सोमवार, 19 सितंबर 2011

कुछ नन्हीं नज्में ….

 
बारिश
बिखरे वजूद के
अक्स को समेट
लरजती हुई
साँसों से
घायल से जज़्बात लिए
एक छटपटाती
सी नज़्म
तैर गयी है
मेरी सूनी
आँखों में ,
इस बार
बारिश नहीं हुई


सौगातें
मैंने महज़ तुझसे
प्यार माँगा था
मैंने बस तुझसे
वफ़ा चाही थी
मैंने तेरी ही
खुशियों के लिए
अपनी झोली
फैलाई थी
पर तूने
भेज दीं हैं
सौगातें
मेरे हिस्से की
जिसमें हैं
तेरी नफरत ,
रुसवाई औ बेवफाई.


आईना
रख दिया है
फिर से एक
नया आईना
मैंने ख़्वाबों के सामने
और
बिखरे  से ख्वाब
लगें हैं सजने
फिर आईने में.

संगीता स्वरुप

24 टिप्‍पणियां:

  1. आपका 'नज्म' नन्ही होने के बजाय भी परिपक्व एव गूढ़ भावों से मन की आकुलता को सुंदर तरीके से प्रस्तुत करती है । लोग तो बदल जाते है लेकिन चेहरे नही बदलते । इसलिए आज के इस परिवर्तनशील युग में हमें एक कृत्रिम विकल्प ही सही किसी प्रतिमान को अपने समक्ष रखने में कोई दोष नही है।

    1.बदलते चेहरों के मौसम में ये जरूरी है,
    नजर के सामने हर वक्त आईना रखना ।

    नज्म अच्छा लगा धन्यवाद ।

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  2. संवेदनाओं की सहज-सुंदर अभिव्यक्ति . आभार .

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  3. वाह क्‍या अंदाज है? बढिया है।

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  4. --सुंदर नज्में...सही है प्रतिमान में स्वयं को भी उकेरते रहना चाहिए....
    "बदलते मौसम में आपका चेहरा न बदले,
    ज़रूरी है साथ में इक आईना रखना |"

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  5. अच्छा लगा ये अंदाज़ भी.ख्वाबों के सामने आइना रखना भी अच्छा लगा

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  6. फूलों की पंखुड़ियों सी कोमल ये नज्में हैं ! डर लगता है कहीं बार बार पढ़ने से ही कुम्हला तो नहीं जायेंगी ! बहुत प्यारी और खूबसूरत क्षणिकायें ! बहुत सुन्दर !

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  7. रख दिया है
    फिर से एक
    नया आईना
    मैंने ख़्वाबों के सामने
    और
    क्षत -विक्षत से ख्वाब
    लगें हैं सजने
    फिर आईने में.तीनो ही नज़्मे बेहद उम्दा दिल मे उतर जाती हैं और इस आखिर वाली ने तो मन मोह लिया।

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  8. घायल से जज़्बात लिए
    एक छटपटाती
    सी नज़्म
    तैर गयी है
    मेरी सूनी
    आँखों में ,
    इस बार
    बारिश नहीं हुई
    .... baarish kee nanhi nanhi bundon si nazmen aur uski sondhi khushboo

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  9. कोमल संवेदनशील भावों से गुंथी नज़्में!

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  10. वाह वाह , सजने दीजिये ख्वाब , दिखे लगेगा महताब .

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  11. ख्वाब सजने लगे हैं फिर से आईने में ...
    भावुक कर देती है ये रचनाएँ!

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  12. मन को भिंगोने के बाद जो सौगात मिली है उसने आइना दिखा दिया है।

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  13. waah man ke bhavo kee gahan abhivyakti se ot prot hain ye nanhi nazmen jinka arth bahut vistrit hai.

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  14. बहुत ही ख़ूबसूरत नज्में हैं.. इन्हें अलग से छोटी नज्में कहने की आवश्यकता नहीं थी, क्योंकि संगीता दी की नज्में होती ही नन्हीं हैं, और प्यारी भी. मगर आज पहली बार एक शब्द पर मेरी आपत्ति है. अंतिम नज़्म में यह पंक्तियाँ
    क्षत -विक्षत से ख्वाब
    लगें हैं सजने
    फिर आईने में.

    ख्वाब तो बड़े नाज़ुक होते हैं और ये शब्द भी इतना नाज़ुक है कि उसके लिए क्षत-विक्षत शब्द बहुत ही चुभने वाला लगा..

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  15. teenon najmen bahut sundar hai. kya bat kahi hai? unake andar ka dard chalak pad raha hai.

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  16. वाह ...बहुत ही बेहतरीन नज्म हैं

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  17. सभी पाठकों का शुक्रिया ..

    @@ सलिल जी ,

    आपके सुझावानुसार क्षत - विक्षत शब्द हटा कर बिखरे ..कर दिया है ...आभार

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  18. बहुत ही खूबसूरत, दिल को छू लेने वाली नज़्में...
    आपकी लेखनी को नमन...

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  19. आपकी चिर परिचित शैली में तीनों ही नज़्में मन को छू गईं.

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  20. बेहद ख़ूबसूरत एक से बढकर एक नज्में....
    निःशब्द कर दिया है मुझे....आभार ....

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  21. barish aur saugaton ke bad aayine ke aage fir se bikhre hue khaab sajne lage hain....ye bahut hi acchhi baat hai.

    bahut hi nazuk si lekin bharpoor prabhavshali nazme.

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  22. पीड़ा ..दर पीड़ा ...दर पीड़ा ....कितना कुछ कह जाती है यह पीड़ा

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