सोमवार, 27 सितंबर 2010

मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर करना


आज भारतीय परिवेश में हमें सोचना पड़ रहा है कि मज़हब आपस में बैर करना नहीं सिखाता है .कैसी विडम्बना है हमारी भारतीय संस्कृति की . 
जिस संस्कृति को सारा संसार पूजता है , जिस संस्कृति ने विभिन्न देशों की संस्कृति का समावेश कर लिया है , आज उसी पर एक प्रश्नचिह्न लग गया है कि हम धर्म के नाम पर कब तक आपस में लड़ते रहेंगे ?
आज़ादी को मिले तरेसठ (६३) साल हो गए हैं पर आज भी हम धर्म को मुद्दा बना कर एक दूसरे पर अत्याचार करते नज़र आते हैं . एक वो समय था जब भारत के संविधान के अनुसार भारत को धर्म - निरपेक्ष राष्ट्र घोषित किया गया था . उस समय पूरे संसार में भारत कितना गौरवान्वित हो उठा था .परन्तु आज वर्तमान स्थिति में शायद धर्म निरपेक्षता का अर्थ ही बदल गया है .
आप किसी भी धर्म कि गहराई में जाइये तो सब एक ही सर्वशक्तिमान की अराधना करते दिखाई देते हैं . चाहे आप उसे ईश्वर कह लें या अल्लाह .ईसु मसीह कह लें या वाहे गुरु .
व्यक्ति धर्म से नहीं बना वरन् व्यक्तियों ने धर्म बनाया है .प्रत्येक धर्म की बुनियाद अच्छाइयों की नींव पर रखी जाती है . यह तो व्यक्ति के ऊपर है की किस धर्म से प्रभावित हो कर वह उस धर्म को अपना ले .लोंग धार्मिक प्रचारकों से प्रभावित हो कर ही उनके अनुयायी बन गए और उस धर्म को मानाने लगे .इस्लाम धर्म के प्रभाव में आने के कारण पर ही दृष्टिपात किया जाये तो हज़रात मुहम्मद के उपदेशों से प्रभावित हो कर ही लोंग उनके अनुयायी बन गए थे .सिख धर्म को देखा जाये तो यह धर्म तो हिंदुत्व की रक्षा के लिए हिंदू धर्म से ही जन्मा है . सिख का वास्तविक अर्थ है " शिष्य ".जो लोंग गुरु गोविन्द सिंह जी से प्रभावित हो कर हिंदू धर्म की रक्षा के लिए अपना बलिदान देने को तत्पर थे और उनके शिष्य बने वही सिख कहलाये .परन्तु कितनी दयनीय स्थिति है कि
आज हम धर्म में आस्था नहीं वरन्  धर्म को राजनीति में उतार लाए हैं .आज के धार्मिक नेता भी ईश्वर मार्ग को छोड़ सत्ता मार्ग पर आरूढ़ हो गए हैं और भोली भाली जनता को मुर्ख बना रहे हैं .
यह एक और विषम स्थिति है कि अत्यधिक प्रयासों के पश्चात भी आज भारत में शिक्षा का जितना प्रचार - प्रसार होना चाहिए  उतना नहीं हो पाया . यही कारण है कि आम जनता का मानसिक विकास इतना नहीं हो पाया कि वह गलत और सही में भेद कर सके .वह तो अपने राज नेताओं और धार्मिक नेताओं से अत्यधिक प्रभावित हो जाती है और वह सब कर गुज़रती है जो उसके नेता कहते हैं . मज़हब के नाम पर बिना सोचे समझे किसी का क़त्ल करने से भी नहीं हिचकते .उसी का नतीजा था कि भारत की तृतीय प्रधान मंत्री श्रीमति इंदिरा गाँधी की निर्ममता से हत्या कर दी गयी थी .
.बाबरी मस्जिद और राम मंदिर का मसला आप लोगों ने देखा ही है कि किस तरह धर्म को राजनीति में हथियार बनाया गया ..आज लोंग इस राजनीति को समझ चुके हैं ...पर धर्म के ठेकेदार अभी भी इस मुद्दे पर वैमनस्य के बीज बो रहे हैं ..फैसला आने को है ..पहले ही अयोध्या को छावनी के रूप में बदल दिया गया है ..यानि कि परोक्ष रूप से यह बताया जा रहा है कि फैसला आते ही दोनों पक्ष उग्र हो उठेंगे ..सद्भावना और सौहार्द जैसी बातें दिखाई ही नहीं देतीं ..लोगों की  न्यूनतम ज़रूरतें पूरी नहीं हो पा  रही हैं जिसने नक्सलवाद और आतंकवाद को जन्म दे दिया है ..
संक्षेप में इतना ही कि आज ज़रूरत है यह समझ लेने की , कि मज़हब कोई भी हो वो हमें आपस में दुश्मनी करना नहीं सिखाता . ईश्वर ने सभी मनुष्यों को एक समान इस धरती पर भेजा है ,यह तो हम हैं जो स्वयं को धर्मों में बाँट लेते हैं और आपस में वैमनस्य की भावना को बढते हैं .आज ज़रूरत है धर्म की संकीर्ण भावना से ऊपर उठें .अपने अंदर इंसानियत लाएं और मानवता के पुजारी बने . मानवता के धर्म को अपनाएं . मनुष्य हो कर मनुजता अपना सकें
तभी हमारा राष्ट्र धर्म निरपेक्ष  कहला सकेगा ......
 
जय हिंद
 

25 टिप्‍पणियां:

  1. बेहद उम्दा रचना ! बधाइयाँ और शुभकामनाएं

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  2. संगीता जी आपने सही कहा है.. धर्म का उद्भव मानव को संस्कारित करने और अनुशाषित करने के लिए हुआ था.. लेकिन धर्म के नाम पर आज जो हो रहा है हम उसे धर्म नहीं कह सकते.. बहुत उम्दा आलेख..

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  3. यही बात तो हमारी समझ में नहीं आ रही है अच्छा लेख बधाई

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  4. कोई समझे जब कोई बात है।
    कौमी तराने गाए जाते हैं लेकिन अमल कम लोग ही करते हैं।

    सार्थक आलेख

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  5. इस विषय में एक सुझाव - सब मज़हबों के मूल ग्रंथ सामने रख कर जिस में सर्व-मंगल की पुष्टि हो उसे सर्वश्रेष्ठ और जिसमें अपने सिवा औरों को निकृष्ट बता कर वैमनस्य का प्रतिपादन हो उसे मानवता पर कलंक माना जाय.

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  6. मानवता से धर्म है , धर्म से मानवता नहीं . ये समझाने के लिए शिक्षा का समुचित प्रसार आवश्यक है . सामयिक आलेख . आभार .

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  7. इंसानियत से बढकर कोई धर्म नही अगर इतना सब समझ लें तो देश का नक्शा ही बदल जाये…………बहुत बढिया आलेख्।

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  8. इन बातों से कोई अनभिज्ञ नहीं है लेकिन कुछ मौकापरस्त इस बात का फायदा उठना चाहते हैं. आखिर कब तक हम इस तरह इंसां होकर ही इंसानियत के पथ को दुहराते रहेंगे और वे जो करना चाहते हैं क्या हमसे अधिक है, नहीं वे अधिक नहीं है लेकिन हमनहीं संगठित हैं. एक दूसरे का हाथ थाम कर दीवार बन जाएँ तो कभी भी ये दुस्साहस करने के लिए कोई सिर न उठाये.

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  9. संगीता जी बहुत सुन्दर सन्देश दिया है। धन्यवाद।

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  10. धर्म बनाये गए हमारे व्यवहारों को अनुशाषित करने के लिए ,समाज में व्यवस्था बनाये रखने के लिए परन्तु आज उनका स्वरुप ही बदल गया है ..अव्यवस्था और द्वेष का कारण बना दिया गया है उसे.
    बहुत अच्छी सन्देश देती पोस्ट.

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  11. बहुत ही सारगर्भित और सार्थक पोस्ट संगीता जी ! हज़रत मौहम्मद, गुरु गोविन्द सिंह, भगवान राम और प्रभु ईसा मसीह आज संसार में जीवित होते तो अपने अनुयायियों की बर्बरता और नासमझी पर आँसू बहा रहे होते ! इन धर्मान्ध लोगों से पूछना चाहिए कि ये किसकी सिखाई शिक्षा का पालन करते हैं अपने भगवान का या गुमराह करने वाले और अपने राजनैतिक स्वार्थ सिद्ध करने वाले अपने मतलबी नेता का ? बहुत ही शानदार पोस्ट ! आपको बहुत सारी बधाइयां !

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  12. दीदी,
    उत्कृष्ट सार्थक शुभभाव सहित प्रतिपादन,
    धर्म निश्चित में मानव को अनुशासित जीवन सार्थकता, ध्येय,एवं संस्कार,प्रदान करने के हेतू हुआ है। कुसंस्कार के कार्य धर्म के हो ही नहिं सकते।
    सार्थक प्रयास दीदी।

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  13. आपने बिल्कुल सही फरमाया।
    अच्छी पोस्ट

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  14. अच्छा सन्देश देती रचना.
    काश लोग इंसानियत को सबसे बड़ा धरम मान ले. बाकी झमेले अपने आप सुलझ जायेंगे.

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  15. संगीता दी!
    मज़हब?????????????? यह क्या बला है, मेरे घर में या हमारे शब्दकोश में तो यह शब्द है ही नहीं!!..बहुत सुंदर. कविता से अलग आपका गद्य लेखन पढना, एक सुखद अनुभव है.
    सलिल

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  16. अच्छा लेख, बहुत सुन्दर सन्देश, लेकिन अमल?? बहुत बढिया गद्य लेखन

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  17. आज ज़रूरत है धर्म की संकीर्ण भावना से ऊपर उठें .अपने अंदर इंसानियत लाएं और मानवता के पुजारी बने . मानवता के धर्म को अपनाएं . मनुष्य हो कर मनुजता अपना सकें
    तभी हमारा राष्ट्र धर्म निरपेक्ष कहला सकेगा ......

    जय हिंद

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  18. अति सुन्दर और ज्ञानवर्धक ........ आभार.

    जाने काशी के बारे में और अपने विचार दे :-
    काशी - हिन्दू तीर्थ या गहरी आस्था....
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  19. धर्म के नाम पर आपस में लडना तो लोगों को राजकीय नेता सिखा रहे है!....ये लोग अपना स्वार्थ साधने में माहिर होते है!....उत्तम रचना, बधाई!

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  20. प्रिय संगीता जी,
    आप का विचार मंथन हमारी मानसिकता की सच्चाई का दर्पण है। मैं स्वयं दंतेवाड़ा निवासी हूँ और अपनी संस्कृति पर पड़ रहे विचित्र धब्बों की प्रयत्यक्षदर्शी हूँ।
    हमारे समाज के कुछ ठेकेदार जो राजनैतिक गलियारों से ताल्लुक रखते हैं.... वे बहुत हद तक हमारी संस्कृति को समय-समय पर आहत करते रहते हैं।
    आपकी प्रस्तुति उत्कृष्ट है।

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