शुक्रवार, 23 सितंबर 2011

दिनकर की सौंदर्य और प्रेम भावना

रामधारी सिंह ‘दिनकर’ के जन्म दिवस पर

दिनकरदिनकर की सौंदर्य और प्रेम भावना

मनोज कुमार

दिनकर जी राष्ट्रवादी स्वर की कविताओं के साथ भिन्न प्रकार की कविताएँ भी लिखते रहे। ‘रसवंती’ और ‘द्वन्द्वगीत’ में इस प्रकार की कविताएं सम्मिलित हैं। प्रेम और श्रृंगार के प्रति आकर्षण उनमें शुरु से ही देखा जा सकता है। लेकिन उनके उच्च्गर्जन भरे राष्ट्रवादी स्वर के नीचे यह दब सा जाता रहा है। प्रेम, सौन्दर्य और श्रृंगार के प्रति आकर्षण आगे चलकर उनके प्रसिद्ध काव्य ‘उर्वशी’ मे दिखलाई पड़ता है। लेकिन यह एक पुरुषकवि द्वारा नारी को मात्र भोग्या या श्रृंगार की सामग्री समझकर नहीं लिखा गया। इसमें आध्यात्मिकता का भी स्पर्श है। इसमें प्रेम भावना और सहज काम-वासना के बीच द्वंद्व चलता है। क्या काम से मनुष्य को मुक्ति मिलती है? ऐसे प्रश्न दिनकर जी की कविताओं में उठाए गए हैं।

‘हुंकार’ आदि कविताएं कविताएं लिखने के बाद दिनकर जी पर आरोप लगाया जाता रहा कि उनमें जोश अधिक और बौद्धिकता कम है। अपने ऊपर लगे आरोपों का जवाब देते हुए उन्होंने कहा,

“मैं भी चाहता था कि गर्जन-तर्जन छोड़कर कोमल कविताओं की रचना करूं, जिनमें फूल हों, सौरभ हों, रमणी का सुंदर मुख और प्रेमी पुरुष के हृदय का उद्वेग हो और ऐसी अनेक रचनाएं ... रेणुका, रसवन्ती और द्वन्द्वगीत में प्रकाशित हुआं।”

मेरी भी यह चाह विलासिनी

सुंदरता को सीस झुकाऊं।

जिधर-जिधर मधुमयी बसी हो

उधर वसन्तानिल बन जाऊं।

सौंदर्य और प्रेम की भावनाओं की यह अभिव्यक्ति दिनकर जी के मूल स्वभाव के अनुकूल थी। आगे चलकर यही धारा ‘उर्वशी’ काव्य में ज़ोरों से फूटी। ‘उर्वशी’ 1953 से 1961 के बीच लिखी गई थी। इस रचना पर उन्हें प्रतिष्ठित ज्ञानपीठ पुरस्कार भी मिला था। इसमें व्यक्त सौन्दर्य, प्रेम और काम को देख कई लोगों को झटका भी लगा था। यह तो दिनकर जी की प्रचलित और स्वीकृत छवि थी ही नहीं।

‘उर्वशी’ में एक एक मिथकीय आख्यान को लेकर उसकी पुनर्रचना की गई है। पुरूरवा चंद्रवंशी राजकुल का प्रवर्तक था, उर्वशी स्वप्नलोक की अप्सरा। मित्र और वरुण देवताओं के शाप के कारण उसे पृथ्वी पर उतरना पड़ा। यहां उसे पुरूरवा ने देखा और उस पर आसक्त हो गया। उर्वशी भी उसके सौंदर्य, सच्चाई, भक्ति और उदारता जैसे गुणों पर मोहित हो गई। दोनों पति-पत्नी बन गये। बहुत दिनों तक साथ रहकर उर्वशी एक पुत्र को जन्म देकर स्वर्ग चली गई। पुरूरवा उसके वियोग में पागल-सा हो गया। उर्वशी द्रवित होकर वापस आ गई और एक पुत्र को और जन्म दिया। इस तरह उनके पांच पुत्र हुए। उर्वशी बार-बार स्वर्ग चली जाती। पुरूरवा उसे जीवन-संगिनी बनाना चाहता था। उसने यज्ञ किया और उसका मनोरथ पूरा हुआ।

‘उर्वशी’ काव्य की नयिका स्वर्ग की अप्सरा है और उसे अक्षय सौंदर्य मिला है। देवलोक की यह नर्तकी चिरयुवती, वारविलासिनी, अनंत यौवनमयी और चिररहस्यमयी है। वह तो रूपमाला की सुमेरू ही है।

एक मूर्ति में सिमट गयीं किस भांति सिद्धियां सारी?

कब था ज्ञान मुझे इतनी सुन्दर होती हैं नारी?

आगे वर्णन है –

जग भर की माधुरी अरुण अधरों में धरी हुई-सी,

आंखों में वारुणी रंग निद्रा कुछ भरी हुई-सी!

दर्पण, जिसमें प्रकृति रूप अपना देखा करती है,

वह सौंदर्य, कला जिसका सपना देखा करती है।

नहीं, उर्वशी नारि नहीं, आभा है अखिल भुवन की,

रूप नहीं, निष्कलुप कल्पना है स्रष्टा के मन की।

वहीं दूसरी तरफ़ उर्वशी पुरूरवा के शरीर के सौंदर्य को कुसुमायित पर्वत की उपमा देती है। नारी स्वयं कोमल है, अतः कठोर वरण करती है। उसके मन में पुरुषाकृत्ति की उदात्त छवि समाई हुई है-

यह ज्योतिर्मय रूप! प्रकृति ने किसी कनक-पर्वत से

काट पुरुष-प्रतिमा विराट्‌ निज मन के आकारों की

महाप्राण से भर उसको, फिर भूपर गिरा दिया है।

इन अंशों में दिनकर की भावसमृद्धि, कल्पनावैभव और शब्दशक्ति उच्चशिखर का स्पर्श करती है। इस अर्धमानवी और अर्धदिव्या नारी के सौंदर्य का चित्रण स्थूल और रंगों के मिश्रण से होना स्वाभाविक है। कहीं मांसलता है, तो कहीं सूक्ष्म-लावण्य की अभिव्यक्ति, कहीं इंद्रधनुषी रंगों का मिश्रण है, तो कहीं धूप-छाहीं रंग। वह स्थूल भी है, सूक्ष्म भी। कवि ने सौंदर्य को कल्पना-बल से रूपायित किया है, जहां देहांकन और विदेहांकन दोनों है।

पहले प्रेम स्पर्श होता है,

तदन्तर चिन्तन भी;

प्रणय प्रथम मिट्टी कठोर है,

तब वायव्य गगन भी।

देह-सीमा से स्वानुभूतिमय परिचय कर लेने के बाद विदेहभाव धारण करना अधिक निरापद और न्याय्य होता है। राग से परिचय पाने के बाद विराग धारण ही व्यक्ति का स्वाभाविक विकास है। प्रेम का जन्म काम में होता है; किन्तु, उसकी परिणति काम के अतिक्रमण में होनी चाहिए। प्रेम इतना पवित्र और महार्घ तत्त्व है कि उस पर दैहिक स्खलनों के दाग नहीं पड़ते। ‘सेक्स’ की अनुभूति में शारीरिक अनुभूति होती है, किंतु, प्रेम की अनुभूति में शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक – तीनों अनुभूतियां समन्विर होती हैं, जब प्रेम में अनासक्ति का समावेश होने लगता है।

नहीं इतर इच्छाओं तक ही अनासक्ति सीमित है

उसका किंचित्‌ स्पर्श प्रणय को भी पवित्र करता है।

देह से उत्थित होने वाले प्रेम को ही दिनकर जी ने रहस्य-चिंतन तक पहुंचा दिया है। यह फ़्रायड के मनोवैज्ञानिक ‘सब्लिमेशन’ की तरह एक ‘आध्यात्मिक उन्नयन है। कवि ने प्रेम को मनोमय लोक में पहुंचा दिया है। पुरूरवा का अंतिम विकल्प कामाध्यात्म की ओर है। तभी तो हजारी प्रसाद द्विवेदी कहते हैं,

“‘उर्वशी’ विश्वब्रह्मांडव्यापी मानस की नित्य-नवीन सौंदर्य-कल्पना के रूप में ऐसी बिखरी है कि आश्चर्य होता है। निश्चय ही, यह समाधिस्थ चित्त की रचना है – समाधिस्थ चित्त जो विराट्‌ मानस के साथ एकाकार हो गया था।”

दिनकर जी ने कालिदास की ‘विक्रमोर्वशीयम्‌’ और रवीन्द्रनाथ ठाकुर की रचना ‘उर्वशी’ पढ़ी थी। इनमें प्रेम और कामाकर्षण की कथा है। आगे चलकर उन्होंने महर्षि अरविन्द की उर्वशी पढ़ी। इसमें उन्हें इसका एक आध्यात्मिक पक्ष भी दिखलाई पड़ा। दिनकर के ‘उर्वशी’ में इन रचनाओं का दुहराव नहीं है। दिनकर के रचना में बीसवीं शताब्दी के पुरूरवा और उर्वशी हैं, जिन्हें क्रमशः सनातन नर और नारी का प्रतीक माना जा सकता है। इसमें एक द्वन्द्व चलता रहता है। पुरूरवा पूछता है,

रूप की आराधना का मार्ग

आलिंगन नहीं, तो और क्या है?

स्नेह का सौंदर्य को उपहार

रस-चुंबन नहीं, तो और क्या है?

‘उर्वशी’ में पुरुष और स्त्री के बीच प्राकृतिक आकर्षण, काम-भावना के कारण उत्पन्न प्रेम और फिर इस प्रेम के विस्तार को मापने की कोशिश की गई है। काम का ललित पक्ष प्रेम है और प्रेम संतानोत्पादन के साथ-साथ आनंद का उत्कर्ष भी है। वह शारीरिक होने के साथ-साथ रहस्यवादी अनुभूति भी है। प्रेम का यह पक्ष कवि को अपनी ओर खींचता है। एक आत्मा से दूसरी आत्मा का गहन संपर्क अध्यात्म की भूमिका बन सकता है, यह उर्वशी काव्य का गुणीभूत व्यंग्य है।

उर्वशी प्रेम की अतल गहराई का अनुसंधान करती हुई रचना है। ‘उर्वशी’ में यह प्रेम शारीरिक आकर्षण से कहीं आगे जाता है। यह प्रेम की अतीन्द्रियता का आख्यान है और यही आख्यान उसका आध्यात्मिक पक्ष है। फिर भी हम पाते हैं कि ‘उर्वशी’ में प्रेम के ऐंद्रिय पक्ष भी स्पष्ट हैं, पुरूरवा की उक्ति देखिए,

फिर अधर-पुट खोजने लगते अधर को।

कामना छूकर त्वचा को फिर जगाती है।

रेंगने लगते सहस्रों सांप सोने के रूधिर में,

चेतना रस की लहर में डूब जाती है।

रूप के सौन्दर्य, प्रेम और श्रृंगार की अनुभूतियों की खुली अभिव्यक्ति ‘उर्वशी’ में मिलती है। इसपर भारी साहित्यिक विवाद भी हुआ। उस समय की प्रसिद्ध पत्रिका ‘कल्पना’ में यह विवाद काफ़ी दिनों तक चलता रहा। मुक्तिबोध ने तो यहां तक कहा कि कवि कामात्मक मनोरति और संवेदनाओं में डूबना-उतराना चाहते हैं, साथ ही इस गतिविधि को सांस्कृतिक-आध्यात्मिक श्रेष्ठत्व का प्रतिपादन करना चाहते हैं। डॉ. नामवर सिंह ने भी इस पर सहमति जताई। लेकिन जब हम ‘उर्वशी’ को पढ़ते हुए दिनकर जी की पहली रचनाओं को ध्यान में रखते हैं तो पाते हैं कि दिनकर जी की प्रत्येक घटना या मनोभाव अथवा अनुभूति के सांस्कृतिक पक्ष पर यह आरोप असंगत और अन्यायपूर्ण है कि ‘कामात्मक मनोरति और संवेदनाओं में डूबना-उतराना चाहते हैं’।

श्रृंगारिक वार्णनों के रहने पर भी ‘उर्वशी’ अपने उदात्त विचारों के कारण एक सर्वतोभद्र काव्य है। कारण, पकी उम्र में कवि ने श्रृंगार और प्रेम को अपना विषय बनाया, अतः किशोरवय की सहज बिछलन और ऐंद्रियता के अतिरेक से वह बच गया तथा श्रृंगार के सांस्कृतिक स्तर से नीचे नहीं उतरा। ‘उर्वशी’ में प्रेम को एक बोधात्मक विषय (कॉग्निटिव कंटेंट) के रूप में स्वीकार किया गया है और उसे भारतीय ढ़ंग मे उन्नयन (सब्लिमेशन) के सहारे ‘वासना’ से दर्शन तक पहुंचाया गया है –

पहले प्रेम स्पर्ष होता है,

तदन्तर चिन्तन भी।

प्रणय प्रथम मिट्टी कठोर है,

तब वायव्य गगन भी।

इसलिए दिनकर की उर्वशी एक ओर अपार्थिव सौंदर्य का पार्थिव संस्करण है, तो दूसरी ओर पार्थिव सौंदर्य (नारी) का अपार्थिव उन्नयन भी। फलस्वरूप ‘उर्वशी’ में प्रेम के प्रति वैष्णवभाव है, जिसे हम प्रेम का आधुनिक ‘सहजियाकरण’ कह सकते हैं।

***     ****     *****

जन्म : रामधारी सिंह दिनकर का जन्म बिहार के मुंगेर (अब बेगूसराय) ज़िले के सिमरिया गांव में बाबू रवि सिंह के घर 23 सितम्बर 1908 को हुआ था।

शिक्षा और कार्यक्षेत्र : ढाई वर्ष की उम्र में पिता जी का देहांत हो गया। गांव से लोअर प्राइमरी कर मोकामा से मैट्रिक किया। 1932 में पटना विश्वविद्यालय के पटना कॉलेज से इतिहास में बी.ए. (प्रतिष्ठा) की परीक्षा पास करने के बाद वे कुछ दिनों के लिए बरबीघा उच्च माध्यमिक विद्यालय में प्रधानाध्यापक का काम किए। उसके बाद सरकारी नौकरी में चले आए और निबन्धन विभाग के अवर-निबंधक के रूप में 1934 से 1942 तक रहे। 1943 से 1945 तक सांग पब्लिसिटी ऑफीसर, फिर जनसम्पर्क विभाग के उपनिदेशक पद पर 1947 से 1950 तक रहे। उसके बाद उन्होंने 1950 से 1952 तक लंगट सिंह महाविद्यालय, मुज़फ़्फ़रपुर के हिन्दी प्रध्यापक के अध्यक्ष पद को संभाला।

स्वंत्रता मिली और पहली संसद गठित होने लगी तो वे कांग्रेस की ओर से भारतीय संसद के सदस्य निर्वाचित हुए और राज्यसभा के सदस्य के रूप में 1952 से 1963 तक रहे। 1963 से 1965 तक भागलपुर विश्वविद्यालय के उपकुलपति भी रहे। अंततः 1965 से 1972 तक भारत सरकार के गृह-विभाग में हिन्दी सलाहकार के रूप में हिन्दी के संवर्धन और प्रचार-प्रसार के लिए काफ़ी काम किया।

पुरस्कार व सम्मान :

१. कुरूक्षेत्र के लिए काशी नागरी प्रचारिणी सभा, उत्तरप्रदेश सरकार और भारत सरकार सम्मान मिला

२. ‘संस्कृति के चार अध्याय’ के लिए उन्हें 1959 में साहित्य अकादमी से सम्मानित किया गया।

३. 1959 में भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद ने उन्हें पद्म विभूषण से किया विभूषित किया।

४. भागलपुर विश्वविद्यालय के तात्कालीन कुलाधिपति और बिहार के राज्यपाल जाकिर हुसैन, जो बाद में भारत के राष्ट्रपति बने, ने इन्हें डी. लिट. की मानद उपाधि प्रदान की।

५. 1972 में ‘उर्वशी’ के लिए भारतीय ज्ञानपीठ के सर्वोच्च पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

मृत्यु : 24 अप्रैल 1974 को हृदय गति रुक जाने से उनका देहांत हो गया।

:: प्रमुख रचनाएं ::

:: काव्य रचनाएँ :: चक्रवाल, रेणुका , हुंकार, द्वन्द्वगीत, रसवंती, सामधेनी, कुरुक्षेत्र, बापू, धूप और धुआं, रश्मिरथी, नील कुसुम, नये सुभाषित, उर्वशी, परशुराम की प्रतीक्षा, हाहाकार,आत्मा की आंख, हारे को हरिनाम, संचयिता तथा रश्मि लोक।

:: गद्य रचनाएं :: मिट्टी की ओर, अर्द्धनारीश्वर, भारतीय संस्कृति के चार अध्याय, शुद्ध कविता की खोज, रेती के फूल, उजली आग, काव्य की भूमिका, प्रसाद, पंत और मैथिली शरण गुप्त, लोकदेव नेहरू, हे राम, देश-विदेश, साहित्यमुखी।

16 टिप्‍पणियां:

  1. जब कभी भी रामधारी सिंह दिनकर की बात चलती है न जाने क्यूं मेरा मन उमड़-घुमड़ कर उनकी अनेक कृतियों पर चलचित्र की तरह सामने आने लगता है एवं उन समस्त कृतियों पर एक साथ ही बरस जाना चाहता है । इतिहास को ' भारतीय संस्कृति के चार अध्याय ' नामक अपने पुस्तक में उन्होंने जो भी लिखा है वह हमारे लिए एक धरोहर है ।
    दिनकर जी राष्ट्रीय सांस्कृतिक धारा के कवि हैं । उनकी कविताए ओजस्वी हैं लेकिन "उर्वशी" में उनकी कविता की भाषा , रूप, शैली एवं अदाज बदला हुआ है । इसमें उन्होंने श्रंगारिक अनुभूति को प्रधानता दी है । कवि की मान्यता रही है कि नारी को पुरूष का स्पर्श कर या पुरूष को नारी सुख पा कर भी संतुष्टि नही होती , जब वे मिल जाते हैं, तब भी उनके भीतर किसी ऐसे तृषा का संचार करती है, जिसकी तृप्ति शरीर के धरातल पर अनुपलब्ध है। वस्तुत:उर्वशी काव्य में जीवन की स्वीकृति है । "उर्वशी" की नायिका "पुरूरवा" भी स्वीकार करती है---

    "कामनाओं के झकोरे रोकते हैं राह मेरी,
    खींच लेती है तृषा पीछे पकड़ कर बाँह मेरी ।"
    पोस्ट अच्छा लगा ।
    धन्यवाद ।. .

    उत्तर देंहटाएं
  2. राष्ट्र कवि डा राम धारी सिंह दिनकर के जन्मदिन पर आप सब को मुबारकवाद और विस्तृत जानकारी देने के लिए धन्यवाद।

    उत्तर देंहटाएं
  3. इस महान कवि की लेखन को शत शत नमन आपका आभार उनका विस्तृत परिचय देने के लिए ..

    उत्तर देंहटाएं
  4. वाह। आपने तो दिनकर के उस पक्ष पर लेख लिखा जिसपर, अक्सर ध्यान नहीं देते हम लोग। 'उर्वशी' पर यह पढ़कर अच्छा लगा। जानकारी मिली।

    उत्तर देंहटाएं
  5. दिनकर मेरे प्रिय कवि ... लेकिन अभी तक उनका उर्वशी काव्य नहीं पढ़ा ...आपने कुछ अंश दे कर उत्कंठा जगा दी है पढने की ... सुन्दर लेख के लिए आभार

    उत्तर देंहटाएं
  6. दिनकर तो सच मे दिनकर ही थे आज आपने उनके काव्य से परिचित कराया उसके लिये आभारी हैं। कवि का लेखन तभी परिपक्व हो जाता है जब वो श्रृंगार से अध्यात्म तक अपने भावो को ले जाये और इसमे तो दिनकर जी सिद्धहस्थ थे।

    उत्तर देंहटाएं
  7. आह वाह दिनकर ..मेरे पसंदीदा कवि.आभार आपका.

    उत्तर देंहटाएं
  8. दिनकर तो बहुत महान कवि हैं ..उनके बारे में विस्तार से बताने के लिए आभार आपका

    उत्तर देंहटाएं
  9. राष्ट्र कवि दिनकर के जन्म दिवस पर यह प्रस्तुति सचमुच प्रशंसनीय है!!

    उत्तर देंहटाएं
  10. मेरी भी यह चाह विलासिनी

    सुंदरता को सीस झुकाऊं।

    जिधर-जिधर मधुमयी बसी हो

    उधर वसन्तानिल बन जाऊं।

    दिनकर को पढ़ना एक अलग सा आनंद देता है 'उर्वशी 'के श्रृंगारिक प्रवाह में मन बह जाता है ,द्वंद्व उसे समेटने लगता है .अध्यात्म विमुग्ध करता है .

    सत्य ही रहता नहीं ये ध्यान ,तुम कविता ,कुसुम या कामिनी हो .

    उत्तर देंहटाएं
  11. बहुत अच्छी जानकारी दी है |
    आशा

    उत्तर देंहटाएं
  12. एक मूर्ति में सिमट गयीं किस भांति सिद्धियां सारी?

    कब था ज्ञान मुझे इतनी सुन्दर होती हैं नारी?

    वाह मज़ा आगया...आपने इस लेख के माध्यम से बहुत अच्छी जानकारी दी है आभार ...समय मिले तो आयेगा कभी मेरी पोस्ट पर ...
    http://mhare-anubhav.blogspot.com/

    उत्तर देंहटाएं
  13. आज इस लेख को पढ़ कर दिनकर जी के उर्वशी काव्य की कुछ पंक्तियाँ याद आ गयी जो उन्होंने उर्वशी की महिमा में लिखी थी की वो न तो सामान्य नारी है और न स्वर्ग की अप्सरा है. उर्वशी तो चिरंतन नारी का प्रतीक है...

    एक पुष्प में सभी पुष्प, सब किरने के किरण में
    तुम संहित एकत्र एक नारी के सब नारी हो
    प्रतियुग की परिचित, रसाकर्षण प्रति मन्वंतर की,
    विश्वप्रिया, सत्य ही, महारानी सबके सपनो की.

    बहुत अच्छे तथ्य पेश किये हैं आपने. आपकी महनत को नमन.

    उत्तर देंहटाएं
  14. दिनकर की सौन्दर्य भावना औए मनोज जी आपका स्नेह दोनों ही हमें अभिभूत .

    उत्तर देंहटाएं
  15. आपके आलेख से राष्ट्र कवि को और जान पाया। ..आभार।

    उत्तर देंहटाएं

आप अपने सुझाव और मूल्यांकन से हमारा मार्गदर्शन करें