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गुरुवार, 13 जनवरी 2011

शमशेर बहादुर सिंह – जन्म दिवस पर

शमशेर बहादुर सिंह - जन्मशती के मौके पर

IMG_0568मनोज कुमार

13 जनवरी 1911 को मुजफ्फरनगर के एलम ग्राम में जन्मे शमशेर बहादुर सिंह की आज सौंवी वर्षगांठ है। हम उनके जन्म दिन पर उनको याद करते विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। १२ मई १९९३ को उनकी मृत्यु हुई।

कुछ प्रमुख कृतियाँ

कुछ कविताएं (1959), कुछ और कविताएं (1961), चुका भी हूँ मैं नहीं (1975), इतने पास अपने (1980), उदिता: अभिव्यक्ति का संघर्ष (1980), बात बोलेगी (1981), काल तुझसे होड़ है मेरी (1988)

1977 में "चुका भी हूँ मैं नहीं " के लिये साहित्य अकादमी पुरस्कार एवं मध्यप्रदेश साहित्य परिषद के "तुलसी" पुरस्कार से सम्मानित। सन् 1987 में मध्यप्रदेश सरकार द्वारा "मैथिलीशरण गुप्त" पुरस्कार से सम्मानित।

शमशेर को आधुनिक दौर का सबसे जटिल कवि माना गया है। मतलब यह कि शमशेर की कविताओं को समझने में आलोचकों को मुश्किल होती रही है। इसका एक प्रमुख कारण तो यह है कि वे आलोचकों द्वारा बनाए गए सांचे में फिट नहीं बैठते। उन्हें समझने के लिए साहित्य-कला-जीवन के बारे में उनकी मान्यताओं को ध्यान में रखना बहुत ज़रूरी है।

यह सही है कि उनकी काव्य संवेदना सरल नहीं है। उन्होंने १९४९ में अपना पहला कविता-संग्रह ‘उदिता’ तैयार कर लिया लिया था, पर अह उस साल छप नहीं सका।  उन दिनों वे अत्यंत निजी-भाव की कविताएं लिख रहे थे। ‘उदिता’ में उन्होंने कहा भी है कि वे उस पाठक का ख़्याल रखकर लिखते हैं, जो उनकी हंसी-ख़ुशी और दुख-दर्द की आवाज़ सुनता और समझता है। उनकी आरंभिक कविताएं छायावादी और उत्तर-छायावादी काव्य संस्कारों से निर्मित हुई।

रह जाते हैं सिहर-सिहर

मृदु कलिका के विस्मित गात:

बहका फिरता मधुप अधीर,

तितली अस्थिर गति अवदात।

कोई अपने सुख-दुख भूल

सूने पथ पर राग-विहीन,

विस्मृति के बिखराता फूल

फिर आया है मूक-मलीन।

अपने ऊपर निराला और पंत के गहरे प्रभाव की चर्चा करते हुए उन्होंने यह कहा भी है कि हिन्दी की ओर उनका खिंचाव भी इन्हीं दोनों कवियों के कारण हुआ। अपने प्रिय कवि निराला को याद करते हुए शमशेर ने लिखा था-

भूल कर जब राह- जब-जब राह.. भटका मैं

तुम्हीं झलके हे महाकवि,

सघन तम की आंख बन मेरे लिए।

घने अंधेरे में शमशेर के लिए आंख बन निराला इसलिए झलके कि दोनों का जीवन साम्य लिये हुए था। एक जैसा आर्थिक और भावात्मक अभाव। बचपन में मां की मृत्यु, युवाकाल में पत्नी की मृत्यु, अनियमित रोजगार और अकेलापन। पत्नी की मृत्यु के बाद जीवन में गहरे हो गए अकेलेपन में हिन्दी कविता शमशेर से छूट-सी गई थी। ऐसे में बच्चन से उनकी मुलाक़ात हुई। बच्चन उनको इलाहाबाद ले आए। ‘निशानिमंत्रण’ की कविताओं ने उनपर प्रभाव डाला और उन्होंने ‘निशानिमंत्रण के कवि से’ कविता में कहा,

यह खंडहर की सांस

तुम जिसे भर रहे वंशी में -

है तंग घुटी-सी सुबह

लाल सफेद सिहाह!

मत गाओ यह गीत

मैं बिखर पड़ूंगा पागलपन में

ओ देर अजान मुसाफ़िर

यह हंसी मरुस्थल की है।

वे बहुत ही एकांत-प्रिय थे। उनका यह निजीपन उनकी कविताओं को एक अलग स्वर और स्वरूप प्रदान करता है। एकाकीपन उनके लिए उतनी ही ठोस हक़ीक़त था, जितनी उनके लिए मौत। उनके सम्पूर्ण काव्य में जिस गहन वेदना की अंतर्धारा प्रवहमान है वह उनकी वास्तविक जीवन-परिस्थितोयों से उत्पन्न हैं। अपने अकेलेपन को अपने युग के साथ जोड़कर एक बहुत ही जटिल एकाकीपन की रचना उन्होंने अपने लिए की थी। ‘आधी रात’ कविता में कहते हैं,

बहुत धीरे-धीरे

बजे हैं बा .. sरा s …

गिना है रुक रुक कर मैंने

बा  र  ह  बा  र

सुनो!

अब भी वैसे ही हवा में

बा  रा  बज रहे हैं …

(बादल घिरे हुए हैं दिन भर।)

एक  का  ए  क्‌

श्‍वान भूकने लगे!

गा उठा बिरहा कोई दूsर जाता पथ

पर …

नीम के सन्नाटे में एकाएक जोड़ा

ओल्लुओं का चीख उठा

प्री   ई   अ,   प्री   ई   अ, ! प्रईअ!

उन्होंने अर्थ को ज़्यादा से ज़्यादा छोड़कर कविता लिखी। इसके चलते उनकी कविताओं की दुरूहता बढती ही चली गई।

एक आदमी दो पहाड़ों को कोहनियों से ठेलता
पूरब से पच्छिम को एक कदम से नापता
बढ़ रहा है
कितनी ऊंची घासें चांद-तारों को छूने-छूने को हैं
जिनसे घुटनों को निकालता वह बढ़ रहा है
अपनी शाम को सुबह से मिलाता हुआ
फिर क्यों
दो बादलों के तार
उसे महज उलझा रहे हैं?

अशोक वाजपेयी ने ‘टूटी हुई बिखरी हुई’ की भूमिका में कहा है,

“शमशेर की कविताओं का आप किसी अन्य अभिप्राय के लिए इस्तेमाल नहीं कर सकते। वह अपने अत्यंतिक अर्थ में परम नैतिक कविता है, प्रार्थना की तरह पवित्र …।”

वाह जी वाह!

हमको बुद्धू ही निरा समझा है!

हम समझते ही नहीं जैसे कि

आपको बीमारी है :

आप घटते हैं तो घटते ही चले जाते हैं,

और बढ़ते हैं तो बस यानी कि

बढ़ते ही चले जाते हैं-

दम नहीं लेते हैं जब तक बि ल कु ल ही

गोल न हो जाएं,

बिलकुल गोल ।

वे कविओं के कवि थे। चित्रात्मकता, ऐंद्रियता, मितकथन, कविता में मौन की जगह आदि उनकी कविता की विशेषता है। वे आत्मविलोपन और आत्म-अवमूल्यन के कवि हैं। यह एक आध्यात्मिक विनय है। उन्हें सौंदर्य का कवि माना गया है। कविता लिखने के साथ वे चित्र भी बनाते थे। उनका मानना था कि कलाकार का नज़रिया सौंदर्यात्मक ही हो सकता है और कुछ नहीं, भले ही वह राजनीतिक विषय पर लिख रहा हो। कलाकार किसी जाहिरी रूप को अभिव्यक्त नहीं करता, वह उसके कलात्मक रूप को अभिव्यक्त करता है।

मोटी, धुली लॉन की दूब,

साफ़ मखमल की कालीन।

ठंडी धुली सुनहरी धूप।

हलकी मीठी चा-सा दिन,
मीठी चुस्की-सी बातें,
मुलायम बाहों-सा अपनाव।

पलकों पर हौले-हौले
तुम्हारे फूल से पाँव

मानो भूलकर पड़ते
हृदय के सपनों पर मेरे!

अकेला हूँ आओ!

‘प्रम की भावुकता’ को उन्होंने महत्त्वपूर्ण स्थान दिया। न प्रेम सीमित है, न ही उनकी भावुकता का दायरा तंग है। प्रेम की भावुकता उन्हें कमज़ोर करने की जगह इन्सानों के साथ सही रिश्ते क़ायम करने में मदद करती है।

द्रव्य नहीं कुछ मेरे पास

फिर भी मैं करता हूं प्यार

रूप नहीं कुछ मेरे पास

फिर भी मैं करता हूं प्यार

सांसारिक व्यवहार न ज्ञान

फिर भी मैं करता हूं प्यार

शक्ति न यौवन पर अभिमान

फिर भी मैं करता हूं प्यार

कुशल कलाविद् हूं न प्रवीण

फिर भी मैं करता हूं प्यार

केवल भावुक दीन मलीन

फिर भी मैं करता हूं प्यार ।

मैंने कितने किए उपाय

किन्तु न मुझ से छूटा प्रेम

सब विधि था जीवन असहाय

किन्तु न मुझ से छूटा प्रेम

सब कुछ साधा, जप, तप, मौन

किन्तु न मुझ से छूटा प्रेम

कितना घूमा देश-विदेश

किन्तु न मुझ से छूटा प्रेम

तरह-तरह के बदले वेष

किन्तु न मुझ से छूटा प्रेम ।

नम्रता और दृढता, फाकामस्ती और आत्मविश्वास से बना शमशेर का कवि-व्यक्तित्व अपनी पूरी गरिमा के साथ हमारे बीच मौजूद है। जन्मशती के मौके पर उनके इन गुणों को पहचानना, याद करना, और हो सके तो अपनाना, सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

शुक्रवार, 26 नवंबर 2010

शमशेर के काव्‍य में प्रकृति

शमशेर के काव्‍य में प्रकृति
मनोज कुमार
शमशेर बहादुर सिंह के अनुसार कलाकार जीवन के किसी जाहिरी रूप को अभिव्‍यक्‍त नहीं करता, वह उसके कलात्‍मक रूप को अभिव्‍यक्‍त करता है। उन्‍हें जहां एक ओर मनोवैज्ञानिक यर्थाथवादी कवि माना गया वहीं दूसरी ओर आत्‍मपरक कवि भी कहा गया है। इसका उचित कारण है। उनकी रचनाओं में सामाजिक विषयों का फैलाव नहीं है। जीवन के छोटे-छोटे सुख-दुख, विचार, मनःस्थितियां, उनकी कविताओं का विषय बनती है। लेकिन इन्‍हें वे उनके पूरे संदर्भों में देखकर चित्रित करते हैं।
प्रकृति के अलग-अलग रंग शमशेर पर गहरा प्रभाव डालते रहे हैं। वे प्रायः रंगों और गतियों में ही प्राकृतिक रूपों को ढलता हुआ देखते हैं।
"उदिता" की भूमिका में शमशेर लिखते हैं –
"शामों की झुरमुट में, जब पच्छिम के मैले होते हुए लाल पीले बैगनी रंग हर चीज को लपेट कर अपने गढे मिलेजुले धुंधलके में खोने से लगते हैं आपने क्‍या उस वक्त भी ध्‍यान दिया है कि कैसे हर चीज एक खामोश राग में डूबने लगती है.....?"
आसमान और रंग उनकी कविताओं में विशेष रूप से प्रस्‍तुत होते रहे हैं। “उदिता" में शाम के समय के बादलों का चित्रण ... क्‍या चित्रकारी ही है! शमशेर जिस सूक्ष्‍मता से बादल और उस के बीच से आ रही किरणों के रंगों को पहचाना है वह किसी और कवि की रचनाओं में नहीं मिलता।
बादल अक्‍टूबर के
हल्‍के रंगीन ऊदे
मद्धम मद्धम
रुकते-से आ जाते
इ त ने पास अपने।
लग रहा है मानो तटस्‍थ भाव से दृश्‍य का अंकन वो नहीं करते बल्कि उनका मन इन प्राकृतिक चित्रों में घुला मिला है। यह इस कदर है कि यह बताना कठिन है कि प्राकृतिक दृश्‍य उनके मन पर असर डाल रहे हैं या कवि का मन ही प्रकृति को अपनी कल्‍पना के रंग में निहार रहा है। रंग के साथ साथ गति का विवरण और शब्‍दों को तोड़कर गति को विलंबित कर देने से धीरे धीरे सरकते बादलों का अद्भुत चित्र मिलता है।
‌एक्‌-इक पत्ता साकत्‌
ठै रा, संध्‍या भा में
सु न ता - सा कुछ किस को
इ त ने पास अपने ।
या दों की द्वा भा एँ
बा दल के भा लों पर
चमकी-सी लय होने
धीरे-धीरे-धीरे
इ त ने पास अपने।
जैसे क्षितिज के नीचे जाते सूरज का मंद प्रकाश अचानक बादलों के ऊपर चमक उठता है, वैसे ही मन में यादें कौंध जाती है। फिर उसी प्रकाश की तरह लय भी हो जाती है।
यर्थाथ दर्शन का शमशेर का अपना नजरिया है। शमशेर की कविता पढ़ते हुए ऐसा लगता है कि शाम के धुंधलके में जब सारी चीजें गुम होने लगती है, तब कभी-कभी वक्‍त के बहते हुए धारे में एक ठहराव सा आता महसूस होता है।
शमशेर ने प्रकृति के कुछ अत्‍यंत अछूते बिंब और उनसे जुड़ी हुई अपनी खास संवेदना के चित्र हिंदी कविता को दिए हैं। जैसे इस चांद को देखिए
संवलाती ललाई में लिपटा हुआ
काफी ऊपर
तीन चौथाई खामोश गोल सादा चांद
आगे चलकर यह चांद जब कवि मन में उतर जाता है तो बिम्‍ब देखिए...
रात में ढलती हुई तमतमाई-सी
लाजभरी शाम के
अंदर
वह सफेद मुख
किसी ख्‍याल के बुखार का
चांद अपना रूप छोड़कर कवि की संवेदना में बदल जाता है। और कवि तब अपनी मनःस्‍थिति के अंदर के साथ साथ एक रेखा चित्र खींचता है ...
बादलों में दीर्घ पश्चिम का
आकाश मलिनतम।
ढके पीले पांव
जा रही रूग्णा संध्‍या।
... ... ... ...
नील आभा विश्‍व की
हो रही प्रति पल तमस।
बीमार शाम का पीलापन रात के गहरे अंधेरे में तबदील हो रहा है। पर ऐसा लगता है मानो शाम की खिड़की खुली रह गई है। जैसे शाम बीत गई है, कवि का भाव भी बीत चुका है। वह इस खुली खिड़की से झांकता है
विगत संध्‍या की
रह गई है एक खिड़की खुली।
झांकता है विगत किसका भाव।
इस खुली खिड़की के कारण कवि के मन पर छाया अंधेरा उसे पूरी तरह ग्रसित नहीं कर पाया है और वह कहता है ...
बादलों के घने नीले केश
चपलतम आभूषणों से
भरे लहरते हैं
बायु-संग सब ओर
बादल कवि को अब आभूषणों से सजे नीले लहराते देश की तरह लग रहे हैं। यानि शाम जब रात में ढलने लगी तो कवि का मन रूग्‍न नहीं है। कविता की भाव-भूमि देखिए कि आरंभ में अवसाद के कारण जो स्थिरता थी वही अब गति में बदल गया लगता है।
शमशेर की प्रकृति पर लिखी कविताओं को शमशेर के मन में पढ़ना होता है। उसकी भंगिमाएं और उसकी संवेदनाओं का संबंध तभी समझ आएगा। आधुनिक हिंदी कविता में इस तरह की अभिव्‍यक्ति और कहीं नहीं मिलती। तभी तो उन्‍हें बिम्‍बों का कवि कहा गया है।
शमशेर के लिए प्रकृति सामाजिक जटिलताओं में पलायन के बाद की शरण-स्‍थली नहीं है। वह उन्‍हें समाज की ओर लौटा ले जाती है। दरअसल प्रकृति उन पर चारों ओर से हमला करके उनकी इंद्रियों को उत्तेजित कर देती है। वह उनकी मानवीय संवेदना का विस्‍तार बन जाती है।
उड़ते पंखों की परछाइयां
हल्‍के झाड़ से धूप को समेटने की
कोशिश हो जैसे।
धूप को समेटने की कोशिश व्‍यर्थ है। यह अगर सिर्फ़ बाहर फैला हो तो समेटी भी जा सके पर –
धूप मेरे अंदर भी
इसलिए तो
कह कर कवि यह जताता है कि धूप को अलग करना कठिन है। शमशेर की प्रकृति संवेदना को अलग से पकड़ना भी उतना ही कठिन है। क्‍योंकि यह उनकी मानवीय संवेदना के अंदर धंसी है।
इस प्रकार हम देखते हैं कि प्रकृति शमशेर के काव्‍य में यथार्थवादी ढंग से अंकित नहीं होती। अभिव्‍यक्‍त प्रकृति-चित्र में उनका मन इस कदर घुला-मिला रहता है कि यह बता पाना कठिन होता है कि प्राकृतिक दृश्‍य मन पर असर डाल रहा है या कवि मन ही प्रकृति को अपने ख्‍यालों के रंग से निहार रहा है।