मंगलवार, 5 अप्रैल 2011

सभी भारतीय भाषाओं के लिए एक ही लिपि की आवश्यकता और औचित्य

                                                                      

भारतीय भाषाएंउच्चारण की विचित्रताएँ

उच्चारण तो हर व्यक्ति का भिन्न होता है चाहे वह एक ही प्रांत (राज्य से छोटे स्तर के लिए), जाति (व्यापक अर्थ में) या स्थान के क्यों न हों। इसी अंतर को व्यक्ति बोली की अवधारणा में निहित समझा जा सकता है। द्विभाषिकता तथा बहुभाषिकता के कारण, उच्चारण संबंधी कठिनाइयों के मूल स्रोत, विभिन्न भाषाओं की औच्चारणिक मूल ध्वनियों का ज्ञान इतर भाषा भाषी को नहीं हो पाता है। हर प्रमुख भाषा की कुछ ऐसी ध्वनियाँ हैं जिनके लेखन के लिए अलग ध्वनि प्रतीक (स्वर या व्यंजन के चाक्षुष वर्ण प्रतीक) की आवश्यकता पड़ती है। उच्चारण तो अभ्यास से सीखा जा सकता है, समस्या लेखन की है। उदाहरण के लिए, उर्दू में एक ध्वनि के लिए कई वर्ण हैं, जैसे, से लिए )  ثसे, स्वादص और सीनس) हैं। ज़ ध्वनि के लिए पाँच (ज़े ز, ज़ाल, ज़्वाद ض,  ज़ो ظ, झ़ेژ) हैं। इसके अलावा ज (जीम) ध्वनि अलग है। इतना ही नहीं बल्कि एक ही उच्चारण वाले शब्द को पाँच तरह से लिखा जाता है और उन पाँचों शब्दों के अर्थ भिन्न हैं, जैसे, "असीर" शब्द को (अलिफ़+सीन+इये+रे=बंदी), (अलिफ़+से+इये+रे=ख़ालिस), (ऐन+सीन+इये+रे=दुष्कर), (ऐन+स्वाद+इये+रे=अंगूर का सीरा), (ऐन+से+इये+रे=धूलि)। अब यदि आप सीन की जगह से या स्वाद अथवा अलिफ़ की जगह ऐन का प्रयोग करके उर्दू (फ़ारसी) लिपि में लिखेंगे तो वह ग़लत हो जाएगा। इसी प्रकार असमिया, उड़िया, बांगला, सिंधी, कश्मारी आदि भारोपीय परिवार की भाषाओं में कुछ न कुछ भिन्न ध्वनियाँ हैं। ऐसे ही द्रविड़ परिवार वाली भाषाओं में भी अनेक ध्वनियाँ हैं जिनके लेखन के लिए अलग ध्वनि प्रतीक (स्वर या व्यंजन के चाक्षुष वर्ण प्रतीक) की आवश्यकता पड़ती है। अतः आसेतु एक भारत और सामासिक संस्कृति की कल्पना तो की ही जा सकती है। ह़क़ीक़ी की स्थिति तो आना भविष्य के गर्भ की बात है।

प्रमुख भारतीय भाषाओं में विद्यमान ध्वनियों की तुलनात्मक स्थिति

देवनागरी में ऋ को मिलाकर कुल 11 स्वरों के लिए ध्वनि चिह्नों का विधान है। जिसके लिए सभी टाइपिंग उपकरणों और कंप्यूटर पर टाइप करने के लिए हिंदी ट्रेडिशनल लेआउट में पूरी व्यवस्था है। परंतु अन्य प्रमुख भारतीय भाषाओं के शामिल किया जाए तो कुल 19 स्वर प्रतीकों की आवश्यकता होगी। इसी प्रकार नागरी में 25 स्पर्श व्यंजन हैं। प्रमुख भारतीय भाषाओं की सर्व साधारण व्यंजन ध्वनियों को अंकित करने के लिए 39 प्रतीकों की आवश्यकता होगी। नागरी में 4 अंतःस्थ और पाँच ऊष्म ध्वनियाँ, अर्थात्, कुल 9 हैं जबकि प्रमुख भारतीय भाषाओं को मिलाकर कुल 11 ध्वनि प्रतीकों की ज़रूरत पड़ेगी। इस प्रकार अखिल भारतीय मानकीकृत, स्वयंपूर्ण देवनागरी लिपि में कुल 88 (19(स्वर मात्राएं) + 19(स्वर वर्ण) + 39 +11) प्रतीकों को लिखने के लिए कीबोर्ड में व्यवस्था करना होगा। जब इतने ध्वनि प्रतीकों की व्यवस्था की जाएगी तो संयुक्ताक्षरों की संख्या में भी वृद्धि होगी फलस्वरूप ग्लिफ़ों की संख्या भी बढ़ेगी। लेखन नियम में एकरूपता बनाए रखने की भी समस्या सामने आएगी। अतः इन सारी बातों को ध्यान में रखते हुए सुनियोजित कार्य करना होगा। यह काम केवल सरकार ही कर सकती है।

लिपि का जिस भाषा के लिए निर्माण होता है, उसमें उस भाषा की ध्वनियों को प्रदर्शित करने की कुछ अंश में अक्षमता रहती है। दुनिया की किसी भी भाषा की लिपि, जगत की सभी भाषाओं की ध्वनियों को अंकित कर सकेगी, यह कहना भ्रम मूलक है। इतना ही नहीं हमारे देश की प्रमुख भाषाओं की लिपियाँ भी अपनी-अपनी भाषाओं की सब ध्वनियों को अंकित करने में असमर्थ हैं। यही कारण है कि भाषा वैज्ञानिकों को अंतरराष्ट्रीय ध्वन्यात्मक लिपि चिह्नों के निर्धारण के लिए विचार करना पड़ा। रॉयल एशियाटिक सोसायटी ने रोमन लिपि पर आधारित लिपि चिह्नों की व्यवस्था की है जिसका उपयोग विलियम्स और विलियम्स के संस्कृत शब्द कोश में तथा अन्य कोशों में किया गया है। अंतरराष्ट्रीय ध्वनि परिषद् भी इसी दिशा में प्रयास करती आ रही है। सन् 1888 में इस प्रकार के लिपि चिह्नों की रचना हुई थी। देवनागरी लिपि के आधार पर भी अंतरराष्ट्रीय ध्वन्यात्मक लिपि चिह्नों की संरचना का प्रयास किया गया है। (ए बेसिक ग्रामर ऑफ़ मॉडर्न हिंदी; 1975; परिशिष्ट VII; केंद्रीय हिंदी निदेशालय, नई दिल्ली, देखें।)

भारतीय भाषाओं की अतिरिक्त ध्वनियाँ और ध्वनि प्रतीक

1.  कश्मीरी, सिंधी और दक्षिण की चारों भाषाओं में – ह्रस्व ए, ऐ तथा ह्रस्व ओ ध्वनियाँ हैं। इनके लिए कीबोर्ड में क्रमशः ऍ, ऎ, ऒ व्यवस्था की गई है।
2.  दीर्घ बलाघात तथा लघु बलाघात के लिए क्रमशः ॓ ॔ की व्यवस्था की गई है।
3.  कश्मीरी में - ह्रस्व अ, ह्रस्व आ, ह्रस्व उ, ह्रस्व ऊ स्वर ध्वनियाँ हैं जिनके उच्चारण में होंठ कम गोल करके बोला जाता है। 
4.  कश्मीरी में अति ह्रस्व इ और उ ध्वनियाँ हैं।
5.  कश्मीरी और तेलुगु में च छ ज झ ध्वनियों का उच्चारण भिन्न होता है।
6.  मराठी में ळ ध्वनि ल से भिन्न है परंतु रोमन में इसे L द्वारा ही लिखा जाता है। 
7.  सिंधी में ग ज द ब ध्वनियों का उच्चारण भिन्न होता है।
8.  तमिल और मलयालम में दो ध्वनियाँ हैं जो ळ तथा झ के क़रीब हैं। इनके लिए ऴ, ष़ ध्वनि प्रतीकों का विधान किया गया है।   
9.  तमिल, मलयालम, तेलुगु और कन्नड़ में एक ध्वनि है जो र के क़रीब है परंतु र से भिन्न है। इसके लिए ऱ  ध्वनि प्रतीक का विधान किया गया है।
10.  दीर्घ ॠ ॡ की व्यवस्था भी की गई है।
11.  तमिल और मलयालम में एक ध्वनि है जो न्न के क़रीब है। इसके लिए ऩ  ध्वनि प्रतीक का विधान किया गया है।
12. उर्दू की ध्वनियों के बारे में प्रारंभ में ही बताया जा चुका है।
भारतीय भाषाओं के लिए ही लिपि का औचित्य
       
भारत के राज्यों की राजभाषाओं की अपनी-अपनी लिपियाँ हैं और ये लिपियाँ ही भाषाओं को सीखने में बाधा उत्पन्न करती हैं। भाषा वैज्ञानिकों ने सिफ़ारिश की है कि यदि सभी भारतीय भाषाओं के लिए यदि एक समान और वर्धित लिपि बना दी जाए तो भाषाओं का सीखना आसान हो जाएगा और दूसरी भाषा सीखने में रुचि भी जाग्रत होगी। जिस प्रकार यूरोपीय भाषाओं के लिए आवश्यकतानुसार उसमें संशोधन परिवर्धन करके एक ही लैटिन लिपि का उपयोग किया जाता है और इस प्रकार जर्मन, फ़्रेंच और अंग्रेज़ी सीखने में आसानी होती है उसी प्रकार भारतीय भाषाओं के लिए भी यदि एक समान और वर्धित लिपि बना दी जाए तो भाषाओं का सीखना आसान हो जाएगा और दूसरी भाषा सीखने में रुचि भी जाग्रत होगी। लिपियों की संस्कृति को सुरक्षित रखने के लिए उन ग्रंथों को संरक्षित किया जा सकता है।    

भारतीय भाषाओं के लिए समन्वित कीबोर्ड की आवश्यकता         

अब यदि भारत की सभी भाषाओं के देवनागरी लिपि में लिखना हो तो एक ऐसे कीबोर्ड की ज़रूरत होगी जिसमें उपर्युक्त सारी ध्वनियों को लिखने में सक्षम हो। यह इतना आसान तो नहीं लगता है परंतु असंभव भी नहीं है। विश्वनाथ दिनकर नरवणे ने 16 भाषाओं वाले भारतीय व्यवहार कोष₹(1966)के आसपास। उन्होंने सभी भारतीय भाषाओं के लिए देवनागरी के लिपि चिह्नों का उपयोग किया है। उन्हें अभिव्यक्ति में कोई दिक्कत नहीं आई। मैंने 1989 में उनसे और राजभाषा आयोग के उस समय तक एकमेव जीवित सदस्य श्री गोपाल परशुराम नेने से मिलकर इस बात पर चर्चा की थी कि आसेतु देश की प्रमुख भाषाओं की लिपियाँ देवनागरी रख ली जाए तो राजभाषा हिंदी की राह आसान हो जाएगी। नरवणे जी ने तो कहा कि 16 भाषाओं वाले भारतीय व्यवहार कोषबनाने में मुझे तो कोई कठिनाई नहीं हुई। नीयत ठीक हो तो कोई भी काम या विकल्प आसान है। फिर 1990 में सीडैक के डॉ. हेमंत दरबारी से मिला तो उन्होंने ही इन्स्क्रिप्ट कीबोर्ड की जानकारी दी और तब से इसी कीबोर्ड से बिना किसी औपचारिक प्रशिक्षण के काम कर रहा हूं। यह बेहद आसान और देवनागरी के लिए स्वयंयूर्ण कीबोर्ड लेआउट है। इसी में सुधार करके और इसे ही वर्धित करके देश की प्रमुख भाषाओं को देवनागरी लिपि में लिखने योग्य बनाया जा सकता है।

 जहाँ तक हिंदी भाषा के लिए इन्स्क्रिप्ट या ट्रेडिशनल कीबोर्ड सवाल है, इसमें भी सुधार की थोड़ी गुंजाइश है। राजभाषा विकास परिषद ने यह प्रयास किया है और साइबरस्केप इंडिया लिमिटेड, मुंबई के सहयोग से कीबोर्ड विकसित कर लिया है। इन्स्क्रिप्ट/ट्रेडिशनल लेआउट में सुधार करके हिंदी देवनागरी वर्णों के मूल संयोजन क्रम के अनुसार उच्चारण के क्रम में वर्णों को क्वेर्टी कीबोर्ड से टाइप करने के लिए नया लेआउट बनाया है जिसे याद करना सरल है और अधिक वैज्ञानिक है। मैं स्वयं इसकी टेस्टिंग कर रहा हूं और इसके अभ्यास के लिए अभ्यास उपकरणभी बनाया है। जैसे ही पूर्णतः दोष मुक्त मिलेगा इसे आम उपयोग के लिए जारी कर दिया जाएगा। लेआउट का चित्र इस प्रकार है-

 पूर्ण व्यंजन और स्वर तथा मात्राएं इस लेआउट में प्रदर्शित हैं। संयुक्त व्यंजन बनाने के लिए नियम वही रहेंगे जो कि ट्रेडिशनल लेआउट में हैं, अर्थात्, किसी व्यंजन को स्वर रहित करने के लिए उसे टाइप करने के तुरंत बाद d कुंजी दबाई जाएउसके बाद जैसे ही अगला वर्ण टाइप किया जाएगा पूर्ववर्ती वर्ण अगले वर्ण के साथ जुड़ जाएगा।

विराम चिह्न और संख्याओं की कुंजियों पर शिफ़्ट के साथ टाइप होने वाले सिंबल अंग्रेज़ी मोड में गए बग़ैर ही मिलेंगे । कॉमा, पूर्ण विराम और प्रश्नवाचक चिह्न बिना शिफ़्ट मिलेंगे क्योंकि इनका प्रयोग अधिक होता है। अभी इनके लिए अंग्रेज़ी मोड में जाना होता है। संख्याएं अंतरराष्ट्रीय रूप में मिलेंगी। संख्याओं के ऊपर वाले चिह्न अंग्रेज़ी में गए बग़ैर ही मिलेंगे।

इस कीबोर्ड में प्रमुख और अधिकतर उपयोग में आने वाले व्यंजनों को होम रो और थर्ड रो में रखा गया है। इससे टाइपिंग में स्पीड भी आएगी और वर्णमाला के मूल क्रम में होने से याद रखना आसान होगा।

कीबोर्ड में आधे में, बांईं ओर सारे स्वर और आधे में, दांईं ओर सारे व्यंजन हैं। पाँचों वर्गों के अघोष और घोष वर्णों के साथ ही ऊष्म एवं अंतःस्थ वर्ण भी मिलेंगे। यह कीबोर्ड सर्वथा सरल और भारतीय भाषाओं की प्रकृति के अनुसार है। हिंदी-देवनागरी की वर्णमाला सभी को याद रहेगी, सही उच्चारण का भी अभ्यास होता रहेगा। दूसरी भारतीय भाषाओं के संदर्भ में दिए गए फ़ॉन्ट या मात्राएं वैसी ही रहेंगी। पाँचों नासिक्य वर्ण, विंदु तथा चंद्र बिंदु, ऋ  तथा इसकी मात्रा निचली पंक्ति में हैं। नुक्ता शिफ़्ट + पाइक पर, रुपया चिह्न ` पर, दशमलव बिंदु शिफ़्ट + > हैं।

-डॉ. दलसिंगार यादव

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5 टिप्‍पणियां:

  1. सुंदर आलेख !एक देश एक सामूहिक भाषा, को इंगित करता.
    यह देश में एक तरह की विचारधारा को विकसित करने का एकमात्र ज़रिया है. लेकिन इस दिशा में सरकार की तरफ से कभी पुरे मन काम नही किया गया. गोविन्द बल्लभ पन्त की अध्यक्षता वाली समिती चाहकर भी हिंदी को राष्ट्रभाषा न बना सकी और उसके बाद इसके दायरे सिमटते चले गए. और आज भारतीय अपनी आधी ऊर्जा सिर्फ अंग्रेजी सिखने में लगा देते है ताकि उन्हें नौकरी मिल सके और फिर भी कई उनसे वंचित रह जाते है.
    अंग्रेजी का फलता फूलता व्यापार और देश की चौपट होती संस्कृति !

    सच तो ये है इस मद्दे सरकार से ज्यादा बॉलीवुड ने काम किया है .

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  2. जबरदस्त आलेख है इसे बुकमार्क कर लिया है.

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  3. .सार्थक पोस्ट, जानकारी से भरी, स्वागत योग्य

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  4. बहुत अच्छी जानकारी ...सार्थक पोस्ट

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  5. दलसिंगार जी,

    हिंदी की-बोर्ड को लेकर अक्सर तरह तरह के सवाल उठते रहे हैं कि कैसे और क्या मानक तय किये जांय ताकि सभी के लिये एक स्टैंडर्ड तय किया जाय। इस पोस्ट को पढ़ कर जाना कि अभी आगे कितनी और कैसी मुश्किलों से पार पाना पड़ेगा मानक हिंदी की बोर्ड के बनने में।

    बहुत ही उपयोगी जानकारी।

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