात  सोच यह मन में 
सुख का अक्षय कोष कहीं 
प्रक्षिप्त  पड़ा है वन में । 

जाते ही  वह जिसे प्राप्त कर 
सब कुछ पा जाएगा 
गेह नहीं छोड़ा कि देह धर 
फिर न कभी आएगा । 

जनाकीर्ण  जग से व्याकुल हो 
निकल भागना  वन में ;
धर्मराज , है घोर पराजय 
नर की  जीवन रण  में । 

यह निवृति है ग्लानि , पलायन 
का यह कुत्सित क्रम है 
नि: श्रेयस यह श्रमित , पराजित 
विजित  बुद्धि का भ्रम है । 

इसे दीखती मुक्ति रोर से , 
श्रवण मूँद  लेने में 
और दहन से परित्राण - पथ
पीठ  फेर देने में । 


सोमवार, 2 जुलाई 2012

कुरुक्षेत्र ..... सप्तम सर्ग .... भाग -7 / रामधारी सिंह दिनकर



प्रस्तुत संदर्भ  जब विजय के पश्चात युधिष्ठिर सभी बंधु- बंधवों की मृत्यु से  विचलित हो कहते हैं कि यह राजकाज  छोड़ वो वन चले जाएंगे उस समय पितामह भीष्म उन्हें समझाते  हैं ----

नृपति चाहिए जो कि  उन्हें 
पशुओं की  भांति चराए 
रखे अनय से दूर , नीति - नय 
पग -  पग  पर सिखलाये ।

नृप चाहिए नरों को , जो 
समझे उनकी नादानी 
रहे छींटता  पल - पल 
पारस्परिक  कलह पर पानी । 

नृप चाहिए , नहीं तो आपस 
में वे  खूब लड़ेंगे 
एक दूसरे के शोणित  में 
लड़ कर  डूब मरेंगे । 

राजतंत्र  द्योतक  है नर की 
मलिन निहीन  प्रकृति का 
मानवता की ग्लानि  और 
कुत्सित कलंक संस्कृति का ।

आया था यह प्रगति रोकने 
को केवल  दुर्गुण    की 
नहीं बांधने को सीमा 
उन्मुक्त पुरुष के गुण की । 

सो देखो, अब दिशा विचारों 
की भी निर्धारित है 
राज - नियम से परे कर्म क्या ,
चिंतन भी वारित है । 

कृष्ण हों कि  हों विदुर , नियोजित 
सब पर एक नियम है 
सब के मन , वच और कर्म पर 
अनुशासन का क्रम है । 

इनकी भी यदि क्रिया रही 
अनुकूल नहीं सत्ता के 
तो ये भी तृणवत नगण्य हैं 
सम्मुख  राज प्रथा के । 

जो कुछ है , उसका रक्षण ही 
ध्येय  एक शासन का ; 
नयी भूमि की ओर न बह 
सकता प्रवाह जीवन का । 

कहीं रूढ़ि - विपरीत बात 
कोई न बोल सकता है 
नया धर्म का भेद मुक्त 
हो कर न खोल सकता है । 

ग्रीवा पर दु : शील तंत्र को 
शिला भयानक धारे 
घूम रहा है मनुज जगत में 
अपना रूप बिसारे । 

अपना बस रख सका नहीं 
अविचल वह अपने मन पर , 
अत: बिताया एक खड्गधर
प्रहरी निज जीवन पर ।

और आज प्रहरी न देता 
उसे न हिलने- डुलने 
रूढ़ि बंध से परे मनुज का 
रूप निराला खुलने । 

किन्तु , स्वयं नर ने कु कृत्य  से 
संभव किया इसे है ,
आपस में लड़ - झगड़ उसी से 
आदर दिया इसे  है । 

जब तक स्वार्थ - शैल मानव के 
मन का चूर  न होगा 
तब तक नर-समाज से असिधर 
प्रहरी दूर न होगा । 

नर है विकृत अत: , नरपति 
चाहिए धर्म- ध्वज-  धारी 
राजतंत्र है हेय , इसीसे 
राज धर्म है भारी । 

धर्मराज , सन्यास खोजना 
कायरता है मन की 
है सच्चा  मनुजत्व ग्रंथियां 
सुलझाना  जीवन की । 

दुर्लभ नहीं मनुज के हित , 
निज वैयक्तिक सुख पाना 
किन्तु कठिन है कोटि - कोटि 
मनुजों को सुखी बनाना । 

एक पंथ है , छोड़ जगत को 
अपने में रम जाओ , 
खोजो  अपनी मुक्ति और 
निज को ही सुखी बनाओ । 

अपर पंथ है , औरों को भी 
निज - विवेक बल दे कर , 
पहुँचो  स्वर्ग - लोक  में जग से 
साथ बहुत को ले कर । 

जिस तप से तुम चाह रहे 
पाना केवल निज सुख को 
कर सकता है दूर वही तप 
अमित  नरों के दुख को । 

निज तप रखो चुरा निज हित ,
बोलो क्या न्याय यही है ? 
क्या समष्टि - हित मोक्ष  दान का 
उचित उपाय  यही है ? 

निज को ही देखो न युधिष्ठिर ! 
देखो निखिल भुवन को 
स्ववत शांति - सुख की ईहा में 
निरत , व्यग्र जन जन को ।