गुरुवार, 10 नवंबर 2011

सजल है कितना सवेरा !

सजल है कितना सवेरा !

164323_156157637769910_100001270242605_331280_1205394_nअनामिका

सुधी पाठक वृन्द को अनामिका का सादर प्रणाम ! 

कुछ दिनों से  ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे आप सब का रुझान इस आलेख पर से कुछ कम हो गया है और सोच रही थी कि अब इस श्रृंखला को यहीं विश्राम दे दूँ. मैं आप सभी साथियों के संपर्क में तो नहीं हूँ इसलिए नहीं  जानती  कि अगर इसे बंद कर दिया जाए तो आप सब की प्रतिक्रिया क्या होगी, लेकिन इसी सोच के चलते एक दिन क्षमा जी के आगे ये बात रखी, उन्होंने जो जवाब दिया वो कुछ इस प्रकार था कि वो तो हर वहष्पतिवार का बड़ी बेसब्री से इंतजार करती हैं और उन्हें ये श्रृखला बहुत अच्छी लगती है, इसे अधूरा न छोड़ा जाए. इसी प्रकार  समय समय पर  मनोज जी का प्रोत्साहन भी मेरा  मनोबल बढाता है और मैं स्वयं को आगे की श्रृंखला को विस्तारित करने में जुट जाती हूँ... तो चलिए महादेवी जी के बारे में आगे जानते हैं...

महादेवी वर्मापांचवी काव्य-कृति 'दीपशिखा' को काव्यमय चित्र या चित्रमय काव्य अथवा 'चित्रगीत' की संज्ञा दी जा सकती है. इसके प्रत्येक गीत की पृष्ठभूमि के रूप में एक चित्र अंकित है, जो काव्योत्कर्ष की चारुता बढ़ाने में समर्थ है. कला और भाव दोनों की दृष्टि से 'दीपशिखा' पूर्णत्व का स्पर्श करती हुई अपने ढंग की अकेली काव्य कृति है. इसे देखने के पश्चात ही निरालाजी ने अपने ये उदगार प्रकट किये थे -

               हिंदी के विशाल मंदिर की वीणा-वाणी,

               स्फूर्ति-चेतना-रचना की प्रतिमा कल्याणी !

'दीपशिखा' में महादेवीजी की समात्मभावना रागात्मक अनुभूति की तीव्रता से सर्वव्यापक होकर इतनी प्रत्यक्ष और जीवंत हो उठती है कि सर्वभूत हितरत क्रियाओं में उसका स्वरुप परिलक्षित होने लगता है. भाव,क्रिया और बोध का यही समन्वय अध्यात्म की चरम परिणति काव्य की उच्चतम उपलब्धि है. 'दीपशिखा' का प्रारंभ ही लोक-मंगल की भावना से होता है -

           दीप मेरे जल अकम्पित घुल अचंचल  !

           पथ न भूले, एक पग भी, घर न खोये, लघु विहाग भी

           स्निग्ध लौ की तूलिका से आँक सबकी छाँह उज्जवल !

और अपनी इस वृति के लिए - निष्काम कर्मयोग की साधना के लिए अपेक्षित आत्मविश्वास का दृढ संबल भी इनके पास है -

             पंथ होने दो अपरिचित प्राण रहने दो अकेला !

             अन्य होंगे चरण हारे,

             और हैं जो लौटते, दे शूल को संकल्प सारे ;

             दृढव्रती निर्माण उन्मद, यह अमरता नापते पद,

             बाँध देंगे अंक-संसृति से तिमिर में स्वर्ण बेला !

इस प्रकार साधना सिद्ध आत्मविश्वास का सहज संबल 'दीपशिखा' को प्राप्त है. कवयित्री ने स्पष्ट घोषणा भी की है -

           और कहेंगे मुक्ति कहानी, मैंने धूलि व्यथा भर जानी ;

            हर कण को छू प्राण पुलक बंधन में बंध जाता है !

            मिलन उत्सव बन क्षण जाता है !

            मुझे प्रिय जग अपना भाता है !

कहना न होगा कि समत्व की यह स्थिति सर्वत्र एक ही आत्मा को देखने की दृष्टि का ही सुफल है. द्वन्दमोहविनिर्मुक्त होने से व्यष्टि जीव का विश्वात्मा के प्रति प्रेमभाव उजागर हो सकता है, अन्यथा नहीं ! वास्तव में आध्यात्मिक आलोक की सार्थकता यही है कि वह विश्व के लिए करुणा, सहानुभूति ही नहीं, समानुभूति तथा स्नेह का सन्देश दे सके, क्युंकि उच्च से उच्च आदर्श जीवन के यथार्थ से समन्वित होकर ही प्रतिष्ठा पाता है. इस सार्वभौम प्रेम और समत्व की प्राप्ति के लिए अपने प्राकृत अहम् की चारदीवारी को तोडना और अपरा प्रकृति से उठकर परा प्रकृति में प्रवेश करना अनिवार्य है, केवल तभी सर्वभूतों के प्रति मैत्री और करुणा का भाव जाग्रत हो सकता है !

'दीपशिखा' की कवयित्री  'अपने से पहले अपनों की मुक्ति गौतमी गीता ' के अनुसार अपने लिए व्यक्तिगत सुख से पूर्व विश्व को सुखी देखना चाहती हैं, सबका दुख बंटाने के लिए आतुर हैं और इसीको कवि का मोक्ष मानती हैं ! महादेवीजी अपनी इस विराट संवेदनशीलता के उन्मेष में लोक-कल्याण की भावना को व्यक्तिगत मोक्ष से कई गुना अधिक महत्त्व देती जान पड़ती हैं. वे विश्व से विषाद, क्लेश और ताप को दूर करके उल्लास, आनंद और शीतलता की रचना करने को उत्सुक हैं,

"मैं उन मुरझाये फूलों पर संध्या के रंग जमा जाती",

मैं पथ के संगी शूलों के सौरभ के पंख लगा जाती,

अपने को गलाकर पृथ्वी को शीतलता देने वाले..

उस घन की हर कम्पन पर मैं शत-शत निर्वाण लुटा जाती,

अपने बाह्य पाषाणी रूप के भीतर

करुणा का अक्षय जलस्त्रोत

संजोने वाले पहाड़ को भी

मैं ढाल चांदनी में

मधुरस गिरी का

मृदु प्राण बता जाती,

केवल इतना ही नहीं यदि कवयित्री में क्षमता होती तो वह विश्व को इतना रम्य, साधनापीठ और आनंदधाम बना जाती कि इसका स्रष्टा भी इसके प्रति आकर्षित हो उठता -

सुधि विद्युत की तूली लेकर

मृदु मोम फलक सा उर उन्मन

मैं घोल अश्रु में ज्वाला कण

चिर मुक्त तुम्हीं को जीवन के

बंधन हित विकल दिखा जाती !

गोस्वामी तुलसीदास ने लोक-मंगल की भावना के जिस बल पर आत्म-विश्वास के साथ कहा था - संभु प्रसाद सुमित हिय हुलसी, रामचरितमानस कवि तुलसी ! उसी अकंप विश्वास के साथ महादेवी ने भी कहा है -

विद्युत घन में बुझने आती, ज्वाला सागर में घुल जाती

मैं अपने आंसू में बुझ घुल, देती आलोक विशेष रही !

जो ज्वारों में पल कर, न बहें अंगार चुगें जलजात रहें,

मैं गत-आगत के चिरसंगी सपनों का उर उन्मेष रही !

इसलिए 'दीपशिखा' में अविश्वास का कोई कम्पन नहीं है. नवीन प्रभात  के वैतालिकों के स्वर के साथ इसका स्थान रहे, ऐसी कामना नहीं, पर रात की सघनता को इसकी लौ झेल सके, यह इच्छा तो स्वाभाविक है. वस्तुतः व्यापक और स्थिर समता, निष्कामता, लोक मंगल की भावना और आत्मा के स्वातंत्र्य की मांग 'दीपशिखा' का प्रमुख प्रतिपाद्य है -

सब आँखों के आंसू उजले सबके सपनों में सत्य पला

जिसने उसको ज्वाला सौपी उसने इसमें मकरंद भरा,

आलोक लुटाता वह घुल-घुल देता झर यह सौरभ बिखरा;

दोनों संगी पथ एक किन्तु कब दीप खिला कब फूल जला ?

इस गीत में प्रकृति के विस्तृत क्षेत्र में स्थित रूप, आकार और कार्य से नितांत भिन्न पदार्थों को चुनकर तथा उन सबको एक ही पथ के पथिक और एक ही मूल चेतन की अभिव्यक्ति मानकर कवयित्री ने बाह्य भिन्नता के भीतर निहित अभिन्नता की बहुत ही मार्मिक अभिव्यंजना की है.  वस्तुतः किसीको बड़ा-छोटा, कोमल-कठोर, ऊँचा-नीचा तथा लघु-विरत समझना हमारे व्यष्टि भाव का बुद्धि-विभ्रम मात्र है, अन्यथा सभी इस धरातल पर  उस परममूल तत्व की सृष्टि हैं और उसी की आभा से उद्भासित हैं. इस प्रकार ब्रह्म और जीवात्मा तथा प्रकृति अभिन्न हैं. दोनों का लोक-मंगल के लिए उत्सर्ग समान है. इसी भावोदय के उल्लास में ये पंक्तियाँ मुखरित हो उठी हैं -

लघु ह्रदय तुम्हारा अमर छंद, स्पंदन में स्वर -लहरी अमंद,

हर स्वप्न स्नेह का चिर निबंध, हर पुलक तुम्हारा भाव-बंध

निज सांस तुम्हारी रचना का लगती अखंड विस्तार मुझे !

स्पष्ट है  'दीपशिखा' में आध्यात्मिक साधनों के विभिन्न सोपानों पर चढ़ती हुई कवयित्री ने सिद्धि की उस उच्चतम स्थिति का आकलन और अनुभव कर लिया है, जहाँ जीवात्मा निम्नतर, वैयक्तिक स्तर के अहंभाव से ऊपर उठकर सर्व-व्यापी आत्मा  की निर्वैयक्तिक समस्थिति में विकसित होकर परमसत्ता के साथ चेतना और दिव्य आनंद में भावात्मक एकता स्थापित करते हुए असीम प्रेम और चरम स्वातंत्र्य का लाभ प्राप्त करती है. मानवीय जीवन की चरम सफलता और उसकी सृजनात्मकता का यही परम विकास है.

साधना की सिद्धि का संकेत इन पंक्तियों में चरितार्थ है -

सजल है कितना सवेरा !

कल्पना निज देखकर साकार होते,

और उसमे प्राण का संचार होते,

सो गया रख तूलिका दीपक चितेरा !

ले उषा ने किरण -अक्षत हास रोली,

रात अंकों से पराजय -रेख धो ली,

राग ने फिर सांस का संसार घेरा !

क्रमशः

25 टिप्‍पणियां:

  1. महादेवी वर्मा जी की कृति "दीपशिखा" पर आपकी प्रस्तुति एवं उदाहरणों के साथ प्रस्तुत किए गए अन्य कवियों की तुलनात्मक भावों का समावेश इसे संपूर्णता प्रदान करने में अहम भूनिका का निर्वाह किया है । इसी क्रम में इस पोस्ट को जीवंत करने की प्रक्रिया में अपनी ओर से महादेवी जी की कुछ पक्तियां जोड़ रहा हूँ-
    "बाँध लेंगे क्या तुझे यह मोम के बंधन सजीले !
    पंथ की बाधा बनेंगे तितलियों के पंर रँगीले !
    विश्व की क्रंदन भुला देगी मधुप की मधुर गुनगुन ,
    क्या डूबो देंगे तुझे .यह फूल के दल ओस गीले !
    तू न अपनी छाँह को अपने लिए कारा बनाना !
    जाग तुझको दूर जाना । "
    मेर पोस्ट पर आपकी प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी । पोस्ट अच्छा लगा । धन्यवाद ।

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  2. ज्ञानवर्धक आलेख.सुंदर प्रस्तुतिकरण. महादेवी जी वास्तव में हिन्दी कविता का गौरव हैं.उन्होंने हिंदी की छायावादी काव्य धारा को एक नया रंग और नया अंदाज़ दिया था . लेखमाला के ज़रिये ब्लॉग जगत को उनके ऐतिहासिक योगदान से परिचित कराने की आपकी यह पहल स्वागत योग्य है. आभार.

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  3. कार्तिक पूर्णिमा एवं प्रकाश उत्सव की आपको हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं !

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  4. Aapne Deepshikha se betareen panktiyan chunee hain.Kaviyatri kee uchh star pe pahunchee adhyatmikta ko darshatee hain.
    Aapkee shailee to haihee badhiya.Lagta hai,samne baith ke batiya rahee hain.

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  5. महादेवी की पंक्तियाँ पढ़ कर ही हमारा सवेरा सजल हो गया है.

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  6. Nice .

    keep it up.

    आंखों में रहा दिल में उतर कर नहीं देखा ,
    कश्ती के मुसाफिर ने समन्दर नहीं देखा |
    पत्थर मुझे कहता है मेरा चाहने वाला ,
    मैं मोम हूँ उसने मुझे छू कर नहीं देखा |
    http://mushayera.blogspot.com/

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  7. बहुत बढिया श्रृंखला चल रही है …………जारी रखें।

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  8. पाठकों की चिन्ता किए बगैर आप लगातार लिखते रहिए। यह एक बढ़िया काम है…

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  9. सुन्दर , सामयिक , सार्थक प्रस्तुति , आभार .

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  10. आप मेरे ब्लॉग पर आयीं उसका बहुत धन्यवाद ।
    आप बहुत अच्छा काम कर रही हैं कृपया इस क्रम को बनाये रखें ।
    इस तरह के ब्लॉग ब्लॉग्गिंग जगत की गुणवत्ता को बढाते हैं ।
    महादेवी वर्मा एक ऐसा नाम है जिसे सुनके ही उनकी कवितायें याद आने लगती हैं और उनकी लिखी कहानियाँ भी ।
    बहुत अच्छी प्रस्तुति,आभार !

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  11. यह पूरी श्रृंखला एक साहित्य-तीर्थ सी चल रही है!! एक स्वर्गिक अनुभव!!

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  12. सार्थक श्रृंखला ..अच्छी प्रस्तुति

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  13. महादेवी की काव्य-साधना की अनूठी बारीकियों का ज्ञान हो रहा है इस शृंखला से ...जारी रखिए इस विषय को।

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  14. आपकी श्रंखला के माध्यम से हमें महादेवीजी के बारे काफी कुछ जानने और समझने का अवसर मिल रहा है .....
    इसे यों ही जारी रखें

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  15. यह श्रृंखला साहित्यिक अभिरुचि वालों के लिये अनमोल है.बंद करने का विचार भी मन में लायें.

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  16. अनामिका जी, आपकी यह श्रृंखला बहुत से पाठकों को भाती है। इस श्रृंखला के महत्व को टिप्पणियों की संख्या से मत तौलिए आप बहुत अच्छा काम कर रही हैं, करते रहिए।

    प्रस्तुत अंक में आपने महादेवी की रचनाओं में रागात्मक संबंध पर खास प्रकाश डाला है। मानव किसी चकित शिशु-सा जब ब्रह्मांड के विराट-लीला व्यापार को देखता है तो वह बस चकित होकर रह जाता है। जब उसकी बुद्धि कोई व्याख्या प्रस्तुत नहीं कर पाती तो वह रहस्य में डूब जाता है। इस परम प्रिय के परोक्ष दर्शन कर कवयित्री उससे मिलन के लिए उत्कंठित हो जाती है। रागात्मक संबंध की यह महत्वपूर्ण विशेषता है।

    एक उम्दा प्रस्तुति।

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  17. बहुत बढ़िया श्रंखला है ...अनामिका जी ...आप बहुत अच्छा काम कर रहीं हैं ....कृपया अपना प्रयास जारी रखें.....

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  18. बहुत सुन्दर अनामिका जी ! महादेवी जी के बारे में पढ़ना सदैव ही बहुत अच्छा लगता है ! उस पर आपकी प्रस्तुति विलक्षण है ! इस श्रंखला को ऐसे ही जारी रखिये ! मानसिक उर्वरा की पूर्ति होती है महादेवी जी की चुनिन्दा रचनाओं को पढ़ कर ! शुभकामनायें !

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  19. अनामिका जी,
    हम सब तो बहुत कवियों ,लेखकों के बारे मे, उनकी कृतियों के संबंध में बहुत कुछ पढ चुके हैं किंतु उनके अविस्मरणीय पलों की अनुभूति के बारे में अब तक अनभिज्ञ रहे हैं । आशा करता हूँ कि भविष्य में भी आप उन सबके इन रागात्मक एवं आत्मीय पलों को प्रस्तुत करती रहेंगी । मेरे पोस्ट पर देर से ही सही आने के लिए मेरी ओर से मैं आपको तहे दिल से शुक्रिया अदा करता हूँ । सादर ।

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  20. आपके इस सुन्दर प्रविष्टि की चर्चा आज दिनांक 11-11-2011 को शुक्रवारीय चर्चा मंच पर भी होगी। सूचनार्थ

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