मंगलवार, 20 सितंबर 2011

कुपथ रथ दौड़ाता जो

IMG_0596आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री की कविताएं-2

कुपथ रथ दौड़ाता जो

कुपथ कुपथ रथ दौड़ाता जो
पथ निर्देशक वह है,
लाज लजाती जिसकी कृति से
धृति उपदेश वह है।

मूर्त दंभ गढ़ने उठता है
शील विनय परिभाषा,
मृत्यु रक्तमुख से देता
जन को जीवन की आशा।

जनता धरती पर बैठी है
नभ में मंच खड़ा है,
जो जितना है दूर मही से
उतना वही बड़ा है।

8 टिप्‍पणियां:

  1. आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री जी को नमन.....

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  2. आचार्य जी की गहन रचना पढवाने के लिए आभार

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  3. आचार्य जी के बारे में सुन तो रखा था पर आपके माध्यम से उन्हें पढ़ भी लिया,आभार !

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  4. बहुत सुन्दर रचना पढ़वाई, शास्त्री जी को नमन...

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  5. ये सार्वकालिक बातें हैं। हर युग में प्रासंगिक रहेंगी।

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  6. आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
    प्रस्तुति आज के तेताला का आकर्षण बनी है
    तेताला पर अपनी पोस्ट देखियेगा और अपने विचारों से
    अवगत कराइयेगा ।

    http://tetalaa.blogspot.com/

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