श्रद्धेय गुरु तुल्य स्व. श्री श्यामनारायण मिश्र हमारे साथ मेदक में काम करते थे। वहां उनसे नवगीत विधा में रचना की ढेर सारी जानकारी मिली और उनके मार्गदर्शन में बहुत कुछ सीखा। कई नवगीत लिखे भी। मेदक से मैं स्थानान्तरण होकर चंडीगढ आ गया। जब चंडीगढ में था तो उनसे पत्राचार होते रहते थे। आज उनका लिखा एक पत्र और उनकी एक रचना पोस्ट कर रहा हूं। अब वो हमारे बीच नहीं रहे। उनकी एक मात्र संतान उनकी पुत्री से इसे पोस्ट करने की अनुमति ले चुका हूं। हर सप्ताह गुरुवार के दिन उनकी एक रचना हम प्रकाशित करेंगे तथा नवगीत विधा पर कुछ चर्चा भी।
पत्र लिखना स्वयं में एक कला है। मुझे तो यह पत्र किसी साहित्यिक कृति से कम नहीं लगता। तो पहले पत्र फिर उनकी एक रचना।
आदरणीय मनोज कुमार साहब,
सादर नमस्कार।
आप तो जानते हैं कि कभी मेरी आत्मा गीतों में ही रची-बसी थी। भावपूर्ण गीतों के साथ आपके पत्र मिलते ही मैं अपने अतीत में लौट आता हूँ। इन गीतों से मेरे भी सुख दुख जुड़े हैं इसलिए मुझे ये प्रिय हैं। गीत हमारी रग रग में प्रवाहित होते हैं। इतने प्राकृतिक हैं ये। हवाओं का, पानी का और हमारे मन का साथ साथ बहना किसी धुन किसी लय और किसी छंद में ही होता है।
हू-हू हाय-हाय कल कल कल कल
सूं-सूं-धांय-धांय छल छल छल छल
कू-कू-कांय-कांय (कांव कांव) भल भल भल भल
चूं चूं चांय-चांय तल तल तल तल
टू-टू टांय-टांय मल मल मल मल
ठू-ठू ठांय ठांय पल पल पल पल
कुछ प्राणियों के स्वर भी उदाहरण के रूप में देखे जा सकते हैं
पंत जी ने लिखा है - "टी बी टी टुट टुट बोल रही थी चिडि़यां।"
तीतर बोलता है -- चिड़ी कोको, चिडि़ कोको ।
बटेर की आवाज -- चह गुल गुल, चह गुल गुल
चक्रवाक का स्वर है -- दुर्र पों, दुर्र पों ।।
मानसून आते ही हर दिशाओं में पंछियों की कुछ ऐसी ही बोलियां गूंज उठती है। तिल बोऊं कि कक्करा। उठो लोगो जिमी जोतो। उठ पूल तिल पूर। पचीस तीस लात। बस इनकी आवृतियों पर नजर (ध्यान) रखते रखते मेरे ओठो पर छंद ताल लय से पूरित गीत थिरकने लगते थे। ग्वालों का बंशी अलगोजा, बच्चों की पपिहरी, लड़कियों का फुंकनी फुकना, गायों के गले लकड़ी के घंटी नुमा खड़खड़े बजना मुझे सब कुछ गीत नुमा लगते थे। देहातियों का गाली गलौज करना - हरामजादे, कमीने की औलाद, मुंहजले या और भी फूहड़ गालियां -- सब कुछ तो गीत मय ही था। बच्चों का कुछ बोलकर मुंह चिढ़ाना, रोना, मचलना, छींकना-डकारना क्या सब लय बद्ध ताल बद्ध और छंद बद्ध (आवृतियों के साथ) नहीं है? इसलिए मैं गीत के समर्थन में सदा रहा। तथाकथित कविता गद्य से या नई कविता से मुझे कोई शिकायत नहीं, मैं उसे कविता नहीं मानता क्योंकि वह प्राकृतिक नहीं है। मैं अतीत की दूरी में जाकर काव्य की व्याख्या के पचड़े में नहीं पड़ना चाहता हमें अपने ही युग में जीना और मरना है।
अपनी ही सांस की धुन सुनकर मन कभी हिरन सा बिदक उठता है, मैं इसे भी कविता में बांध चुका हूँ। फिर कोई कारण नहीं है कि हमारे तमाम जीवन्त क्रिया-कलाप गीतों के अंश नहीं बनते। सचमुच वह बड़ा अलग संसार था। कई बार अस्तित्व की रक्षा के लिए बचाव की मुद्रा में आना पड़ा और अब तो बस बचाव में जीवन उलझकर रह गया है। आप मेरे जीवन यथार्थ से भली भांति परिचित हैं। समय ने मुझे कुछ भी न बनने दिया, यह कहना ठीक नहीं। बस अपने व्यक्तित्व में ही कुछ कमियां थी कि हम समय या अवसर से लाभ लेना न सीख सके।
मुझे पूरा विश्वास है आप अपने पूरे जीवन का सदुपयोग सृजन में कर सकेंगे। ईश्वर ने आपको प्रतिमा के साथ-साथ चयन की क्षमता, काल का विशाल फलक दे रखा है। बस गावं या नदियों वाली रचना की तरह शब्दों से गीत चित्र बनाते रहें। आपके सुखद-सफल भविष्य की कामना के साथ पत्र समाप्त करता हूँ।
भवदीय
श्यामनारायण मिश्र
अब
नवगीत
ये अंधेरों में लिखे हैं गीत
श्यामनारायण मिश्र
ये अंधेरों में लिखे हैं गीत
सूर्य से इनको जंचाना चाहता हूँ।
दिनभर आकाश से आखें लड़ाकर
शहतीर के नीचे दुबककर सो गई चिडि़या,
आंखों में सतरंगी इन्द्रधनुष के अंडे
सपनों के सुख में ही खो गई चिडि़या,
कुंठा के कोबरे-करैतों की
दाढ़ से इसको बचाना चाहता हूँ ।
एक ओर घर था एक ओर जंगल
घर को अपनाकर वह परेशान क्यों है?
जिसको बेआबरू करके निकाला था
आंखों में अब भी वह मेहमान क्यों है?
आघात से अनवरत रिसता है,
इस रंग से जीवन रचाना चाहता हूँ ।