मंगलवार, 27 जुलाई 2010

काव्य लक्षण – 11 :: गुणवदलंकृतं च वाक्यमेव काव्यम्‌

काव्य लक्षण – 11

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गुणवदलंकृतं च वाक्यमेव काव्यम्‌

आचार्य राजशेखर के बारे में आप पढ चुके हैं। (लिंक यहां है)

आचार्य राजशेखर ने अपने ग्रंथ काव्य-मीमांसा में काव्य के लिए कहा है -

गुणवदलंकृतं च वाक्यमेव काव्यम्‌!

अर्थात्‌ गुणों और अलंकारों से युक्त वाक्य का नाम काव्य है। उनका यह मानना था कि काव्य में अतिशयोक्ति का समावेश हो सकता है। उनके अनुसार अतिशयोक्तिपूर्ण होने से न तो कोई काव्य त्याज्य होता है न ही असत्य! इस कथन के पीछे उनका तर्क यह था कि काव्य में जो अतिशयोक्ति होती है उसका समर्थन शास्त्र और लोक दोनों करते हैं।

काव्य में श्रृंगार भी होता है। इसके रसात्मक अभिव्यक्ति में, खास कर पुरुष-नारी के मिलन के वर्णन को कुछ लोग अश्‍लील मानते हैं। इस विषय पर आचार्य राजशेखर का कहना था कि काव्य में जीवन की समग्रता को अभिव्यक्ति दी जाती है। तो उसमें संयोग कैसे वर्जित रहेगा! कलावाद की दृष्टि से यदि देखेण तो श्‍लील-अश्‍लील का विवाद ही नहीं होना चाहिए।

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