रविवार, 6 नवंबर 2011

एक अचंभा देख्या रे भाई


कबीरदास की रचनाएं
(2)
एक अचंभा देख्या रे भाई।

समंदरि लागि आगि, नदियां जल कोइला भई।
देखि कबीरा  जागि, मछी  रूखां  चढ़ि  गई॥

आकासे मुखि  औंधा  कूवा,  पाताले  पनिहारि।
ताका पाणी को हंसा पीवै, बिरला आदि विचारि॥


एक अचंभा देख्या रे भाई।
ठाढ़ा स्यंघ चरावै गाई॥ टेक॥
पहले  पूत   पछैं  भई  माइ। चेला  कै  गुर  लागै  पाइ।
जल को मछली तरवरि ब्याई। पकड़ि  बिलाई  मुरगै  खाई।
बैलहि  डारि  गूनि  घरि  आई। कूता  कू  लै  गई बिलाई।
तलि करि साषा ऊपरि करि मूल। बहुत भांति जड़ लागे फूल।
कहै कबीर  या  पद को बूझै। ताकू  तीन्यू  त्रिभुवन  सूझै॥

11 टिप्‍पणियां:

  1. कबीर साहब की अनमोल रचना.. आज कबीर की दूसरी प्रस्तुति देखने को मिली दिन भर में..

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  2. आपके इस सुन्दर प्रविष्टि की चर्चा आज दिनांक 07-11-2011 को सोमवासरीय चर्चा मंच पर भी होगी। सूचनार्थ

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  3. एक अच्छी और गहन रचना. की प्रस्तुति के लिए धन्यवाद । मेरे नए पोस्ट पर आपका इंतजार रहेगा । धन्यवाद ।

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  4. बहुत अच्छी प्रस्तुति,यदि हो सके तो कृपया हिंदी अर्थ भी उल्लेखित कर दें जिससे जो नहीं समझ पायें उनके लिए सुविधा हो व वे भी ज्ञानवर्धन कर सकें ।

    मेरे नए पोस्ट पर आपका स्वागत है,कृपया अपने महत्त्वपूर्ण विचारों से अवगत कराएँ ।
    http://poetry-kavita.blogspot.com/2011/11/blog-post_06.html

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