शुक्रवार, 8 अप्रैल 2011

जानकी बल्लभ शास्त्री नहीं रहे . छोड़ गए हैं एक विपुल विरासत.

जन्म: 1916   निधन: 07 अप्रैल 2011

कुछ ही कवि ऐसे हुए हैं जिन्होंने विनम्रता से शासन और सिस्टम के प्रति अपना विरोध जताया है. पुरस्कारों के पीछे भागे नहीं है. साहित्य की साधना साधक की तरह की है. अपने जीवन को किसी भी तरह के लोभ से दूर रखा . साहित्‍य का यह सेवक राग केदार में, 'किसने बांसूरी बजाई' गा तो लेता है पर सरकारी सम्‍मान पद्म श्री लेने से इंकार कर देता है . साहित्यिक गुटबंदियों से दूर मुजफ्फरपुर जैसे शहर में उन्होंने अपना पूरा जीवन बिताया। बेला जैसी साहित्यिक पत्रिका का संपादन करते रहे। तथाकथित महान आलोचकों कीदृष्टि में वे सदा अलक्षित ही रहे। 'रूप-अरूप, 'तीर तरंग, 'शिवा, 'मेघ-गीत, 'अवंतिका, 'कानन, 'अर्पण आदि इनके मुख्य काव्य संग्रह हैं। ये 'साहित्य वाचस्पति, 'विद्यासागर, 'काव्य-धुरीण तथा 'साहित्य मनीषी आदि अनेक उपाधियों से सम्मानित हुए तथा पद्मश्री जैसे राजकीय पुरस्कार को ठुकरा चुके हैं।
जानकीवल्लभ शास्त्री जी का साहित्यिक योगदान भारतीय काव्य परंपरा के विकास में स्वर्णाक्षरों में लिखा जाना चाहिए. अब शास्त्री जी नहीं रहे लेकिन छोड़ गए हैं एक विपुल विरासत
अपने काव्य की, अपने सरल, सहज जीवन की.

उनकी कुछ कवितायेँ श्रद्धांजली स्वरुप..
.....अरुण चन्द्र रॉय 


ऐ वतन याद है किसने तुझे आज़ाद किया ? 

ऐ वतन याद है किसने तुझे आज़ाद किया ?
कैसे आबाद किया ? किस तरह बर्बाद किया ?

कौन फ़रियाद सुनेगा, फलक नहीं अपना,
किस निजामत ने तुझे शाद या नौशाद किया ?

तेरे दम से थी कायनात आशियाना एक,

सब परिंदे थे तेरे, किसने नामुराद किया ?

तू था ख़ुशख़ल्क, बुज़ुर्गी न ख़ुश्क थी तेरी,

सदाबहार, किस औलाद ने अजदाद किया ?

नातवानी न थी फ़ौलाद की शहादत थी,

किस फितूरी ने फ़रेबों को इस्तेदाद किया ?

ग़ालिबन था गुनाहगार वक़्त भी तारीक़,

जिसने ज़न्नत को ज़माने की जायदाद किया ?

माफ़ कर देना ख़ता, ताकि सर उठा के चलूँ,

काहिली ने मेरी शमशेर को शमशाद किया ?


कुपथ रथ दौड़ाता जो

कुपथ कुपथ रथ दौड़ाता जो
पथ निर्देशक वह है,
लाज लजाती जिसकी कृति से
धृति उपदेश वह है,

मूर्त दंभ गढ़ने उठता है

शील विनय परिभाषा,
मृत्यू रक्तमुख से देता
जन को जीवन की आशा,

जनता धरती पर बैठी है

नभ में मंच खड़ा है,
जो जितना है दूर मही से
उतना वही बड़ा है।



सांध्यतारा क्यों निहारा जायेगा

सांध्यतारा क्यों निहारा जायेगा ।
और मुझसे मन न मारा जायेगा ॥

विकल पीर निकल पड़ी उर चीर कर,
चाहती रुकना नहीं इस तीर पर,
भेद, यों, मालूम है पर पार का
धार से कटता किनारा जायेगा ।

चाँदनी छिटके, घिरे तम-तोम या
श्वेत-श्याम वितान यह कोई नया ?
लोल लहरों से ठने न बदाबदी,
पवन पर जमकर विचारा जायेगा ।

मैं न आत्मा का हनन कर हूँ जिया
औ, न मैंने अमृत कहकर विष पिया,
प्राण-गान अभी चढ़े भी तो गगन
फिर गगन भू पर उतारा जायेगा ।

गंध वेदना



केसर-कुंकुम का लहका दिगन्त है
गंध की अनन्त वेदना वसन्त


चीर उर न और
धुंधलाए वन की
ओ अनचीती बाँसुरी

गीत या अतीत बुझे द्वीप-द्वीप का
मोती अनबिंधा मुंदी-मुंदी सीप का,


धूला-धूला वर्तमान
धूप-तपा तीखा
चीख़-चीख़कर
हँसना-रोना है सीखा

गोपन मन भावी का काँचनार है
कब फूले क्यों मुरझे बेकरार है


उजले दिन
हरख साँझ-झाँवरी
थके-थके पाँव
अभी बहुत दूर गाँव री

और अंत में.......

 
ज़िंदगी की कहानी

ज़िंदगी की कहानी रही अनकही !
दिन गुज़रते रहे, साँस चलती रही !

अर्थ क्या ? शब्द ही अनमने रह गए,
कोष से जो खिंचे तो तने रह गए,
वेदना अश्रु-पानी बनी, बह गई,

धूप ढलती रही, छाँह छलती रही !

बाँसुरी जब बजी कल्पना-कुंज में
चाँदनी थरथराई तिमिर पुंज में
पूछिए मत कि तब प्राण का क्या हुआ,

आग बुझती रही, आग जलती रही !

जो जला सो जला, ख़ाक खोदे बला,
मन न कुंदन बना, तन तपा, तन गला,
कब झुका आसमाँ, कब रुका कारवाँ,

द्वंद्व चलता रहा पीर पलती रही !

बात ईमान की या कहो मान की
चाहता गान में मैं झलक प्राण की,
साज़ सजता नहीं, बीन बजती नहीं,

उँगलियाँ तार पर यों मचलती रहीं !

और तो और वह भी न अपना बना,
आँख मूंदे रहा, वह न सपना बना !
चाँद मदहोश प्याला लिए व्योम का,

रात ढलती रही, रात ढलती रही !

यह नहीं जानता मैं किनारा नहीं,
यह नहीं, थम गई वारिधारा कहीं !
जुस्तजू में किसी मौज की, सिंधु के-

थाहने की घड़ी किन्तु टलती रही !

20 टिप्‍पणियां:

  1. आदरणीय शास्त्री जी को विनम्र श्रद्धांजलि....

    माँ सरस्वती के वरद पुत्र शास्त्री जी हिंदी साहित्य के आकाश में अनंतकाल तक जगमगाते रहेंगे |

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  2. शास्त्री जी को विनम्र श्रद्धांजलि..

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  3. साहित्य वाचस्पति, 'विद्यासागर, 'काव्य-धुरीण 'साहित्य मनीषी जानकी बल्लभ शास्त्री जी को विनम्र श्रद्धांजलि....!!

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  4. शास्त्रीजी के जाने से हिंदी साहित्य को भारी क्षति हुई है जिसकी भरपाई मुश्किल है. उन्हें श्रद्धांजलि.

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  5. आदरणीय जानकी वल्लभ जी के देहावसान का समाचार सुन कर आघात पहुँचा| ऐसे मनीषी वैसे भी कभी कभार ही वसुंधरा की गोद को हरी करते हैं| हम सौभाग्य शाली हैं कि हम ने उस कालखण्ड में जन्म लिया, जिसे आदरणीय जानकी वल्लभ शास्त्री जी के नाम से जाना जाएगा| विनम्रता के साथ विरोध के लिए जाने जाने वाले शास्त्री जी के कर्मठ जीवन के बारे में लगभग सभी जानते हैं| पुरस्कार उन के लिए कभी भी लक्ष्य नहीं रहा, अगर लक्ष्य था तो सिर्फ़ और सिर्फ़ साहित्य की सेवा| ऐसे महान व्यक्तित्व की अनुपस्थिति युगों युगों तक खलती रहेगी| ईश्वर उन की आत्मा को चिर शांति प्रदान करें|

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  6. शास्त्रीजी के जाने से हिंदी साहित्य को भारी क्षति हुई है. उन्हें विनर्म श्रद्धांजलि.

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  7. आदरणीय जानकी बल्लभ शास्त्री जी को विनम्र श्रृद्धांजलि ...

    एक निवेदन ... इनकी कविताओं की श्रृंखला पढ़ने को मिले तो बहुत अच्छा रहेगा ...एक साथ कई रचनाओं को आत्मसात नहीं किया जा सकता ...यह एक नम्र निवेदन है |

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  8. हिन्दी साहित्य के पुरोधा और काव्यशास्त्र के महामनीषी आचार्च जानकी बल्लभ शास्त्री को अपने श्रद्धा सुमन समर्पित करता हूँ!
    परमपिता परमात्मा उनकी आत्मा को शान्ति और सदगति प्रदान करें!

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  9. आज के हिन्दुस्तान में प्रथम प्रष्ट पर शास्त्री जी के निधन की सूचना पढ़ कर दुःख हुआ.अभी हाल ही में आपके दुसरे ब्लॉग पर उनकी जीवनी पढ़ कर परिचय हुआ था. हम जानकी वल्लभ शास्त्री जी की आत्मा की शांति हेतु परम-पिता परमात्मा से प्रार्थना करते हैं.

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  10. ईश्वर उनकी आत्मा को शांति दे...
    विनम्र श्रद्धांजलि

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  11. बड़े शौक से सुन रहा था जमाना.
    आप सो गए दांसता कहते-कहते।
    शास्त्री जी का पार्थिव शरीर भले ही पंचत्तत्व में विलीन हो गया है किन्तु उनकी साहित्यिक कृतियां उन्हे अमरत्व प्रदान कर गयी हें।विद्या और विनय की सौम्य मूर्ति शास्त्री जी को विनम्र श्रद्धांजलि......।

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  12. आदरणीय जानकी वल्लभ शास्त्री के निधन से हिन्दी साहित्य और कविता के एक सुनहरे युग का अंत हो गया. अश्रुपूरित विनम्र श्रद्धांजलि .

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  13. एक अपूरणीय क्षति!! मुझे यह समाचार सुनकर आघात सा लगा!
    इश्वर उनकी आत्मा को शान्ति दे!

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  14. आदरणीय जानकी बल्लभ शास्त्री के निधन से साहित्य जगत सूना हो गया है। क्षति अपूरणीय है परंतु शास्त्री जी अपनी अमर और असल ज़िंदगी से अनुभूत रचनाओं से हमारे बीच विद्यमान रहेंगे।

    राजभाषा विकास परिषद की ओर से श्रद्धा सुमन अर्पित करता हूं।

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  15. हिन्दी साहित्य के पुरोधा और काव्यशास्त्र के महामनीषी आचार्च जानकी बल्लभ शास्त्री को अपने श्रद्धा सुमन समर्पित करता हूँ!
    परमपिता परमात्मा उनकी आत्मा को शान्ति और सदगति प्रदान करें!

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  16. माँ शारदे के वरदपुत्र को श्रद्धांजलि देने के लिए मेरे पास तो शब्द भी नहीं है. वे तो सशरीर गोलोक में वास करते थे... ! अंतिम क्षणों में भी उन्हें गायों की ही चिंता थी.... ! उन्हें आभास हो गया था अपने महाप्रयाण का. स्वयं उस दिन कुछ नहीं खाए. सिर्फ दूध पीकर रह गए लेकिन अपने प्यारे कुत्ते 'भोलू' को कटोरा भर दूध-भात खिलाया और कहा कि यह कहीं भी रहे अंतिम समय में मेरे पास आ ही जाएगा. अपने सहायकों से कहा कि आग घर-आँगन साफ़ कर लो. शाम को बहुत सारे लोग आयेंगे. आठ बजे तक आस-पास रहने वाले छात्रों से बात करते रहे. साढ़े आठ उनका घरेलु सहायक 'नरेश' रात्री-भोजन लेकर उन्हें जगाने आया, शास्त्रीजी तब तक चिर-निंद्रा में सो गए थे. काश कुछ दिन और चल जाते.... तो एकबार पुनः उनका आशीष ले आता.

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