मैं एक नौ वर्ष के बालक का छोटा सा अनुभव आपसब के साथ बांटना चाहूँगा । इस बालक ने प्रेमचंद की कहानी ईदगाह पढ़ी और तीन पैसे ले कर ईदगाह जाने वाले बालक कि मजबूरी से दुखी कोमलमन बालक कई दिन तक गुमसुम रहा वो बालक मै था। ये मेरा स्वयं का अनुभव है. ऐसे अनगिनत मायूस अनुभवों से भरा है मेरा बचपन। इस कथा साहित्य ने मेरी बाल सुलभ मुस्कान, हंसी, मेरा बचपन मुझसे छीन लिया। इससब से उबर परिपक्व होने में जवान होने के बाद भी मुझे बरसों लगा गए। --- पन्डित सूर्यकान्त ”
मंगलवार, 31 जुलाई 2012
जन्म दिवस पर - प्रेमचंद की देन
मैं एक नौ वर्ष के बालक का छोटा सा अनुभव आपसब के साथ बांटना चाहूँगा । इस बालक ने प्रेमचंद की कहानी ईदगाह पढ़ी और तीन पैसे ले कर ईदगाह जाने वाले बालक कि मजबूरी से दुखी कोमलमन बालक कई दिन तक गुमसुम रहा वो बालक मै था। ये मेरा स्वयं का अनुभव है. ऐसे अनगिनत मायूस अनुभवों से भरा है मेरा बचपन। इस कथा साहित्य ने मेरी बाल सुलभ मुस्कान, हंसी, मेरा बचपन मुझसे छीन लिया। इससब से उबर परिपक्व होने में जवान होने के बाद भी मुझे बरसों लगा गए। --- पन्डित सूर्यकान्त ”
बुधवार, 25 जुलाई 2012
प्रेमचंद जी के उपन्यासों में पात्रों का चरित्र चित्रण और पात्र योजना
प्रेमचंद जी के उपन्यासों में
पात्रों का चरित्र चित्रण और पात्र योजना
कई बार उपन्यासकार स्वाभाविक चारित्रिक विकास की ओर पूर्ण रूप से ध्यान नहीं दे पाता अतः या तो पात्रों की बीच में हत्या कर देनी पड़ती है या उनकी असामयिक मृत्यु हो जाती है, या वे बीच से ही गायब हो जाते है, फिर अंत तक उनका पता ही नहीं चलता और पाठक उन्हें खोजते ही रह जाते हैं. प्रेमचंद जी के उपन्यासों में भी ऐसा बहुत हुआ है. आदर्शवाद को उभारने के लिए ही यथार्थ जीवन से पात्रों को चुनने के बावजूद प्रेमचंद ने अपने उपन्यासों में संयोग तत्वों को इतना अधिक महत्त्व दिया है कि प्रायः उनके पात्र अस्वाभाविक, अयथार्थ अथवा यांत्रिक से प्रतीत होने लगते हैं. निर्मला उपन्यास में मुंशी उदयभानु लाल अपनी पत्नी से झगडा करके इसीलिए घर से बाहर निकलते हैं ताकि मतई रास्ते में उन्हें मार डाले और घर की स्वाभाविक आर्थिक विषमताओं के कारण निर्मला का अनमेल विवाह हो. रंगभूमि में सोफिया का माँ से झगड कर घर से बाहर निकलना इसलिए होता है ताकि वह अग्निकांड देखे और विनयसिंह के समीप आये. गबन के रामनाथ को चुंगिघर में नौकरी मिलना, जहाँ से वो पैसे उड़ा सके. और तो और कंगन बनवाने के लिए रतन का उसे छह सौ रूपए देना, ठीक छह सौ जिससे रामनाथ के जीवन में संघर्ष उत्पन्न हो सके. वरदान में कमलाचरण का ट्रेन से कूद कर मरना, प्रतिज्ञा में बसंत कुमार का गंगा में डूब कर मरना ताकि पूर्णा विधवा हो सके, सेवासदन में कृष्णचन्द्र का डूब कर मरना, ताकि विषमताओं के कारण सुमन का अनमेल विवाह गजाधर से हो सके, प्रेमाश्रम में गायत्री, मनोहर और ज्ञानशंकर की आत्महत्याएं और कायाकल्प में शंखधर की मृत्यु , उसके पिता की आत्महत्या, रंगभूमि में ही सूरदास की मृत्यु, सेवासदन में गजाधर का साधू बन जाना और समय समय पर उपस्थित होकर फिर गायब हो जाना आदि ऐसे ही उदाहरण हैं. वस्तुतः प्रेमचंद जी ऐसा या तो भावुकता के वशीभूत होकर करते हैं, या पात्रों की गति न संभाल पाने के कारण ही उन्हें मार देना पड़ता है.
प्रश्न यह भी उठता है कि क्या प्रेमचंद के पात्रों में अपनी व्यक्तिगत विशेषताएं नहीं है. क्या सुमन, निर्मला, मंसाराम, जालपा, होरी, धनिया, गोबर, झुनियाँ आदि वैयक्तिता से रहित हैं. सबल व्यक्तित्व के पात्रों के अध्ययन से हम एक भावलोक में अपने आपको खोकर उनसे तादातम्य पाते हैं तो प्रेमचंद जी के पात्रों को यथार्थ रूप में देखकर उनसे सीधा संबंध स्थापित करते हैं. निर्मला में लेखक ने निर्मला और मंसाराम के आंतरिक द्वन्द का चित्रण करते हुए मनोव्यापारों का थोड़ा अध्ययन किया था, परन्तु इस कार्य को किसी अन्य उपन्यास में वो आगे नहीं बढ़ा पाए. संक्षेप में कहा जा सकता है कि प्रेमचंद जी के पात्र अपने वर्ग के प्रतिनिधि भी हैं, और काफी हद तक व्यक्तिगत विशेषताओं से युक्त भी. होरी के समबन्ध में अगर दावा करें कि मैंने एक मौलिक पात्र की सृष्टि की है तो होरी हडबडा कर उठ बैठेगा और चिल्ला उठेगा, 'सृष्टि आपने ख़ाक की है, मैं तो स्वयंभू हूँ,आपने मेरा चित्र मात्र उतारा है. प्रेमचंद जी के पात्रों का सम्बन्ध बाह्य जीवन से अधिक रहा है और उनका संघर्ष युग और समाज के सन्दर्भ में ही उभरता है. उनके मानसिक द्वंदों या आंतरिक संघर्ष को प्रेमचंद जी ने विशेष महत्त्व नहीं दिया जिससे वे वैयक्तिक बन पाते. प्रेमचंद जी की प्रखर सामाजिक चेतना और सामाजिक दायित्व के निर्वाह की भावना ने भी पात्रों में वैयक्तिकता नहीं आने दी. बुधवार, 18 जुलाई 2012
हिंदी उपन्यास साहित्य की परंपरा में प्रेमचंद जी का स्थान
हिंदी उपन्यास साहित्य की परंपरा में प्रेमचंद जी का स्थान
प्रेमचंद जी के साहित्यिक सृजन का पठन करते हुए पिछली बार हमने जाना कि प्रेमचंद जी के समय की राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक एवम धार्मिक परिस्थियाँ क्या थी और उसमे प्रेमचंद जी का क्या योगदान था. आइये आज जानते हैं हिंदी उपन्यास साहित्य की परंपरा में प्रेमचंद जी का क्या स्थान था और आधुनिक उपन्यास साहित्य पर उनका प्रभाव कहाँ तक पड़ा...
हिंदी उपन्यासों का आविर्भाव उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तराद्ध में हुआ. कथा कहानी की परंपरा का सम्बन्ध वेद, पुराण से जोड़ना या अन्य धार्मिक साहित्य से जोड़ना तर्क संगत नहीं है. वह सर्वथा आधुनिक युग की देन है और उसके लिए हिंदी उपन्यास साहित्य पश्चिम का ऋणी है.
पूर्व प्रेमचंद काल की स्थिति भी कुछ विशेष अच्छी न थी. परिवार में सबसे बड़ा व्यक्ति धन कमाए और सारे परिवार का पालन-पोषण करे - यह भावना समाप्त हो गयी थी. नारियों की स्थिति तो और भी दयनीय थी. उनकी आर्थिक परतंत्रता भीषण रूप धारण कर चुकी थी. उन्हें सामाजिक स्वतंत्रता भी न प्राप्त थी, राजनीतिक स्वतंत्रता तो दूर की बात थी. प्रेम और विवाह की स्वतंत्रता न प्राप्त होने के कारण सामाजिक रूढ़ियों को तोडना प्रायः असंभव हो गया था. बाल विवाह बराबर छिपे तौर पर अब भी होते जा रहे थे. वेश्यावृति भी बढती जा रही थी. विधवा विवाह को भी मान्यता प्राप्त नहीं थी. जिस प्रगतिशीलता की नितांत आवश्यकता थी, समाज उससे लगभग अपरिचित था.
ऐसी परिस्थितियों में हिंदी उपन्यास का जन्म हुआ. इन समस्याओं के समाधान और समाज में प्रगतिशीलता लाने का उत्तरदायित्व प्रारम्भिक उपन्यासकारों ने लिया, साथ ही उपन्यासों के माध्यम से पाठकों तक ऐसी भावनाओं का सम्प्रेषण किया, जिसमे उनके जीवन के प्रति गरिमा का अनुभव हो, उनके खंडित होने वाले विश्वास, छिन्न-भिन्न होने वाली आस्थाओं को आधार प्राप्त हो, चरित्र निर्माण हो, वेश्यागमन हो, मद्यपान एवं जुए का अंत हो, समाज में दृढ़ता आये एवं उसकी प्रगति हो तथा धर्म की रक्षा हो. यह आवश्यक था कि उपन्यासकार जीवन की इन समस्याओं को अपनी कृतियों से चित्रित करें और गौरवपूर्ण जीवन के निर्माण पर बल दें. यद्यपि इस युग में उपन्यास साहित्य अधिक प्रगति नहीं कर पाया, फिर भी लाला श्रीनिवास दास, श्रद्धा राम फिल्लोरी, बालकृष्ण भट्ट, गोपालराम गहमरी, मेहता लज्जाराम शर्मा आदि ने किन्हीं सीमाओं तक अपने उपन्यासों में जीवन की समस्याओं की ओर ध्यान दिया, पर या तो वे चलते चलते इन प्रसंगों को स्पर्श करने के बराबर था, अथवा उपदेशक बन कर शिक्षा देने की प्रक्रिया मात्र थी. इस प्रारम्भिक काल में उपन्यासों का मानव जीवन के साथ कोई विशेष सम्बन्ध स्थापित नहीं हो सका. पर जो प्रयत्न हुए, उनमे उस अकुलाहट और बेबसी का आभास हमें मिलता है, जो आगे चल कर प्रेमचंद जी द्वारा क्रियाशील ढंग से अधिक कलात्मकता से प्रकट हुआ.
वास्तव में उस समय नाटकों के अतिरिक्त केवल उपन्यास लेखन ही ऐसा साधन था, जिसके द्वारा समाज के दोषों को दूर करने का प्रयत्न किया गया. नैतिकता के विकास का प्रयत्न इन्हीं के माध्यम से किया गया. उपन्यासों के माध्यम से ही सामाजिक चरित्र को ऊंचा उठाने का प्रयत्न हुआ. अनेक उपन्यास लेखक ऐसे थे जिनमे युगीन समस्याओं को उपन्यासों में उठाने और उनका समाधान प्रस्तुत करने की व्यग्रता थी. 'भाग्यवती' , सौ अजान एक सुजान, नूतन ब्रह्मचारी, परीक्षा गुरु आदि इसी प्रकार के उपन्यास थे . इन लेखकों ने अपनी कृतियों में समाज के पतन की ओर ध्यान दिया. घरेलु जीवन से सम्बन्ध रखने वाले गृहस्थ जीवन के उपन्यासों की भी रचना की गयी.
प्रेमचंद के आगमन के समय भारतीय जीवन बहुत ही दयनीय था. लोगों में अजीब सी निराशा व्याप्त थी. आर्य समाज आन्दोलन इस काल में सामाजिक परिस्थिति में सुधार लाकर प्रगतिशीलता लाने में संलग्न था. यह तो निश्चित था कि भारतवासी जहाँ थे , वहां न रहना चाहकर आगे बढ़ने के लिए उत्सुक थे. भारत की ज्यों ज्यों आर्थिक स्थिति शोचनीय होने लगी, सम्मिलित कुटुम्ब प्रथा भी त्यों त्यों विच्छिन्न होने लगी. जाति प्रथा भी क्षीण होने लगी थी. बाल विवाह की प्रथा भी समाप्त होती जा रही थी. सुधारवादी आन्दोलनों एवं पाश्चात्य शिक्षा के बढ़ते प्रभाव के कारण भारत का सामाजिक ढांचा हिलने लगा था.
इस युग में प्रेमचंद जी ने साहित्य के क्षेत्र में पर्दापण किया था और उन्होंने उपन्यासों को एक नयी दिशा प्रदान की. कल्पना लोक से निकल कर उसे यथार्थ की कठोर भूमि पर ला खड़ा कर प्रेमचंद जी ने हिंदी उपन्यासों को प्रगति की ओर मोड़ा. स्वयं प्रेमचंद जी ही ने अपने सभी उपन्यासों में इस युग की सभी समस्याओं का चित्रण कर उनका समाधान प्रस्तुत किया है. शोषक और शोषित वर्ग के परस्पर संघर्ष, पूँजीवाद के दमन-चक्र, नये धर्म का स्वरुप और प्रगतिशील समाज की रचना के सुझावों से उनके उपन्यास भरे पड़े हैं.
नारी जीवन की अनेक समस्याओं के साथ सामाजिक कुरीतियों और धार्मिक पाखंडों की ओर प्रसाद ने अपने उपन्यासों में लोगों का ध्यान आकर्षित कर उन्हें उचित निर्देशन प्रदान करने का प्रयास किया. इस युग में लगता था कि नारी समस्या, उसकी प्रगति और सामाजिक संघर्ष में उसे उचित स्थान देने की ओर ही उपन्यासकारों का विशेष ध्यान रहा. भगवती प्रसाद बाजपेयी, प्रताप नारायण श्रीवास्तव, चतुरसेन शास्त्री, चण्डीप्रसाद हृदयेश, वृन्दावन लाल वर्मा, सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला',राजा राधिकारमण प्रसाद सिंह, ठाकुर श्रीनाथ और पाण्डेय बेचन शर्मा 'उग्र' आदि सभी उपन्यासकारों की कृतियों में नारी जीवन के मार्मिक प्रसंग नारियों की प्रगतिशीलता के लिए जोरदार दलीलें, उनके पिछड़े होने पर तीखे व्यंग्य और उसकी समस्याओं के समाधान का अपना आदर्शवादी ढंग सभी कुछ मिल जाता है. इस प्रकार प्रेमचंद जी के नेतृत्व में इस युग में प्रायः सभी उपन्यासकारों ने युग की समस्याओं को पिछले युग की भाँती अवहेलना की दृष्टि से नहीं देखा, बल्कि उन्हें हृदयंगम कर, चेतना की कसौटी पर कपडछान कर और मंजी तार्किक शक्ति से उपस्थित कर उनका समाधान भी अपने अपने ढंग से प्रस्तुत किया.
इस प्रकार हिंदी उपन्यास साहित्य को वास्तविक रूप देने का श्रेय प्रेमचंद जी को है. हिंदी उपन्यासों की पहले से कोई परंपरा न थी. उन्होंने ही परंपरा का निर्माण किया और स्वयं एक उल्लेखनीय स्थान के अधिकारी बने. प्रेमचंद जी ने जीवन की यथार्थता को उपन्यास साहित्य में अधिक व्यापक बना दिया है. नीति के साथ कला का संबंध स्थापित किया है, इसके अतिरिक्त व्यक्ति की संवेदनाओं का, विवशताओं का विश्लेषण भी किया है. उनकी आर्थिक विशेषताओं का अनुशीलन किया है. और उनमे समाधान के लिए समाज की विकृत व्यवस्थाओं पर कुठाराघात किया है. उनके प्रति पीड़ित व्यक्ति के मन में प्रतिक्रिया भी उत्पन्न की है. जिन सामाजिक व्यवस्थाओं ने व्यक्ति के जीवन को पंगु, असमर्थ, शक्तिहीन बना रखा है उनके दोषों का अध्ययन करके उनको अपने उपन्यासों के माध्यम से पीड़ित जनता के सम्मुख प्रस्तुत किया है. व्यक्ति की असहाय अवस्था का निदान करते हुए उन्होंने सामयिक, राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, धार्मिक, सामाजिक परिस्थियों का अन्वेषण - विश्लेषण किया है. समाज के माध्यम से बाह्य उपकरणों की सहायता से व्यक्ति की दुर्दशा का, करुणाजनक स्थिति का पर्यालोचन किया है. उसे परिवार में, बिरादरी में, गाँव में, नगर में, आंदोलनों में, सभाओं-उत्सवो में, सत्याग्रहों में विचारना, नाना प्रकार के क्रिया-कलापों को करना चित्रित किया है, जिससे कि पाठक व्यक्ति की समस्याओं का परिचय प्राप्त कर सके.
एक आलोचक ने ठीक ही लिखा है कि यदि चंद से लेकर प्रेमचंद तक हिंदी साहित्य की प्रवृतियों, विषयवस्तु और रूपविधानों, साहित्य के आलंबनों और उपकारों का विस्तृत अध्ययन किया जाय तो प्रेमचंद जी का कृतित्व कई बातों में असाधारण और क्रन्तिकारी प्रतीत होगा.
तुलसी और सूर के काव्यों में जो लोक जीवन की छाया मिलती भी है, तो वह सामंती आदर्शों को उभार कर सामने लाने के लिए श्रृंगारिक उपकरण के रूप में या चमत्कार पैदा करने वाली विरोधी पृष्ठभूमि के रूप में. किन्तु प्रेमचंद जी ने युग जीवन से प्रेरणा लेकर सामान्य जनता और किसानों के देहाती जीवन को अपने साहित्य का आलंबन बनाया, उन्होंने भारत की अस्सी प्रतिशत जनता की मूक वाणी को अपनी रचनाओं में मुखरित किया. हिंदी साहित्य के क्षेत्र में यह एकदम नया क्रन्तिकारी कदम था.
प्रेमचंद की परंपरा आज भी उतने ही सशक्त रूप में जीवित है. यशपाल, विष्णु प्रभाकर, उपेन्द्रनाथ अश्क, रांगेय राघव आदि इन्ही की देन हैं.
बुधवार, 4 जुलाई 2012
प्रेमचन्द : साहित्यिक योगदान
“साहित्यकार का लक्ष्य केवल महफ़िल सजाना और मनोरंजन का सामान जुटाना नहीं है – उसका दरज़ा इतना न गिराइए। वह देशभक्ति और राजनीति के पीछे चलने वाली सच्चाई भी नहीं है, बल्कि उसके आगे मशाल दिखाती हुई चलने वाली सच्चाई है।”
“गत युग के सामाजिक और राजनीतिक जीवन में आर्थिक विषमताओं के जितने भी रूप संभव थे, प्रेमचंद की दृष्टि उन सभी पर पड़ी और उन्होंने अपने ढंग से उन सभी का समाधान प्रस्तुत किया है, परन्तु उन्होंने अर्थवैषम्य को सामाजिक जीवन का ग्रंथि नहीं बनने दिया। .. उनके पात्र आर्थिक विषमताओं से पीड़ित हैं परंतु वे बहिर्मुखी संघर्ष द्वारा उन पर विजय प्राप्त करने का प्रयत्न करते हैं, मानसिक कुंठाओं का शिकार बनकर नहीं रह जाते।”
“प्रेमचन्द कोई फ़रिश्ता नहीं थे, पर शैतान भी नहीं थे; दाने-दाने को मुहताज न थे, पर अमीर भी न थे; बहुत से मामलों में दकियानूस भी थे, पर एक औसत आदमी से ज़्यादा प्रगतिशील और जागरूक थे; अंतर्विरोध उनके चरित्र में था, पर मनोवैज्ञानिक कुंठाओं से ग्रस्त नहीं थे; दुनिया के दस महान साहित्यकारों में उनकी गिनती न हो, पर हज़ारों साहित्यकारों से ऊपर उनका स्थान अवश्य है। प्रेमचन्द एक साधारण इंसान, पर बड़े लेखक हैं। भारतीय कथा साहित्य में उनका स्थान प्रथम पंक्ति में सुरक्षित है। हिंदी कथा साहित्य के सम्राट वे अपने समय में भी थे और आज भी हैं।”***
