सोमवार, 5 सितंबर 2011

असमंजस …

 

द्रोण ,
जो आधुनिक युग के
गुरुओं के
पथ - प्रदर्शक थे
उन्होंने सिखाया कि
पहले लक्ष्य साधो
फिर शर चलाओ
अर्थात
पहले मंजिल को देखो
फिर मंजिल पाने के लिए
कर्म करो,


कृष्ण ने कहा कि -
कर्म करो ,
फल की इच्छा मत रखो
मैं , अकिंचन
क्या करुँ ?
एक ईश्वर और एक गुरु










कबीर ने कहा -----
गुरु की महिमा अपरम्पार

जिसने बताया ईश्वर का द्वार
गुरु की मानूं तो फल - भोगी
हरि को जानूं तो कर्म - योगी
क्या बनना है क्या करना है
निर्णय नही लिया जाता है
पर लक्ष्य बिना साधे तो
कर्म नही किया जाता है .



संगीता स्वरुप

22 टिप्‍पणियां:

  1. जिसने बताया ईश्वर का द्वार
    गुरु की मानूं तो फल - भोगी
    हरि को जानूं तो कर्म - योगी
    क्या बनना है क्या करना है
    निर्णय नही लिया जाता है
    पर लक्ष्य बिना साधे तो
    कर्म नही किया जाता है .

    @1.गुरू गोविंद दोऊ खड़े काके लागूँ पाय,
    बलिहारी गुरूदेव की गोविंद दियो बताय ।
    2.कर्मणेय वा धिकारेस्तु मां फलेषु कदाचनम ।
    3.First you deserve then you desire.
    काश ! आज के युग में हमें कोई द्रोणाचार्य जैसा गुरू मिल जाता । पोस्ट अच्छा लगा । सुप्रभात । धन्यवाद

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  2. उद्धारक तो गोविन्द ही हैं जो कहें वही शिरोधार्य होना चाहिए!

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  3. अच्‍छा चिंतन है। बधाई।

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  4. असमंजस की स्थिति कहाँ है संगीता जी ! गुरू ने कहा पहले लक्ष्य साधो फिर कर्म करो ! हरि का परामर्श कर्म से आरम्भ होता है ! तीन स्थितियाँ है ! पहले लक्ष्य, फिर कर्म और अंत में फल ! पहले सम्पूर्ण एकाग्रता से लक्ष्य साधना है कर्म के सफल निष्पादन के लिये, उसके बाद कर्म करना है यह सोचे बिना कि यह मीठा फल देगा या तीखा और तीसरी स्थिति में जो फल मिले उसका वरण करना है ! लक्ष्य किस पर साधना है इसका विवेकपूर्ण निर्धारण परम आवश्यक है ! मेरे विचार से तो गुरू और गोविन्द दोनों के बताए रास्ते एक ही दिशा में जा रहे हैं ! बहुत सुन्दर रचना ! शिक्षक दिवस की हार्दिक शुभकामनायें !

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  5. एक उत्कृष्ट चिंतन.
    कर्म-योगी बनकर निर्धारित लक्ष्य साधने से जब भी फल प्राप्त होगा - राग-द्वेष ,सफलता-असफलता के भावों से मुक्त रहेगा और मनोवांछित फल प्राप्त नहीं होने का दु:ख नहीं होगा.

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  6. ज्ञान भिन्न कुछ क्रिया भिन्न है,
    इच्छा क्यों पूरी हो मन की .
    एक दूसरे से न मिल सके ,
    यह विडंबना है जीवन की !
    - 'कामायनी से '
    आप स्वयं गुरु हैं .इच्छा,ज्ञान और क्रिया की दिशायें भिन्न हों तो बेचारा गुरु या ईश्वर क्या करे!

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  7. सार्थक चिंतन की ओर प्रेरित करती कविता... बहुत सुन्दर

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  8. कृष्ण यह भी कहते है कि तू वो करता है जो तू चाहता है और फल भी वही चाहता है जो तू चाहता है , मगर होता वही है जो मैं चाहता हूं इसलिए वह कर जो मैं चाहता हूँ तो वही होगा जो तू चाहता है ...
    इस कविता से बरबस ही जुड़ रही हैं ...
    सार्थक चिंतन!

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  9. सभी पाठकों का आभार ... आप सबके विचार मंथन से दिशा मिल रही है ... आप सभी गुरुओं को नमन ..

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  10. गुरु का दर्जा तो भगवान से ऊपर माना जाता है फिर कैसा असमंजस्……………भगवान गुरु से नही मिलवा सकता मगर गुरु जरूर भगवान से मिलवा सकता है यही फ़र्क है दोनो मे तो क्यों रहे असमंजस्…………गुरु के बताये मार्ग पर यदि आँख बँद करके भी चलो तो भी कल्याणकारी होता है।
    इसी विषय मे एक किस्सा सुनाती हूँ जैसा मुझे ध्यान है हो सकता है थोडा बहुत फ़र्क हो जो कहीं सुना था और सच्चा है…………एक ब्राह्मण था मगर उसे बहुत सी बुरी आदतों ने घेरा था यहाँ तक कि वो मदिरापान भी किया करता था उससे गुरुदीक्षा लेने एक व्यक्ति पहुँचा अब ब्राह्म्ण देवता नशे मे तो थे ही इसलिये काली का मंत्र दे दिया जिसके उच्चारण मे गलत बता दिया अब वो व्यक्ति उसी मंत्र का जाप पूरी लगन और निष्ठा से करने लगा और इतनी निष्ठा को देखकर काली माँ को गुस्सा आया और उसे एक थप्पड लगाया जैसे ही उसने माँ को देखा उन्हे दण्डवत किया और मारने का कारण पूछा तो माँ बोली कि ये क्या करता है मंत्र का गलत उच्चारण करता है ये सुन उसने कहा मेरे गुरु ने दिया है तो गलत कैसे हो सकता है तब माँ बोली कि सही मंत्र ये है इससे साधना सफ़ल होगी तुम्हारे गुरु ने नशे मे गलत उच्चारण बता दिया था मगर वो बोला कि ये कैसे हो सकता है इस मंत्र मे कितनी शक्ति है कि इसने आपको प्रकट होने पर विवश कर दिया और मेरे गुरु का दिया मंत्र गलत कैसे हो सकता है । ये देख माँ उसकी गुरुनिष्ठा पर बहुत प्रसन्न हुई और उसे समझाया और वरदान मांगने को कहा जिसे सुन उसने कहा कि माँ आज से आपका यही मंत्र सर्वग्राह्य हो जाये और माँ ने उसे ये वरदान दे दिया जिसे आज भी बंगाल मे इसी रूप मे प्रयोग किया जाता है।
    गुरु मे तो इतनी शक्ति होती है मगर उसके लिये गुरु के वाक्य पर भी उतनी ही निष्ठा का होना भी जरूरी है।

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  11. lakshya na ho to karm bekaar ... haan use karm mein ichha nihit nahi karni hai, ishwar sab dekhte hain ....

    hamesha ki tarah jwalant vichaaron ka samavesh

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  12. असमंजस से तो गुरु रूप में खड़े गोविन्द ही उबार सकते हैं!

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  13. हम्म उत्कृष्ट चिंतन.हम भी सोच रहे हैं.

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  14. आज शिक्षक दिवस पर प्रेरणा देती सार्थक पोस्ट
    आभार

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  15. बेहद खूबसूरत और अपने समय की आवाज़ है यह पोस्ट .
    पर लक्ष्य बिना साधे तो
    कर्म नही किया जाता है .

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  16. क्या बनना है क्या करना है
    निर्णय नही लिया जाता है
    पर लक्ष्य बिना साधे तो
    कर्म नही किया जाता है .

    bahut khoob...aabhar

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  17. संगीता दी,
    गोविन्द भी गुरु के ही पक्ष में बोल रहे थे.. वह गुरु जिसने यह सिखाया कि लक्ष्य निर्धारित करो फिर शर संधान करो.. जब शिष्य वही ज्ञान भूल गया, तो गोविन्द को कहना पड़ा कि तेरा अधिकार सिर्फ कर्म पर है, क्योंकि तेरी मंजिल, तेरा लक्ष्य तो पहले ही निर्धारित हो चुका है.. फल की चिंता व्यर्थ है.. या तो तू वीरगति को प्राप्त होगा या विजय को.. किन्तु कर्म का त्याग करके तो क्षात्र धर्म से च्युत हो जाएगा!!
    कविता के भावों में नवीनता है!जो निश्चित तौर पर प्रशंसनीय है!!

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  18. मै विज्ञजनो की गूढ़ बाते पढने आता रहूँगा. अद्भुत चिंतन .

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  19. वंदना जी ,

    आपकी कहानी शिक्षक में विश्वास को बताती है ... काश ऐसा विश्वास आज के विद्यार्थी भी करते ..

    सलिल जी ,

    आपकी बात से सहमत हूँ ..अच्छा चिंतन किया है ... सभी पाठकों को आज नमन ..

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  20. तीन बातें हैं - लक्ष्य का निर्धारण, संकल्पित लक्ष्य की और गमन (कर्म ) और लक्ष्य की उपलब्धि. लक्ष्य के निर्धारण के बिना कर्म की गति नहीं. अतः निर्धारण तो आवश्यक है. हाँ ! लक्ष्य की प्राप्ति के प्रति अनुराग न हो तो कर्म गति पीडादायी नहीं होती. One should decide the goal and .....perform ....but without the inclination in the achievement .

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