बुधवार, 1 सितंबर 2010

काव्य प्रयोजन (भाग-4) नवजागरणकाल की दृष्टि

काव्य प्रयोजन (4)


नवजागरणकाल और काव्य प्रयोजन

पिछली तीन पोस्टों मे हमने (१) काव्य-सृजन का उद्देश्य, (लिंक)(२) संस्कृत के आचार्यों के विचार (लिंक) और (३) पाश्‍चात्य विद्वानों के विचार (लिंक) की चर्चा की थी। जहां एक ओर संस्कृत के आचार्यों ने कहा था कि लोकमंगल और आनंद, ही कविता का “सकल प्रयोजन मौलिभूत” है, वहीं दूसरी ओर पाश्‍चात्य विचारकों ने लोकमंगलवादी (शिक्षा और ज्ञान) काव्यशास्त्र का समर्थन किया।। आइए अब पाश्‍चात्य विद्वानों की चर्चा को आगे बढाएं।

प्लॉटिनस ने दर्शन के आधार पर विवेचना करते हुए कहा कि कविता उस परम चैतन्य तक पहुंचने का सोपान है। उनके अनुसार कविता के प्रयोजन आनंद और परम चेतना के सौंदर्य का साक्षात्कार है।

तीसरी शताब्दी के उत्तरार्द्ध से चौदहवीं शताब्दी के पुर्वार्द्ध तक अंधकार युग माना जाता है। इसके बाद नवजागरणकाल की शुरुआत हुई। यह विश्‍व इतिहास की एक युगान्तरकारी घटना थी। इस काल में साहित्य और कला में एक नई चेतना का प्रादुर्भाव हुआ। बल्कि प्रबल विस्फोट कहना ज़्यादा उचित होगा। धर्मांधता और रूढिवादिता पर प्रहार हुआ और हर चीज़ों की विवेचना और विश्लेषण वैज्ञानिक दृष्टिकोण से किय जाने लगा। नए-नए आविष्कार हुए। धर्म-दर्शन को नए ढ़ंग से परिभाषित किया गया। हर दिशा में क्रांतिकारी परिवर्तन परिलक्षित हुए। नई चेतना का प्रचार व प्रसार हुआ। इसे रेनेसां (Renaissance) या पुनर्जागरण भी कहा जाता है।

नवजागरणकाल में प्राचीन यूनानी-रोमन ज्ञान का पुनरुद्धार हुआ। विज्ञान और तर्क की कसौटी पर वर्तमान की तलाश-परख की गई और रूढ और जर्जर मूल्यों-परम्पराओं का बहिष्कार हुआ। परलोकवाद की जगह इहलौकिक चिंतन को महत्व दिया जाने ल्लगा। धर्मनिरपेक्ष चिंतन का मार्ग प्रशस्त हुआ। एक नई ऊर्जा का संचार हुआ। स्पेंसर, मार्लो और शेक्सपियर सरीखे रचनाकारों का सृजन इसी ऊर्जा से ओत-प्रोत है।

इस काल के साहित्य का प्रयोजन था मानव की संवेदनात्मक ज्ञानात्मक चेतना का विकास और परिष्कार।

8 टिप्‍पणियां:

  1. आपका आलेख पढ़ कर कई नई जानकारियाँ मिली। मेरी सम्मति है कि इस आलेख में जिसे नवजागरण काल कहा गया है और जिसे प्राचीन यूनानी-रोमन ज्ञान की संज्ञा प्रदान की गई है वह भारत के न्याय-दर्शन से उधार लिए हुए ज्ञान पर आधारित रहा था। ऐसा नवजागरण गौतम के न्यायवाद की स्थापना और उसके विस्तार के साथ भारत में पहले हो चुका था। भारत पर यवनों की कूटसंद्धि के बाद बहुत से भारतीय ज्ञान पर यूनानियों का ठप्पा लग गया। यह सब वैसे ही हुआ जैसे आज हिंदी पर अंग्रेजी का ठप्पा लग रहा है।
    सद्भावी -डॉ० डंडा लखनवी

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  2. नवजागरण काल के विषय में अच्छी जानकारी ...आभार

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  3. RaajBhaasha Hindi par .....bahut hi gyaanbhardhak post , sabhi ke padhne laayak, baar-baar padhne laayak lag rahi hain.

    iske liye aapko aabhaar.

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  4. अच्छी जानकारी.


    श्री कृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक बधाई

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  5. "नवजागरणकाल की दृष्टि"
    अच्छी जानकारी ...आभार

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  6. आंच पर “साँझ भई फिर जल गयी बाती” http://manojiofs.blogspot.com/2010/09/33.html

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