शनिवार, 31 जुलाई 2010

ठूंठ (एक कविता, मनोज कुमार)

ठूंठ


IMG_0155मनोज कुमार

कल रात वर्षा हुई

ख़ूब हुई

ज़ोर-ज़ोर से

मूसलाधार

मेरे घर के सामने की सड़क

बेलेवेडियर रोड के किनारे

एक बड़ा पेड़ था

तन कर खड़ा।

 

 

गिर पड़ा बेचारा!

असहाय सा।

कुछ देर बाद ...

उसके तने काट दिए गए

सड़क साफ़ हो गई

आवाजाही बहाल हो गई

सड़क के किनारे

बच रहा

ठूंठ बस!

23 टिप्‍पणियां:

  1. thoonth ped ke bahane aapne jiwan darshan de diya hai.. hum sab eak din toonth hi ho jayenge jarurat khatm ho jane ke baad... behad shashakt rachna ...

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  2. गहरे भावों के साथ बेहतरीन अभिव्‍यक्ति ।

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  3. यह मार्मिक है , हम इंसान इसे जानने की कोशिश भी नहीं करते कि यह पेंड जीवित होते हैं इनमें भी जान और संवेदना है ! शुभकामनायें आपको

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  4. यही जीवन है....हम लोग भी ठूंठ बन आवाजाही को रोक देते हैं ....और ऐसे ठूंठ को हटा कर ज़िंदगी की आवाजाही बहाल हो जाती है ..मार्मिक प्रस्तुति

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  5. मनोज जी ठूँठ के बहाने आपने जीवन के कटु सत्यों पर अच्छा खासा प्रकाश डाला है।

    …………..
    प्रेतों के बीच घिरी अकेली लड़की।
    साइंस ब्लॉगिंग पर 5 दिवसीय कार्यशाला।

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  6. ठूँठ के माध्यम से बहुत ही गहरी बात कह दी।

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  7. कई बार हमारा दिमाग ठूंठ बन जाता है। नए विचारों को आने नहीं देते, और पूराने विचार को रास्ता नहीं मिलता निकलने का.....

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  8. सही जीवन दर्शन ! जीवन कभी रुकता नहीं।

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  9. पेड़ की नियति में एक दिन ठूंठ बनना लिखा है.

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  10. Pedka thoont zindagee kee baharon ka khandhar ho mano..

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  11. मन की संवेदनाओं को चित्रित करती अच्छी रचना.

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  12. बहुत अच्छी प्रस्तुति।
    इसे 01.08.10 की चर्चा मंच में शामिल किया गया है।
    http://charchamanch.blogspot.com/

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  13. अगर इस ठूँठ की जड़ अभी बाक़ी है,
    तो देखना -
    कुछ समयांतराल में ही इसकी शक्ति!
    फूट पड़ेंगी -
    अनेकों टहनियाँ इसके घायल हुए जिस्म से
    और चल पड़ेंगी फिर से पेड़ बनने की दिशा में!

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  14. Smriti ke roop men vriksh ka thoonth jabtak rahega bana rahega

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  15. jindagi ka ek katu satya bahoot hi gahri anbhuti ke sath...........
    bahoot achchhi lagi

    charch manch ka bhi dhanyabad .....itni achchhi kavita uplabdh karane ke liye

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  16. यही तो विडम्बना है. आजीवन फल-फूल और छाँव देने वाले पेड़ (प्रतीक) के गिर जाने पर भी कोई हमदर्दी नहीं उसके जिस्म के टुकड़े कर रस्ते से हटा दिया गया. मतलब परस्ती पर बहुत ही तीक्ष्ण व्यंग्य है. शैली सरल है. धन्यवाद !

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