सोमवार, 26 जुलाई 2010

काव्यशास्त्र – 25 :: आचार्य रूपगोस्वामी और आचार्य केशव मिश्र

काव्यशास्त्र – 25

::

आचार्य रूपगोस्वामी

और

आचार्य केशव मिश्र

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आचार्य परशुराम राय

आचार्य रूपगोस्वामी

आचार्य रूपगोस्वामी का काल पन्द्रहवीं शताब्दी का अन्त और सोलहवीं शताब्दी माना जाता है। आचार्य रूपगोस्वामी के एक और भाई थे जिनक नाम सनातन गोस्वामी था। दोनों भाई चैतन्य महाप्रभु के शिष्य थे। चैतन्य महाप्रभु की इच्छा के अनुसार दोनों भाई बंगाल छोड़कर वृन्दावन आकर बस गए। आचार्य जीव गोस्वामी, जो उक्त दोनों आचार्यों के भतीजे थे, वे भी इनके साथ हो लिए। ये तीनों उद्भट विद्वान और वैष्णव सम्प्रदाय के प्रसिधद्ध आचार्य थे।

आचार्य जीवगोस्वामी के एक ग्रंथ 'लघुतोषिणी' (आचार्य सनातनगोस्वामी द्वारा भागवत महापुराण पर विरचित टीका का संक्षिप्त रूप) में आचार्य रूपगोस्वामी द्वारा विरचित सत्रह ग्रंथों के नाम दिए गए हैं। इनमें आठ विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं हंसदूत, उद्धवसन्देश, विदग्धमाधव, ललितमाधव, दानकेलिकौमुदी, भक्तिरसामृतसिन्धु, उज्जवलनीलमणि और नाटक चन्द्रिका। इनमें से प्रथम दो काव्य हैं, बाद के दो नाटक, पाँचवा भाणिका और अन्तिम तीन काव्यशास्त्र से सम्बन्धित ग्रंथ हैं। जिसके कारण आचार्य रूपगोस्वामी भारतीय काव्यशास्त्र के इतिहास में हमेशा याद किए जाएँगें।

'भक्तिरसामृतसिन्धु' और 'उज्जवलनीलमणि' दोनों में रसों का निरूपण किया गया है। भक्तिरसामृतसिन्धु में चार विभाग हैं - पूर्व, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण। प्रत्येक विभाग लहरियों में विभक्त है। इसमें भक्ति रस को रसराज कहा गया है। 'पूर्व' विद्या में भक्ति का स्वरूप, लक्षण (परिभाषा) आदि का निरूपण है। 'दक्षिण' विभाग में भक्ति रस के विभाव अनुभाव, व्यभिचारीभाव तथा स्थायीभावों का विवेचन है। 'पश्चिम' विभाग में भक्ति रस के विभिन्न भेदों का प्रतिपादन किया गया हैं। 'उत्तर' विभाग में अन्य रसों का निरूपण पाया जाता है। दूसरा ग्रंथ 'उज्जवलनीलमणि' 'भक्तिरसामृतसिन्धु' का पूरक है और इसमें मधुर शृंगार का प्रतिपादन है। 'नाटकचन्द्रिका' आचार्य भरतकृत 'नाटयशास्त्र'और आचार्य शिंगभूपालकृत 'रसार्णवसुधाकर' के आधार पर लिखा गया नाटयशास्त्र का ग्रंथ है।

'भक्तिरसामृतसिन्धु' और 'उज्जवलनीलमणि' पर इनके भतीजे आचार्य जीवगोस्वामी द्वारा क्रमश: 'दुर्गमसंगिनी' और 'लोचनरोचनी' नामक टीकाएँ लिखी गयीं हैं।

आचार्य केशव मिश्र

आचार्य केशव मिश्र का काल भी सोलहवीं शताब्दी का उत्तरार्ध है और ये दिल्ली के निवासी थे। इन्होंने कांगड़ा नरेश माणिक्यचन्द्र के अनुरोध पर 'अलंकारशेखर' नामक ग्रंथ की रचना की। राजा माणिक्यचन्द्र महाराज धर्मचन्द्र के पुत्र थे और 1563 ई0 में काँगड़ा की गद्दी पर बैठे। इनका शासन-काल दस वर्षों तक ही रहा।

'अलंकारशेखर' में कारिकाएँ हैं और उन पर वृत्ति भी स्वयं आचार्य केशव मिश्र ने लिखी है। यह आठ रत्नों में विभक्त है। प्रथम रत्न में काव्य का लक्षण, द्वितीय में रीति, तृतीय में शब्द शक्ति, चतुर्थ में पद दोष, पंचम में वाक्य दोष, षष्ठ में अर्थदोष, सप्तम में शब्दगुण, अर्थगुण, दोषों का गुणभाव और अष्टम रत्न में अलंकार तथा रूपक (नाटक) आदि विषयों का प्रतिपादन किया गया है।

आचार्य ने लिखा है कि इन्होंने 'अलंकारशेखर' ग्रंथ की रचना भगवान शौद्धोदनि द्वारा विरचित किसी काव्यशास्त्र विषयक ग्रंथ के आधार पर की है। लेकिन अब तक भगवान शौद्धोदनि और उनके द्वारा विरचित किसी ग्रंथ का पता नहीं चल पाया है।

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3 टिप्‍पणियां:

  1. भारतीय काव्यशास्त्र को समझाने का चुनौतीपुर्ण कार्य कर आप एक महान कर्य कर रहे हैं। इससे रचनाकार और पाठक को बेहतर समझ में सहायता मिल सकेगी। सदा की तरह आज का भी अंक बहुत अच्छा लगा।

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  2. साहित्य का मूल काव्यशास्त्र है । आपका कार्य स्तुत्य है ।

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