शनिवार, 17 सितंबर 2011

बांसुरी...

आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री की कविता-1



बांसुरी...

किसने बांसुरी बजाई ?
जनम-जनम की पहचानी-
वह तान कहां से आई?

अंग-अंग फूले कदम्ब-सम,
सांस-झकोरे झूले;
सूखी आंखों में यमुना की
लोल लहर लहराई!
किसने बांसुरी बजाई?

जटिल कर्म-पथ पर थर-थर-थर
कांप लगे रुकने पग,
कूक सुना सोए-सोए-से
हिय में हूक जगाई!
किसने बांसुरी बजाई?

मसक-मसक रहता मर्म-स्थल,
मर्मर करते प्राण,
कैसे इतनी कठिन रागिनी
कोमल सुर में गाई!
किसने बांसुरी बजाई?

उतर गगन से एक बार-
फिर पीकर विष का प्याला,
निर्मोही मोहन से रूठी
मीरा मृदु मुसकाई!
किसने बांसुरी बजाई?

4 टिप्‍पणियां:

  1. आचार्य जानकी बल्लभ शास्त्री जी की सुन्दर रचना ..बांसुरी .. पढ़ कर मन आनंदित हुआ .. बांसुरी के साथ राधा , मीरा की बात और फिर कर्म पथ पर चलने का सन्देश देती यह रचना बहुत अच्छी लगी ..

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  2. नमन.. शास्त्री जी को! प्रणाम, उनकी इस रचना को!!

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  3. बंसी धुन-सी ही मधुर रचना !
    आभार !

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  4. आचार्य जानकी बल्लभ शास्त्री जी की..बांसुरी ..
    बहुत बहुत आभार इसे यहाँ पढवाने का.

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