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मंगलवार, 22 जनवरी 2013

प्रेरक प्रसंग-40 :: यह गाजा-बाजा किसलिए?

प्रेरक प्रसंग-40

यह गाजा-बाजा किसलिए?

1930 के अप्रैल के महीने की बात है। गांधी जी के नेतृत्व में दाण्डी कूच (नमक सत्याग्रह) पूरा हो चुका था और अब खजूर का पेड़ काटने का सत्याग्रह चल रहा था। कराडी नामक गांव में पड़ाव था। एक छोटी सी झोपड़ी में गांधी जी रहते थे। एक दिन सुबह-सुबह गांव वालों ने बड़ा जुलूस निकाला। जुलूस में महिलाएं भी थीं। बाजे बज रहे थे। पुरुषों के हाथ में फल, फूल, पैसे थे। गांधी जी ने सोचा ये कैसा जुलूस है? ये सारे लोग क्या सत्याग्रह करने जा रहे हैं? गांधी जी झोपड़ी से बाहर निकले। तभी उनकी जय-जयकार होने लगी। उन लोगों ने गांधी जी को श्रद्धापूर्वक प्रणाम किया और अपना उपहार गांधी जी के चरणों में समर्पित कर दिया।

गांधी जी ने पूछा, “कैसे आए? यह गाजा-बाजा किसलिए?”

जुलूस के नेता ने कहा, “महात्मा जी, हमारे गांव में हमेशा पानी का अकाल रहता है। गर्मी के दिन आते ही कुएं सूख जाते हैं। पानी की बड़ी किल्लत रहती है। लेकिन यह बड़े आश्चर्य की बात है कि हमारे गांव में आपके चरण पड़ते ही सारे कुओं में पानी भर आया है। यह देख आपके प्रति हमारे हृदय भक्ति भाव से भर आए हैं।”

गांधी जी ने कठोरता और नाराजगी से कहा, “तुम लोग पागल हो। मेरे आने का और इस पानी का क्या संबंध है? ईश्वर पर मेरा अधिकार थोड़े ही है? उसके पास आपकी वाणी का जो मूल्य है, उतना ही मेरी वाणी का है।”

कुछ क्षण रुककर गांधी जी ने कहा, “यह देखो, पेड़ पर कौआ बैठने और पेड़ टूटने का संयोग हो आए तो क्या यह कहोगे कि कौए ने पेड़ तोड़ दिया? और भी कई कारण होते हैं। तुम्हारे कुएं में पानी आया, पृथ्वी के गर्भ में कुछ भी उथल-पुथल हुई होगी और नया झरना फूटा होगा। व्यर्थ में बाल-कल्पना न करो। तुम सबके सब लोग पहले सूत कातने लगो। भारत मां को कपड़ा चाहिए न?”

सारे लोग प्रणाम करके चले गए। गांधी जी खजूर का पेड़ काटने के सत्याग्रह में लग गए।

मंगलवार, 21 अगस्त 2012


‘प्रसाद’ की राष्ट्रीय चेतना का स्वरूप

मनोज कुमार

‘हिन्दुस्तान की कहानी’ में भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू ने कहा था, “राष्ट्रीयता एक गहरा और मज़बूत आदर्श है।” मैज़िनी की मानें तो शिक्षा, स्वदेशी और स्वराज्य - राष्ट्रीयता के तीन प्रधान स्तंभ हैं। जो राष्ट्र क हित है, वही व्यक्ति का हित है। स्वदेशी, स्वराज्य और राष्ट्रहित की भावना राष्ट्रीयता कहलाता है। “प्रिंसिपल्स ऑफ सोशियोलॉजी” में ई.ए. रॉस ने कहा है, “किसी भी राष्ट्र के चरित्र में अधःपतन के सबसे प्रबल कारणों में से एक कारण उस राष्ट्र का किसी विदेशी शासन के अधीन हो जाना है। राष्ट्रीयता की चेतना जगाने के लिए विभिन्न विद्वानों-चिंतकों ने समय-समय पर अपना-अपना योगदान दिया है। प्रसाद जी ने भी अपनी रचनाओं में अपने युग की राष्ट्रीय भावनाओं को प्रतिबिम्बित किया है।

‘प्रेम पथिक’ (1910) से ‘कामायनी’ (1936) तक प्रसाद जी के रचनाकाल के अध्ययन से हम पाते हैं कि उनमें राष्ट्रीय चेतना और आधुनिक भावबोध कूट-कूट कर भरे हुए थे।
“बात कुछ छिपी हुई है गहरी,
मधुर है स्रोत, मधुर है लहरी।”

उपर्युक्त पंक्तियां ‘छायावाद’ के स्वरूप को रेखांकित करती हैं। प्रसाद जी को छायावाद का प्रवर्तक कहा जाता है। छायावाद को नवजागरण की अभिव्यक्ति कहा जाता है। इस नवजागरण के पीछे राष्ट्रीय सांस्कृतिक चेतना सक्रिय थी। छायावाद का मूल उत्स भारतीय स्वाधीनता संघर्ष में है। जब लोगों में दासता के ख़िलाफ़ संघर्ष के भाव मुखरित हुए, तो उनमें स्वाधीनता की चेतना जगी। इसी चेतना का परिणाम है – कल्पना पर अधिक बल। ध्यान करने वाली बात यह है कि हिंदी कविता में छायावाद और भारतीय राजनीतिक मंच पर महात्मा गांधी का आगमन लगभग एक साथ हुआ। तभी तो डॉ. नगेन्द्र कहते हैं, “जिन परिस्थितियों ने हमारे दर्शन और कर्म को अहिंसा की ओर प्रेरित किया, उन्होंने ही भाव-वृत्ति को छायावाद की ओर।”

प्रसाद जी के काव्य में हमें नवीन भावबोध के साथ स्वाधीनता की चेतना, सूक्ष्म कल्पना, लाक्षणिकता, नए प्रकार का सादृश्य-विधान, नया सौंदर्य बोध आदि के दर्शन होते हैं। छायावादी काव्य में राष्ट्रीय जागरण, सांस्कृतिक जागरण के रूप में आता है। नन्ददुलारे वाजपेयी ने आधुनिक साहित्य में कहा है, “केवल राष्ट्रीयता की भावना देश और समाज के सांस्कृतिक जीवन के बहुमुखी पहलुओं का स्पर्श नहीं करती और एक बड़ी सीमा तक एकांगी बनी रहती है। … नवयुग के कवियों ने इस तथ्य को समझ लिया था और इसीलिए उनकी रचनाएं ‘राष्ट्रीय’ न रहकर अधिक राष्ट्रीय और सांस्कृतिक भूमियों पर पहुंची थीं।”

प्रसाद जी की रचनाओं में कहीं भी भाव-स्थूलता का वर्णन नहीं है। इनमें अनुभूति का सूक्ष्म वर्णन है। वे स्वच्छंदतावादी भी थे। हालांकि कुछ आलोचकों ने, जब उन्होंने “ले चल मुझे भुलावा देकर, मेरे नाविक धीरे-धीरे” लिखा था, पलायनवादी होने का आरोप लगाया। किंतु हमें इस बात का ध्यान रखना होगा कि प्रसाद जी की राष्ट्रीय चेतना और ‘द्विवेदी कालीन’ कवियों,  मैथिलीशरण गुप्त, सुभद्रा कुमारी चौहान, माखनलाल चतुर्वेदी, की चेतना में अंतर है। उनकी राष्ट्रीय चेतना बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ के ‘विप्लव गान’ और ‘निराला’ के ‘जागो फिर एक बार’ से भी भिन्न है। इनमें राष्ट्रीयता का स्वरूप स्थूल हैं, इनमें उद्बोधन है, विदेशी सत्ता से मुक्त होने का आह्वान है।

प्रसाद जी की राष्ट्रीय चेतना का स्वर प्रच्छन्न है, कोमल है, सौम्य है, सूक्ष्म है। यह सीमित अर्थ में राष्ट्रवाद नहीं है। यहां राष्ट्रीय जागरण ने सांस्कृतिक जागरण का रूप धारण कर लिया है। इस सांस्कृतिक जागरण की अभिव्यक्ति ‘प्रथम प्रभात’, ‘अब जागो जीवन के प्रभात’, ‘बीती विभावरी जाग री’ आदि रचनाओं के अध्ययन से स्पष्ट हो जाती है। प्रसाद जी की राष्ट्रीय चेतना की अभिव्यक्ति शैली अभिधात्मक नहीं है, बल्कि यह अप्रत्यक्ष है, व्यंजना पर आधारित है यह स्वच्छन्दतावाद की मूल चेतना से अभिन्न है
अब जागो जीवन के प्रभात।
वसुधा पर ओस बने बिखरे
हिमकन आंसू जो क्षोभ भरे
ऊषा बटोरती अरुण गात।

जहां प्रसाद जी सूक्ष्म, सास्कृतिक और सौम्य हैं वहीं द्विवेदी युगीन काव्य स्थूल है। भाषा की विलक्षणता पर ज़ोर देकर, आंतरिकता के स्पर्श और आधुनिक बोध और बदली हुई काव्य दृष्टि द्वारा वे मनुष्यों की मुक्ति को महत्त्व दे रहे थे। बंधनों से छुटकारा पाने को बल दे रहे थे। एक प्रकार से यह स्वाधीनता की चेतना के विकास का काम था। नया सौंदर्य बोध, नयी संबंध भावना के विकास का काम था। भारतेदु युग में राष्ट्रीय आदर्शवाद अस्पष्ट और अमूर्त रूप में था। द्विवेदी युग में इतिवृत्तात्मकता और विवरेणात्मकता प्रमुख हो गई, जो स्थूल कथन पर आश्रित थी। प्रसाद जी के समय और उनके द्वारा राष्ट्रीय चेतना अधिक गहरी है, प्रौढ़ है, परिपक्व है। उन्होंने परतंत्र देशवासियों में नवजागरण का शंख फूंका। ‘लहर’ में संकलित लम्बी कविता ‘अशोक की चिंता’, ‘शेरसिंह का शस्त्र समर्पण’, ‘पेशोला की प्रतिध्वनि’, तथा ‘प्रलय की छाया’ में नवजागरण के संकेत हैं। ये रचनाएं 1930 के आस-पास लिखी हईं। प्रसिद्ध आलोचक नामवर सिंह ने कहा कि यह 1930 के में भारत में राजनैतिक पराभव या पराजय की भावना की अभिव्यक्ति है। ‘प्रलय की छाया’ का राजनीतिक अर्थ स्वाधीनता संग्राम के एक विशेष दौर की मनोदशा से संबद्ध है। नामवर सिंह व्याख्या के क्रम में संकेत करते हैं कि कमलावती राजशक्ति को नष्ट करने की कोशिश में स्वयं नष्ट हुईं। इससे उसकी आत्मप्रवंचना के निहितार्थों का अनुमान किया जा सकता है। प्रसाद जी इस पराजय की भावना से देश-प्रेम का संदेश देते हैं।

इसी प्रकार ‘अशोक की चिंता’ और ‘अरी ओ करुणा की शांत कछार’ में भी राष्ट्र के प्रति गर्व गौरव की भावना अंकित किया गया है। कवि अशोक के नरसंहार के बाद हृदय परिवर्तन और बौद्ध-धर्म ग्रहण के माध्यम से यह बताना चाहता है कि राजा/शासक का धर्म है जनता की सेवा करना। कवि शांति का संदेश देते हुए कहता है कि विजय लोहे की नहीं होती, विजय आत्मा की होती है। और वह प्रेम, शांति और मानवता से ही संभव है। कवि राष्ट्रीय एकता का भी संदेश इस कविता के माध्यम से देता है।

‘पेशोला की प्रतिध्वनि’ में  महाराणा प्रताप को अस्ताचल के सूर्य के रूप में बताया गया है। वह निर्धन है, ज्वलंतहीन है। पर इसके द्वारा एक तरह से जागृति का संदेश है हम पराजित होकर भी जीवित हैं। इसके द्वारा यह भी बताया गया है कि जिसे जीतना चाहिए था, वह हारा है। ‘अरी ओ करुणा के कछार’ सारनाथ के पास यमुना का वर्णन है। भगवान बुद्ध के अहिंसा, शांति, करुणा के संदेश को याद करता हुआ कवि कहता है
छोड़ कर जीवन के अतिभाव, मध्य पथ से लो सुगति सुधार।
दुख का समुदय उसका नाश, तुम्हारे कर्मों का व्यापार।
विश्व मानवता का जयघोष, यहीं पर हुआ जलद-स्वर-मंद।
मिला था यह पावन आदेश, आज भी साक्षी है रवि-चन्द्र।

प्रसाद जी में संकुचित राष्ट्रीयता नहीं है। यह देश की सीमा से बंधा हुआ नहीं है। यह विश्व-राष्ट्रीयता है इसमें विश्व-मंगल की कामना है।
‘बीती विभावरी जाग री!
...    ...    ...    ...
तू अब तक सोई है आली
आंखों में भरे विहाग री!”

इन पंक्तियों के द्वारा प्रसाद जी राष्ट्र को जागरण का संदेश देते हैं। नन्ददुलारे वाजपेयी का कहना है, “बीती विभावरी जाग री” शीर्षक जागरण गीत प्रसाद जी के संपूर्ण काव्य-प्रयास के साथ उनकी युग-चेतना का परिचायक प्रतिनिधि गीत कहा जा सकता है।” राष्ट्रीय चेतना का स्थूल रूप उनके नाटकों के गीतों, ‘अरुण यह मधुमय देश हमारा’ और ‘हिमाद्रि तुंग श्रृंग से’ में मिलता है। नाटकों के माध्यम से उन्होंने राष्ट्रीय चेतना का प्रसार किया। और जब वे कहते हैं
“इस पथ का उद्देश्य नहीं है श्रांत भवन में टिक रहना,
किंतु पहुंचना उस सीमा पर जिसके आगे राह नहीं।”

तो वे समग्र विश्व तक राष्ट्रीय चेतना का प्रसार करते प्रतीत होते हैं। इसका क्लासिक उदाहरण है ‘कामायनी’।

‘कामायनी’ संकुचित राष्ट्रवाद से ऊपर उठकर विश्वमंगल वाली रचना है। वह संपूर्ण मानवजाति की समरूपता का सिद्धांत अपनाकर आनंद लोक की यात्रा का संदेश देती है
समरस थे जड़ और चेतन
सुंदर आकार बना था
चेतना एक विलसती
आनंद अखंड घना था।
या
‘विश्व भर सौरभ से भर जाए
सुमन के खेलों सुंदर खेल।’

‘कामायनी’ आधुनिक जीवन-बोध का महाकाव्य है। इसमें संघर्ष करना सिखाया गया है। कर्म करना सिखाया गया है। विश्व-मंगल इसका मूल प्रयोजन है। उसकी मूल संकल्पना संकुचित राष्ट्रवाद के विरुद्ध है। मुक्तिबोध इड़ा को पूंजीवादी सभ्यता की उन्नायिका कहते हैं। इसमें संदेह नहीं कि श्रद्धा, जो रागात्मक वृत्ति का प्रतीक है, का आदर्शीकरण प्रसाद जी करते हैं। श्रद्धा मनु को जीवन में वापस लाती है। कर्म-क्षेत्र में आने से आनंद की प्राप्ति होती है। फिर भी इड़ा का जो व्यक्तित्व विधान है उसमें नई युग चेतना के सभी सकारात्मक तत्त्व वर्तमान हैं
‘बिखरी अलकें ज्यों तर्क-जाल।
गुंजरित मधुप-सा मुकुल सदृश
वह आनन जिसमें भरा गान
वक्षस्थल पर एकत्र धरे
संसृति के सब विज्ञान-ज्ञान
था एक हाथ में कर्म-कलश
वसुधा-जीवन रस सार लिए
दूसरा विचारों के नभ को
था मधुर अभय अवलंब लिए।’

प्रसाद जी की व्यापक राष्ट्रीय सांस्कृतिक चेतना का विश्वमंगल से विरोध न था। वे उत्पीड़न के विरोध में थे द्वंद्वों से क्षुब्ध थे विषमता रहित समाज की स्थापना चाहते थे। ‘कामायनी’ की मिथकीय सीमाओं में भी कर्म चेतना, संघर्ष चेतना, एकता जैसे तत्त्व हैं, जिनका महत्त्व राष्ट्रीय आंदोलन के लिए था।

‘चित्राधार’ में तो वे यहां तक कहने का साहस कर गए कि उस ब्रह्म को लेकर मैं क्या करूंगा जो साधारण जन की पीड़ा नहीं हारता। ‘आंसू’ में भी विश्वमंगल की भावना की अभिव्यक्ति हुई है।
‘सबका निचोड़ लेकर तुम
सुख से सूखे जीवन में
बरसो प्रभात हिमकन-सा
आंसू इस विश्व-सदन में।’

हालांकि घनीभूत पीड़ा आंसू में अभिव्यक्ति पाती है, लेकिन यहां महत्त्वपूर्ण यह है कि व्यक्तिगत वेदना कैसे व्यापक कल्याण भावना में बदलने लगती है।
‘चिरदग्ध दुखी यह वसुधा
आलोक मांगती तब भी।’

यही अनुभव कवि को विश्व भावना तक ले जाता है।

सारांशतः हम यह कह सकते हैं कि प्रसाद जी का काव्य राष्ट्रीय काव्य, सांस्कृतिक जागरण का काव्य हैं। ये स्वाधीन चेतना के बल पर नई मानव परिकल्पना में सक्षम हैं। वह नई संबंध भावना का संकेत हैं। यहां राष्ट्रीयता का भाव संकुचित नहीं है, बल्कि विश्वमंगल हेतु है।
‘शक्तिशाली हो, विजयी बनो
विश्व में गूंज रहा यह गान।’
***

रविवार, 3 जून 2012

सफाई ईश्वर का रूप है


प्रेरक प्रसंग-38
सफाई ईश्वर का रूप है


गांधी जी सफाई पसंद व्यक्ति थे। उनका मानना था कि सफाई ईश्वर का रूप है। वे घर में तो सफाई रखते ही थे, सार्वजनिक सफाई का भी उन्हें काफ़ी ख़्याल रहता था। वे तो अंदर और बाहर दोनों निर्मल रखते थे, रखना चाहते थे।

बात उन दिनों की है जब गांधी जी यरवदा जेल में थे। जेल के अधिकारियों से उन्होंने अपने लिए एक खास काम मांग रखा था। वे कपड़े सीते थे। कर्मयोगी तो वे थे ही, लगन और निष्ठा से अपना यह काम भी किया करते थे।

एक दिन जेल का एक प्रमुख अधिकारी उनसे मिलने आया। गांधी जी जहां बैठकर सूत कातते थे, वहां तक वह अधिकारी जूते पहन लर चला आया। उसने गांधी जी से हाल-चाल पूछा। गांधी जी ने प्रसन्नता से उत्तर दिया। कुछ देर रुक कर वह अधिकारी चला गया।

उस अधिकारी के जाते ही, गांधी जी उठकर कमरे से बाहर गए और एक बाल्टी पानी भरकर ले आए। जेल का वह अधिकारी जहां तक जूते पहने हुए गया था, वहां तक उन्होंने फ़र्श को धोया, लिपाई की, साफ कर दिया। एक सहयोगी की नज़र इस पर पड़ी, तो उसने पूछा, “बापू! यह आप क्या कर रहे हैं?”

गांधी जी ने कहा, “यह मेरे उठने-बैठने का स्थान है। क्या उसे साफ न रखूं?”

उस सहयोगी ने पूछा, “किसने गंदा कर दिया?”

गांधी जी ने कहा, “जेल के अधिकारी आए थे। बात करते-करते वे यहां तक आए। उन्होंने जूते पहन रखे थे। इसलिए इसे साफ कर रहा हूं।”

सहयोगी ने सुझाव दिया, “आपको उन्हें मना कर देना चाहिए था। आपने उनसे कहा क्यों नहीं? आप दरवाज़े के पास एक तख़्ती लगा दीजिए कि जूते बाहर उतारकर आएं।”

गांधी जी ने कहा, “नहीं, यह तो हर एक के समझने की बात है। जाने दो। बहुत दिनों के बाद आज लिपाई की। ऐसा अवसर मुझे कौन देगा? जेल के अधिकारी के प्रति मुझे आभार मानना चाहिए कि उन्होंने मुझे ऐसे सत्कार्य का अवसर दिया, मेरे हाथ से सफाई की सेवा हुई।”

यह कहकर गांधी जी हंसते-हंसते अपना हाथ धोने लगे।
***

शनिवार, 2 जून 2012

पुस्तक परिचय-31 : सुहाग के नूपुर


पुस्तक परिचय-31 : सुहाग के नूपुर

मनोज कुमार

प्रेमचन्दोतर उपन्यासकारों में अमृतलाल नागर का विशिष्ट स्थान हैं। उन्होने ऐतिहासिक और सामाजिक दोनो प्रकार के उपन्यास लिखे हैं। जहां एक ओर वे "शतरंज के मोहरे" में अवध प्रदेश के नवाबों का पतनोन्मुख जीवन अंकित करते हैं वहीं दूसरी ओर "सुहाग के नुपूर" के द्वारा तमिल के प्राचीन काव्य "शिलप्पदिकारम" की कथावस्तु पर दक्षिण भारत के ऐतिहासिक जीवन का विस्तृत और विश्वसनीय चित्रण प्रस्तुत करते हैं। आज हम आपका परिचय इसी उपन्यास से कराने जा रहे हैं जिसके कथानक और पात्रों  के चरित्र द्वारा नागर जी ने विवाह और प्रेम की समस्या का चित्रण बहुत ही प्रामाणिकता के साथ किया है।

अमृतलाल नागर ने कई महत्वपूर्ण उपन्यास स्वतंत्रता के बाद वाले दौर में लिखे। उन्होंने अपने उपन्यासों में व्यक्ति और समाज के सापेक्षिक संबंध को चित्रित किया है। ‘नवाबी मसनद’, ‘सेठ बांके मल’, ‘महाकाल’, ‘बूंद और समुद्र’, ‘सुहाग के नूपुर’, ‘शंतरंज के मोहरे’, अमृत और विष’, ‘एकदा नैमिषारण्ये’, ‘बिखरे तिनके’, ‘नाच्यौ बहुत गोपाल’, ‘मानस के हंस’, ‘खंजन नयन’, और ‘करवट’ जैसे उनके प्रसिद्ध उपन्यास इसी काल में प्रकाशित हुए। नागर जी के उपन्यास जैसे "बूँद और समुद्र", "अमृत और विष", "नाच्यौ बहुत गोपाल", आदि में सामाजिक जीवन का चित्रण हैं। "बूँद और समुद्र" में व्यक्ति और समाज के सामंजस्य पर बल दिया गया है बूँद के रूप में व्यक्ति और समुद्र के रूप में समष्टि का प्रतीकात्मक संकेत है। "मानस के हंस" और "खंजन नयन" में तुलसी और सुर के जीवन का मार्मिक और मौलिक कल्पनात्मक रोचक चित्रण है।

नागर जी की ख्याति उपन्यासों के कारण अधिक हुई हैं, किंतु इनकी कई कहानियाँ भी लोकप्रिय हुई हैं। आज के जीवन के आर्थिक सकट, विपन्नता, परिवारिक संबधों का तनाव आदि इनकी कहानियों का मुख्य विषय हैं। "दो आस्थाएँ", "ग़रीब की हाय", "निर्धन" , "कयामत का दिन", "गोरखधंधा" आदि उल्लेखनीय हैं।
   
इस तरह प्रख्यात कथा-शिल्पी अमृतलाल नागर जी ने हिन्दी साहित्य के प्रत्येक क्षेत्र में अपनी लेखनी चलाई है। व्यंग्य और संस्मरण साहित्य में भी उनका विशिष्ट योगदान है। “सुहाग के नूपुर” उनका विशिष्ट उपन्यास है। यह कथ्य और कला दोनों की दृष्टि से बेहतरीन रचना है। इसके कथानक की प्रेरणा नागर जी को पहली शताब्दी के तमिल कवि इलंगो के अमर काव्य-कृति "शिलप्पदिकारम" से मिली है। लेकिन इस उपन्यास को नागर जी की सृजन-प्रतिभा ने अद्भुत मौलिकता प्रदान की है।

उस समय के समाज और राज्य-व्यवस्था के परिवेश में वेश्या समस्या को आधार बना कर नागर जी ने इसमें  मनुष्य-समाज के व्यथित अर्धांग नारी के अनंत शोषण और पुरुष-प्रकृति की उच्छृंखलता की लोमहर्षक कहानी कही है। कथानक हालाकि प्राचीन काल की आधारभूमि पर रची और बुनी गई है, और अगर हम साहित्य के विपुल भंडार पर दृष्टिपात करें तो कह सकते हैं कि ऐसी कहानी हाज़ारों बार कही गई है, जिसमें प्रेम-त्रिकोण भी है, फिर भी उस कथानक के सहारे विवाह बनाम प्रेम की पुरानी समस्या को नए रूप में प्रस्तुत करना नागर जी की लेखनी का बेमिसाल उदाहरण है।

प्रकाशन के बाद इस उपन्यास की खूब प्रशंसा हुई, लेकिन नागर जी इसे अपनी कोई विशेष उपलब्धि नहीं मानते। उनका कहना था, “सच तो यह है कि यह उपन्यास मैंने साहित्यिक कृति की तरह नहीं उठाया था।” उनके ऐसा विचार व्यक्त करने के पीछे की घटना कुछ इस प्रकार है। “धर्मयुग” साप्ताहिक पत्रिका नागर जी का एक धारावाहिक उपन्यास छपना चाहता था। उस समय उसके संपादक सत्यकाम विद्यालंकार थे। जब उन्होंने इस आशय का आग्रह नागर जी से किया तो वे इंकार न कर पाए। नागर जी के मन में आया कि “धर्मयुग” मध्यमवर्गीय घरों का पत्र है, इसलिए इन्हें गहरे चिंतन की चीज़ मत दो। उन्होंने सोचा कि इनके लिए कोई लोकरंजन कथा लिख देता हूं।

इस तरह लोकरंजन की दृष्टि से ही “सुहाग के नूपुर” के कथानक पर नागर जी का ध्यान गया। इसकी कथा वे तमिल में पढ़ चुके थे। इसका अंग्रेज़ी अनुवाद भी सुन चुके थे। लखनऊ में उनसे भारत भूषण अग्रवाल ने रेडियो नाटक लिखने को कहा था। जब यह कथानक 1952 में सवा घंटे के रेडियो नाटक के रूप में प्रसारित हुआ तो उसे काफ़ी लोकप्रियता मिली। इस तरह “सुहाग के नुपूर” उपन्यास के रूप में छपने के पहले रेडियो नाटक के रूप में लिखा गया था। इस उपन्यास की साहित्यिक क्षमता के बारे में इसी बात से अंदाज़ लगाया जा सकता है कि इसे पढ़ने के बाद राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने “सुहाग के नूपुर” की प्रसिद्ध और प्रतिष्ठित साहित्य अकादेमी पुरस्कार के लिए सिफ़ारिश की थी।

लेखक के शब्दों में ही कहें तो “घिसी-पिटी थीम” होने के बावज़ूद भी मिली-जुली सरल भाषा में लिखा गया यह उपन्यास, जिसे साधारण हिंदी जाननेवाले पाठक पढ़ सकें, अपनी प्रामाणिकता, और मौलिकता के कारण एक अद्वितीय कृति है, जिसके अब तक बारह आवृत्ति और छह संस्करण निकल चुके हैं, और यह इसकी लोकप्रियता का अकाट्य प्रमाण है।



पुस्तक का नाम
सुहाग के नूपुर
रचनाकार
अमृतलाल नागर
 प्रकाशक
राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली
संस्करण
प्रथम संस्करण : 1960
बारहवीं आवृत्ति : 2001
छठा संस्करण : 2011
मूल्य
250
पेज
192





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1. व्योमकेश दरवेश, 2. मित्रो मरजानी, 3. धरती धन न अपना, 4. सोने का पिंजर अमेरिका और मैं, 5. अकथ कहानी प्रेम की, 6. संसद से सड़क तक, 7.मुक्तिबोध की कविताएं, 8. जूठन, 9. सूफ़ीमत और सूफ़ी-काव्य, 10. एक कहानी यह भी, 11. आधुनिक भारतीय नाट्य विमर्श, 12. स्मृतियों में रूस13. अन्या से अनन्या 14. सोनामाटी 15. मैला आंचल 16. मछली मरी हुई 17. परीक्षा-गुरू 18.गुडिया भीतर गुड़िया 19.स्मृतियों में रूस 20. अक्षरों के साये 21. कलामे रूमीपुस्तक परिचय-22 : हिन्द स्वराज : नव सभ्यता-विमर्श पुस्तक परिचय-23 : बच्चन के लोकप्रिय गीत पुस्तक परिचय-24 : विवेकानन्द 25. वह जो शेष है 26. ज़िन्दगीनामा 27. मेरे बाद 28. कब पानी में डूबा सूरज 29. मुस्लिम मन का आईना 30. आधे अधूरे

शनिवार, 26 मई 2012

पुस्तक परिचय-30 : आधे-अधूरे

पुस्तक परिचय-30

आधे-अधूरे

मनोज कुमार

मोहन राकेश की रचनाएं 1958 के बाद की हैं। वे पहले कहानी और उपन्यास लिखा करते थे। बाद में उन्होंने नाटक लिखना शुरु किया। इस विधा में उन्हें काफ़ी पसिद्धि मिली।

उनकी शिक्षा-दीक्षा लाहौर में हुई। वे साधारण परिवार के व्यक्ति थे। पिता एक वकील थे। उनका घर बदबूदार और सीलन भरा था। इस कारण से वे हमेशा बीमार रहा करते थे। उनके दीमाग पर ग़रीबी का आतंक छाया रहता था। इन सब कारणों से उनमें समाज के प्रति चिढ़ और कुढ़ की भवना घर कर गई थी।

पिता के स्वर्गवास के बाद उनका जीवन अस्त-व्यस्त हो गया। उन्होंने संस्कृत और हिन्दी में एम.ए. किया। वे स्वच्छंदतावादी व्यक्ति थे। काफ़ी घूमते रहते थे। लहौर के अलाव मुम्बई आदि की यात्रा उन्होंने की। वे अनुशासन प्रिय तो थे पर नियमों से आबद्ध नहीं थे। कुछ लोग उन्हें आवारा व्यक्तित्व का मानते हैं। उन्होंने दो-तीन शादियां की। उनके अस्त-व्यस्त ढ़ंग से जीने का ढ़ंग उनकी रचनाओं पर भी पड़ा।

आधुनिक युग की छाप है उनकी रचनाओं पर। आधुनिक युग के समाज की विशेषता का प्रभाव उनकी रचनाओं पर देखने को मिलता है। आधुनिक युग औद्योगिक युग है। साथ ही यह वैज्ञानिक युग भी है। इस युग में मानव भी औद्योगिक और वैज्ञानिक हो गया है। उत्पादन के साधन में परिवर्तन के साथ मानव के स्वभाव में भी परिवर्तन होता है। जब-जब समय का परिवर्तन होता है, समाज की संरचना में भी परिवर्तन होता है। आज संयुक्त परिवार का विघटन हो गया है। एकाकी परिवार का प्रचलन है। व्यक्ति-व्यक्ति का संबंध अलग हो गया है। परिवार के अंदर भी आपसी संबंध में भी तनाव परिलक्षित है। पति-पत्नी का संबंध, मां-बाप के साथ बच्चे के संबंध में सहयोग, विश्वास आदि की भावना भी क्षतिग्रस्त हो गई है। लोग आत्मकेन्द्रीत होते जा रहे हैं। मानव मूल्य में परिवर्तन आ गया है। स्वार्थ की बोलबाला है। आज धन ही सर्वोपरि हो गया है। आपसी सामाजिक संबंध विलीन हो गए हैं।

समाज तीन वर्गों उच्च, मध्यम और निम्न वर्ग में बंटा हुआ है। आधुनिक चिंतक मार्क्स ने मध्यम वर्ग को बुर्जुआ या सर्वहारा कहा। इस पेटी बुर्जुआ (मध्य वर्गी) की जीवनधारा अत्यंत विचित्र हो गई है। पूंजीपती या शोषक वर्ग का ध्येय है – लाभ कमाना, समाज में बिखराव लाना, समाज में एकता को नहीं लाने देना, सरकार को अपने वश में करना। निम्न वर्ग का एकमात्र उद्देश्य है किसी तरह जीवन यापन करना। मध्य वर्ग जहां एक ओर सामाजिक मान्यता में विश्वास रखता है वही उसमें बाहरी आडंबर, दिखावे की भावना भी है और वह पुराने मूल्य को नहीं स्वीकार करना चाहता है। अपने स्वजनों को अपना कहने में वह आनाकानी करता है। बाह्य आडंबर में जीना उसकी आदत बन गई है और वह धारती पर रहकर आकाश की बात करता है। व्यक्तिगत परिवार (Nucleus Family) में अविश्वास, संत्रास, हतोत्साह, खालीपन, अकेलापन आज की हक़ीक़त है। इसकी सबसे बड़ी विडंबना है – मनुष्य अपने को हमेशा अकेला पाता है। यही अकेलापन मनुष्य को बोध कराता है कि वह आधा है, अधूरा है। वह अपने को पूर्ण करने की तलाश करता है। यही बिखराव, खास कर स्त्री-पुरुष के संबंध में, मोहन राकेश के नाटकों आषाढ का एक दिन, लहरों का राज हंस, आधे-अधूरे में देखने को मिलता है।

‘आधे-अधूरे’ आधुनिक मध्यवर्गीय, शहरी परिवार की कहानी है। इस परिवार का प्रत्येक सदस्य अपने को अधूरा महसूस करता है। हर सदस्य अपने को पूर्ण करने की चेष्टा करता है। परिवार में पति-पत्नी, एक पुत्र और दो बेटियां हैं। पत्नी के चार मित्र हैं। महेन्द्रकांत बिज़नेसमैन है। उसे व्यापार में असफलता हाथ लगती है। पत्नी सावित्री पति के पास काम नहीं रहने की वजह से नौकरी करने घर से बाहर निकलती है। उसे तब पति में दायित्वबोध की कमी नज़र आती है। उसे लगता है कि वह सबसे बेकार आदमी है। वह सम्पूर्ण मनुष्य नहीं है। बाहर निकलने पर सावित्री की मुलाक़ात चार लोगों से होती है। एक है धनी व्यक्ति, वह मित्र स्वभाव का है औ सज्जन व्यक्ति है। दूसरा डिग्री धारी व्यक्ति शिवदत्त है जो सारे संसार में घूमता रहता है। वह एकनिष्ठ नहीं है। तीसरा सामाजिक व्यक्ति है, मनोज। वह सावित्री से दोस्ती तो गांठता है पर उसकी बेटी से प्रेम विवाह करता है। और चौथा व्यक्ति एक व्यापारी है। वह चालाक और घटिया किस्म का आदमी है। चालीस वर्षीय सावित्री जिसके चेहरे पर अभी भी चमक बरकरार है, अपनी ज़िन्दगी के ख़ालीपन को भरने के लिए एक सम्पूर्ण पुरुष की तलाश में रहती है। इस क्रम में वह इन पुरुषों के सम्पर्क में आती है। इनसे संबंध बनाकर भे उसे पूर्णता का अहसास नहीं होता। हर व्यक्ति अपने-अपने ढ़ंग से अपने-अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए उसका उपयोग करता है।

पहला व्यक्ति मित्र ढ़ंग का है। अपनी पत्नी से उसका पटता नहीं है। पत्नी को छोड़कर वह सावित्री के साथ संबंध बनाता है। जब बीमार होता है तो फिर सावित्री के पास से वापस पत्नी के पास चला जाता है।

मनोज मित्रता तो करता है सावित्री से पर सावित्री की बेटी को अपने प्रेमपाश में बांध कर उसके साथ भागकर शादी रचाता है। जब बेटी को अहसास होता है कि उसने जिस चाहत से मनोज को अपनाया था वह पूरी नहीं हो रही तो वह भी वापस मां के पास लौट आती है।

छोटी बच्ची मुंहफट है। मां-बाप के बीच संबंधों का तनाव बच्चों पर भी पड़ता है। बड़ी बेटी को मां से कोई सहानुभूति नहीं है। छोटी बेटी अश्लील उपन्यासों में रमी रहती है। मुंहफट तो है ही। लड़कों से संबंध बनाने को इच्छुक रहती है। बेटे में भी असंतोष की भावना घर किए हुए है। उसके मन में समाज के प्रति विद्रोह की भावना है। मां-बाप के प्रति भी विद्रोह की भावना है। तीनों संतान आधुनिक परिवेश की उपज हैं। परिवार के तनाव और माता-पिता के संबंधों के कारण उनमें ऐसी भावना घर कर गई है।

नाटक के अंत में सभी पात्र एक-एक कर घर वापस लौट आते हैं। सावित्री शिवदत्त के घर से निकल पड़ती है। शिवदत्त उसे नहीं रोकता। लौट कर वह घर चली आती है। महेन्द्रकांत भी अपने मित्र के यहां से लौट आता है। बेटी भी आ जाती है।

इस नाटक में आपस का तनाव, आना-जाना के रूप में कई प्रकार की मनोवृत्ति का अनावरण हुआ है। जैसे स्वतंत्रता की भावना को दिखया जाना। यह अंत में साबित होता है कि वे स्वतंत्र रहकर भी पारिवारिक बंधन में बंधे हैं। एक प्रकार के ख़ालीपन की भावना लोगों के जीवन के अधूरेपन को दर्शाता है। इस अधूरेपन को पूर्ण करने के लिए वे अन्य लोगों से सम्पर्क करते हैं। इसमे यह भी दिखाया गया है कि अर्थिक विपन्नता से परिवार में बिखराव आ जाता है। यह संदेश भी दिया गया है कि जब नारी मुक्ति प्राप्त करने के लिए प्रयास करती है और उसे स्वतंत्रता मिलती है तो किस प्रकार वह परिवार को भुला देती है। स्त्री-पुरुष का संबंध मर्यादित होता है। उन्मुक्त काम भावना से यह मर्यादा समाप्त हो जाती है। उसे पूर्ण करने के लिए विभिन्न प्रकार के पुरुषों से सम्पर्क साधती है। पुरुष-प्रधान समाज से नारी मुक्ति के प्रश्न को भी उठाया गया है। नारी स्वतंत्र तभी हो सकती है जब वह आर्थिक रूप से स्वतंत्र हो। इस अर्थ-संग्रह की भावना उसमें अनुशासनहीनता लाती है। मानव-मूल्य समाप्त होता है। पारिवारिक सुख-शांति समाप्त होती है। इस नाटक में बड़े प्रभावी तरीक़े से दिखाया गया है कि किस प्रकार से स्त्री-पुरुष संबंध बन और बिगड़ रहा है। अंत में यह बताया गया है कि परिवार ही वह धूरी है जो सबको बांधे है। परिवार रूपी संस्था ही एक प्रकार से जीवन को अनुशासित रखती है। आज प्रत्येक परिवार में कलह है। उच्छृंखलताएं, अनुशासनहीनता जो समाज और परिवार में दिख रही हैं उसका मुख्य कारण है समाज का उद्योगीकरण और भौतिकवादी स्वभाव। लेखक यह संकेत देता है कि हमारा जीवन किस ओर जा रहा है? यह एक प्रकार के अदिम अवस्था की ओर जा रहा है। हम लोग एक सभ्य आदिम समाज की ओर बढ़ रहे हैं। फिर भी लेखक आशावादी है। एक प्रकार की आशा है। परिवार यदि अनुशासित हो तो बिखराव से बच सकता है।

***

पुस्तक का नाम

आधे-अधूरे

रचनाकार

मोहन राकेश

प्रकाशक

राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली

संस्करण

प्रथम संस्करण : 2008

मूल्य

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पेज

119

पुराने पोस्ट के लिंक

1. व्योमकेश दरवेश, 2. मित्रो मरजानी, 3. धरती धन न अपना, 4. सोने का पिंजर अमेरिका और मैं, 5. अकथ कहानी प्रेम की, 6. संसद से सड़क तक, 7.मुक्तिबोध की कविताएं, 8. जूठन, 9. सूफ़ीमत और सूफ़ी-काव्य, 10. एक कहानी यह भी, 11. आधुनिक भारतीय नाट्य विमर्श, 12. स्मृतियों में रूस13. अन्या से अनन्या 14. सोनामाटी 15. मैला आंचल 16. मछली मरी हुई 17. परीक्षा-गुरू 18.गुडिया भीतर गुड़िया 19.स्मृतियों में रूस 20. अक्षरों के साये 21. कलामे रूमीपुस्तक परिचय-22 : हिन्द स्वराज : नव सभ्यता-विमर्श पुस्तक परिचय-23 : बच्चन के लोकप्रिय गीत पुस्तक परिचय-24 : विवेकानन्द 25. वह जो शेष है 26. ज़िन्दगीनामा 27. मेरे बाद 28. कब पानी में डूबा सूरज 29. मुस्लिम मन का आईना

रविवार, 20 मई 2012

सुमित्रानंदन पंत जी के जन्म दिन पर

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पंत

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: 20 मई 1900 को अल्मोड़ा जनपद के कौसानी नामक गांव में हुआ था। इन्हें जन्म देने के तुरंत बाद इनकी माता सरस्वती देवी परलोक सिधार गईं। लालन-पालन दादी और बुआ ने किया। उनके बचपन का नाम था गुसाई दत्त। उनके पिता गंगा दत्त चाय बागान के मैनेजर थे। दस साल की उम्र में उन्होंने अपना नाम बदल कर सुमित्रा नंदन पंत रख लिया।

clip_image003 : प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा अल्मोड़ा में हुई। 1911 से आठ वर्षों तक अल्मोड़ा के राजकीय हाई स्कूल में नवीं कक्षा तक की पढ़ाई की। 1918 में काशी आ गए। वहां क्वींस कॉलेज में पढ़ने लगे। हाई स्कूल की परीक्षा 1920 में पास की। मैट्रिक उत्तीर्ण करने के बाद वे इलाहाबाद चले गए और म्योर कॉलेज में दाखिला लिया। 1921 में महात्मा गांधी के असहयोग आन्दोलन के आह्वान पर उन्होंने कॉलेज छोड़ दिया और घर पर ही हिन्दी, संस्कृत, बँगला और अंग्रेजी का अध्ययन करने लगे।

clip_image004 :: पिता के असामयिक निधन से उनका जीवन अस्त-व्यस्त हो गया। पहले कंवर नरेश सिंह के साथ कालाकांकर में रहकर कई वर्षों तक काव्य-रचना में लीन रहे। फिर 1934 में फ़िल्म जगत के प्रसिद्ध नर्तक उदयशंकर भट्ट ने उन्हें अपने चित्र ‘कल्पना’ के गीत लिखने के लिए मद्रास आमंत्रित किया। 1938 में उन्होंने ‘रूपाभ’ नामक प्रगतिशील मासिक पत्र निकाला। कई वर्षों तक भारत के विभिन्न स्थानों का भ्रमण करते हुए 1950 में इलाहाबाद में स्थायी बस गए। उन्होंने इलाहाबाद आकाशवाणी के शुरुआती दिनों में प्रोड्यूसर और फिर हिन्दी सलाहकार के रूप में भी कार्य किया।

clip_image005 : 1961 में इन्हें भारत सरकार की ओर से ‘पद्मभूषण’ की उपाधि से सम्मानित किया गया। 1961 में ही ‘कला और बूढ़ा चांद’ पर इन्हें साहित्य अकादमी का पुरस्कार मिला। ‘चिदम्बरा’ पर 1969 में इन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मनित किया गया। भारत सरकार की हिन्दी-विरोधी नीति और अपने हिन्दी प्रेम के कारण अपना क्षोभ व्यक्त करते हुए इन्होंने ‘पद्मभूषण’ की उपाधि लौटा दी।

clip_image006 : 28 दिसम्बर 1977 को इनका निधन हो गया।

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:: काव्य रचनाएँ :: कविता-संग्रह : वीणा(1927), ग्रंथी (1919), उच्छवास(1920), पल्लव(1928), गुंजन (1932), युगांत, युगांतर, युगवाणी, ग्राम्या, स्वर्ण किरण, स्वर्णधूलि, उत्तरा, कला और बूढा चाँद, चिदंबरा, लोकायतन, सत्यकाम, मुक्तियज्ञ, तारापथ, मानसी, रजतशिखर, शिल्पी, सौवर्ण, अतिमा, वाणी, रश्मिबंध, समाधिता, किरण वीणा, गीत हंस, गंध वीथी, पतझड़, अवगुंठित, ज्योत्सना, मेघनाद वध।

:: उपन्यास :: हार (15 वर्ष की अवस्था में ही लिख डाला था)

:: निबंध संग्रह :: आधुनिक कवि

:: रेडियो रुपक :: ज्योत्सना

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पंत जी हिन्दी के छायावादी युग चार के प्रमुख स्तंभों में से एक हैं। हिंदी साहित्य के इतिहास में प्रकृति के एक मात्र माने जाने वाले सुकुमार कवि श्री सुमित्रानंदन पंत जी बचपन से ही काव्य प्रतिभा के धनी थे और 16 वर्ष की उम्र में अपनी पहली कविता रची “गिरजे का घंटा”। तब से वे निरंतर काव्य साधना में तल्लीन रहे।

कवि या कलाकार कहां से प्रेरणा ग्रहण करता है इस बारे में अपने विचार व्यक्त करते हुए पंत जी कहते हैं, “संभवतः प्रेरणा के स्रोत भीतर न होकर अधिकतर बाहर ही रहते हैं।” अपनी काव्य यात्रा में पन्त जी सदैव सौन्दर्य को खोजते नजर आते हें। शब्द, शिल्प, भाव और भाषा के द्वारा कवि पंत प्रकृति और प्रेम के उपादानों से एक अत्यंत सूक्ष्य और हृदयकारी सौन्दर्य की सृष्टि करते हैं, किंतु उनके शब्द केवल प्रकृति-वर्णन के अंग न होकर एक दूसरे अर्थ की गहरी व्यंजना से संयोजित हैं। उनकी रचनाओं में छायावाद एवं रहस्यवाद का समावेश भी है। साथ ही शेली, कीट्स, टेनिसन आदि अंग्रेजी कवियों का प्रभाव भी है।

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‘उच्छ्वास’ से लेकर ‘गुंजन’ तक की कविता का सम्पूर्ण भावपट कवि की सौन्दर्य-चेतना का काल है। सौन्दर्य-सृष्टि के उनके प्रयत्न के मुख्य उपादान हैं – प्रकृति, प्रेम और आत्म-उद्बोधन। अल्मोड़ा की प्रकृतिक सुषमा ने उन्हें बचपन से ही अपनी ओर आकृष्ट किया। ऐसा प्रतीत होता है जैसे मां की ममता से रहित उनके जीवन में मानो प्रकृति ही उनकी मां हो। उत्तर प्रदेश के अल्मोड़ा के पर्वतीय अंचल की गोद में पले बढ़े पंत जी स्वयं यह स्वीकार करते हैं कि उस मनोरम वातावरण का इनके व्यक्तित्व पर गंभीर प्रभाव पड़ा

मेरे मूक कवि को बाहर लाने का सर्वाधिक श्रेय मेरी जन्मभूमि के उस नैसर्गिक सौन्दर्य को है जिसकी गोद में पलकर मैं बड़ा हुआ जिसने छुटपन से ही मुझे अपने रूपहले एकांत में एकाग्र तन्मयता के रश्मिदोलन में झुलाया, रिझाया तथा कोमल कण्ठ वन-पखियों ने साथ बोलना कुहुकन सिखाया।

पंतजी को जन्म के उपरांत ही मातृ-वियोग सहना पड़ा।

नियति ने ही निज कुटिल कर से सुखद

गोद मेरे लाड़ की थी छीन ली,

बाल्य ही में हो गई थी लुप्त हा!

मातृ अंचल की अभय छाया मुझे।

मां की कमी उन्हें काफी सालती रही और प्रकृति माँ की गोद का सहारा मिला तो मानों वे उसके लाड़ से अपने आप को पूरी तरह सरोबार कर लेना चाहते थेः

मातृहीन, मन में एकाकी, सजल बाल्य था स्थिति से अवगत,

स्नेहांचल से रहित, आत्म स्थित, धात्री पोषित, नम्र, भाव-रत

हालाकि पंत जी ने गद्य की भी कई विधाओं पर अपनी लेखनी चलाई लेकिन मूलतः वे कविता के प्रति ही समर्पित थे। 1918 से 1920 तक की उनकी अधिकांश रचनाएं ‘वीणा’ में छपी हैं। यद्यपि अपनी आरंभिक रचनाओं ‘वीणा’ और ‘ग्रंथि’ से पंत जी ने काव्यप्रेमियों का ध्यान अपनी ओर खींचा ज़रूर पर एक छायावादी कवि के रूप में इनकी प्रतिष्ठा ‘पल्लव’ से ही मिली। ‘पल्लव’ की अधिकांश रचनाएं कॉलेज में पढने जब वे प्रयाग आए, उसी दौरान लिखी गईं। पंत जी कहते हैं, “शेली, कीट्स, टेनिसन आदि अंग्रेज़ी कवियों से बहुत-कुछ मैंने सीखा। मेरे मन में शब्द-चयन और ध्वनि-सौन्दर्य का बोध पैदा हुआ। ‘पल्लव’-काल की प्रमुख रचनाओं का आरम्भ इसके बाद ही होता है।”

प्रकृति-सौन्दर्य और प्रकृति-प्रेम की अभिव्यंजना “पल्लव” में अधिक प्रांजल तथा परिपक्व रूप में हुई है। इस संग्रह के द्वारा पंत जी प्रकृति की रमणीय वीथिका से होकर काव्य के भाव-विशद सौन्दर्य प्रासाद में प्रवेश पा सके। छायावाद के कवियों ने सृजन को मानव-मुक्ति चेतना की ओर ले जाने का काम किया। सुमित्रानंदन पंत ने रीतिवाद का विरोध करते हुए ‘पल्लव’ की भूमिका में कहा कि मुक्त जीवन-सौंदर्य की अभिव्यक्ति ही काव्य का प्रयोजन है।

पल्लव को आलोचक भी छायावाद का पूर्ण उत्कर्ष मानते हैं। डॉ. नगेन्द्र का मानना है, “‘पल्लव’ की भूमिका हिंदी में छायावाद-युग के आविर्भाव का ऐतिहासिक घोषणा-पत्र है।” भाव, भाषा, लय और अलंकरण के विविध उपकरणों का बड़ी कुशलता से इसमें समावेश किया गया है। ‘पल्लव’ में प्राकृतिक रहस्य की भावना ज्ञान की जिज्ञासा में परिणत हो गयी है। इसकी सीमाएं छायावादी अभिव्यंजना की सीमाएं हैं। इसमें पंत जी कल्पना द्वारा नवीन वास्तविकता की अनुभूति प्राप्त करने की चेष्टा कर रहे थे। इसके साथ ही इसमें मानव जीवन की अनित्य वास्तविकता के भीतर सत्य को खोजने का प्रयत्न भी है, जिसके आधार पर नवीन वास्तविकता का निर्माण किया जा सके।

कवि पंत की रचनाओं को देख कर ऐसा लगता था जैसे वे स्वयं प्रकृति स्वरूप थे। उनकी विभिन्न रचनाओं में ऐसा लगता है जैसे कवि प्रकृति से बात कर रहा हो, अनुनय कर रहा हो, प्रश्न कर रहा हो। मानों प्रकृति कविमय हो गई है और कवि प्रकृतिमय हो गया है। प्रकृति से परे सोचना उनके लिए असंभव सा थाः-

छोड़ द्रुमों की मृदु छाया, तोड़ प्रकृति से भी माया।

बाले! तेरे बाल जाल में, कैसे उलझा दूँ लोचन॥

कवि सम्राट पंत जी ने स्वयं माना कि छायावाद वाणी की नीरवता है, निस्तब्धता का उच्छ्वास है, प्रतिभा का विलास है, और अनंत का विलास है। अपनी संकुचित परिभाषा के कारण कुछ लोग पंत की रचनाओं में भी केवल पल्लव और पल्लव में भी कुछेक कविताओं को ही छायावाद के अंतर्गत स्वीकार करते हैं। मौन निमंत्रण में अज्ञात की जिज्ञासा होने के कारण रहस्यवाद है, अभिव्यक्ति की सूक्ष्मता के कारण छायावाद है और कल्पनालोक में स्वच्छंद विचरण करने के कारण स्वच्छंदतावाद भी है। पंत का रहस्य भावना ‘अज्ञात’ की लालसा के रूप में व्यक्त हुई है। पंत सीमित ज्ञान की सीमा को तोड़कर प्रकृति और जगत के प्रति जिज्ञासु की तरह देखते हैं। पंत का बालक मन हर चीज से सवाल पूछता है।

प्रथम रशमि का आना रंगिणि

तूने कैसे पहचाना

‘गुंजन’, विशेषकर ‘युगांत’ में आकर पंत की काव्य यात्रा का प्रथम चरण समाप्त हो जाता है। ‘गुंजन’-काल की रचनाओं में जीवन-विकास के सत्य पर पंत जी का विश्वास प्रतिष्ठित हो जाता है।

सुन्दर से नित सुन्दरतर, सुन्दरतर से सुन्दरतम

सुन्दर जीवन का क्रम रे, सुन्दर सुन्दर जग जीवन!

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उनकी काव्य यात्रा का दूसरा चरण ‘युगांत’, ‘युग-वाणी’ और ‘ग्राम्या’ को माना जा सकता है। इस काल तक आते-आते कवि स्थायी वास्तविकता के विजय-गीत गाने को लालायित हो उठता है और उसके लिए आवश्यक साधना को अपनाने की तैयारी करने लगता है, उसे ‘चाहिए विश्व को नव जीवन’ का अनुभव भी होने लगता है।

नवीन जीवन तथा युग-परिवर्तन की धारणा को सामाजिक रूप देने की कोशिश ‘युगान्त’ में सक्रिय रूप में सामने आई है। ‘युगान्त’ की अधिकांश कविताएं कवि की तीखी भाव चेतना के परिवर्तन का संकेत देती हैं। यह परिवर्तन वस्तुवादी चेतना के प्रति अधिक आग्रहशील दिखता है। “द्रुत झरो जगत के जीर्ण पत्र, हे स्रस्त, ध्वस्त, हे शुष्क शीर्ण” में जहां ओजपूर्ण आवेश है वहीं गा कोकिल में नवीन जीवन पल्लवों से सौन्दर्य-मंडित करने का भी आग्रह है।

गा कोकिल, बरसा पावक कण

नष्ट-भ्रष्ट हो जीर्ण पुरातन –

झरे जाति-कुल; वर्ण-पर्ण धन –

व्यक्ति-राष्ट्र-गत राग-द्वेष-रण –

झरें-मरें विस्मृत में तत्क्षण –

गा कोकिल, गा, मत कर चिन्तन -

‘ग्राम्या’ प्रगतिशील आन्दोलन के प्रभाव के अन्तर्गत लिखी हुई रचना है। इसमें मार्क्सवाद, श्रमिक-मज़दूर, किसान-जनता के प्रति इन्होंने भावभीनी सहानुभूति प्रकट की है।

जगती के जन-पथ कानन में

तुम गाओ विहग अनादि गान।

चिर-शून्य शिशिर-पीड़ित जग में,

निज अमर स्वरों से भरो प्राण।

‘ग्राम्या’ 1940 की रचना है, जब प्रगतिवाद हिन्दी साहित्य में घुटनों के बल चलना सीख रहा था। पंत जी कहते हैं, “‘ग्राम्या’ में मेरी क्रान्ति-भावना मार्क्सवादी दर्शन से प्रभावित ही नहीं होती, उसे आत्मसात्‌ कर प्रभावित करने का भी प्रयत्न करती है।”

भूतवाद उस धरा स्वर्ग के लिए मात्र सोपान,

जहां आत्म-दर्शन अनादि से समासीन अम्लान।

इन सब के साथ-साथ आदर्श तथा यथार्थ के बीच व्यवधान पंत जी के भीतर बना ही रहा। कवि के मन में आदर्श और यथार्थ की चिन्तन-धाराओं का संघर्ष तथा मंथन चलता रहा। डॉ.. नगेन्द्र ने ठीक ही कहा है,

“मार्क्सवाद में श्री सुमित्रानंदन पंत का व्यक्तित्व अपनी वास्तविक अभिव्यक्ति नहीं पा सकता।”

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शीघ्र जी फिर वे अपने परिचित पथ पर लौट आये। मार्क्सवाद का भौतिक संघर्ष और निरीश्वरवाद पंत जैसे कोमलप्राण व्यक्ति का परितोष नहीं कर सकते थे। काव्य यात्रा के तीसरे चरण की रचनाओं ‘स्वर्णकिरण’, ‘स्वर्णधूलि’, ‘युग पथ’, ‘अतिमा’, ‘उत्तरा’ में वे महर्षि अरविन्द से प्रभावित होकर आध्यात्मिक समन्वयवाद की ओर बढ़ते दिखते हैं। कवि की अनुभूति वस्तु जगत को समेटती हुई उस बौद्धिक चेतना से ऊपर उठकर एक सूक्ष्म अतिमानवीय चेतना को ग्रहण करती लगती है।

सामाजिक जीवन से कहीं महत्‌ अंतर्मन,

वृहत्‌ विश्व इतिहास, चेतना गीता किंतु चिरंतन।

इस चरण को पंत जी के चेतना-काव्य का चरण कहा जा सकता है। इसमें उन्होंने मानवता के व्यापक सांस्कृतिक समन्वय की ओर ध्यान आकृष्ट किया है।

भू रचना का भूतिपाद युग हुआ विश्व इतिहास में उदित,

सहिष्णुता सद्भाव शान्ति से हों गत संस्कृति धर्म समन्वित।

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पंत जी की कव्य यात्रा का चौथा चरण ‘कला और बूढ़ा चांद’ से लेकर ‘लोकायतन’ तक की है। इसमे उनकी चेतना मानवतावाद, खासकर विश्व मानवता की ओर प्रवृत्त हुई है। इन रचनाओं में लोक-मंगल के लिए कवि व्यक्ति और समाज के बीच सामंजस्य के महत्व को रेखांकित करता है।

हमें विश्व-संस्कृति रे, भू पर करनी आज प्रतिष्ठित,

मनुष्यत्व के नव द्रव्यों से मानस-उर कर निर्मित।

‘लोकायतन’ कविवर पंत के लोक-कल्याण संबंधी नेक इरादे का भव्य एवं कलात्मक साक्षात्कार कराता है। अरविन्द दर्शन से प्रभावित होकर पंत की चेतना इस चरण में फिर से वापस लौटकर अपने प्रथम चरण की चेतना से जुड़ जाती है। अरविन्द दर्शन के प्रभाव में आने के बाद पंत को भौतिकता और आध्यात्मिकता के समन्वय का एक ठोस आधार प्राप्त हो गया।

समग्र रूप से देखें तो पाते हैं कि कवि के चिंतन में अस्थिरता है। निराला और पंत की जीवन-दृष्टि और काव्य-चेतना की तुलना करें तो हम पाते हैं कि निराला की जीवन-दृष्टि का लगातार एक निश्चित दिशा में विकास होता है जबकि पंत का दृष्टि विकास एक दिशा में न होकर उसमें कई मोड़ आते हैं। कभी वे प्रकृति में रमे रहते हैं तो कभी मार्क्सवाद, अरविन्द दर्शन और गांधीवाद की गलियों के चक्कर लगाते हैं। ‘ग्रंथि’ से ‘पल्लव’ और ‘पल्लव’ से ‘गुंजन’, ‘ज्योत्सना’ और ‘युगांत’ में वे क्रमशः शरीर से मन और मन से आत्मा की ओर बढ़ रहे थे। बीच में ‘युगवाणी’ और ‘ग्राम्या’ में आत्म-सत्य की अपेक्षा वस्तु-सत्य पर बल देते हैं। ‘स्वर्णकिरण’, और ‘स्वर्णधूलि’ में फिर से वे आत्मा की ओर मुड़ जाते हैं।

फिर भी ‘द्रुत झरो जगत के जीर्ण पत्र’ जैसी रचनाओं द्वारा पंत जी छायावादी काव्य-धारा को सम्पन्न बनाया। वे छायावादी कविता के अनुपम शिल्पी हैं। उनकी भाषा में कोमलता और मृदुलता है। हिन्दी खड़ी बोली के परिष्कृत रूप को अधिक सजाने-संवारने में इनका योगदान उल्लेखनीय है। भाषा में नाद व्यंजना, प्रवाह, लय, उच्चारण की सहजता, श्रुति मधुरता आदि का अद्भुत सामंजस्य हुआ है। शैली ऐसी है जिसमें प्रकृति का मानवीकरण हुआ है। भावों की समुचित अभिव्यक्ति के लिए अत्यंत सहज अलंकार विधान का सृजन उन्होंने किया। नये उपमानों का चयन इनकी प्रमुख विशेषता है। उनकी कविताओं में प्राकृतिक उपमानों का सर्वथा एक नया रूप देखने को मिलता है। जैसे

पौ फटते, सीपियाँ नील से

गलित मोतियां कान्ति निखरती

या

गंध गुँथी रेशमी वायु

या

संध्या पालनों में झुला सुनहले युग प्रभात

इसी तरह उन्होंने छाया को, परहित वसना”, “भू-पतिता” “व्रज वनिता” “नियति वंचिता” “आश्रय रहिता” “पद दलिता” “द्रुपद सुता-सी कहा है। इस तरह उन्होंने भाषा को एक नया अर्थ-संस्कार दिया।

ध्वन्यार्थ व्यंजना, लाक्षणिक और प्रतीकात्मक शैली के उपयोग द्वारा उन्होंने अपनी विषय-वस्तु को अत्यंत संप्रेषणीय बनाया है। शिल्प इनका निजी है। पंत जी की भाषा शैली भावानुकूल, वातावरण के चित्रण में अत्यंत सक्षम और समुचित प्रभावोत्पादन की दृष्टि से अत्यंत सफल मानी जा सकती है।

उनका व्यक्तित्व भी आकर्षण का केंद्र बिंदु था, गौर वर्ण, सुंदर सौम्य मुखाकृति, लंबे घुंघराले बाल, उंची नाजुक कवि का प्रतीक समा शारीरिक सौष्ठव उन्हें सभी से अलग मुखरित करता था। आकर्षक और कोमल व्यक्तित्व के धनी कविवर सुमित्रा नंद पंत जिस तरह से अपने जीवन काल में सभी के लिए प्रिय थे उसी तरह से आज भी आकर्षण का केंद्र हैं। प्रकृति का परिवर्तित रूप सदा पंतजी में नित नीवन कौतूहल पैदा करता रहा। उन्होंने सबकुछ प्रकृति में और सब में प्रकृति का दर्शन किया। यही कारण है कि वे प्रकृति के सुकुमार चितेरे थे और अंत में शास्वत सत्य की जिज्ञासा उन्हें अरविंद दर्शन, स्वामी रामकृष्ण आदि के विचारों की ओर खींच ले गई। इस प्रकार उन्होंने काव्य सृजन से वे चारों पुरूषार्थ उपलब्ध किए जो काव्य का फल हैं। अंत में ‘आंसू’ की ये पंक्तियां ...

वियोगी होगा पहला कवि, आह से उपजा होगा गान।

उमड़ कर आंखों से चुपचाप बही होगी कविता अनजान।

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चींटी को देखा?
वह सरल, विरल, काली रेखा
तम के तागे सी जो हिल-डुल,
चलती लघु पद पल-पल मिल-जुल,
यह है पिपीलिका पाँति! देखो ना, किस भाँति
काम करती वह सतत, कन-कन कनके चुनती अविरत।


गाय चराती, धूप खिलाती,
बच्चों की निगरानी करती
लड़ती, अरि से तनिक न डरती,
दल के दल सेना संवारती,
घर-आँगन, जनपथ बुहारती।


चींटी है प्राणी सामाजिक,
वह श्रमजीवी, वह सुनागरिक।
देखा चींटी को?
उसके जी को?
भूरे बालों की सी कतरन,
छुपा नहीं उसका छोटापन,
वह समस्त पृथ्वी पर निर्भर
विचरण करती, श्रम में तन्मय
वह जीवन की तिनगी अक्षय।


वह भी क्या देही है, तिल-सी?
प्राणों की रिलमिल झिलमिल-सी।
दिनभर में वह मीलों चलती,
अथक कार्य से कभी न टलती।