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मंगलवार, 15 नवंबर 2011

ग़रीबी के हज़ार चेहरे हैं , लेकिन पहचाने कौन !

ग़रीबी के हज़ार चेहरे हैं , लेकिन पहचाने कौन !

arunpicअरुण चन्द्र रॉय

दरभंगा. बिहार का एक महत्वपूर्ण शहर. रेलवे के लिहाज़ से देश के बड़े शहरो के बराबर क्योंकि बहुत राजस्व देता है. एतिहासिक शहर भी है. लेकिन इतिहास को जबतक इतिहासकार, सरकार और समाचार पत्र नहीं मिलता इतिहास मिटटी में दबा रहता है. गुमनाम रहता है. देश में बहुत कम ही ऐसे शहर होंगे जहाँ एक साथ इतने सारे शैक्षणिक संस्थान हो. दरभंगा में ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय, कामेश्वर सिंह संस्कृत विश्वविद्यालय, मेडिकल कालेज, महिला इंजीनियरिंग कालेज, इंजीनियरिंग कालेज, पोलेटेक्निक, दो दो एमबीए संस्थान के अतिरित्क्त कई और निजी संस्थान हैं. अब तो देश भर से लोग पढ़ने आते हैं. यहाँ का विश्वविद्यालय परिसर देश के किसी भी विश्वविद्यालय परिसर के समकक्ष है.

दरभंगा महाराज ने अपना किला विश्वविद्यालय को दे दिया था. यूरोपियन स्थापत्य कला का नमूना है यह परिसर. कभी घूमने की नज़र से कोई आये तो यह परिसर निराश नहीं करेगा आपको. पूरे परिसर में आम के बगीचे हैं, नारियल के बड़े बड़े वृक्ष हैं. पूरे परिसर में धूप कम ही लगेगी. पूरे परिसर में नहर  का जाल सा है, जो बिना रखरखाव के भी पानी से भरा रहता है. इन दिनों मखाने से पटे हैं ये नहर.

जय श्यामा माईदो मंदिर भी हैं इस परिसर में . एक मनोकामना मंदिर. कहते हैं इस मंदिर में मनोकामना रखने पर हनुमान जी मन की बात पूरी कर देते हैं. छोटा सा खूबसूरत मंदिर है. ना जाने कितने आई ए एस अफसर, आई पी एस, बैंक मैनेज़र आदि आदि बने हैं अपनी मेहनत और आस्था के समन्वय से. मंगलवार को अच्छी भीड़ होती हैं यहाँ. लड़कियां भी चुपके चुपके लाल धागा बाँध जाती हैं मंदिर में उगे पीपल से. दूसरा मंदिर श्यामा माई का मंदिर है. भगवती दुर्गा का मंदिर है यह. शारदीय दुर्गा पूजा एवं चैत्री दुर्गापूजा में मेला सा लगता है. छोटा सा स्टेडियम भी है इस परिसर में जहाँ दरभगा महाराज कभी पोलो खेला करते थे. यूरोपियन गेस्ट हाउस में महाराज के विदेशी मित्र रहते थे. आज इसमें विश्वविद्यालय का प्रशासनिक भवन है.

विश्वविद्यालय का मुख्य आकर्षण नरगौना पैलेस है जो कभी महारानी का निवास था. तीस बीघे में फैला यह पैलेस चारो ओर से एक सा दिखता है. चारो ओर एक जैसे प्रवेश द्वार, तालाब और आम के बगीचे थे. ठाणे में जब रेलगाड़ी कि शुरुआत हुई थी, उसके कुछ ही साल के बाद दरभंगा महाराज के इस किले को भी रेल से जोड़ा गया था और पूर्व में कलकत्ता के बाद सबसे पहले रेल दरभंगा ही पहुची थी. लेकिन रेलवे के पहुचने से गरीबी दूर हो जाये यह गारंटी नहीं है. दरभंगा और इसके आसपास का इलाका इस बात का गवाह वर्षों से है.

बिहार को पूरब से जोड़ने के रास्ते में समस्तीपुर भी एक महत्वपूर्ण जक्शन है. पहले समस्तीपुर और दरभंगा के बीच केवल पैसेंज़र गाड़िया चलती थी. लेकिन अब तीन तरह कि रेलगाड़ियाँ चलती हैं. एक पैसेंज़र. समस्तीपुर और दरभंगा के बीच इसका किराया केवल ६ रुपया है. एक है फास्ट पैसेंज़र जिसका किराया ३६ रुपया है. और एक है सुपरफास्ट. आम तौर पर दरभंगा से दिल्ली, मुंबई, बैंगलोर, पूरी आदि को जाने वाली गाड़ियाँ सुपर फास्ट श्रेणी की गाड़ियाँ है. इसका किराया १२८ रूपये है.

मैं दिल्ली से अपने गाव जा रहा था. गाड़ी सुबह नौ बजे समस्तीपुर पहुच चुकी थी. यहाँ से गाड़ी को अंतिम स्थान दरभंगा पहुचना था. गाड़ी खुलने को थी कि एक पति पत्नी मेरी सीट पर आकर बैठ गए. वे ठीक से बैठे ही थे कि टी टी ई साहब पहुच गए. शायद उन्होंने इन्हें गाड़ी में चढ़ते देखा था. टिकट मांगने पर पत्नी ने टिकट निकाल कर दे दिया. टी टी ई साहब की बांछे खिल गई. उन्होंने जोड़ लिया कि १२८ रुपया किराया में से ६ रुपया किराया घटाकर बनता है १२२ रुपया इसमें २५० रुपया जुर्माना जोड़ने से बनता है ३७२ रुपया और दो लोगों का सात सौ चौवालिस रुपया. बेचारी पत्नी तो सुनकर रोने ही लगी.

वे समस्तीपुर के पास मुसरीघरारी के रहने वाले थे. पति को कोई मानसिक बीमारी हो गई थी. पत्नी ने बताया कि चिंता से. इतिहास से एम ए होने के वावजूद उन्हें कोई उचित रोज़गार नहीं मिल सका . अपना देश गाँव छोड़ कर बाहर जा नहीं पाया. आज पत्नी अपने गाँव में ही घर के बाहर परचून की दुकान चला कर दो बेटियों को पाल रही है. टी टी ई से जुर्माने का नाम सुनकर वो दवाई के सारी कागज़ दिखाने लगी, अपना खाली स्टील का डब्बा भी दिखाने लगी जिसमे तीन चार सुखी रोटियां और घर के बने आचार थे. पति कुछ कह नहीं पा रहा था क्योंकि दवाई के असर से वो हमेशा नींद में ही रहता था. रोते रोते पत्नी कह रही थी कि उसे पता नहीं था कि जिस गाड़ी में वो चढ़ी है वह सुपरफास्ट है. किसी टी टी ई ने ही बता दिया कि यह गाड़ी दरभंगा जाएगी. उस महिला के पास पूरे अस्सी रूपये थे. पचास रुपया डाक्टर के लिए और बाकी वापसी किराया के लिए. किन्तु टी टी ई महोदय का ह्रदय बिल्कुल भी पसीज नहीं रहा था. शायद वो अपना काम कर रहे थे. हम दो यात्रियों के अनुरोध पर टी टी ई एक व्यक्ति का जुर्माना लेकर छोड़ने को तैयार हो गए और उस महिला के 3७२ रूपये हमने दिए.

टी टी ई के जाने के बाद जब महिला से बात हुई तो पता चला कि वो उच्च जाति की है इस लिए उसे गरीबी रेखा के नीचे वाला कोई लाभ नहीं पहुचता. खेती बाड़ी कुछ है नहीं. जो है उसमे भी करने के लिए उनमे सामर्थ्य नहीं है. बटाई नहीं दे सकती क्योंकि कमजोर समझ कर निचली जाति के लोग उसका खेत छीन लेंगे. किसी तरह परचून की दुकान से अपने बीमार पति और दो बेटियों का पालन पोषण कर रही है. हाँ ! बेटियों को पढ़ा रही है वह. उच्च जाति, स्टील के डिब्बे में सूखी रोटी, बीमार पति और फटती हुई महँगी साडी, गरीबी का एक चेहरा है, जिसकी गिनती शायद सरकार के आकड़ो में नहीं होती.

दरभंगा और पूरे इलाके में गरीबी का यह चेहरा बहुत आम है, सरकार है कि पहचानती ही नहीं है.

बुधवार, 8 दिसंबर 2010

हिन्दी साहित्य की विधाएं - संस्मरण और यात्रा-वृत्तांत

हिन्दी साहित्य की विधाएं - संस्मरण और यात्रा-वृत्तांत
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मनोज कुमार

हिन्दी साहित्य में गद्य के अंतर्गत निबंध, रेखचित्र, जीवनी, आत्मकथा, रिपोर्ताज, साक्षात्कार, संस्मरण, यात्रा-वृत्तांत आदि शामिल हैं।
संस्मरण को हम सम्पूर्ण स्मृति कह सकते हैं। इस तरह की स्मृति जो हमारे आज को अधिक सार्थक, समृद्ध और संवेदनशील बना दे। हमारी स्मृति का एक सिरा हमारे वर्तमान से बंधा होता है, तो दूसरा अतीत से। संस्मरण अतीत और वर्तमान के समय सरिता के बीच एक पुल है, जो दोनों किनारों के बीच संवाद का माध्यम बनता है।
हमारे कई ऐसे बीते पल होते हैं जो अनुभव के रूप में हमारे वर्तमान में जीवित होते हैं। इनसे हमारा एक संबंध-सा बन जाता है। यह अतीत हमारे आज को मूल्यांकन करने का अवसर प्रदान करता है। इसकी सहायता से संस्मरणकार समय की धुंध में ओझल होती ज़िन्दगी को फिर से रचने का प्रयास करता है।
बीते कल के कुछ पात्र, कुछ स्थान, कुछ दृश्य, कुछ घटनाओं के साथ हमारी एक आत्मीयता हो जाती है। एक संबंध बन जाता है। हम उन स्मृतियों को संजोए रहते हैं। संबंधों की यही आत्मीयता और स्मृति की परस्परता ही संस्मरण की रचना प्रक्रिया का मूल आधार है।
इस तरह की रचना में महज सूचना नहीं होता। बल्कि एक जीवंत अस्तित्व होता है जो हमारी बीती ज़िन्दगी के अनेक आवर्तों में लिपटा होता है। जो संस्मरण लिख रहा होता है, वह उन आवर्तों की पहचान करता है। इस तरह से जब संस्मरण की रचना की जा रही होती है तो एक संस्मरणकार के समक्ष स्मृति यानी अतीतता होती है। दूसरे उसमें संबंध भाव होता है। फिर उसका अपना आत्मानुभव होता है। और अंत में स्वयं को खोजने-पहचानने की ईमानदार कोशिश होती है।
संस्मरण न तो हम सूचना के आधार पर लिख सकते हैं और न ही साक्षी भाव से। स्मृति तो अतीत की वर्तमानता की बोधक होती है। इसलिए एक साथ जीने और बीतने से मिला भाव संस्मरण लिखने के लिए आधार भूमि होती है। साथ ही साथ संस्मरण में रचनाकार ख़ुद को भी प्रकाशित करता चलता है। इसे कल्पना करके नहीं लिखा जा सकता। क्योंकि आत्मीयता, अनुभव की प्रत्यक्षता और घटना एवं परिवेश की सत्यता इसका आधार तैयार करते हैं। इसमें व्यक्ति का संबंध होता है। ऐसा संबंध, किसी भी स्तर पर रचनाकार की ज़िन्दगी को अर्थ देता है, उसमें भराव या खालीपन पैदा करता है, वह संस्मरणीय हो सकता है।
आज काफ़ी संस्मरण लिखे जा रहे हैं, ब्लॉग जगत में भी। शिखा वार्षणेय, रश्मि रवीजा के कई संस्मरण एक उत्कृष्ट साहित्यिक कृति हैं। जबकि एक पूरा ब्लॉग ही समर्पित है संस्मरण के लिए – और यह ब्लॉग है चला बिहारी ब्लॉगर बनने । संस्मरण को आज एक स्वतंत्र पहचान मिली है। शिखा जी एवं रश्मि जी के संस्मरण पढते वक़्त लगता है कि जीवन के लौकिक अनुभवों को संबंधों के प्रकाश में सहेजने की इनकी आकांक्षा ने इन रचनाओं को जन्म दिया है। सलिल जी के संस्मरण अपनी माटी से जुड़े होने का जहां एक ओर अहसास कराते हैं, वहीं दूसरी ओर इसकी जीवंतता और सरसता आकर्षित करती है। इनके कुछ पोस्ट के लिंक नीचे दिए हैं।
फ़ेसबुक की दीवार से अंतरिक्ष दर्शन
जाके बैरी सम्मुख ठाड़े, वाके जीवन को धिक्कार
टॉल्सटॉय,गोर्की और यह नन्हा दिमाग
http://shikhakriti.blogspot.com/
कुछ मस्ती कुछ तफरी
http://shikhakriti.blogspot.com/2010/11/blog-post_11.html
वो कौन थी ?
http://shikhakriti.blogspot.com/2010/06/blog-post.html
छोटी सी ये दुनिया...पहचाने रास्ते हैं...
पेंटिंग की बदौलत मिले कुछ यादगार पल..
हालाकि संस्मरण एक मिश्रित विधा है जिसमें कहानी, निबंध, जीवनी, आत्मकथा और रेखाचित्र की कई विशेषताएं संशलिष्ट हैं, परन्तु इसकी एक अलग पहचान भी है। निबंध के रूप में संस्मरण लिखना अपेक्षाकृत नई विधा है। संस्मरण का आधार स्मृति है, जबकि निबंध का विचार। संस्मरण में घटना एवं संबंध सत्य पर आधारित होते हैं, जबकि निबंध में कल्पनाशीलता होती है।
कहानी और संस्मरण का ढांचा मिलता-जुलता है। कई बार अच्छे ढंग से लिखे गए संस्मरण और कहानी में अंतर नहीं दिखता। महादेवी वर्मा के ‘अतीत के चलचित्र’ की रचनाएं संस्मरण होते हुए कहानी का-सा प्रभाव पैदा करती है। जबकि शिवपूजन सहाय की ‘कहानी का प्लाट’ संस्मरण का आभास देती है। लेकिन कहानी और संस्मरण अलग-अलग विधाएं हैं। कहानी में कल्पना होती है, यह अलग बात है कि कल्पना एवं कला का संस्पर्श पाकर अवास्तविक भी वास्तविक लगने लगती है। ‘मनोज’ ब्लॉग पर ‘मेरे छाता की यात्रा कथा’ के अंतर्गत प्रस्तुत कहानियों को कई पाठकों ने संस्मरण मान लिया। तो जहां कहानियों में सत्य आभासित होता है, वहीं संस्मरण में सृजित होता है। कल्पना का प्रयोग यहां भी होता है, लेकिन इसकी भूमिका संयोजन, अन्वय (सम्बंध स्थापित करना) एवं रचनात्मक प्रभाव पैदा करने की होती है। ‘मनोज’ ब्लॉग पर हमने ‘बूटपॉलिश’ संस्मरण में बूटपॉलिश की कल्पना रचनात्मक प्रभाव पैदा करने के लिए ही की थी।
संस्मरण में रचनाकार शुरु से लेकर अंत तक एक आलंबन (सहारा) के साथ गहरी आत्मीयता से जुड़ा होता है। कहानी में यह बात नहीं है। जीवनी और आत्मकथा संस्मरण की तरह अतीत के सत्य पर आधारित होती हैं। जीवनी एक व्यक्ति का इतिहास है, इसलिए इसमें रचनाकार का दृष्टा-भाव होता है, भोक्ता भाव नहीं। जबकि आत्मकथा में आत्मपरकता होती है। आत्मकथा लेखक अनुभव एवं स्मृति के प्रकाश में अपने जीवन का पुनरावलोकन करता है। संस्मरण में जीवनी और आत्मकथा के कुछ तत्त्व हो सकते हैं, लेकिन ये तीनों ही स्वतंत्र विधाएं हैं।
जीवनी में जीवनीकार का अपना जीवन नहीं होता। जबकि संस्मरण में रचनाकार स्वयं का अनुभूत सत्य लिख रहा होता है। इसी तरह आत्मकथा में रचनाकार का अपना जीवन केन्द्र में होता है जबकि संस्मरण में स्मरणीय व्यक्ति या घटना। आत्मकथा में संस्मरण के टुकड़े हो सकते हैं। किन्तु संस्मरण का विस्तार, जीवनी या आत्मकथा की तुलना में छोटा होता है।
एक विशिष्ट विधा के रूप में यात्रा वृत्तांतों का लेखन एक नई शुरुआत है। गद्य की अनेक नई विधाओं की तरह इसका श्रेय भी पश्चिमी साहित्य को जाता है। पर हिंदी साहित्य में यात्रा वृत्तांत पश्चिमी साहित्य से अलग और मौलिक इस रूप में है कि इसमें अपनी परंपरा, देश, समाज और शिल्प की निजी विशेषताएं समाहित हैं।
हिंदी साहित्य में यात्रा-वृत्तांत का विपुल भंडार नहीं है। इसका प्रमुख कारण तो यह है कि इसके लिए लेखक का वास्तविक यात्रा पर निकलना ज़रूरी है। यह यात्रा सिर्फ़ पर्यटक की भांति नहीं होनी चाहिए। इसमें यात्रा हर स्थल, मानव संपर्क, रास्ते, देश-काल, भिन्नता और विविधता में गहरे प्रवेश करने वाली दृष्टि के साथ होनी चाहिए। साथ ही अपने समस्त अनुभव-ज्ञान से रचना को संपुष्ट करने की क्षमता भी रचनाकार में होनी चाहिए। साथ ही जब तक पाठक को पूरी तरह शामिल करने की क्षमता उस वृत्तांत में नहीं होगी, तब तक वह गूंगे का गुड़ ही बनी रहेगी। इसलिए यात्रा-वृत्तांत में अनुभव और रोमांच के साथ-साथ शैलीगत विशेषताओं की योग्यता भी रचनाकार को सफलता प्रदान करती है। इस विधा को साधना एक कठिन कार्य है। .. और ब्लॉग जगत में इस साधना सिद्धहस्त शिखा वार्षणेय के कई यात्रा-वृत्तांत काफ़ी रोचक और पठनीय है। जैसे
दो दिन, स्कॉटस और बैग पाइप
-http://shikhakriti.blogspot.com/2010/09/blog-post.html
वेनिस की एक शाम
http://shikhakriti.blogspot.com/2010/01/blog-post_18.html
ये कहाँ आ गए हम ...." मेरी स्विस यात्रा
-http://shikhakriti.blogspot.com/2010/07/blog-post_07.html
मानव जीवन में यात्रा के सर्वोपरि महत्त्व को प्रतिपादित करते हुए उर्दू का यह शे’र बहुत खास है,
सैर कर दुनिया की गाफिल ज़िन्दगानी फिर कहां।
ज़िन्दगानी-गर रही तो नौजवानी फिर कहां।
यात्रा-वृत्त एवं संस्मरण कुछेक रूप में एक दूसरे से जुड़े हैं। बल्कि यह कह सकते हैं कि संस्मरण का ही विशिष्ट रूप है। यात्रा-वृत्त यायावर के अनुभव, सौन्दर्य बोध और प्रतिक्रिया की अभिव्यक्ति है। शिखा जी अपने यात्रा-संस्मरण से हमें यदा-कदा परिचय कराती रहती हैं। हमने भी ‘गंगा सागर’ और ‘मसूरी’ के यात्रा-संस्मरण ‘मनोज’ ब्लॉग पर लिखे हैं। यात्रा-संस्मरण का मूल तत्त्व भौगोलिक विस्तार, प्राकृतिक सौन्दर्य एवं महत्त्वपूर्ण घटनाए शामिल होती हैं। यात्रा-संस्मरण में समाज, इतिहास, संस्कृति, अर्थव्यवस्था, राजनीतिक चहल-पहल, पर्यावरण चिंता आदि समाहित हो सकते हैं। अज्ञेय द्वारा रचित ‘एक बूंद सहसा उछली’ और निर्मल वर्मा की ‘चीड़ों पर चांदनी’ उत्कृष्ट कोटि का यात्रा-संस्मरण हैं।
जो संस्मरण के सबसे नज़दीक है – वह है रेखाचित्र। कई बार तो इनको पढते वक़्त एक ही विधा का भास होता है। सैद्धांतिक स्तर पर हम इसके अंतर को स्पष्ट कर भी दें, पर रचनात्मक स्तर पर ये एक-दूसरे से गुंथे हैं। महादेवी वर्मा की ‘स्मृति की रेखाएं’ रेखाचित्र है, पर संस्मरण भी। गहराई से देखने पर अंतर भी है। रेखाचित्र में रूपाकृति पर बल दिया जाता है। इसमें अतीत, घटनाओं से नहीं, रूप की स्मृति से उकेरा जाता है। जबकि संस्मरण के केन्द्र में घटनाओं और मनोभावों से बना हुआ अतीत होता है। दूसरा अंतर यह है कि रेखाचित्र का अतीत वस्तुगत होता है, जबकि संस्मरण का अतीत आत्मगत। तीसरी प्रमुख बात है कि रेखाचित्र में रचनाकार विषय को उसकी स्थिरता में पकड़ता है, जबकि संस्मरण में अनुभव की गत्यात्मकता में। चौथी बात यह कि रेखाचित्र में रचनाकार स्मृति को चित्रात्मक धरातल पर उपलब्ध कराता है, जबकि संस्मरण में संबंधों की परतदार एवं गतिशील स्मृतियां होती हैं। पांचवें रेखाचित्र में लेखक का व्यक्तित्व अनुपस्थित हो सकता है, जबकि संस्मरण में लेखक के जीवन का उद्घाटन भी साथ-साथ चलता रहता है। और अंत में रेखाचित्र पर्यवेक्षण प्रधान होता है, संस्मरण संवेदन प्रधान। संवेदनशीलता संस्मरण का प्रधान गुण है।
बीसवीं शताब्दी के चौथे दशक तक संस्मरण एक विधा के रूप में अपनी कोई पहचान नहीं बना पाया था। हालाकि संस्मरण लेखन का सिलसिला बीसवीं शताब्दी के तीसरे दशक से शुरु हो चुका था, पर एक विधा के रूप में इसकी पहचान पांचवें दशक में ही बन पाई। पहला महत्त्वपूर्ण नाम इस विधा में आता है पद्मसिंह शर्मा का। १९२९ में उनके संस्मरण ‘पद्म पराग’ का प्रकाशन हुआ। इसमें महा कवि अकबर, सत्यनारायण कविरत्न, भीमसेन शर्मा आदि पर मार्मिक संस्मरण हैं। इसमें भावुकता के साथ-साथ हास्य-विनोद भी है।
बनारसी दास चतुर्वेदी का ‘संस्मरण’ नाम से १९५२ में पुस्तक प्रकाशित हुई। इसमें श्रीधर पाठक, द्विजेन्द्र नाथ ठाकुर, गणेश शंकर विद्यार्थी, आदि पर प्रभावशाली ढंग से लिखा गया है। छोटी-छोटी घटनाओं और पत्र के सहारे संस्मरण की रचना प्रक्रिया की गई है।
कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ ने १९५६ में ‘दीप जले शंख बजे’ शीर्षक पुस्तक लिखी थी। इनके संस्मरण में साधारण के प्रति आकर्षण एवं स्वस्थ एवं नैतिक जीवन पर बल दिया गया है।
महादेवी वर्मा द्वारा १९५६ में रचित ‘पथ के साथी’ में रवीन्द्रनाथ ठाकुर, मैथिलीशरण गुप्त, सुभद्रा कुमारी चौहान, प्रसाद, निराला, पंत पर अद्भुत संस्मृति की रचनाएं हैं।
अज्ञेय द्वारा रचित ‘वसंत का अग्रदूत’, रामवृक्ष बेनीपुरी का ‘माटी की मूरतें’, पांडेय बेचन शर्मा उग्र का ‘व्यक्तिगत’, उपेन्द्र्नाथ अश्क का ‘मंटो – मेरा दुश्मन’, जैनेन्द्र कुमार का ‘ये और वे’, माखनलाल चतुर्वेदी का ‘समय के पांव’, जगदीशचन्द्र माथुर का ‘दस तस्वीरें’, रामधारी सिंग दिनकर का ‘लेक देव क=ने हम कुछ’, बहुत ही उत्कृष्ट कोटि के संस्मरण हैं।
संस्मरण स्मृति से साक्षात्कार है। वह समय में लौटना नहीं है, बल्कि गुज़रे समय को जीवन की वर्तमानता से जोड़ने का माध्यम है। इस रूप में वह इकहरे वर्तमान की रिक्तता को भरने वाला सशक्त रचना माध्यम है। संस्मरण रचना का मूल लक्ष्य मूल्यवान स्मृति को सुरक्षित रखना होता है। संस्मरण रचना वर्तमान को एक दिशा, पहचान और संस्कार देती है। हमारा वर्तमान तात्कालिकता वाला होता है, एक आयामी होता है, इसमें सूचनाओं की प्रधानता होती है! हम यदि अतीत की प्रतिमा पर पड़ी धूल को झाड़कर उन्हें बार-बार पहचानने योग्य बना दें – तो एक सार्थक संस्मरण तैयार हो सकता है।
.... तो, देरी किस बात की। टटोलिए अपने अतीत को, और रच डालिए एक संस्मरण। हां, अपने संस्मरण के लिंक राजभाषा हिन्दी ब्लॉग को controler.rajbhasha.blog@gmail.com पर मेल करना न भूलें। हो सकता है ब्लॉग जगत और संस्मरणात्मक रचनाएं विषय पर एक शोध पत्र तैयार हो जाए।