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बुधवार, 28 मार्च 2012

सरकारी स्कूल नक्सली नहीं परिवर्तनकारी पैदा करते हैं

सरकारी स्कूल नक्सली नहीं परिवर्तनकारी पैदा करते हैं

arunpicअरुण चन्द्र रॉय

अच्छा हुआ कि श्री श्री रविशंकर जी ने यह बयान दिया कि सरकारी स्कूल नक्सली पैदा करते हैं. कम से कम सरकारी स्कूल बनाम पब्लिक स्कूल की एक बहस तो शुरू होगी. इस विषय पर मेरा अध्यनन कुछ नहीं है लेकिन सरकारी स्कूल, कालेज और विश्वविद्यालय से पढ़ कर निकला हूं तो थोडा अहम् को ठेस तो लगा ही है.


पब्लिक स्कूल की अवधारणा 

इतिहास का तो नहीं पता लेकिन मुझे लगता है कि पब्लिक स्कूल की अवधारणा भारत में अंग्रेज़ों के आने के बाद शुरू हुई है. कहीं पढ़ रहा था कि भारत में जातीय और धार्मिक विद्वेष पहले उतना नहीं था, यह तो अंग्रेज़ों ने आकर पैदा किया. उनके हित साधन के लिए, यानी भारत पर शासन करने के लिए भारतीय समाज में दो वर्ग पैदा करना ज़रुरी था, एक जो शासन करे और एक जिस पर शासन चले. शासक वर्ग को तब तक अलग नहीं किया जा सकता था जब तक कि उनके बच्चे को समाज से अलग न हों और वहीं से शुरू हुई अलग स्कूल की जरुरत. यहीं पडी थी पब्लिक स्कूल की नींव. देश आज़ाद तो हुआ लेकिन मानसिकता नहीं बदली. सो चलते रहे इस तरह के स्कूल. आर्थिक उदारीकरण  के बाद समाज में यह खाई और बढ़ी और स्कूल बन गए स्टेटस सिम्बल. पब्लिक स्कूल बन गए बाज़ार. बाज़ार का नियम है एक उत्पाद तब तक नहीं चल सकता जब तक कि उसके प्रतिस्पर्धी उत्पाद को निकृष्ट न दिखाया जाय. बाज़ार में होड़ होना ज़रुरी है. यही होड़ आज अपने चरम पर है जो बेहतर पढाई के नाम पर मध्यवर्गीय भारतीय समाज की जेब काट रहा है.

भारत में विद्यालय

भारत एक विशाल देश है. अधिकाश लोगों को भारत के भौगोलिक, सामाजिक और आर्थिक विषमता और व्यापकता का आभास ही नहीं है.  सरकारी आकड़ों को मान लें, तो भी अभी देश के आधे गाँव में चार घंटे बिजली नहीं पहुची है. सौ लोगों तक की आबादी वाले मोहल्ले तक सड़क पहुचने के लक्ष्य से काफी दूर है अपनी सरकार. ऐसे में स्कूल तक कितनी पहुंच होगी देश के नौनिहालों की, यह सहज सोचा और महसूस किया जा सकता है. देश में अभी लगभग सात लाख प्राथमिक विद्यालय हैं. लेकिन एक बच्चे को 1 से 3 किलोमीटर की दूरी तय करनी पड़ती है प्राथमिक विद्यालय तक पहुचने के लिए.  माध्यमिक विद्यालय तक यह दूरी और बढ़ जाती है. कालेज के लिए तो यह दूरी 25 से 50 किलोमीटर तक भी हो जाती है.  जिन लोगों का कभी गाँव या सुदूर गाँव से पाला नहीं पड़ा है वे सोच भी नहीं सकते हैं कि बिना भवन और शिक्षक के कैसे स्कूल चलते हैं. यह तो है देश में शिक्षा की दयनीय तस्वीर. लेकिन हर दयनीय व्यक्ति नक्सली है, यह नहीं हो सकता.

सरकारी स्कूल बनाम पब्लिक स्कूल 

school1देश में तीन तरह के विद्यालय हैं. एक खास सरकारी. एक पब्लिक स्कूल और एक बड़ा तबका स्कूल का सरकारी स्कूल को बदनाम करते हुए बिना मान्यता के चलते हैं. ऐसे स्कूलों की संख्या बड़ी तादाद में है. खैर यह एक अलग मुद्दा है. 52वे राष्ट्रीय प्रतिदर्श सर्वेक्षण आकडे के अनुसार देश में उच्च विद्यालय में लगभग 86 %  बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ते हैं और शेष 14 % पब्लिक स्कूलों में, जिसमे असंगठित रूप से चल रहे पब्लिक स्कूल भी शामिल हैं.  सरकारी स्कूल भी तीन तरह के हैं. एक केंद्रीय विद्यालय, जिसमे अधिकांशतः शहरी, सरकारी कर्मचारियों के बच्चे पढ़ते हैं. दूसरे सुदूर क्षेत्र में अवस्थित नवोदय विद्यालय और तीसरे देश के विभिन राज्यों में चलते प्राथमिक, माध्यमिक और उच्च विद्यालय. गौरतलब है कि इन तीनो विद्यालयों का परीक्षा परिणाम लगातार तथाकथित पब्लिक स्कूलों को पीछे छोड़ रहा है.

schol2एक अध्ययन के अनुसार 2001 से 2011 तक की अवधि में जवाहर नवोदय विद्यालय (जो कि एक सरकारी स्कूल ही है) में दसवी की परीक्षा में सफलता के परिणाम में लगातार सुधार हुआ है और 2001 में 87% पास परिणाम की तुलना में 2011 में पास हुए विद्यार्थियों की प्रतिशतता बढ़ कर 97.5% हो गई है. जबकि पब्लिक स्कूलों की पास प्रतिशतता 2011 में 92 प्रतिशत रही है. केंद्रीय विद्यालयों का औसत भी पब्लिक स्कूलों की तुलना में बेहतर ही है. भारतीय प्रसाशनिक सेवा अधिकारीयों पर किये गए एक अध्यनन के अनुसार 73% आई ए एस अधिकारी ग्रामीण पृष्टभूमि से होते हैं और सरकारी स्कूलों से पढ़े होते हैं. 

जीवन में उपलब्धिया 

एक पुस्तक "डाइवर्सिटी एंड चेंज़ इन माडर्न इण्डिया - एंटोनी ऍफ़ हीथ और रोज़र जेफरी (ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस) "  के अनुसार भारत में सफल जीवन जीने वाले लोग आम तौर ग्रामीण पृष्ठभूमि से आते हैं और उनमे परिवर्तन करने और नेतृत्व क्षमता अधिक होती है. देश में बदलाव लाने वालों की अगली कतार में वे हैं जिनका संघर्ष अधिक रहा है. ऐसे लोगों की सूची में देश के बड़े वैज्ञानिको, खिलाडियों, शिक्षाविदो के नाम हैं जिन्होंने आधुनिक भारत की नीव रखी है. भूतपूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम का नाम भी इसमें शामिल है. एक शोधपत्र "एक्सेस, सटिस्फैक्शन एंड फ्यूचर : अंडर ग्रैज़ुएट  एजुकेशन इन इण्डिया - आर वर्मा " में स्पष्ट उल्लेख है कि सरकारी स्कूलों और खुद पढ़ कर आये छात्र में रचनात्मकता और नवोंन्मेषण तुलनात्मक रूप से अधिक होती है और वे अपने जीवन को नए नज़रिए से देखते हैं तथा नए समाधान के लिए उत्त्प्रेरक का काम करते हैं.  इसके अतिरिक्त सरकारी स्कूल से सैकड़ों ड्रॉप आउट बच्चे ऐसे हैं जो कुशल, अर्धकुशल कामगार के रूप में देश के आर्थिक विकास में अपना योगदान कर रहे हैं. क्या श्रम का योगदान आर्थिक विकास के चित्र से हटा दिया जायेगा ?

ऐसे में, श्री श्री रविशंकर से आग्रह है,

आप कभी भारत के उन गाँव, कस्बो की यात्रा करें, सरकारी स्कूलों में एक दिन बिताएं, जहाँ बच्चे सूरज, चाँद, खेत खलिहान, फसल, तालाब, पोखर से सीखते हुए बड़े होते हैं. जीवन जीने की कला उनमे प्राकृतिक रूप से आती है. वे नक्सल नहीं होते. वे परिवर्तनगामी होते हैं. 

सरकारी स्कूल – यानी असरकारी स्कूल!