रविवार, 17 अप्रैल 2011

प्रेमचंद : साहित्यिक योगदान-1

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मनोज कुमार

धनपत राय उर्दू में नवाब राय के नाम से अफ़साना-निगारी करते थे। वतन-परस्ती के ज़ज़्बे से लबरेज़ उनकी किताब 'सोज़े-वतन' बरतानि हुकूमत को हज़म नहीं हुई। 'सोज़े-वतन' की हज़ारों प्रतियां क्या जली वतन को प्रेमचन्द मिल गया। नवाब की कलम पर हुकूमत की पाबन्दी हो गयी थी। नवाब भूमिगत हो गए किन्तु कलम चलती रही। लिपि बदल गयी, जुबान कमोबेश वही रहा। तेवर वही रहे और जज्बे में कोई तबदीली मुमकिन थी क्या ?

1936 में लखनऊ में एक अधिवेशन में भाषण देते हुए प्रेमचंद जी ने कहा था,

“साहित्यकार का लक्ष्य केवल महफ़िल सजाना और मनोरंजन का सामान जुटाना नहीं है – उसका दरज़ा इतना न गिराइए। वह देशभक्ति और राजनीति के पीछे चलने वाली सच्चाई भी नहीं है, बल्कि उसके आगे मशाल दिखाती हुई चलने वाली सच्चाई है।”

प्रेमचंद साहित्य को उद्देश्य परक मानते थे। प्रेमचंद के पहले हिन्दी उपन्यास साहित्य रोमानी ऐयारी और तिलस्मी प्रभाव में लिखा जा रहा था। उन्होंने उससे इसे मुक्त किया और यथार्थ की ठोस ज़मीन पर उतारा। यथातथ्यवाद की प्रवृत्ति के साथ प्रेमचंद जी हिंदी साहित्य के उपन्यास का पूर्ण और परिष्कृत स्वरूप लेकर आए। आम आदमी की घुटन, चुभन व कसक को अपने कहानियों और उपन्यासों में उन्होंने प्रतिबिम्बित किया। इन्होंने अपनी रचनाओं में समय को ही पूर्ण रूप से चित्रित नहीं किया वरन भारत के चिंतन व आदर्शों को भी वर्णित किया है। उनके पात्रों में में ऐसी व्यक्तिगत विशेषताएं मिलने लगीं जिन्हें सामने पाकर अधिकांश लोगों को यह भासित होता था कि कुछ इसी तरह की विशेषता वाले व्यक्ति को हमने कहीं देखा है।

प्रेमचंद का जीवन औसत भारतीय जन जैसा है। यह साधारणत्व एवं सहजता प्रेमचंद की विशेषता है। प्रेमचंद दरिद्रता में जनमे, दरिद्रता में पले और दरिद्रता से ही जूझते-जूझते समाप्त हो गए। फिर भी वे भारत के महान साहित्यकार बन गए थे। उन्होंने अपने को सदा मज़दूर समझा। बीमारी की हालत में, मरने के कुछ दिन पहले तक भी अपने कमज़ोर शरीर को लिखने पर मज़बूर करते थे। कहते थे,

“मैं मज़दूर हूं! मज़दूरी किए बिना मुझे भोजन का अधिकार नहीं है।”

उनके हृदय में इतनी वेदनाएं, इतने विद्रोह भाव, इतनी चिन्गारिया थी कि वे उसे संभाल नहीं सकते थे। उनका हृदय अगर उसे प्रकट नहीं कर देता तो वे शयद पहले ही बंधन तोड़ देते। धूर्तता और मक्कारी से अनभिज्ञ, विनम्रता की वे प्रतिमूर्ति थे। लाखों-करोडों भूखे, नंगे, निर्धनों की वे ज़बान थे। धार्मिक ढ़कोसलों को ढ़ोंग मानते थे और मानवता को सबसे बड़ी वस्तु।

उनके उपन्यासों में उठाई गई प्रत्येक समस्या के मूल में आर्थिक विषमताओं का हाथ है। उनके उपन्यासों में प्रत्येक घटना इसी विषमता को लेकर आगे बढती है। शायद पहली बार, उनके द्वारा ही शोषित, दलित एवं ग़रीब वर्ग को नायकत्व प्रदान किया। इनमें मुख्य रूप से किसान, मज़दूर और स्त्रियां हैं। सेवासदन, ग़बन, कर्मभूमि, निर्मला, प्रेमाश्रम और गोदान इन सबमें मूल रूप में वही आर्थिक और नैतिक समस्याएं हैं। ‘निर्मला’ में दहेज-प्रथा ने अनमेल विवाह की स्थिति पैदा की। धनाभाव के कारण मुंशी तोताराम के परिवार में संघर्ष चलते हैं। ‘ग़बन’ के नायक रामनाथ और ‘गोदान’ के होरी को भी आर्थिक समस्या से जूझना पड़ता है। प्रेमचंद ने जो अभिशाप देखा था, अपने जीवन में भोगा था, उसी को उन्होंने अपने साहित्य में प्रमुख स्थान दिया।

डॉ. नगेन्द्र कहते हैं,

“गत युग के सामाजिक और राजनीतिक जीवन में आर्थिक विषमताओं के जितने भी रूप संभव थे, प्रेमचंद की दृष्टि उन सभी पर पड़ी और उन्होंने अपने ढंग से उन सभी का समाधान प्रस्तुत किया है, परन्तु उन्होंने अर्थवैषम्य को सामाजिक जीवन का ग्रंथि नहीं बनने दिया। .. उनके पात्र आर्थिक विषमताओं से पीड़ित हैं परंतु वे बहिर्मुखी संघर्ष द्वारा उन पर विजय प्राप्त करने का प्रयत्न करते हैं, मानसिक कुंठाओं का शिकार बनकर नहीं रह जाते।”

प्रेमचन्द हिन्दी साहित्य में युग प्रवर्तक रचनाकार के रूप में जाने जाते हैं। वे युगदृष्टा हैं। वे अपने समय की राजनीतिक, सामाजिक व सांस्कृतिक अस्थिरता से भलीभाँति परिचित थे। उनके समय स्वतंत्रता संग्राम के कारण देश की राजनीति में सत्ता व जनता के मध्य टकराव जारी था तो समाज में सामंती-महाजनी सभ्यता अपने चरम पर थी। शोषण और शोषित के बीच खाई बढ़ती जा रही थी। गरीब त्रासदपूर्ण जीवन जीने के लिए विवश था। प्रेमचन्द ने मध्य और निर्बल वर्ग की नब्ज पर हाथ रखा और उनकी समस्याओं, जैसे विधवा विवाह, अनमेल विवाह, वेश्यावृत्ति, आर्थिक विषमता, पूँजीवादी शोषण, महाजनी, किसानों की समस्या तथा मद्यपान आदि को अपनी कहानी का कथानक बनाया। तत्कालीन परिस्थितियों में शायद ही कोई ऐसा विषय छूटा हो जिसे प्रेमचन्द ने अपनी रचनाओं में जीवंत न किया हो।

(ज़ारी …!)

10 टिप्‍पणियां:

  1. प्रेमचंद जी के बारे में जो भी कहा जाए , वह कम ही है !

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  2. विस्तृत जानकारी ...बहुत शोध पूर्ण कार्य कर रहे हैं ..आभार

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  3. प्रेमचंद जी हमेशा से ही प्रेरणा स्त्रोत रहे हैं... उनके बारे में जानना अच्छा लगा... बढ़िया प्रयास!

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  4. आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
    प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
    कल (18-4-2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
    देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
    अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।

    http://charchamanch.blogspot.com/

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  5. प्रेमचंद ने अपने कथा साहित्य में जो भी लिखा है वह उनका भोगा हुआ यथार्थ ही है और जब तक कोई भी लेखक उसको खुद नहीं जीता है तब तक उसको उतनी गहराई से व्यक्त भी नहीं कर सकता है. आपकी ये श्रंखला बहुत उपयोगी है.

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  6. प्रेमचंद जी के बारे में जानना अच्छा लगा .प्रेरणा स्त्रोत हैं...उपयोगी पोस्ट..आभार

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  7. बहुत शोध पूर्ण कार्य कर रहे हैं|धन्यवाद|

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  8. सुंदर आलेख। प्रेम चंद ने इतना लिख दिया कि जितना पढ़ा जाय कम है।

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  9. प्रेमचंद पर सार्थक आलेख हेतु हार्दिक बधाई।
    श्रृंखला निश्चित रूप से बहुत रोचक रहेगी।

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  10. प्रेमचंद पर बहुत ही सारगभि‍र्त लेख है। प्रेमचंद सचमुच भारतीय किसान और मजदूर की ओर से लडने वाले योद्धा की तरह याद किए जाएंगे। जो वर्ग समाज में हाशि‍ए पर पड़ा उसे कलम के सिपाही ने उसे साहित्य के सिंहासन पर बैठाने का पुुनीत कार्य किया है। प्रेमचंद सच्चे अर्थों में माक्सर्वादी और गांधीवादी कहे जा सकते हैं।
    डॉ. ईश्वर सिंह तेवतिया
    हिन्दुस्तान पेट्र्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड
    नई दिल्ली

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