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बुधवार, 10 नवंबर 2010

न रंगा सियार बने, न मेढक बने, अनुवादक बने !

मेरा फोटोसंतोष कुमार गुप्‍ता

भारत सरकार 1950 से केन्‍द्र सरकारी उपक्रमों, उद्यमों, बैंकों कारखानों व विविध यूनिटों में राजभाषा प्रचार-प्रसार हेतु करोड़ों रूपए व्‍यय करती रही है पर परिणाम आशानुकूल नहीं रहे हैं। इनके कारणों की मीमांसा करने पर मुझे दो कहानियॉं याद आ गईं।

जी हॉं, रंगा सियार और मेढक की कहानी।

एक घना जंगल था जिसमें बहुत सारे जंगली जीव रहते थे। वैसे तो इस जंगल में सभी प्रकार के वन्‍य जीव रहते थे किन्‍तु सियारों की बहुतायत थी। चुँकि उसमें बहुत सारे जंगली जीव रहते थे इस लिए वह शिकारियों का शिकार करने का प्रिय स्‍थल था। एक दिन जंगल में शिकारियों का एक दल आया । वे अपने साथ शिकार के आवश्‍यक विविध उपकरण भी लाए जिसमें एक ड्रम भी था। उस ड्रम में नील लगी हुई थी। शिकारियों ने शिकार किया तथा शाम को लौट गए किन्‍तु ड्रम वहीं छोड़ गए। शिकारियों के जाने के बाद वन्‍य जीवों ने राहत की सांस ली और अपने साथियों की सलामती जानने को जंगल में निकल पड़े। ऐसे में सियारों का दल भी जंगल में निकल पड़ा, अपने साथियों की सलामती जानने के लिए नहीं वरन शिकारियों द्वारा मारे गए जीवों के छोड़ दिए गए अवशेषों का सफाचट करने के लिए।

अंतत: दल ने तलाब के किनारे मृत नीलगाय के अवशेष को खोज लिया। अब उसे खाने के लिए सब सियारों में होड़ लग गई। इस अफरातफरी के माहौल में एक सियार शिकारियों द्वारा छोड़े गए ड्रम में जा गिरा जिससे उसके पूरे शरीर में नील लग गई। किसी तरह प्रयास कर वह ‘रंगा सियार’ ड्रम से निकलने सफल हुआ । उसे देखते ही सभी सियार पहले तो घबरा गए। उधर रंगा सियार दर्द के मारे कुछ बोल नहीं पा रहा था। उसके रंगे शरीर को देखकर अन्‍य सभी सियार उसे दिव्‍य शक्ति से अलंकृत मानने लगे तथा उसकी सेवा में लग गए और उसे भोजन व अन्‍य आवश्‍यक वस्‍तु उपहार में देने लगे। रंगा सियार के दिन फिर गए, अब वह शांत मुद्रा में अपने आवास के आगे बेठने लगा। वह मन ही मन प्रसन्‍न था कि उसे अब उसके अन्‍य साथियों की भॉंति भोजन की तलाश में भटकना नहीं पड़ता। इस तरह कुछ दिन निकल गए, इस बीच पूर्णिमा आ गई । रात को गोल चॉंद को देखते ही सभी सियारों में हुँऽआऽऽ, हुँऽआऽऽ करने की होड़ लग गई। इन आवाजों को सुनते ही रंगे सियार में भी ऐसी आवाज निकालने की प्रबल इच्‍छा हुई पर उसने कुछ हद तक तो अपने पर नियत्रण बनाये रखा क्‍योंकि वह समझ चुका था कि जैसे ही वह सियारों जैसी आवाज निकालेगा तो अन्‍य सियार उसे पहचान जाएंगे तथा उसे प्राप्‍त मान-सम्‍मान, उपहार सब कुछ समाप्‍त हो जाएगा। उसे भोजन के लिए जंगल में दिनों-दिन भटकना पड़ेगा। और हुआ भी वही जैसे ही उसने उनके साथियों की भॉंति आवाज निकालना आरंभ किया । सभी सियार उसे पहचान गए और रंगे सियार को प्राप्‍त सभी सुविधाएं समाप्‍त हो गईं।

कहने का तात्‍पर्य यह है कि आज शासकीय संस्‍थानों में बहुत सारे हिन्‍दी अधिकारी, सहायक निदेशक/ राजभाषा तथा राजभाषा प्रबंधक स्‍वयं को अपने कैडर के अन्‍य राजभाषा कर्मियों से बहुत अलग समझने लगे हैं, जबकि वास्‍तव में चाहे हिन्‍दी अधिकारी, सहायक निदेशक/राजभाषा , राजभाषा प्रबंधक, अनुवादक हो या राजभाषा सहायक सभी पर राजभाषा कार्यान्‍वयन का दायित्‍व एक समान हैं। किंतु वर्तमान में बहुत सारे हिन्‍दी अधिकारी, सहायक निदेशक/ राजभाषा तथा राजभाषा प्रबंधकों का व्‍यवहार रंगे सियार की भॉंति हो गया है।

अत्‍यन्‍त दु:ख के साथ यह लिखना पड़ रहा है कि आज जब मानव जगत चॉंद से आगे निकल कर ‘’मंगल’’ गृह की ओर बढ़ रहा है वहीं राजभाषा कार्यान्‍वयन के क्षेत्र में हिन्‍दी अधिकारी, सहायक निदेशक/ राजभाषा तथा राजभाषा प्रबंधकों की भूमिका मात्र अनुवादकों द्वारा किए गए अनुवाद की वेटिंग तथा कुछ सेमिनार कराने तक ही सिमट गई है।

क्‍यों नहीं हम आई.टी. क्षेत्र में हुए क्रॉंतिकारी परिवर्तनों का लाभ उठाते ? क्‍यों नहीं हम क्‍लर्क की मानसिकता से ऊपर उठ कर काम करें ? वर्तमान कई हिन्‍दी अधिकारी, सहायक निदेशक/ राजभाषा तथा राजभाषा प्रबंधकों को एक नई भूमिका ‘’प्रशासनिक अधिकारी’’ दी गई है। सर्वविदित है कि प्रशासनिक अधिकारी के असंख्‍य दायित्‍वों के साथ-साथ असंख्‍य अधिकार भी होते हैं। जिन्‍हें वह कार्यालय तथा कार्मिक हित में प्रयोग करता है। परन्‍तु यह देखने में आया है कि नई भूमिका में हमारे अधिकांश हिन्‍दी अधिकारी, सहायक निदेशक/ राजभाषा तथा राजभाषा प्रबंधक अनुवादकों पर ही अपने अधिकारों का प्रयोग कर अपने खंडित अहं को संतुष्‍ट कर रहे हैं।

ऐसा करके वे त्‍वरित प्रभाव के रूप अनुवादक को हतोत्‍साहित कर अपने अहम को संतुष्टि करने में सफल अवश्‍य हो जाते हैं परन्‍तु इसका दीर्घकालिक दुष्‍परिणाम पूरे संगठन के राजभाषा क्रियान्‍वयन पर पड़ता है।

अब आते दूसरी कहानी पर । एक छोटे से पोखर में एक मेढ़क रहता था । वह दिन भर पोखर में बिना किसी परेशानी के विचरण करता । छोटे-छोटे जीवों का भक्षण करता और आराम से टर्र-टर्र की आवाज निकाल कर दिन व्‍यतीत करता। चूँकि उस पोखर में कोई सर्प या उससे बड़ा अथवा उसका भक्षण कर सकने वाला अन्‍य जीव नहीं रहता था इसलिए उसकी दिनचर्या मजे में कट रही थी। ऐसे में वह अपने को दुनिया का बादशाह तथा पोखर को दुनिया ही समझने लगा। समय के साथ सावन का आगमन हुआ और इंद्र देव की कृपा हुई । अतिवृष्टि होने लगी पाखर लबालब भर गया, आसपास के गॉंव जलमग्‍न हो गए। ऐसे में बाढ़ के कारण न चाहते हुए भी मेढक पानी की धारा के साथ पोखर से निकल कर नदी से होता हुआ समुद्र में आ मिला । यहॉं समुद्र के विशाल जीव-जन्‍तुओं को देखकर उसकी सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई। यहॉं वह भोजन के लिए जब भी ऑखें खोलता तो उसे उससे बड़े व भयावह विचित्र जीव ही दिखाई पड़ते। ऐसी स्थिति में वह कमजोर होता गया और अंतत: एक दिन काल के गाल में समा गया ।

कहने का तात्‍पर्य यह है कि आज शासकीय संस्‍थानों में बहुत सारे हिन्‍दी अनुवादक, राजभाषा सहायक अपने वहीं पुराने कार्यविधि से संतुष्‍ट हैं तथा नविन परिवर्तनों को आत्‍मसात करने के प्रति उदासीन बने हुए हैं। स्‍वयं को अनुवादक की भूमिका में कम, लिपिक की भूमिका में अधिक सहज पाते हैं। माह के अंत में वेतन तो मिल ही जाएगा इस सोच से हमें ऊपर ऊठ कर कार्य करना होगा।

अब अनुवादकों को अनुवादक की भूमिका के साथ ही प्रशिक्षक की भूमिका में आना होगा। मात्र अनुवाद करके देने की अपेक्षा अब अपने सहकर्मियों को अनुवाद व हिन्‍दी युनिकोड टंकण के गुर सीखने में समय लगाना होगा। इसके साथ ही हमें हार्ड वर्कर के स्‍थान पर स्‍मार्ट वर्कर बनाना होगा और अनूदित समस्‍त डेटा को त्‍वरित संदर्भ हेतु इलेक्‍ट्रॉनिक फार्म में सुरक्षित रखना होगा अर्थात अनूदित सामग्रियों का डेटाबेस तैयार करना होगा जिससे समान रूप के प्रपत्रों को अनुवाद करने में हमें अधिक श्रम व समय का प्रयोग न करना पड़े और हमारी अनुपस्थिति में अन्‍य कार्मिक भी सहजता से अनुवाद करने में सफल हो पाएं।

यह सर्व विदित है कि आज के युवा मात्र एम.ए. की डिग्री के साथ ही शासकीय सेवा में अनुवादक के रूप में नहीं आते हैं बल्कि राजभाषा प्रचार-प्रसार में उपयोगी विविध सॉफ्टवेयर के में कार्य करने की दक्षता भी है। हमें स्‍वैच्‍छा से अपने इन्‍हीं ज्ञान व ऊर्जा का प्रयोग शासकीय कार्यालयों के वेबसाइट के द्विभाषीकरण, ऑन-लाइन हिन्‍दी शब्‍दकोश, द्विभाषी ऑन-लाइन प्रशिक्षण सामग्री तैयार करने में लगानी होगी।

प्राय: अनुवादकों व राजभाषा कर्मियों की यह शिकायत रहती है कि आई.टी. विभाग उनके सहयोग हेतु उदासीन रवैय्या रखता है पर अनुवादकगण स्‍वत: से यह प्रश्‍न करें कि यदि वह इंटरनेट का उपयोग जानता है तो क्‍यों नहीं वे यूनिकोड फान्‍ट का उपयोग करता है ?, क्‍यों वह वेबपेज डिजाइनिंग नहीं सीखता ? क्‍यों वह एम.एस. वर्ड की भॉंति ही एम.एस. फ्रन्‍टपेज में कार्य नहीं करता ? हमें सदैव स्‍मरण में रखना होगा कि यदि हम पहल करेंगे तो लोग भी हमारे साथ जुड़ेंगे। पहल ही नहीं होगा तो जुड़ने का प्रश्‍न ही नहीं आएगा।

10 वर्ष अनुवादक के रूप में कार्य करने के पश्‍चात मैं यह जान गया हूँ कि हम अपनी क्षमता से बहुत कम कार्य कर पाएं हैं, जो कि चोरी करने के समान ही है। कार्यालय समय में ही हमारे पास बहुत कुछ सीखने के पर्याप्‍त अवसर व समय होता है। हम सभी राजभाषा कर्मी कार्यालय समय में सूचना प्रौद्योगिकी का हिन्‍दी में प्रशिक्षण ग्रहण करें। पुस्‍तक खरीद योजना के अन्‍तर्गत सूचना प्रौद्योगिकी की हिन्‍दी में उपलब्‍ध पुस्‍तकें खरीदें व उसका अनुसरण करके वेबपेज डिजाइनिंग सीखें।

हिन्‍दी अधिकारी, सहायक निदेशक/राजभाषा, राजभाषा प्रबंधक, अनुवादक या राजभाषा सहायक हमें आपसी मन-मुटाव दूर रखकर राजभाषा कार्यान्‍वयन के मिशन में लगना होगा। एक–दूसरे को नीचा दिखाने से राजभाषा कैडर की छवि तो खराब होगी ही इसके साथ ही आम कार्मिकों में यह संदेश जाएगा कि इनक पास कोई काम ही नहीं है। राजभाषा संबंधी दोनों ही वर्ग के पदों पर बने लोगों को ध्‍यान में रखना होगा कि जब हम दूसरे का सम्‍मान करते है तो ही हमें सम्‍मान मिलता है।

इस लेख के माध्‍यम से मैंने किसी कैडर विशेष पर आक्षेप नहीं लगाया है । बस 10 वर्ष के अनुभवों तथा राजभाषा कार्यान्‍वयन के मार्ग की बाधाओं की ओर लोगों का ध्‍यान आकर्षित करने का तुच्‍छ प्रयास मात्र किया है।

अतंत: पुन: कहुँगा कि न रंगा सियार बने, न मेढक बने, अनुवादक बने !

शुक्रवार, 1 अक्टूबर 2010

बदलते परिवेश में अनुवादकों की भूमिका

बदलते परिवेश में अनुवादकों की भूमिका मनोज कुमार
 

जहां एक ओर पिछले कुछ दशकों में सांस्कृतिक, सामाजिक और आर्थिक क्षेत्र में अभूतपूर्व बदलाव आया है वहीं दूसरी ओर हिंदी के ज़रिए एक वैश्‍विक क्रांति का आगाज़ हुआ है। न सिर्फ हिंदीतर भाषी बल्कि विदेशी भी यह समझ चुके है कि अगर आम भारतीयों को कोई संदेश देना है तो हिंदी को माध्यम बनाना ही होगा।  आज अनुवाद एक व्यापक विषय बन गया। पूरे विश्‍व में तेज़ी से बदलाव आ रहा है। अत: बदलते परिवेश में अनुवाद के संदर्भ में अनेक बिंदुओं का विकास अब ज़रूरी हो गया है। इसमें अनुवादकों की भूमिका काफी बढ़ जाती है।

आज बाज़ारवाद के असर में हिंदी भाषा के बदलते रूप से कौन नहीं परिचित है। यह एक व्यवसायिक हिंदी का रूप इख़्तियार कर चुकी है। इसका चौतरफा विस्तार हो रहा है। इसके फलस्वरूप हिंदी ने इस घोर व्‍यावसायिक युग में संचार की तमाम प्रतिस्‍पर्धाओं को लाँघ अपनी गरिमामयी उपस्थिति भी दर्ज कराई । जिसका रोजमर्रा की जिंदगी में कोई खास उपयोग नहीं है वह प्रायः आम लोगों के लिए कोई विशेष महत्‍व नहीं रखती। मशीनी युग के भाग-दौड़ में वही चीज स्‍वागतेय है जिसका सीधा और तीव्र प्रभाव पड़ता हो। परिवर्तन ही एक मात्र शाश्‍वत है। हिंदी को भी रूढिवादिता एवं परंपरावादिता से बाहर निकल कर दैनिक जीवन की छोटी-बड़ी सभी आवश्‍यकताओं की पूर्ति के लिए बाजार के मान-दंड पर खड़ा होना पड़ा है। इस हिंदी का सौन्दर्य अलंकारों से नहीं साधारनीकरण से है। आज अनेक विदेशी उत्‍पादों के विज्ञापन भारत में हिंदी में किए जाते हैं ऐसी हिंदी में जो आम आदमी से लेकर खास आदमी तक पर प्रभाव डाल सके। फलत: हिंदी के ज़रिए रोजगार के नए-नए अवसरों का समावेश हुआ है।

हालांकि साहित्‍य के अलावे ज्ञान-विज्ञान के अनेक क्षेत्रों में भी हिंदी का इतिहास कमजोर नहीं रहा है, अपितु ज्ञान-विज्ञान का हस्‍तांतरण मजबूत भाषा की विशेषता रही है। आज की तारीख में चिकित्‍सा, अभियंत्रण, पारिस्थितिकी, अर्थशास्‍त्र से लेकर विभिन्‍न भाषाओं से साहित्‍य का हिंदी में अनुवाद करने वालों की भारी मांग है। यह पूर्णतः अनुवादक पर निर्भर करता है कि वह जिस भाषा से और जिस भाषा में अनुवाद कर रहा है उन भाषाओं पर उसका कितना अधिकार है और इन भाषाओं की अनुभूतियों में वह कितनी तारतम्‍यता कायम रख सकता है। एक सफल अनुवादक वही होता है जो अनुदित कृति में भी मूल कृति की नैसर्गिक अनुभूतियों को अपरिवर्तित रखे। अनुवाद करते समय स्रोत भाषा की रचना के परिवेश और प्रसंग को समझकर ही अनुवादक को लक्ष्य भाषा में अनुवाद करना चाहिए। अपने किसी आत्मीय को बहुत दिनों के बाद देखकर अगर कोई पश्‍चिम के देशों का विदेशी कहे “You came as sunlight” तो इसका अनुवाद हिंदी में “तुम सूर्यप्रकाश की तरह आए” के स्थान पर “तुम्हारे आने से बड़ी खुशी हुई” सही होगा।

कार्यालयों में अनुवाद का प्रयोग एक विशेष प्रयोजन के लिए होता है। राजभाषा हिंदी के ज़रिए हमारा प्रयास भारत के सभी प्रांतों, अंचलों और जनपदों के बीच सौहार्द्र, सौमनस्य व परस्पर स्नेह से एक सूत्र में बांधने का होना चाहिए। राजभाषा के प्रयोग का अधिकाधिक अवसर तभी मिलेगा जब उसमें सभी भारतीय भाषाओं के शब्दों का सहज समावेश हो। अनुवाद और अनुवादक की सार्थकता तभी है जब प्रवाहमय भाषा का प्रयोग होगा। भाषा में सदैव नए प्रयोग चलते रहते हैं। हिंदी भाषा में भी बाज़ारवाद, वैश्‍वीकरण, भौगोलीकरण एवं भूमंडलीकरण के कारण कई नए प्रयोग हो रहें हैं। अनुवादकों को इस बात का ख़ास ख़्याल रखना चाहिए। उन्हें इन परिवर्तनों को अपनी सहज प्रवृत्ति के रूप में ढ़ालना चाहिए। सहज प्रवृत्ति से सहज भाषा निर्मित होती है। सहज भाषा ही सर्वग्राह्य होगी। अनुवादकों को यह ध्यान रखना चाहिए कि हिंदी भाषा को इतना बोझिल और कृतिम न बना दिया जाए कि इसकी सहजता नष्ट होने लगे। प्रचलित और सबकी समझ में आने वाली व्यवहार-कुशल हिंदी ही सर्वग्राह्य हो सकती है। सरकारी कार्यालयों में साहित्यिक और व्याकरण सम्मत हिंदी का आग्रह रख हम इसका विकास नहीं कर सकेंगे। यहां की शब्दावली में न तो भावनाओं का प्रवाह होता है न विचारों की प्रबलता। यहां मात्र माध्यम बनने की नियति होती है। अनासक्त तटस्थता यहां के अनुवाद का मूलमंत्र है।

अनुवाद करते समय स्रोत भाषा की रचना के परिवेश और प्रसंग को समझकर ही अनुवादक को लक्ष्य भाषा में अनुवाद करना चाहिए।!

अत: परिवर्तन के इस दौर में अनुवादकों की भूमिका काफी चुनौतीपूर्ण है। अनुवाद में स्रोत भाषा के अर्थ या संदेश का लक्ष्य भाषा में सम्प्रेषण ही मुख्य बात है। समरूपता की दृष्टि से दो भाषाओं में संरचनात्मक अंतर स्वाभाविक है। अनुवाद में स्रोत भाषा में कही गई बात को लक्ष्य भाषा में व्यक्त करने के लिए लक्ष्य भाषा के समतुल्य शब्द, भाव और कथ्य ही अनुवादक का अंतिम लक्ष्य होना चाहिए। एक भाषा के पाठ की भाषिक व्यवस्था का दूसरी भाषा की भाषिक प्रतीक व्यवस्था में रूपांतरण अनुवाद कहलाता है। स्रोत भाषा से लक्ष्य भाषा में अंतरण समतुल्यता के आधार पर किया जाता है। समतुल्यता के सिद्धांत के सार्थक निर्वाह के बिना सफल अनुवाद संभव नहीं होता। प्रत्येक भाषा का प्रत्येक शब्द अपने-आप में एक प्रतीक होता है और वह एक विशिष्ट प्रकार का आशय अथवा अर्थ ध्वनित करता है। सिद्धांतत: दो प्रतीक एक जैसे अर्थ के वाहक नहीं होते। अंग्रेजी में ‘वाटर’ और ‘एलीफैंट’ के लिए क्रमश: ‘पानी’ और ‘हाथी’ समान्य पर्याय हैं। किंतु क्रमश: नीर, अंबु या तुरंग, गज आदि शब्दों को अंग्रेजी शब्दों के सामान्य पर्याय के रूप में ग्रहण नहीं किया जा सकता क्योंकि इन शब्दों की अपनी-अपनी अर्थ ध्वनियां हैं। अनुवादक को लक्ष्य और स्रोत दोनों ही भाषाओं में शास्त्रीय दृष्टि से पारंगत एवं सृजनात्मक दृष्टि से सक्षम होना चाहिए। तभी उसे दोनों भाषाओं के शब्दों और मुहाबरों का ज्ञान हो सकता है। एक ही भाव लिए बहुत समानार्थी शब्द मिल सकते हैं पर वे भिन्न- भिन्न स्थियों को सूचित करते हैं। अत: उनका प्रयोग बहुत सोच-समझ कर करना होता है। मुहाबरों का अनुवाद नहीं हो सकता। अनुवादकों को लक्ष्य भाषा में वैसे ही अर्थ देने वाले मुहावरे ढ़ूंढ़ने होंगे। ‘किसी की आंख का नूर हँ’ का अनुवाद “the light of one’s eye” न होकर “the apple of one’s eye” होगा।

भाषा न कठिन होती है न सरल, सहज या असहज। कैसा भी कठिन शब्द निरंतर प्रयोग के बाद सहज हो जाता है और अपना बन जाता है। अनुवादक को भाषा की सरलता और जटिलता से ऊपर उठकर सहज भाषा में अनुवाद करना चाहिए। जब अनुवादक सहज भाषा में काम करने लग जाता है तो वह सर्जक हो जाता है। आज अनुवाद का क्षेत्र काफी बढ़ गया है। आज अनुवाद न तो घटिया किस्म का रोजगार रहा और न कामचलाऊ चीज़। आज वह विभिन्न भाषाओं के विस्तार का संसाधन बन गया है। आज विश्‍व का एक दूसरे से परिचय अनुवाद के परिचयपत्र के माध्यम से हो रहा है। अनुवाद आज सांस्कृतिक साहित्यिक राजदूत की भूमिका निभाता है।

हिंदी आज विविध रूपों में प्रयोग की जाती है। इस विविधता में सौंदर्य भी है, शक्ति भी है। अब यही विविधता अनुवादों की दुरुहता के कारण आम आदमी की उपेक्षा करने लगे तो वह कुरूपता और दुर्बलता का प्रतीक बन जाएगी। अत: अनुवादकों को संस्कृत के भारी-भरकम शब्दों के उपयोग से बचना चाहिए। लंबे वाक्यों को दो या दो से अधिक छोटे वाक्यों में बदलकर लिखना चाहिए। संसार में लगभग तीन हज़ार भाषाएं लिखी जाती हैं। इन भाषाओं में उपलब्ध सभी प्रकार के ज्ञान को एक-दूसरे तक पहुँचाने का माध्यम अनुवाद है। अनुवाद एक भाषा को दूसरी भाषा में लिख देना मात्र नहीं है। यह वह विधा है जिसमें अनुदित रचना स्वतंत्र एवं मौलिक लगे। वह सार्थक और मूल रचना के समग्र अर्थ में होना चाहिए। अत: अर्थ की परिशुद्धता अनुवाद का मूल मंत्र है।

आज साहित्य, तकनीकी तथा संचार के क्षेत्र में अनुवाद का कार्य हो रहा है और इन क्षेत्रों में अनुवाद का चरित्र और सम्प्रेषणनीयता का मापदंड भिन्न है और अनुवादकों का भी. जहाँ साहित्यिक अनुवाद में भाव को सम्प्रेषण करना होता है उसकी पृष्ठभूमि, भावभूमि और विम्ब संरचना के साथ, वही तकनीकी अनुवाद में तथ्य को अनुवाद करना मुख्य लक्ष्य होता है. आज संचार के क्षेत्र में हिंदी एवं स्थानीय भाषाओँ में काफी अनुवाद हो रहा है खास तौर पर विज्ञापन ने अनुवाद को नई दिशा दी है.  इसमें अनुवाद का लक्ष्य भाषिक ग्राहकों को लुभाना होता है, उनके ह्रदय तक पहुचना होता है, बाज़ार का सृजन करना होता है. ऐसे में जहाँ साहित्य के अनुवाद के लिए अनुवादक को साहित्यानुरागी होना चाहिए, वही तकनीकी अनुवाद के लिए तकनीकी ज्ञान का होना ए़क  आवश्यकता  है.  वही विज्ञापन के अनुवाद में भाशा की समझ के साथ साथ बाज़ार की समझ भी जरुरी है.

उत्कृष्ट अनुवादक वही है जो स्रोत और लक्ष्य भाषा के सामाजिक और सांस्कृतिक संदर्भों का भी ध्यान रखे। समाज जिस अर्थ में किसी शब्द का प्रयोग करता है अनुवादक को भी उसी अर्थ में उस शब्द का प्रयोग करना चाहिए। स्रोत भाषा और लक्ष्य भाषा दो समानान्तर रेखाएं हैं। उनकी परस्पर दूरी को कम करने का प्रयास अनुवाद है। अनुवादकों को अपनी भाषा में देशी, प्रांतीय और सहज शब्दों को लेना चाहिए तभी हिंदी और हिंदीतर भाषाईयों के बीच की दूरी कम होगी।

आज अनुवाद न तो घटिया किस्म का रोजगार रहा और न कामचलाऊ चीज़। आज वह विभिन्न भाषाओं के विस्तार का संसाधन बन गया है। आज विश्‍व का एक दूसरे से परिचय अनुवाद के परिचयपत्र के माध्यम से हो रहा है। अनुवाद आज सांस्कृतिक साहित्यिक राजदूत की भूमिका निभाता है।

सोमवार, 17 मई 2010

अनुवाद और संप्रेषणीयता

Vista02 अनुवाद और संप्रेषणीयता


---- मनोज कुमार

003 कोई भी शब्द अपने आप में सरल या कठिन नहीं होता। किसी शब्द का सरल या कठिन होना वाक्य संरचना में प्रयोग के आधार पर निर्भर करता है।

हिंदी भाषा में विविधता है। यह विकासशील भाषा है। बीतते समय में इसकी प्रकृति, शब्दावली आदि में निरंतर परिवर्तन होते रहे हैं। अनेक भाषा के शब्द इसमॆं समाहित हो गए हैं।

आपको मालुम होगा कि हमारे संविधान के अनुच्छेद 351 में यह परिकल्पना की गई  है कि हिंदी एक ऐसी भाषा होगी जिसमें भारत की सामासिक संस्कृति की झलक मिले।

उपर्युक्त बातों को ध्यान में रखते हुए यह कहना चाहूंगा कि अनुवादकों से हमारी अपेक्षा बहुत अधिक होती है। हम चाहते हैं कि अनुदित सामग्री में भी वही भाव हो जो स्रोत भाषा में है। इसके साथ ही अनुवादकों को यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि अनुदित सामग्री को पढने वाले मूल सामग्री के पढने वाले से अलग होते हैं। दोनों वर्गों के रहन-सहन, रिति-रिवाज़ और बौद्धिक स्तर में फ़र्क़ हो सकता है। इसे अनुवादकों को समझना चाहिए। इसलिए जब वे अनुवाद करते हैं तो न सिर्फ़ उपर्युक्त बातों का ध्यान रखें बल्कि  पात्र,  देशकाल एवं परिस्थिति के अनुसार भाषा के प्रयोग की अपेक्षा को भी ध्यान में रखें।

विभिन्न भाषाओं से संदर्भ के अनुसार शब्द लेते हुए संप्रेषणीय अनुवाद करना एक अनुवादक का दायित्व है। आज के बदलते परिदृष्य में अनुवादकों की भूमिका न सिर्फ़ महत्वपूर्ण है बल्कि बहुत ही चुनौती भरी है। एक बात जो सबसे चुनौती भरी है वह यह कि अनुवादक को लक्ष्य भाषा में मौज़ूद कई समान अर्थ रखने वाले शब्दों में से सबसे अधिक उपयुक्त शब्द का चुनना। इसके साथ ही वे ऐसी वाक्य संरचना करें कि कठिन शब्द भी सरल लगे और आसानी से समझ में आए।

इस चुनौती का सामना करने के लिए अनुवादक को भाषा के इतिहास, भाषा विज्ञान, व्याकरण आदि का समुचित ज्ञान होना चाहिए। इस प्रकार वे लोगों को अपनाने लायक अनुवाद कर पाएंगे। जो सर्वग्राह्य होगा वही सफल अनुवाद कहलाएगा।

006 अनुवादकों को हिंदी प्रौद्योगिकी की भी सहायता लेनी चाहिए। अनुवाद कर्य और अनुवाद कर्मियों के लिए विकिपीडिया (http://hi.wikipedia.org/wiki/) के बंधु प्रकल्प में विकि-शब्दकोश, विकिताबें, विकिक्वोट, विकिस्रोत, विकिस्पीशीज आदि विषय दिए गए हैं। विकि-शब्दकोश में सामान्य शब्दों के साथ ही विभिन्न तकनीकी विषयों के शब्दों को अंग्रेज़ी में अर्थ सहित दिया गया है।