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मंगलवार, 31 जुलाई 2012

जन्म दिवस पर - प्रेमचंद की देन


प्रेमचंद जी के जन्मदिवस पर विशेष प्रस्तुति



पिछले दिनों इसी ब्लॉग के एक पोस्ट पर यह टिप्पणी आई थी। (लिंक)
“प्रेमचंद जी एवं उनके समय के अन्य लेखकों(लेखकों और उनके प्रेमियों से क्षमा याचना सहित) की यथार्थ परक समाज-चित्रण वाला कथा साहित्य है जोकि यथार्थ चित्रण में इतना बढ़ाचढ़ा है कि उनका नायक लाख प्रयत्न करे, वो मुंह के बल ही गिरता है। यदि विजय प्राप्त भी करता है तो नैतिक कारणों से, नकि पुरुषार्थ के कारण। ये देख पाठक का मन अनायास ही यह सोचने लगता है कि पुरुषार्थ व्यर्थ है. परिश्रम व्यर्थ है. 
आप जानते ही हैं की प्रेमचंद जी एवं उनके समकालीन अन्य लेखकों का कथा साहित्य भारतीय पाठ्यक्रम में आदि से अन्त तक भरा पड़ा है और इसी कारण से इसे पढ़ने का सौभाग्य, जब मैं मात्र नौ वर्ष का बालक था तभी से प्राप्त हो गया था। मेरे चाचा, बुआ इत्यादि सब विश्वविद्यालय के विद्यार्थी थे अतः उनके पाठ्यक्रम का साहित्य भी घर में उपलब्ध था और इसी कारण हाईस्कूल (कक्षा १०) तक आते आते मैंने ये तथाकथित यथार्थ परक समाज-चित्रण वाला कथा साहित्य सारा ही पढ़ डाला था।
मैं एक नौ वर्ष के बालक का छोटा सा अनुभव आपसब के साथ बांटना चाहूँगा । इस बालक ने प्रेमचंद की कहानी ईदगाह पढ़ी और तीन पैसे ले कर ईदगाह जाने वाले बालक कि मजबूरी से दुखी कोमलमन बालक कई दिन तक गुमसुम रहा वो बालक मै था। ये मेरा स्वयं का अनुभव है. ऐसे अनगिनत मायूस अनुभवों से भरा है मेरा बचपन। इस कथा साहित्य ने मेरी बाल सुलभ मुस्कान, हंसी, मेरा बचपन मुझसे छीन लिया। इससब से उबर परिपक्व होने में जवान होने के बाद भी मुझे बरसों लगा गए।  --- पन्डित सूर्यकान्त ”

इस टिप्पणी को डॉ. रमेश मोहन झा को दिखाया और उनसे कहा कि आप इस टिप्पणी को ध्यान में रखकर प्रेमचंद जी के जन्म दिवस के उपलक्ष्य में एक आलेख दीजिए। तो आज वही प्रस्तुत है :-

प्रेमचंद की देन

ज्‍यादातर ऐसा होता है कि जब हमें किसी से कोई बहुत बड़ी चीज मिलती है तो हम न तो देनेवाले की, न उस पाई हुई चीज की ही कद्र कर पाते हैं। लेकिन कभी-कभी ऐसा भी होता है कि हम यह महसूस करते हैं कि हमें कोई बड़ी चीज हासिल हुई है और हम उसके प्रति कृतज्ञता से भर जाते हैं जिससे हमें बहुत कुछ मिलता-सा प्रतीत होता है, हम भले ही ठीक-ठाक यह समझ न पायें कि वह है क्‍या, जो हमें मिला है । प्रेमचंद के संबंध में हिंदी के विद्वानों,पाठकों की जो कृतज्ञता की भावना है, वह बहुत कुछ इसी तरह की है : वह अबोध कृतज्ञता है। हालांकि अपवाद स्‍वरूप इधर एक खास वर्ग प्रेमचंद और उनकी रचनाओं को खारिज करने पर तुला है। अतार्किक (कुतार्किक नहीं) पद्धति से, एक खास चश्‍मे से देखकर उसे निष्‍प्राण करने की कोशिश में लगा है। लेकिन सांच को आंच नहीं। प्रेमचंद जिस आसन पर आसीन है, वहीं रहेंगे भले ही उनपर कुछ लोगों की भृकुटि तनी हो। आज के समय में बूंद भी समुद्र के लहजे में बात करता है, इसलिए इस विषय पर मौन रहना ही श्रेयष्‍कर है।

प्रेमचंद ने हिंदी कथा साहित्‍य के क्षेत्र में अभूतपूर्व क्रांति की थी। साहित्‍य के इस क्षेत्र मे उनकी कृतियों ने युगांतर उपस्थित कर दिया और किसी न पुराने को ढहते और नये को उठते देखा तक नहीं। प्रेमचंद ने पूर्ववर्ती युग की प्रवृति को आघात पहुंचाये बिना उसका परिष्‍कार किया। उन्‍होंने आलोचना के प्रतिमानों को चुनौती न देकर नये मूल्‍य स्‍थापित किए। हंगामा जरा भी न हुआ और परिवर्तन बहुत बड़ा हो गया। नई या विपरीत दिशा में मुड़ना झटके के साथ होता है और सदैव ध्‍यान आकृष्‍ट करता है। किंतु, कभी ऐसा भी होता है कि आगे बढ़ना, नजदीक रहने वालों के लिए अस्‍पष्‍ट होने पर भी, इतनी दूर तक पहुंचा देता है कि जब हम देख पाते हैं तब चकित हो जाते हैं। प्रेमचंद ने बहुत दूर आगे बढ़कर युगांतर उपस्थित किया था, नया मोड़ नहीं लिया था।

प्रेमचंद ने कुछ भी ऐसा नहीं किया जो उनके पहले हो नहीं चुका था, या हो नहीं रहा था। प्रेमचंद के पहले दवकीनंदन खत्री ऐसे उपन्‍यास लिख चुके थे, जिसने अपनी रोचकता के बल पर लो‍कप्रियता के सारे रिकार्ड तोड़ दिए थे। प्रेमचंद ने, खत्री जी की तरह तिलस्‍म और ऐयारी के सहारे, अपने उपन्‍यासों या कहानियों को रोचक नहीं बनाया। वे इनके बिना ही रोचक हैं।

किशोरीलाल गोस्‍वामी ने, बंगला से प्रभावित होकर रूमाने प्रेम से पगी और कोमलकांत पदावली जैसी भाषा के योग से कथा को रोचक बनाने का प्रयास किया था। प्रेमचंद ने यथार्थ और आदर्श का समन्‍वय करते हुए ऐसी रोचकता बनाए रखी, जैसी गोस्‍वामी जी के कथा-साहित्‍य में शायद ही मिलती हो।

यथार्थ और आदर्श के समन्‍वय का प्रयास भी, अपने ढंग से, प्रेमचंद के पहले के हिंदी-कथा-साहित्‍य में हुआ था। श्रीनिवास दास, राधाकृष्‍ण दास और बालकृष्‍ण भट्ट के उपन्‍यासों में और कुछ हो या न हो, इस समन्‍वय की एक हद तक सफल चेष्‍टा तो है ही। किंतु प्रेमचंद ने आदर्शोन्‍मुख यथार्थवाद के साथ कथानक की रोचकता बनाए रखी, जबकि दोनों परस्‍पर-विरोधी सिद्ध होते हैं। यह आगे बढ़ना ही नहीं, काफ़ी दूर तक आगे बढ़ना है। इसे ही आगे चलकर बाद के लोग युगांतर करना कहते हैं।

प्रेमचंद ने सेवा-सदन, निर्मला, वरदान, गबन लिखकर, पूर्ववर्ती युग से भिन्‍न प्रेमचंद-युग का प्रवर्तन किया था। प्रेमचंद-युग से भिन्‍न युग की स्‍थापना के लिए भी वे प्रायः इसी समय से प्रयोग करते लग गए थे। प्रेमाश्रम, रंगभूमि और कर्मभूमि उस प्रयोग के सोपान हैं, जिसका शिखर गोदान है।

‘गोदान’ में जीवन के दृश्यमान सरल व जटिल यथार्थ को इस तरह आबद्ध किया गया है कि उसकी गहराइयां और जटिलताएं ऊपरी सतह पर प्रदर्शित न होती हुई भी निभ्रांत रूप से नीचे, अंदर झलकती रहती है। गोदान में शुद्ध यथार्थ है, इस कारण कथा सारे भारतीय जीवन को उसके विश्रृंखल रूप में उपस्थिति करती है।

प्रेमचंद ने भारतीय उपन्यासकारों में सबसे पहले औद्योगिकरण-जनित समस्‍याओं का चित्रण किया, अश्रुविगलित पात्रों की जगह औसत सामाजिक मनुष्यों का सुख-दुख लिया, शोषित-वंचित किसान-मज़दूर की गाथा प्रस्‍तुत की, किंतु ये उनके द्वारा किए गए सार्वाधिक महत्‍वपूर्ण कथा-प्रयोग के साध्‍य नहीं, गौण साधन मात्र है। उनके प्रयोग का साध्‍य था भारतीय जीवन का पूर्ण चित्रण। प्रेमचंद ने सफलतापूर्वक ऐसा प्रयोग किया था। उन्होंने लगातार प्रायास कर एक अभीष्ट उपन्यास-स्‍थापत्‍य गढ़ लिया, जिसके कारण ‘गोदान’ जैसा उपन्‍यास वो हमें दे सके। स्‍थापत्‍य के साथ-साथ उन्‍होंने अपने ढंग से चेखव तथा तुर्गनेव की तरह साधारणता को अपने उपन्‍यासों और कहानियों का उपकरण बनाने का साहस दिखाया है, यह उनकी विशिष्‍ट देन है।

प्रेमचंद की भाषा की जो सरलता व सहजता है, उसके पीछे उसके अंगभूत दृष्टिकोण की यही अनिवार्यता काम करती है। शैली की यह सरलता पत्रकारिता की सरलता नहीं है, जीवन की साधारणता को व्‍यक्‍त करने की मौलिक और वैशिष्‍ट्यपूर्ण चेष्‍टा है। यही कारण है कि प्रेमचंद के समकालीनों में से कुछ-एक ने और बाद के अनेक उपन्‍यासकारों ने, सरल शैली में लिख अवश्‍य, किंतु उनकी सरलता प्रेमचंद की सरलता नहीं है। प्रेमचंद की शैली अनुकरणीय है, पर अनुकरण के लिए अत्‍यंत कठिन।

प्रेमचंद की महत्‍ता इस बात में भी निहित है कि उन्‍होंने दिलचस्प और लो‍कप्रिय किस्‍सा-कहानी तथा साहित्यिक तथा कलापूर्ण गल्‍प के बीच की झूठी खाई को मिटा दिया था। तथाकथित उच्‍चकोटि की साहित्‍यक गल्‍पों में शैली की विशिष्‍टता और चरित्र तथा भाव के कुशल अंकन के बावजूद, साहित्यिकता की दृष्टि से, हमें किस्‍से कहानियों के घटना-वैचित्र्य, प्रवाह, नाटकीयता और मनुष्‍यता के अभाव खटकते हैं। प्रेमचंद ने इस अभाव को अपनी कृतियों से दूर कर दिया।

और अंत में मैं वहीं आता हूँ जहां मैने मौन रहने की बात कही है। मैं उस खास वर्ग या पूर्वग्रह से ग्रसित ऐसे लोगों पर आता हूँ जो बिना वजह के ऐस शिखर से टकराते हैं। ये जब प्रेमचंद पर विचार करते हैं, तो उन्हें अपने नजरिये से देखते हैं। अपने नजरिये से किसी चीज को देखना बुरा नहीं है। लेकिन अपने नजरिये से देखे हुए को ही मुख्‍य और असल बताना और बाकी सबसे इन्‍कार करना गलत है। ये प्रेमचंद के साथ ऐसे ही सलूक कर रहे हैं। ये प्रेमचंद को अपनी जमीन पर नहीं रहने देना चाहते। वे खींचकर अपनी जमीन पर लाते हैं और फिर खड़ा करते हैं, मानो यह बताना चाहते हैं कि प्रेमचंद की अपनी जमीन थी ही नहीं, या वे यहां महान नहीं मालूम होते। प्रेमचंद स्वयं में इतने समर्थ लेखक है कि उन्‍हें किसी दूसरे आधार की जरूरत नहीं है। इस प्रसंग में मुझे साहिर के गीत की ये पंक्तियां याद आ रही है –

अश्‍कों में जो पाया है वो गीतो में दिया है,
इस पर भी सुना है कि जमाने को गिला है।

डॉ. रमेश मोहन झा
ए.डी- 119, रवीन्‍द्र पल्‍ली
कृष्‍णापुर
कोलकाता – 700101
दूरभाष – 09433204657

बुधवार, 25 जुलाई 2012

प्रेमचंद जी के उपन्यासों में पात्रों का चरित्र चित्रण और पात्र योजना

प्रेमचंद जी के उपन्यासों में 

पात्रों का चरित्र चित्रण और पात्र योजना

Anamika 7577 की प्रोफाइल फोटोअनामिका
clip_image001आदरणीय पाठक गण पिछली बार मैंने प्रेमचंद जी के उपन्यास लेखन पर लिखा था कि  प्रेमचंद जी ने युग जीवन से प्रेरणा लेकर सामान्य जनता और किसानों के देहाती जीवन को अपने साहित्य का आलंबन बनाया, उन्होंने भारत की अस्सी प्रतिशत जनता की मूक वाणी को अपने उपन्यासों  में मुखरित किया. आज मैं इसी विषय को विस्तार देते हुए  कुछ ऐसे तथ्य आप के साथ  सांझा करुँगी कि कैसे प्रेमचंद जी अपने उपन्यासों में पात्रों का  चरित्र चित्रण, उनकी वास्तविकता, पात्रों की संख्या और पात्रों की व्यक्तिगत या सामाजिक विशेषताओं को मुखरित करते थे  और कैसे ये पात्र  अपने समाज और वर्ग का प्रतिनिधित्व करते  हैं...

इस महीने की 31 तारीख को प्रेमचन्द जी का जन्मदिन है और यह पूरा मास हम “राजभाषा हिंदी” ब्लॉग टीम की तरफ़ से प्रेमचन्द जी के व्यक्तित्व और कृतित्व के ऊपर कुछ पोस्ट ला रहे हैं। इसी कड़ी में आज प्रस्तुत है अनामिका की रचना।
उपन्यासों में पात्रों एवं चरित्र चित्रण का अत्यधिक महत्त्व होता है. वे हमारे सामने जीवन का  वास्तविक यथार्थ रूप प्रस्तुत करते हैं. कई उपन्यासों के प्रारंभ में प्रायः लिखा होता है कि इसके पात्र पूर्णतया कल्पित हैं. लेकिन यह सत्य नहीं एक भ्रमपूर्ण कथन होता है. उसकी सत्यता की सीमा मात्र यहीं तक सीमित होती है कि पाठक उन विशेषताओं और प्रवृतियों  से संपन्न व्यक्ति को जानता  है, पर उसके परिचित का वह नाम नहीं है. उपन्यासकार मानव जीवन ही जीता है, कोई दैवी जीवन नहीं. हमारे मध्य ही वह रहता है. हमारी जीवनगत विषमताओं एवं दुरुहताओं से उसका भी साक्षात्कार होता है और उसकी कटुता का पान उसे भी करना पड़ता है.  उपन्यासकार आत्माभिव्यक्ति करता हुआ कुछ शब्दजाल बुन देता है, उसे नाम देता है, उसमे प्राण संचारित करता है, स्त्री-पुरुष का भेद प्रदान करता है. जैसे ईश्वर मानव सृष्टि की रचना करता है वैसे ही  उपन्यासकार अपने उपन्यास की.  फर्क इतना है कि ईश्वर ऐसे भी ना जाने कितने व्यक्तियों का निर्माण करता है जो बिलकुल भी दिलचस्प नहीं होते, लेकिन उपन्यासकार इसके विपरीत दिलचस्प पात्रों का सृजन करता है और उनका उपन्यास संसार में महत्वपूर्ण स्थान  होता है. अगर उपन्यासकार अनावश्यक पात्रों  का भी निर्माण करता है तो उसका उपन्यास असफल हो जाता है.

वास्तव में उपन्यास रचना किसी निश्चित उद्देश्य को सामने रखकर होती है. केवल मनोरंजन या कल्पनालोक का निर्माण करना ही उपन्यासकार का दायित्व नहीं है. आज उसका दायित्व सत्य का अन्वेषण करना, मूल्य निर्माण और दिशा निर्देशन का भी  है. अपने अनुभवों को भी  पाठकों तक पहुंचाना उसका उद्देश्य होता है. इन पात्रों का वास्तविक होना आवश्यक है, क्यूंकि तभी उपन्यासकार का उद्देश्य भी सफल होता है. यही कारण है कि प्रेमचंद जी के निर्मला, धनिया, होरी, गोबर आदि पात्र हमारे अत्यंत निकट प्रतीत होते हैं. उनमे वास्तविकता और जीवन के प्रति सच्चाई है. संघर्ष के प्रति ईमानदारी है और सबसे बड़ी बात यथार्थता है.  पर इसके ठीक विपरीत जैनेन्द्र कुमार की कट्टो, कल्याणी और सुनीता का आकर्षक व्यक्तित्व होते हुए भी वे यथार्थ प्रतीत नहीं होते हैं.

अब दूसरा महत्वपूर्ण  प्रश्न यह आता है कि उपन्यासों में पात्रों की संख्या दो,तीन या चार कितनी हो ? इसका उत्तर उपन्यास के कथानक एवं उपन्यासकार के व्यक्तित्व से संबंधित है. यदि उपन्यासकार बहिर्मुखी व्यक्तित्व का है तो स्वाभाविक है उसका दायरा भी व्यापक होगा, मित्रों की संख्या अधिक होगी. इसके विपरीत अंतर्मुखी व्यक्तित्व वाले उपन्यासकार की सीमायें सीमित होंगी. प्रेमचंद जी का व्यक्तित्व भी बहुर्मुखी था. वे सामाजिक प्राणी थे और उनके मित्रों तथा परिचितों की संख्या अपार थी. इन्होने जीवन की व्यापकतम सीमाओं और युगीन समस्याओं के बहुविधीय पक्षों को अपने उपन्यासों में चित्रित करने का प्रयत्न किया है. स्वाभाविक है उनका यह उद्देश्य दो चार पात्रों से नहीं, बल्कि अनेक पात्रों को रखने से ही पूर्ण हो सकता था.  पात्रों की संख्या, अनिवार्यता और उनका सफल निर्वाह होना भी आवश्यक है. 


कई बार उपन्यासकार स्वाभाविक चारित्रिक विकास की ओर पूर्ण रूप से ध्यान नहीं दे पाता  अतः या तो पात्रों की बीच में हत्या कर देनी पड़ती है या उनकी असामयिक मृत्यु हो जाती है, या वे बीच से ही गायब हो जाते है, फिर अंत तक उनका पता ही नहीं चलता और पाठक उन्हें खोजते ही रह जाते हैं. प्रेमचंद जी के उपन्यासों में भी ऐसा बहुत हुआ है. आदर्शवाद को उभारने  के लिए ही यथार्थ जीवन से पात्रों को चुनने के बावजूद प्रेमचंद ने अपने उपन्यासों में संयोग तत्वों को इतना अधिक महत्त्व दिया है कि प्रायः उनके पात्र अस्वाभाविक, अयथार्थ अथवा यांत्रिक से प्रतीत होने लगते हैं. निर्मला उपन्यास में मुंशी उदयभानु लाल अपनी पत्नी से झगडा करके इसीलिए घर से बाहर निकलते हैं ताकि मतई रास्ते में उन्हें मार डाले और घर की  स्वाभाविक आर्थिक विषमताओं के कारण निर्मला का अनमेल विवाह हो. रंगभूमि में सोफिया का माँ से झगड  कर घर से बाहर निकलना इसलिए होता है ताकि वह अग्निकांड देखे और विनयसिंह के समीप आये. गबन के रामनाथ को चुंगिघर में नौकरी मिलना, जहाँ से वो पैसे उड़ा सके. और तो और कंगन बनवाने के लिए रतन का उसे छह सौ रूपए देना, ठीक छह सौ जिससे रामनाथ के जीवन में संघर्ष उत्पन्न हो सके. वरदान में कमलाचरण का ट्रेन से कूद कर मरना, प्रतिज्ञा में बसंत कुमार का गंगा में डूब कर मरना ताकि पूर्णा विधवा हो सके, सेवासदन में कृष्णचन्द्र का डूब कर मरना, ताकि विषमताओं के कारण सुमन का अनमेल विवाह गजाधर से हो सके, प्रेमाश्रम में गायत्री, मनोहर और ज्ञानशंकर की आत्महत्याएं और कायाकल्प में शंखधर की मृत्यु , उसके पिता की आत्महत्या, रंगभूमि में ही सूरदास की मृत्यु, सेवासदन में गजाधर का साधू बन जाना और समय समय पर उपस्थित होकर फिर गायब हो जाना आदि ऐसे ही उदाहरण हैं. वस्तुतः प्रेमचंद जी ऐसा या तो भावुकता के वशीभूत होकर करते हैं, या पात्रों की गति न संभाल पाने के कारण ही उन्हें मार देना पड़ता है.

प्रेमचंद जी के अधिकांश पात्रों पर दोष लगाया जाता है कि वे टाइप पात्र या स्थिर पात्र हैं. स्थिर पात्र ऐसे होते हैं जिन पर जीवन के सुख-दुख, करुणा, उल्लास, विषम अथवा अनुकूल का कोई प्रभाव नहीं पड़ता. ये पात्र वास्तव में किसी न किसी वर्ग के प्रतिनिधि बन कर आते हैं. उपन्यासकार उस वर्ग की सारी प्रमुख विशेषताएं इस प्रकार के पात्र में भर देता है. गोदान का होरी स्वयं अपने में कोई पात्र नहीं है. वह एक टाइप है. वह भारत के उन असंख्य सीधे-सादे, धर्म में गहन आस्था रखने वाले एवं नैतिकता का विशिष्ट मूल्यांकन करने वाले कृषकों का प्रतिनिधि है जो जीवन भर संघर्षरत रहते हैं, जिन्हें परिस्थितियों की विषमता सदैव पराजित करती है और अंत में उनकी अत्यधिक सज्जनता एवं आदर्शवादिता ही उन्हें ले डूबती है. ऐसे पात्र स्वयं नहीं बदलते, उनके सम्बन्ध में हमारी धारणा बदलती है. ऐसे पात्रों के बार बार परिचय देने की आवश्यकता नहीं होती ये पाठकों की चेतना में स्मरणीय रहते हैं. गोदान का होरी भी कितनी भी विषम परिस्थितियों के आगे कभी झुका नहीं चाहे टूट कर बिखर गया और इसी कारण पाठकों के लिए बराबर स्मरणीय रहा.

प्रश्न यह भी उठता है कि क्या प्रेमचंद के पात्रों में अपनी व्यक्तिगत विशेषताएं नहीं है. क्या सुमन, निर्मला, मंसाराम, जालपा, होरी, धनिया, गोबर, झुनियाँ आदि वैयक्तिता से रहित हैं. सबल व्यक्तित्व  के पात्रों के अध्ययन से हम एक भावलोक में अपने आपको खोकर उनसे तादातम्य पाते हैं तो  प्रेमचंद जी के पात्रों को यथार्थ रूप में देखकर उनसे सीधा संबंध स्थापित करते  हैं. निर्मला में लेखक ने निर्मला और मंसाराम के आंतरिक द्वन्द का चित्रण करते हुए मनोव्यापारों का थोड़ा अध्ययन किया था, परन्तु इस कार्य को किसी अन्य उपन्यास में वो आगे नहीं बढ़ा पाए. संक्षेप में कहा जा सकता है कि प्रेमचंद जी के पात्र अपने वर्ग के प्रतिनिधि भी हैं, और काफी हद तक व्यक्तिगत विशेषताओं से युक्त भी. होरी के समबन्ध में अगर दावा करें कि मैंने एक मौलिक पात्र की सृष्टि की है तो होरी हडबडा कर उठ बैठेगा और चिल्ला उठेगा, 'सृष्टि आपने ख़ाक की है, मैं तो स्वयंभू हूँ,आपने मेरा  चित्र मात्र उतारा है. प्रेमचंद जी के पात्रों का सम्बन्ध बाह्य जीवन से अधिक रहा है और उनका संघर्ष युग और समाज के सन्दर्भ में ही उभरता है. उनके मानसिक द्वंदों या आंतरिक संघर्ष को प्रेमचंद जी ने विशेष महत्त्व नहीं दिया जिससे वे वैयक्तिक बन पाते. प्रेमचंद जी की  प्रखर सामाजिक चेतना और सामाजिक दायित्व के निर्वाह की भावना ने भी पात्रों में वैयक्तिकता नहीं आने दी.

बुधवार, 18 जुलाई 2012

हिंदी उपन्यास साहित्य की परंपरा में प्रेमचंद जी का स्थान

हिंदी उपन्यास साहित्य की परंपरा में प्रेमचंद जी का स्थान

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प्रेमचंद जी के साहित्यिक सृजन  का पठन करते हुए पिछली बार हमने जाना कि प्रेमचंद जी के समय   की राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक एवम धार्मिक परिस्थियाँ क्या थी और उसमे प्रेमचंद जी का  क्या योगदान था. आइये आज जानते हैं हिंदी उपन्यास साहित्य की परंपरा में प्रेमचंद जी का क्या स्थान था और आधुनिक उपन्यास साहित्य पर उनका प्रभाव कहाँ तक पड़ा...

हिंदी उपन्यासों का आविर्भाव उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तराद्ध में हुआ. कथा कहानी की परंपरा का सम्बन्ध वेद, पुराण से जोड़ना या अन्य धार्मिक साहित्य से जोड़ना तर्क संगत नहीं है. वह सर्वथा आधुनिक युग की देन है और उसके लिए हिंदी उपन्यास  साहित्य पश्चिम का ऋणी है.

पूर्व प्रेमचंद काल की स्थिति भी कुछ विशेष अच्छी न थी. परिवार में सबसे बड़ा व्यक्ति धन कमाए और सारे परिवार का पालन-पोषण करे - यह भावना समाप्त हो गयी थी. नारियों की स्थिति तो और भी दयनीय थी. उनकी आर्थिक परतंत्रता भीषण रूप धारण कर चुकी थी. उन्हें सामाजिक स्वतंत्रता भी न प्राप्त थी, राजनीतिक स्वतंत्रता तो दूर की बात थी.  प्रेम और विवाह की स्वतंत्रता न प्राप्त होने के कारण सामाजिक रूढ़ियों को तोडना प्रायः असंभव हो गया था. बाल विवाह बराबर छिपे तौर पर अब भी होते जा रहे थे. वेश्यावृति भी बढती जा रही थी.  विधवा विवाह को भी मान्यता प्राप्त नहीं थी. जिस प्रगतिशीलता की नितांत आवश्यकता थी, समाज उससे लगभग अपरिचित था.

इस महीने की 31 तारीख को प्रेमचन्द जी का जन्मदिन है और यह पूरा मास हम “राजभाषा हिंदी” ब्लॉग टीम की तरफ़ से प्रेमचन्द जी के व्यक्तित्व और कृतित्व के ऊपर कुछ पोस्ट ला रहे हैं। इसी कड़ी में आज प्रस्तुत है अनामिका की रचना।

ऐसी परिस्थितियों में हिंदी उपन्यास का जन्म हुआ. इन समस्याओं के समाधान और समाज में प्रगतिशीलता लाने का उत्तरदायित्व प्रारम्भिक उपन्यासकारों  ने लिया, साथ ही उपन्यासों के माध्यम से पाठकों तक ऐसी भावनाओं का सम्प्रेषण किया, जिसमे उनके जीवन के प्रति गरिमा का अनुभव हो, उनके खंडित होने वाले विश्वास, छिन्न-भिन्न होने वाली आस्थाओं को आधार प्राप्त हो, चरित्र निर्माण हो, वेश्यागमन हो, मद्यपान एवं जुए का अंत हो, समाज में दृढ़ता आये एवं उसकी प्रगति हो तथा धर्म की रक्षा हो.  यह आवश्यक था कि उपन्यासकार जीवन की इन समस्याओं को अपनी कृतियों से चित्रित करें और गौरवपूर्ण जीवन के निर्माण पर बल दें.  यद्यपि इस युग में उपन्यास साहित्य अधिक प्रगति नहीं कर पाया, फिर भी लाला श्रीनिवास दास, श्रद्धा राम फिल्लोरी, बालकृष्ण  भट्ट, गोपालराम गहमरी, मेहता लज्जाराम शर्मा आदि ने किन्हीं सीमाओं तक अपने उपन्यासों में जीवन की समस्याओं की ओर ध्यान दिया, पर या तो वे चलते चलते इन प्रसंगों को स्पर्श करने के बराबर था, अथवा उपदेशक बन कर शिक्षा देने की प्रक्रिया मात्र थी. इस प्रारम्भिक काल में उपन्यासों का मानव जीवन के साथ कोई विशेष सम्बन्ध स्थापित नहीं हो सका. पर जो प्रयत्न हुए, उनमे उस अकुलाहट और बेबसी का आभास हमें मिलता है, जो आगे चल कर प्रेमचंद जी द्वारा क्रियाशील ढंग से अधिक कलात्मकता से प्रकट हुआ.

वास्तव में उस समय नाटकों के अतिरिक्त केवल उपन्यास लेखन ही ऐसा साधन था, जिसके द्वारा समाज के दोषों को दूर करने का प्रयत्न किया गया. नैतिकता के विकास का प्रयत्न इन्हीं के माध्यम से किया गया. उपन्यासों के माध्यम से ही सामाजिक चरित्र को ऊंचा उठाने का प्रयत्न हुआ. अनेक उपन्यास लेखक  ऐसे  थे  जिनमे  युगीन  समस्याओं को उपन्यासों में उठाने और उनका  समाधान  प्रस्तुत  करने की व्यग्रता  थी. 'भाग्यवती' , सौ  अजान  एक  सुजान, नूतन  ब्रह्मचारी, परीक्षा  गुरु  आदि इसी  प्रकार  के उपन्यास थे . इन लेखकों  ने अपनी कृतियों  में समाज के पतन  की ओर ध्यान  दिया. घरेलु  जीवन से सम्बन्ध रखने  वाले गृहस्थ  जीवन के उपन्यासों की  भी रचना  की गयी.

प्रेमचंद के आगमन  के समय भारतीय  जीवन बहुत  ही दयनीय  था. लोगों  में अजीब  सी  निराशा  व्याप्त  थी. आर्य  समाज आन्दोलन  इस काल में सामाजिक परिस्थिति  में सुधार  लाकर  प्रगतिशीलता  लाने  में संलग्न  था. यह तो निश्चित  था  कि भारतवासी  जहाँ  थे , वहां न रहना  चाहकर  आगे बढ़ने के लिए उत्सुक थे. भारत की ज्यों ज्यों आर्थिक स्थिति शोचनीय होने लगी, सम्मिलित कुटुम्ब प्रथा भी त्यों त्यों विच्छिन्न होने लगी. जाति प्रथा भी क्षीण होने लगी थी. बाल विवाह की प्रथा भी समाप्त होती जा रही थी. सुधारवादी आन्दोलनों एवं पाश्चात्य शिक्षा के बढ़ते प्रभाव के कारण भारत का सामाजिक ढांचा हिलने लगा था.

इस युग में प्रेमचंद जी ने साहित्य के क्षेत्र में पर्दापण किया था और उन्होंने उपन्यासों को एक नयी दिशा प्रदान की. कल्पना लोक से निकल कर उसे यथार्थ की कठोर भूमि पर ला खड़ा कर प्रेमचंद जी ने हिंदी उपन्यासों को प्रगति की ओर मोड़ा. स्वयं प्रेमचंद जी ही ने अपने सभी उपन्यासों में इस युग की सभी समस्याओं का चित्रण कर उनका समाधान प्रस्तुत किया है. शोषक और शोषित वर्ग के परस्पर संघर्ष, पूँजीवाद के दमन-चक्र, नये धर्म का स्वरुप और प्रगतिशील समाज की रचना के सुझावों से उनके उपन्यास भरे पड़े हैं.

नारी जीवन की अनेक समस्याओं के साथ सामाजिक कुरीतियों और धार्मिक पाखंडों की ओर प्रसाद ने अपने उपन्यासों में लोगों का ध्यान आकर्षित कर उन्हें उचित निर्देशन प्रदान करने का प्रयास किया. इस युग में लगता था कि नारी समस्या, उसकी प्रगति और सामाजिक संघर्ष में उसे उचित स्थान देने की ओर ही उपन्यासकारों का विशेष ध्यान रहा. भगवती प्रसाद बाजपेयी, प्रताप नारायण श्रीवास्तव, चतुरसेन शास्त्री, चण्डीप्रसाद हृदयेश, वृन्दावन लाल वर्मा, सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला',राजा राधिकारमण प्रसाद सिंह, ठाकुर श्रीनाथ और पाण्डेय बेचन शर्मा 'उग्र' आदि सभी उपन्यासकारों की कृतियों में नारी जीवन के मार्मिक प्रसंग नारियों की प्रगतिशीलता के लिए जोरदार दलीलें, उनके पिछड़े होने पर तीखे व्यंग्य और उसकी समस्याओं के समाधान का अपना आदर्शवादी ढंग सभी कुछ मिल जाता है.  इस प्रकार प्रेमचंद जी के नेतृत्व में इस युग में प्रायः सभी उपन्यासकारों ने युग की समस्याओं को पिछले युग की भाँती अवहेलना की दृष्टि से नहीं देखा, बल्कि उन्हें हृदयंगम कर, चेतना की कसौटी पर कपडछान कर और मंजी तार्किक शक्ति से उपस्थित कर उनका समाधान भी अपने अपने ढंग से प्रस्तुत किया.

इस प्रकार हिंदी उपन्यास साहित्य को वास्तविक रूप देने का श्रेय प्रेमचंद जी को है. हिंदी उपन्यासों  की पहले से कोई परंपरा न थी. उन्होंने ही परंपरा का निर्माण किया और स्वयं एक उल्लेखनीय स्थान के अधिकारी बने. प्रेमचंद जी ने जीवन की यथार्थता को उपन्यास साहित्य में अधिक व्यापक बना दिया है. नीति के साथ कला का संबंध स्थापित किया है, इसके अतिरिक्त व्यक्ति की संवेदनाओं का, विवशताओं का विश्लेषण भी किया है. उनकी आर्थिक विशेषताओं का अनुशीलन किया है. और उनमे समाधान के लिए समाज की विकृत व्यवस्थाओं पर कुठाराघात किया है. उनके प्रति पीड़ित व्यक्ति के मन में प्रतिक्रिया भी उत्पन्न की है. जिन सामाजिक व्यवस्थाओं ने व्यक्ति के जीवन को पंगु, असमर्थ, शक्तिहीन बना रखा है उनके दोषों का अध्ययन करके उनको अपने उपन्यासों के माध्यम से पीड़ित जनता के सम्मुख प्रस्तुत किया है.  व्यक्ति की असहाय अवस्था का निदान करते हुए उन्होंने सामयिक, राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, धार्मिक, सामाजिक परिस्थियों का अन्वेषण - विश्लेषण किया है. समाज के माध्यम से बाह्य उपकरणों की  सहायता से व्यक्ति की दुर्दशा का, करुणाजनक स्थिति का पर्यालोचन किया है. उसे परिवार में, बिरादरी में, गाँव में, नगर में, आंदोलनों में, सभाओं-उत्सवो में, सत्याग्रहों में विचारना, नाना प्रकार के क्रिया-कलापों को करना चित्रित किया है, जिससे कि पाठक व्यक्ति की समस्याओं का परिचय प्राप्त कर सके.

एक आलोचक ने ठीक ही लिखा है कि यदि चंद से लेकर प्रेमचंद तक हिंदी साहित्य की  प्रवृतियों, विषयवस्तु और रूपविधानों, साहित्य के आलंबनों और उपकारों का विस्तृत अध्ययन किया जाय तो प्रेमचंद जी का कृतित्व कई बातों में असाधारण और क्रन्तिकारी प्रतीत होगा.

तुलसी और सूर के काव्यों में जो लोक जीवन की छाया मिलती भी है, तो वह सामंती आदर्शों को उभार कर सामने लाने के लिए श्रृंगारिक उपकरण के रूप में या चमत्कार पैदा करने वाली विरोधी पृष्ठभूमि के रूप में.  किन्तु प्रेमचंद जी ने युग जीवन से प्रेरणा लेकर सामान्य जनता और किसानों के देहाती जीवन को अपने साहित्य का आलंबन बनाया, उन्होंने भारत की अस्सी प्रतिशत जनता की मूक वाणी को अपनी रचनाओं में मुखरित किया. हिंदी साहित्य के क्षेत्र में यह एकदम नया क्रन्तिकारी कदम था.

प्रेमचंद की परंपरा आज भी उतने ही सशक्त रूप में जीवित है. यशपाल, विष्णु प्रभाकर, उपेन्द्रनाथ अश्क, रांगेय राघव आदि इन्ही  की देन हैं.

बुधवार, 4 जुलाई 2012

प्रेमचन्द : साहित्यिक योगदान


प्रेमचन्द : साहित्यिक योगदान
मनोज कुमार

धनपत राय की शिक्षा  फ़ारसी से शुरू हुई थी। उर्दू में वे नवाब राय के नाम से अफ़साना-निगारी करते थे। चौदह-पन्द्रह वर्ष की उम्र में उन्होंने खेल-खेल में एक नाटक लिख डाला। उनके नाते के मामू की आशनाई एक दलित जाति की स्त्री से हो गई थी, जिसके चलते उन्हें उसके परिवार वालों से पिटना पड़ा था। उसी घटना को आधार बनाकर उन्होंने नाटक की रचना कर डाली थी। लेकिन कायदे से उनकी पहली उर्दू रचना “ओलिवर क्रॉमवेल” नामक लेख था जो 1903 में प्रकाशित हुआ था। यह लेख धनपत राय के नाम से बनारस से प्रकाशित पत्र “आवाज़-ए-ख़ल्क़” में प्रकाशित हुआ था। इसी पत्र में उनका पहला उर्दू उपन्यास “असरारे मआबिर उर्फ़ देवस्थान रहस्य” धारावाहिक के रूप में 1903-04 में प्रकाशित हुआ था।

कानपुर से प्रकाशित “ज़माना” में वे नवाब राय के नाम से लिखते थे। 1906 में उनका दूसरा उपन्यास “हम खुर्मा व हम शवाब” उर्दू में और 1907 में “प्रेमा अर्थात्‌ दो सखियों का विवाह” नाम से हिन्दी में प्रकाशित हुआ। “किशना” उपन्यास भी 1906 में ही प्रकाशित हुआ था। 1907 में उनकी पहली कहानी “‘दुनिया का सबसे अनमोल रतन” छपी थी। “ज़माना” में 1908 में “इश्क़े दुनिया और हुब्बे वतन” कहानी प्रकाशित हुई थी। ये देश की आज़ादी के लिए अपने को क़ुरबान करने की कहानियां थीं। इसी वर्ष “ज़माना” में ही उनका उर्दू उपन्यास “रूठी रानी” धारावाहिक रूप में प्रकाशित हो रहा था।

जून 1908 में वतन-परस्ती के ज़ज़्बे से लबरेज़ उनका पहला कहानी संग्रह 'सोज़े-वतन' प्रकाशित हुआ। इसमें “दुनिया का सबसे अनमोल रतन”, “शेख़ मख़मूर”, “यही मेरा वतन है”, “सिल-ए-मातम” और “इश्क़े दुनिया और हुब्बे वतन” कहानियां संकलित थीं। ये कहानियां बरतानि हुकूमत को हज़म नहीं हुई। किसी प्रकार सरकार को पता चल गया कि इस संग्रह के लेखक ‘नवाब राय’ वास्तव में धनपत राय हैं। नौकरी तो बच गईं पर उनके लिखने पर पाबंदी लगा दी गई। 'सोज़े-वतन'की हज़ारों प्रतियां क्या जली वतन को प्रेमचन्द मिल गया। नवाब की कलम पर हुकूमत की पाबन्दी हो गयी थी। नवाब भूमिगत हो गए किन्तु कलम चलती रही।  लिपि बदल गयी, जुबान कमोबेश वही रहा। तेवर वही रहे और जज्बे में कोई तबदीली मुमकिन थी क्या ?

प्रेमचन्द के नाम से दिसम्बर 1910 में ‘ज़माना’ में उनकी पहली कहानी “बड़े घर की बेटी” छपी। 1915 तक वे प्रेमचन्द के नाम से उर्दू में कहानियां लिखते रहे। इस बीच 1912 में उनका “जलवए-ईसार” नामक उर्दू उपन्यास प्रकाशित हुआ। 1915 के आसपास उनका ध्यान हिन्दी में लिखने की तरफ़ गया। उर्दू अख़बारों से आमदनी कोई खास नहीं थी। हिन्दी में लिखी उनकी पहली कहानी “सौत” थी, जो ‘सरस्वती’ के दिसम्बर 1915 के अंक में प्रकाशित हुई। इस तरह उनका उर्दू और हिंदी में साथ-साथ लिखना शुरू हुआ। 1917 में उर्दू में “बज़ारे हुस्न” उपन्यास प्रकाशित हुआ जो बाद में “सेवा सदन” नाम से हिन्दी में छपा। यह प्रेमचन्द का पहला हिंदी उपन्यास कहा जा सकता है। इसी तरह 1918 में उर्दू में छपा “गोशाए आफ़ियत” हिन्दी में “प्रेमाश्रम” नाम से प्रकाशित हुआ। ‘चौगाने हस्ती” (1922) का हिंदी रूपान्तर “रंगभूमि” नाम से 1925 में छपा। उनका पहला हिंदी में लिखा उपन्यास “कायाकल्प” (1926) है। इसके बाद निर्मला (1927), प्रतिज्ञा (1929), गबन (1931), कर्मभूमि (1932), और गोदान (1936) प्रकाशित हुआ। प्रेमचन्द का एक और अधूरा रह गया उपन्यास “मंगलसूत्र” उनकी मृत्यु के बाद 1948 में प्रकाशित हुआ।

1936 में लखनऊ में एक अधिवेशन में भाषण देते हुए प्रेमचंद जी ने कहा था,
“साहित्यकार का लक्ष्य केवल महफ़िल सजाना और मनोरंजन का सामान जुटाना नहीं है – उसका दरज़ा इतना न गिराइए। वह देशभक्ति और राजनीति के पीछे चलने वाली सच्चाई भी नहीं है, बल्कि उसके आगे मशाल दिखाती हुई चलने वाली सच्चाई है।”

प्रेमचंद साहित्य को उद्देश्य परक मानते थे। इसीलिए उनके साहित्य में सामान्य मनुष्य कि पृष्ठभूमि में न रखकर केंद्र में रखा गया है और उसकी संवेदना, पीड़ा और संकट को साहित्य में उठाया गया है। प्रेमचंद के पहले हिन्दी उपन्यास साहित्य रोमानी ऐयारी और तिलस्मी प्रभाव में लिखा जा रहा था। उन्होंने उससे इसे मुक्त किया और यथार्थ की ठोस ज़मीन पर उतारा। यथातथ्यवाद की प्रवृत्ति के साथ प्रेमचंद जी हिंदी साहित्य के उपन्यास का पूर्ण और परिष्कृत स्वरूप लेकर आए। आम आदमी की घुटन, चुभन व कसक को अपने कहानियों और उपन्यासों में उन्होंने प्रतिबिम्बित किया। इन्होंने अपनी रचनाओं में समय को ही पूर्ण रूप से चित्रित नहीं किया वरन भारत के चिंतन व आदर्शों को भी वर्णित किया है। जब हम उनके उपन्यासों का अध्ययन करते हैं तो पाते हैं कि उनके साहित्य में ऐसे पात्र भी हैं जो रूढ़ि जर्ज़र संस्कारों से संघर्ष ही नहीं करते बल्कि उन औपनिवेशिक शक्तियों के ख़िलाफ़ भी खड़े होते हैं, जो उनका शोषण कर रहे हैं। उनके पात्रों में में ऐसी व्यक्तिगत विशेषताएं मिलने लगीं जिन्हें सामने पाकर अधिकांश लोगों को यह भासित होता था कि कुछ इसी तरह की विशेषता वाले व्यक्ति को हमने कहीं देखा है।

प्रेमचंद का जीवन औसत भारतीय जन जैसा है। यह साधारणत्व एवं सहजता प्रेमचंद की विशेषता है। परिवार से उन्हें गहरा लगाव था। उनके प्राण अपने लड़कों में बसते थे। प्रेमचंद दरिद्रता में जनमे, दरिद्रता में पले और दरिद्रता से ही जूझते-जूझते समाप्त हो गए। फिर भी वे भारत के महान साहित्यकार बन गए थे। उन्होंने अपने को सदा मज़दूर समझा। बीमारी की हालत में, मरने के कुछ दिन पहले तक भी अपने कमज़ोर शरीर को लिखने पर मज़बूर करते थे। कहते थे, “मैं मज़दूर हूं! मज़दूरी किए बिना  मुझे भोजन का अधिकार नहीं है।”

उनके हृदय में इतनी वेदनाएं, इतने विद्रोह भाव, इतनी चिन्गारिया थी कि वे उसे संभाल नहीं सकते थे। उनका हृदय अगर उसे प्रकट नहीं कर देता तो वे शायद पहले ही बंधन तोड़ देते। धूर्तता और मक्कारी से अनभिज्ञ, विनम्रता की वे प्रतिमूर्ति थे। लाखों-करोडों भूखे, नंगे, निर्धनों की वे ज़बान थे। धार्मिक ढ़कोसलों को ढ़ोंग मानते थे और मानवता को सबसे बड़ी वस्तु। उनके उपन्यासों में उठाई गई प्रत्येक समस्या के मूल में आर्थिक विषमताओं का हाथ है। उनके उपन्यासों में प्रत्येक घटना इसी विषमता को लेकर आगे बढती है। शायद पहली बार शोषित, दलित एवं ग़रीब वर्ग को नायकत्व प्रदान किया। इनमें मुख्य रूप से किसान, मज़दूर और स्त्रियां हैं।

प्रेमचन्द जिस समय लिख रहे थे, वह समय भारतीय समाज में पूंजीवाद का शुरुआती दौर था। पूंजीवाद ने उन सारे रिश्तों को खोखला बना दिया था, जिस पर हमारी सामाजिक संरचना टिकी थी। उन्होंने जीवन के अनुभव के संदर्भ में पूंजीवाद के अमानवीय पहलू को जहां एक ओर उभारा वहीं दूसरी ओर सामाजिक मान्यताओं, अंधविश्वासों और कुरीतियों की आलोचना भी की। सेवासदन, ग़बन, कर्मभूमि, निर्मला, प्रेमाश्रम और गोदान इन सबमें मूल रूप में वही आर्थिक और नैतिक समस्याएं हैं। ‘निर्मला’ में दहेज-प्रथा ने अनमेल विवाह की स्थिति पैदा की। धनाभाव के कारण मुंशी तोताराम के परिवार में संघर्ष चलते हैं। ‘ग़बन’ का नायक रामनाथ ‘गोदान’ के होरी को भी आर्थिक समस्या से जूझना पड़ता है। प्रेमचंद ने जो अभिशाप देखा था, अपने जीवन में भोगा था, उसी को उन्होंने अपने साहित्य में प्रमुख स्थान दिया। डॉ. नगेन्द्र कहते हैं,
“गत युग के सामाजिक और राजनीतिक जीवन में आर्थिक विषमताओं के जितने भी रूप संभव थे, प्रेमचंद की दृष्टि उन सभी पर पड़ी और उन्होंने अपने ढंग से उन सभी का समाधान प्रस्तुत किया है, परन्तु उन्होंने अर्थवैषम्य को सामाजिक जीवन का ग्रंथि नहीं बनने दिया। .. उनके पात्र आर्थिक विषमताओं से पीड़ित हैं परंतु वे बहिर्मुखी संघर्ष द्वारा उन पर विजय प्राप्त करने का प्रयत्न करते हैं, मानसिक कुंठाओं का शिकार बनकर नहीं रह जाते।”

आज की चर्चा को एक साहित्यकार की टिप्पणियों से विराम देना चाहूंगा,
“प्रेमचन्द कोई फ़रिश्ता नहीं थे, पर शैतान भी नहीं थे; दाने-दाने को मुहताज न थे, पर अमीर भी न थे; बहुत से मामलों में दकियानूस भी थे, पर एक औसत आदमी से ज़्यादा प्रगतिशील और जागरूक थे; अंतर्विरोध उनके चरित्र में था, पर मनोवैज्ञानिक कुंठाओं से ग्रस्त नहीं थे; दुनिया के दस महान साहित्यकारों में उनकी गिनती न हो, पर हज़ारों साहित्यकारों से ऊपर उनका स्थान अवश्य है। प्रेमचन्द एक साधारण इंसान, पर बड़े लेखक हैं। भारतीय कथा साहित्य में उनका स्थान प्रथम पंक्ति में सुरक्षित है। हिंदी कथा साहित्य के सम्राट वे अपने समय में भी थे और आज भी हैं।”
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रविवार, 31 जुलाई 2011

मानवीय मूल्यों के संस्थापक- प्रेमचंद


मानवीय मूल्यों के संस्थापक- प्रेमचंद

31 जुलाई 1880-8 अक्टूबर 1936           
                                        मनोज कुमार



आज उनका जन्मदिन है


धनपत राय उर्दू में नवाब राय के नाम से गल्प लिखते थे। वतन-परस्ती के ज़ज़्बे से लबरेज़ थे। पांच कहानियों का संकलन 'सोज़े-वतन' 1909 में प्रकाशित हुआ। ब्रिटिश सरकार ने इसे ख़तरनाक माना। प्रेमचंद पर ‘सिडीशन’ का आरोप लगा। बरतानि हुकूमत को 'सोज़े-वतन' हज़म नहीं हुई और इसकी हज़ारों प्रतियां जला दी गईं। संबद्ध ब्रिटिश अधिकारी ने चेतावनी देते हुए कहा था, “आगे से ऐसा कुछ भी करने की ज़ुर्रत न करना। तुम ब्रिटीश अमलदारी में हो, नहीं तो इस ज़ुर्म के लिए तुम्हारा हाथ कलम कर दिया जा सकता था।” 'सोज़े-वतन' क्या जली वतन को प्रेमचन्द मिल गया।

‘सोज़ेवतन’ की पांच में से चार कहानियां ‘दुनिया का सबसे अनमोल रतन’, ‘शेख मखमूर’, ‘यही मेरा वतन है’, और ‘सांसारिक प्रेम और देश प्रेम’ उस समय की राष्ट्रीय चेतना के उभार को रेखांकित करती हैं। ये कहानियां भावना के स्तर पर देश और राष्ट्र प्रेम को प्रोत्साहित करने की कोशिश का परिणाम हैं।

1936 में लखनऊ में आयोजित प्रगतिशील लेखक संघ के प्रथम अधिवेशन में भाषण देते हुए प्रेमचंद जी ने कहा था,
“साहित्यकार का लक्ष्य केवल महफ़िल सजाना और मनोरंजन का सामान जुटाना नहीं है – उसका दरज़ा इतना न गिराइए। वह देशभक्ति और राजनीति के पीछे चलने वाली सच्चाई भी नहीं है, बल्कि उसके आगे मशाल दिखाती हुई चलने वाली सच्चाई है।”

इससे बढ़िया साहित्य की परिभाषा हो ही नहीं सकती। प्रेमचंद साहित्य को उद्देश्य परक मानते थे। प्रेमचंद के पहले हिन्दी उपन्यास साहित्य रोमानी, ऐयारी और तिलस्मी प्रभाव में लिखा जा रहा था। उन्होंने उससे इसे मुक्त किया और यथार्थ की ठोस ज़मीन पर उतारा। यथातथ्यवाद की प्रवृत्ति के साथ प्रेमचंद जी हिंदी साहित्य के उपन्यास का पूर्ण और परिष्कृत स्वरूप लेकर आए। उन्होंने अपनी रचनाओं में समाज की सामाजिक-आर्थिक विसंगतियों को उजागर किया। शोषित, दलित और ग़रीब वर्ग को नायकत्व प्रदान किया। आम आदमी की घुटन, चुभन व कसक को अपने कहानियों और उपन्यासों में उन्होंने प्रतिबिम्बित किया। इन्होंने अपनी रचनाओं में समय को ही पूर्ण रूप से चित्रित नहीं किया वरन भारत के चिंतन व आदर्शों को भी वर्णित किया है।

प्रेमचंद का साहित्य ग़रीब जनता का साहित्य है। उन्होंने जीवन को बहुत नज़दीक से देखा था। उनके उपन्यासों में निम्न और मध्यम श्रेणी के गृहस्थों के जीवन का बहुत सच्चा रूप मिलता है। इनकी कहानियों में पहली बार समाज का पूरा परिवेश उसकी कुरूपता, असमानता, छुआछूत, शोषण की विभिषिका, कमज़ोर वर्ग और स्त्रियों का दमन आदि वास्तविकता के साथ प्रकट हुई है। ग्रामीण जीवन को उन्होंने बिना किसी वाद की ओर देखे अपने उपन्यासों में चित्रित किया है। अपने पात्रों को ऐसा सजीव चित्र देते हैं कि पाठक की उससे सहानुभूति सहज ही प्राप्त हो जाती है। पुरुष-पात्रों के साथ-साथ उन्हें नारी-पात्र के चरित्र चित्रण में भी  सफलता मिली है। सच तो यह है कि समाज के सभी वर्ग के पात्रों का चरित्र अपने-अपने अनुरूप समान स्थान पाता है।

प्रेमचंद का जीवन औसत भारतीय जन जैसा है। यह साधारणत्व एवं सहजता प्रेमचंद की विशेषता है। प्रेमचंद दरिद्रता में जनमे, दरिद्रता में पले और दरिद्रता से ही जूझते-जूझते समाप्त हो गए। फिर भी वे भारत के महान साहित्यकार बन गए थे। उन्होंने अपने को सदा मज़दूर समझा। बीमारी की हालत में, मरने के कुछ दिन पहले तक भी अपने कमज़ोर शरीर को लिखने पर मज़बूर करते थे। कहते थे, “मैं मज़दूर हूं! मज़दूरी किए बिना  मुझे भोजन का अधिकार नहीं है।”

कलाकार जब वस्तु पर अपने भाव और विवेक का आरोप कर देता है और उसे अपने आदर्श के अनुकूल गढ़ता है तब उसका दृष्टिकोण आदर्शवादी बन जाता है। प्रेमचन्द की कहानियों में आदर्शवाद के बदलते रूप दिखाई देते हैं। ये समसामयिक युगबोध को स्पष्ट करते हैं। शुरु की कहानियों जैसे ‘बड़े घर की बेटी’, ‘पंच परमेश्वर’, ‘नमक का दारोगा’, ‘उपदेश’, ‘परीक्षा’, ‘अमावस्या की रात’, ‘पछतावा’ आदि कहानियों में वे पूरी तरह से आदर्शवादी दिखते हैं। इनमें कर्तव्य, त्याग, प्रेम, न्याय, मित्रता, देश सेवा आदि की प्रतिष्ठा हुई है। बाद में आदर्शवाद यथार्थ में बदलता जाता है। ‘गोदान’, ‘प्रेमाश्रम’ ‘रंगभूमि’ जैसे उपन्यास और  ‘पूस की रात’, ‘ठाकुर का कुँआ’, ‘बूढ़ी काकी’, ‘दूध का दाम’, ‘सद्गति’, ‘वज्रपात’ आदि में जीवन का नग्नतम यथार्थ उजागर होता है।

सामाजिक सुधार संबंधी भावना का प्रबल प्रवाह उन्हें कभी-कभी एक कल्पित यथार्थवाद की ओर खींच ले जाता है फिर भी उन्होंने कल्पना और वायवीयता से कथा-साहित्य को निकालकर उसे समय और समाज के रू-ब-रू खड़ा करके वास्तविक जीवन के सरोकारों से जोड़ा। अपने जीवन काल में वे विभिन्न सुधारवादी और पराधीनता की स्थितिजन्य नव जागरण प्रवृत्तियों से प्रभावित रहे हैं, जैसे - आर्यसमाज, गाँधीवाद, वामपंथी विचारधारा आदि। लेकिन समाज की यथार्थगत भूमि पर उसकी सहज प्रवृत्ति में ये प्रवृत्तियाँ जितनी समा सकती है, उतनी ही मिलाते हैं, ठूस कर नहीं भरते। इसीलिए चित्रण में जितनी स्वाभाविकता प्रेमचन्द में देखने को मिलती है, अन्यत्र दुर्लभ है। 'गोदान' में तो यह अपनी पराकष्ठा पर पहुँच गई है।

प्रेमचन्द क्रांति नहीं, सुधार के समर्थक थे। हां यह ज़रूर है कि वे धीरे-धीरे आदर्शवाद और सुधारवाद के प्रभाव से मुक्त हो रहे थे। ‘गोदान’, ‘पूस की रात’ या ‘सादगी’ में यह बात दिखती है। बदली हुई परिस्थितियों में वे ख़ुद को बदल रहे थे। यदि प्रेमचन्द युग का आरम्भ 'सेवासदन' में है, तो उसका उत्कर्ष 'गोदान' में। इस उपन्यास में उन्होंने भारतीय किसान की पतनशील स्थिति के लिए शोषकों के साथ-साथ सामाजिक रूढ़ियों, अंधविश्वासों और दुराग्रहों को जिम्मेदार माना है। उन्होंने बदलते हुए यथार्थ के परिप्रेक्ष्य में चीज़ों को समझने का प्रयत्न किया है। छोटे व ग़रीब किसान की मज़दूर बन जाने की विवशता इस उपन्यास की उपलब्धि है। ‘गोदान’ किसान जीवन की त्रासदी का महाकाव्य है। भाग्यवाद ने किसान को यथास्थितिवादी होने के लिए मज़बूर कर दिया है। इस उपन्यास में प्रेमचंद आदर्शवाद से यथार्थवाद की ओर बढ़ते हुए दिखाई देते हैं। यह एक तरह से आदर्श और यथार्थ का मिलाजुला रूप है। प्रेमचंद ने प्रगतिवादी साहित्य को नयी दिशा दी जिसे आलोचकों ने – ‘आदर्शोन्मुख यथार्थवाद’ कहा है।

वे आदर्शों और विचारधाराओं को अपने पात्रों पर थोपते नहीं हैं, बल्कि अन्तरमन या अन्तरात्मा की आवाज की तरह स्वाभाविक रूप से प्रस्फुटित होने देते हैं। ‘सेवासदन’ के गांधीवादी प्रेमचंद ‘गबन’ में मार्क्सवादी विचारधारा में ढलते दीखते हैं लेकिन ‘गोदान’ तक आते-आते वामपंथ से भी उनका मोहभंग हो चुका है। जीवन के अंत में मृत्यु-शैय्या पर पड़े प्रेमचंद का जैनेन्द्र से यह कहना कि “अब आदर्श से काम नहीं चलेगा” शायद उनकी आशाओं और दृढ़ विश्वासों के स्खलन का सूचक है।

उनकी कहानियों में आदर्श और यथार्थ का अन्तर्द्वन्द्व है। हालाकि बाद की कहानियाँ समस्यामूलक रही हैं, किन्तु उन्होंने आदर्श समाधान प्रस्तुत करना बन्द कर दिया। यह उनकी रचनाओं में रिक्ति नहीं बनी, बल्कि ये वैचारिक मंथन के रूप में पाठकों को झकझोरने लगीं और ये रचनाएं अपने उत्कर्ष को प्राप्त करती अधिक प्रभावशाली साबित हुईं। ‘पूस की रात’ और'कफन' जैसी कहानियों में उनकी बदली हुई वैचारिक पृष्ठभूमि को स्पष्ट देखा जा सकता है। उनकी बाद की कहानियाँ घटना प्रधान न होकर चरित्र प्रधान हैं जिनमें पात्रों की मनोवृत्तियों का वास्तविक चित्रण नितांत सहज रूप में देखने को मिलता है। उनका स्वयं कथन है - 'कोई घटना तब तक कहानी नहीं होती जब तक कि वह किसी मनोवैज्ञानिक सत्य को व्यक्त न करे।' इस कथन से उनकी कहानियों में आए विकास को समझा जा सकता है। 'कफन' कहानी उनके इस वैचारिक विकास का उत्कर्ष है। इसमें ग्रामीण कृषक की दुरावस्था का चित्रण है। किसानों की आर्थिक विपन्नता जमीदारों - साहूकारों के शोषण का नतीजा नहीं है बल्कि यह आर्थिक विषमता मूलक समाज की संरचना है। यह कहानी उस सामाजिक व्यवस्था पर करारा व्यंग्य करती है जो मनुष्य के जिन्दा रहने पर उसका शोषण होने देती है और मर जाने पर खोखली नैतिकता का जामा पहन उसके अंतिम संस्कार के लिए उपाय करती है, सहयोग करती है।
प्रेमचंद का व्यक्तित्व साधारण और व्यावहारिक था। साथ ही उनके जीवन के आदर्श भी प्रत्यक्ष और सुनिश्चित थे। अतएव उन्होंने व्यावहारिक धरातल पर ही आदर्शवाद की प्रतिष्ठा की है। उनका आदर्शवाद रोमानी आदर्शवाद नहीं है, व्यावहारिक आदर्शवाद है। उन्होंने बहुत विस्तृत क्षेत्र का चित्रण किया है। यथार्थ और आदर्श के चित्रण के समन्वय से इस चित्रण में एक स्वाभाविकता है। उनका मानना था कि यथार्थवाद हमारी आंखें खोल देता है तो आदर्शवाद ऊंचा उठाकर किसी मनोरम स्थान पर पहुंचा देता है। किसी देवता की कामना करना मुमकिन है लेकिन उसमें प्राण-प्रतिष्ठा करना मुश्किल है। यथार्थ और आदर्श के समन्वय से उन्होंने अपने पात्रों में सच्ची प्राण-प्रतिष्ठा की। मानवीय दुर्बलता उनके पात्रों में मिलती है। लेकिन ऐसी दुर्बलताएं ही मनुष्य को मनुष्य बनाती है। अन्यथा निर्दोष चरित्र तो देवताओं में ही मिल सकता है। साहित्य में ‘होरी’, ‘धनिया’ और ‘गोबर’ जैसे 'सर्वहारा' पात्रों को स्थान दिलाने का श्रेय भी प्रेमचंद को ही है।

हिन्दी साहित्य का यह प्रकाश स्तंभ, जो जीवन मूल्यों को बताता था आज हमारे बीच नहीं है पर यह तो निश्चित है कि वे देश के महान व सर्वोत्तम रत्न  थे। उन्होंने जनवादी लेखनी को नया आयाम दिया। जीवन को कसौटी पर कसने के लिए उन्होंने एक मापदंड दिया। वे लेखनी के माध्यम से भविष्य का मार्ग दर्शन भी करते थे।  उन्होंने अपने साहित्य के माध्यम से मानवीय मूल्यों को स्थापित करने का गंभीर प्रयास किया। हिंदी साहित्य में उनके योगदान को नहीं भुलाया जा सकता। उनके दिखाए जीवन का मूल्य और उनका साहित्य आज भी प्रासंगिक हैं।