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शुक्रवार, 24 जून 2011

ग्रामीण भारत के प्रतिनिधि रचनाकार–विवेकी राय

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ग्रामीण भारत के प्रतिनिधि रचनाकार

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अब वे दिन सपने हुए हैं कि जब सुबह पहर दिन चढे तक किनारे पर बैठ निश्चिंत भाव से घरों की औरतें मोटी मोटी दातून करती और गाँव भर की बातें करती। उनसे कभी कभी हूं-टूं होते होते गरजा गरजी, गोत्रोच्चार और फिर उघटा-पुरान होने लगता। नदी तीर की राजनीति, गाँव की राजनीति। लडकियां घर के सारे बर्तन-भांडे कपार पर लादकर लातीं और रच-रचकर माँजती। उनका तेलउंस करिखा पानी में तैरता रहता। काम से अधिक कचहरी । छन भर का काम, पहर-भर में। कैसा मयगर मंगई नदी का यह छोटा तट है, जो आता है, वो इस तट से सट जाता है।
    ये लाईनें हैं श्री विवेकी राय जी के एक लेख की जो उन्होंने एक नदी मंगई के बारे में लिखी हैं।

(श्री सतीश पंचम जी के पोस्ट से साभार)

डॉ. विवेकी राय हिन्दी के वरिष्ठ साहित्यकार हैं। वे ग्रामीण भारत के प्रतिनिधि रचनाकार हैं। श्री राय उनका जन्म 19 नवम्बर सन् 1924 को भरौली (बलिया) नामक ग्राम में हुआ है। इनकी आरमिभिक शिक्षा इनके पैतृक गाँव सोनवानी (गाजीपुर) में हुई।  स्नातकोत्तर परीक्षा बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय वाराणसी से प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। सन् 1970 ई. में स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी कथा साहित्य और ग्राम जीवन विषय पर काशी विद्यापीठ, वाराणसी से आपको पी. एच. डी. की उपाधि मिली।

डॉ. विवेकी राय जी के अध्यापकीय जीवन की जो शुरूआत ‘सोनवानी’ के लोअर प्राइमरी स्कूल शुरू हुई वह हाई स्कूल नरहीं (बलिया), श्री सर्वोदय इण्टर कॉलेज खरडीहां (गाज़ीपुर) होते हुए स्नातकोत्तर महाविद्यालय, गाज़ीपुर में सन् 1988 ई. तक चली। यह अपने आप में शैक्षिक मूल्यों की प्राप्ति और प्रदेय का अनूठा उदाहरण है।

जब 7वीं कक्षा में अध्यन कर रहे थे उसी समय से डॉ.विवेकी राय जी ने लिखना शुरू किया। सन् 1945 ई. में आपकी प्रथम कहानी ‘पाकिस्तानी’ दैनिक ‘आज’ में प्रकाशित हुई। इसके बाद इनकी लेखनी हर विधा पर चलने लगी जो कभी थमनें का नाम ही नहीं ले सकी। इनका रचना कार्य कविता, कहानी, उपन्यास, निबन्ध, रेखाचित्र, संस्मरण, रिपोर्ताज, डायरी, समीक्षा, सम्पादन एवं पत्रकारिता आदि विविध विधाओं से जुड़ा रहा। अब तक इन सभी विधाओं से सम्बन्धित लगभग 60 कृतियाँ आपकी प्रकाशित हो चुकी हैं और लगभग 10 प्रकाशनाधीन हैं।

प्रकाशित कृतियाँ निम्न हैं-

काव्य संग्रह : अर्गला,राजनीगंधा, गायत्री, दीक्षा, लौटकर देखना आदि।

कहानी संग्रह : जीवन परिधि, नई कोयल, गूंगा जहाज बेटे की बिक्री, कालातीत, चित्रकूट के घाट पर, विवेकी राय की श्रेष्ठ कहानियाँ , श्रेष्ठ आंचलिक कहानियाँ, अतिथि, विवेकी राय की तेरह कहानियाँ आदि।

उपन्यास : बबूल,पूरुष पुराण, लोक ऋण, बनगंगी मुक्त है, श्वेत पत्र, सोनामाटी, समर शेष है, मंगल भवन, नमामि ग्रामम्, अमंगल हारी, देहरी के पार आदि।

फिर बैतलवा डाल पर, जुलूस रुका है, मन बोध मास्टर की डायरी, नया गाँवनाम, मेरी श्रेष्ठ व्यंग्य रचनाएँ ,जगत तपोवन सो कियो, आम रास्ता नहीं है, जावन अज्ञात की गणित है, चली फगुनाहट, बौरे आम आदि अन्य रचनाओं का प्रणयन भी डॉ. विवेकी राय ने किया है। इसके अलावा डॉ. विवेकी राय ने 5 भोजपुरी ग्रन्थों का सम्पादन भी किया है। सर्वप्रथम इन्होंने अपना लेखन कार्य कविता से शुरू किया। इसीलिए उन्हें आज भी ‘कविजी’ उपनाम से जाना जाता है।

विवेकी राय स्वभावतः गम्भीर एवं खुश-मिज़ाज़ रचनाकार हैं। बहुमुखी प्रतिभा के धनी, सीधे, सच्चे, उदार एवं कर्मठ व्यक्ति हैं। ललाट पर एक बड़ा सा तिल, सादगी, सौमनस्य, गंगा की तरह पवित्रता, ठहाका मारकर हँसना, निर्मल आचार-विचार आपकी विशेषताएँ हैं। सदा खादी के घवल वस्त्रों में दिखने वाले, अतिथियों का ठठाकर आतिथ्य सत्कार करने वाले साहित्य सृजन हेतु नवयुवकों को प्रेरित करने वाले आप भारतीय संस्कृति की साक्षात् प्रतिमूर्ति हैं।

डॉ. विवेकी राय का जीवन सादगी पूर्ण है। गम्भीरता उनका आभूषण है। दूसरों के प्रति अपार स्नेह एवं सम्मान का भाव सदा वे रखते हैं। सबसे खुलकर गम्भीर विषय की निष्पत्ति एवं चर्चा करना उनका स्वभाव है। अपने इन्हीं गुणों के कारण पहुतों के लिए वे परम पूज्य एवं आदरणीय बने हुए हैं। कुल मिलाकर वे संत प्रकृति के सज्जन हैं। विशुद्ध भोजपुरी अंचल के महान् साहित्यकार हैं।

सत्पथ पर दृढ़ निश्चय के साथ बढ़ते रहने का सतत् प्रेरणा देने वाले डॉ. विवेकी राय मूलतः गँवई सरोकार के रचनाकार हैं। बदलते समय के साथ गाँवों में होने वाले परिवर्तनों एवं  आँचलिक चेतना विवेकी राय के कथा साहित्य की एव विशेषता है। इन्होंने अपने उपन्यासों एवं कहानियों में किसानों, मज़दूरों, स्त्रियों तथा उपेक्षितों की पीड़ा को अभिव्यक्ति प्रदान की है। अपनी रचनाधार्मिता के कारण इन्हें हम प्रेमचन्द और फणीश्वर नाथ रेणु के बीच का स्थान दे सकते हैं। स्वातंत्र्योत्तर भारतीय ग्रामीण जीवन में परिलक्षित परिवर्तनों को इन्होंने अपने उपन्यासों एवं कहानियों में सशक्त ढंग से प्रस्तुत किया है। इनके कथा साहित्य में गाँव की खूबियाँ एवं अन्तर्विरोध हमें स्वष्ट रूप से दिखाई देते हैं।

उनकी सृजन यात्रा अर्धशती से आगे निकली है। जीवन के साकारात्मक पहलुओं की ओर, लोक मंगल की ओर इन्होंने अब तक विशेष ध्यान दिया है।

डॉ. विवेकी राय को अनेकों पुरस्कारों एवं मानद उपाधियों से सम्मानित किया गया है। हिन्दी संस्थान (उ.प्र.) द्वारा ‘सोनामाटी’ उपन्यास पर दिया गया प्रेमचन्द पुरस्कार , हिन्दी संस्थान लखनऊ (उ.प्र. ) द्वारा दिया गया साहित्य भूषण पुस्स्कार, बिहार सरकार द्वारा प्रदान किया गया आचार्य शिवपूजन सहाय सम्मान; ‘आचार्य शिवपूजन सहाय’ पुरस्कार मध्य प्रदेश सरकार द्वारा प्रदत्त ‘शरद चन्द जोशी ; सम्मान केन्द्रीय हिन्दी संस्थान एवं मानव संसाधन विकास मंत्रालय, नई दिल्ली के संयुक्त तत्वावधान में दिया गया ‘पंडित राहुल सांकृत्यायन’ सम्मान तथा हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग की ओर से प्रदत्त ‘साहित्य वाचस्पति’ उपाधि जैसे अनेकों सम्मान इस सन्दर्भ में उल्लेखनीय हैं। डॉ. विवेकी राय के उपन्यासों, कहानियों, ललित निबन्धों; उनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व, उनकी सम्पूर्ण साहित्य साधना पर पंजाब वि.वि, गोरखपुर विश्वविद्यालय, रुहेल खण्ड विश्वाद्यालय, पटना विश्वविद्यालय, विक्रमशिला विश्वविद्यालय, काशी विद्यापीठ, मगध विश्वविद्यालय,दिल्ली विश्वविद्यालय, मुम्बई विश्वविद्यालय, उस्मानिया विश्वविद्यालय, दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सबा मद्रास, श्री वेंकटेश्वर विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, देवी अहिल्या विश्वविद्यालय, डॉ. भीमराव अमबेडकर विश्वविद्यालय, पंडित दीन दयाल विश्वविद्यालय, शिवाजी विश्वविद्यालय, माहाराष्ट्र विश्वविद्यालय, राजस्थान विश्वविद्यालय, वीर बहादुर सिंह पर्वांचल विश्वविद्यालय,बेंगलोर विश्वविद्यालय, जेयोति बाई विश्वविद्यालय, जम्मू विश्वविद्यालय, महर्षि दयानन्द विश्वविद्यालय आदि विश्वविद्यालयों में एम, फिल,/ पी. एच. डी. के 70 शोध प्रबन्ध लिखे जा चुके हैं और कई विश्वविद्यालयों में छात्रों द्वारा इन पर शोध कार्य किया जा रहा है।

नोट : इस आलेख के लिए श्री आशीष राय ने जो योगदान दिया है, मैं उसके लिए उनका आभार प्रकट करता हूं।                                        – मनोज कुमार

शुक्रवार, 17 जून 2011

गामांचल के उपन्यास

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IMG_0877मनोज कुमार

ग्रामांचल उपन्यासों को आंचलिक उपन्यास भी कहा जाता है। जिन उपन्यासों को ग्रामांचल के उपन्यास कहा जाता है, उनमें गांव की धरती, खेत-खलिहान, नदी-नाले, डबरे, पशु-पक्षी, हल-बैल, भाषा, गीत, त्योहार आदि वहां रहने वाले लोग के साथ समवेत स्वर में वाणी पाते हैं। मतलब कि न सिर्फ़ इन उपन्यासों के पात्र बोलते हैं, बल्कि पूरा परिवेश भी बोलता है।

1954 में प्रकाशित फणिश्‍वरनाथ ‘रेणु’ का “मैला आंचल” हिन्दी साहित्य में आंचलिक उपन्यास की परंपरा को स्थापित करने का पहला सफल प्रयास है। हालाकि नागार्जुन ने रेणु से पहले लिखना शुरु किया। उनके ‘रतिनाथ की चाची’ (1949), ‘बलचनमा’, (1952), ‘नई पौध’ (1953) और ‘बाबा बटेसरनाथ’ (1954) में भी आंचलिक परिवेश का चित्रण हुआ है। इनके उपन्यासों में बिहार के दरभंगा और पुर्णिया ज़िले का राजनीतिक व सांस्कृतिक चित्रण हुआ है। उन्होंने मार्क्सवादी दृष्टिकोण से गांव की समस्याओं को चित्रित किया है।

‘मैला आंचल’ और ‘परती परिकथा’ जैसे आंचलिक उपन्यासों की रचना करने वाले फणीश्वरनाथ ‘रेणु’ ने प्रेमचंद के बाद, गांव को नये सौन्दर्यबोध और रागात्मकता के साथ चित्रित किया है। प्रेमचंद ने भी अपने उपन्यासों में गांव के निवासियों की कथाएं लिखी है। लेकिन इन्हें आंचलिक उपन्यास नहीं कहा गया।

‘रेणु’ जी का ‘मैला आंचल’ वस्तु और शिल्प दोनों स्तरों पर सबसे अलग है। इसमें एक नए शिल्प में ग्रामीण-जीवन को दिखलाया गया है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता है कि इसका नायक कोई व्यक्ति (पुरुष या महिला) नहीं है, पूरा का पूरा अंचल ही इसका नायक है। दूसरी प्रमुख बात यह है कि मिथिलांचल की पृष्ठभूमि पर रचे इस उपन्यास में उस अंचल की भाषा विशेष का अधिक से अधिक प्रयोग किया गया है। खूबी यह है कि यह प्रयोग इतना सार्थक है कि वह वहां के लोगों की इच्छा-आकांक्षा, रीति-रिवाज़, पर्व-त्यौहार, सोच-विचार, को पूरी प्रामाणिकता के साथ पाठक के सामने उपस्थित करता है।

ग्रामांचल उपन्यासों की परंपरा

वैसे देखा जाए तो 1925 में प्रकाशित शिवपूजन सहाय के ‘देहाती दुनिया’ में भोजपुरी जनपद का चित्रण बहुत ही मनभावन तरीक़े से हुआ है। हम मान सकते हैं कि आंचलिक उपन्यास परंपरा का यह पहला उपन्यास है।

1952 में प्रकाशित शिवप्रसाद रुद्र का ‘बहती गंगा’ भी इसी श्रेणी में रखा जा सकता है।

प्रसंगवश यह भी याद करते चलें कि अंग्रेज़ी लेखिका मारिया एडवर्थ (1768-1849) का आंचलिक उपन्यासकारों की श्रेणी में सबसे पहले नाम लिया जाना चाहिए, जिनकी कृति ‘कासल रैकर्न्ट’ 1800 में आई थी।

अन्य आंचलिक उपन्यास

अन्य आंचलिक उपन्यासों में उदयशंकर भट्ट का ‘सागर, लहरें और मनुष्य’ (1955) इस धारा की प्रसिद्ध कृति है। इसमें बम्बई के पश्चिमी तट पर बसे हुए बरसोवा गांव के मछुआरों की जीवनकथा का वर्णन किया गया है। शहर के सम्पर्क में जब यह गांव आता है तो गांव की एकांगिता में दरारें पड़ने लगती है। नई परिस्थितियों के कारण बदलाव आता है। गांव की नायिका पूंजीवादी यातना में जा फंसती है।

रांगेय राघव के ‘कब तक पुकारूं’ (1858) और ‘मुर्दों का टीला’, में भी ग्रामांचल का वर्णन हुआ है।

रामदरश मिश्र के ‘पानी की प्राचीर’, ‘जल टूटता हुआ’ तथा ‘सूखता हुआ तालाब’ काफ़ी प्रभावशाली उपन्यास हैं। उन्होंने उत्तर प्रदेश के कछार अंचल की दमघोंट समस्याओं, विसंगतियों, अभावों, आंतरिक संदर्भों को तीव्रता से अभिव्यक्त किया है। अधुनिकीकरण का गांव पर प्रभाव पड़ता है और इसके परिणामस्वरूप काफ़ी बदलाव आता है। गांव को वे लगातार उसके परिवर्तनशील रूप में पकड़ने की कोशिश करते रहे हैं।

शिवप्रसाद सिंह के ‘अलग अलग वैतरणी’, में आंचलिक परिवेश का चित्रण है। नये-पुराने मूल्यों, पीढ़ियों, वर्गों और जातियों का टकराहट है। हर इंसान अपनी-अपनी वैतरणी में घिर जाता है। वैतरणी को पार करने का मतलब है नरक। गांव नरक हो गए हैं, जहां अलगाव और टूटन है।

हिमांशु श्रीवास्तव के ‘लोहे के पंख’, और ‘रथ के पहिए’ भी अपने ढ़ंग के प्रभावशाली ग्रामांचलीय उपन्यास हैं।

राही मासूम रज़ा के ‘आधा गांव’, में शिया मुसलमानों की ज़िन्दगी पर प्रकाश डाला गया है। इसमें भारत विभाजन से पहले और बाद की ज़िन्दगी को उभारा गया है। ज़िन्दगी का एकाकीपन और बिखराव को ऐतिहासिक सन्दर्भ में चित्रित किया गया है।

भैरव प्रसाद गुप्त के ‘गंगा मैया’, ‘सती मैया का चौरा’ मार्क्सवादी दृष्टिकोण से लिखे गए हैं। इनमें गांवों के प्रति आशावादी दृष्टिकोण तथा स्थानीय रंग दर्शाया गया है।

ग्रामांचल को महत्व देने वाले अन्य उपन्यासकारों में विवेकी राय के बबूल, पुरुष पुराण, लोकऋण, सोना माटी, समर शेष है हिमांशु जोशी के ‘कमार की आग’, कृष्णा सोबती के ‘ज़िंदगीनामा’, ‘मितरो मरजानी’, जगदीश चंद्र के ‘कभी न छोड़े खेत’, बलवंत सिंह के ‘शत चोर और चांद’, देवेन्द्र सत्यार्थी के ‘ब्रह्मपुत्र’ (1956) और ‘दूध छाछ’, राजेन्द्र अवस्थी के ‘जंगल के फूल’, ‘जाने कितनी आंखें’, शैलेश मटियानी के ‘हौलदार’ (1960), मनहर चौहान के ‘हिरना सांवरी’, केशव प्रसाद मिर के ‘कोहवर की शर्त’, उदय राज सिंह के ‘अंधेरे के विरुद्ध’, श्रीलाल शुक्ल (रागदरबारी), हिमांशु जोशी (अरण्य), शैलेश मटियानी (कबूतरखाना, दो बूंद जल), शानी (काला जल) ), अमृतलाल नागर के ‘बूंद और समुद्र’ (1956), बलभद्र ठाकुर के ‘मुक्तावली’, और सच्चिदानंद धूमकेतु के ‘माटी की महक’ आदि में और रेणु के भी अन्य उपन्यास जैसे ‘परती परिकथा’ (1958), ’जुलूस’, ‘दीर्घतपा’, ‘कलंक मुक्ति’, व ‘पलटू बाबू रोड’ में अंचल विशेष के सजीव चित्र प्रस्तुत हुए हैं। इन उपन्यासों की रचना करके उपन्यासकारों ने भारत के विभिन्न अंचलों के जीवन-यथार्थ, आशा-आकांक्षा. संघर्ष-टूटन, राजनीतिक-सामाजिक पिछड़ेपन-जागृति आदि का चित्रण किया।