बुधवार, 2 नवंबर 2011

हिन्दी के पाणिनि - आचार्य किशोरीदास वाजपेयी


अंक-7

हिन्दी के पाणिनि - आचार्य किशोरीदास वाजपेयी


आचार्य परशुराम राय

इस अंक में कुछ हिन्दी के धुरंधर विद्वानों से आचार्य किशोरीदास वाजपेयी जी की मुलाकात और उनके विचारों पर चर्चा की जाएगी। हिन्दी के महारथियों की मुलाकात की शृंखला में आचार्य जी ने सर्वप्रथम बाबू श्यामसुन्दर दास जी के नाम का उल्लेख किया है। 1931 में जब वे कांग्रेस के आन्दोलन में सक्रिय थे, एक दिन उनकी मुलाकात बाबू हरिहर नाथ टंडन से हुई और उनसे पता चला कि बाबू श्यामसुन्दर दास जी उनके यहाँ ठहरे हुए हैं। कभी पहले आचार्य जी ने बाबू श्यामसुन्दर दास जी की पुस्तक साहित्यालोचन में वर्णित कलाओं के वर्गीकरण पर तीखा प्रहार किया था। टंडन जी के अनुरोध पर आचार्य जी बाबू जी से मिलने चल तो दिए, पर मानसिक उथल-पुथल के बीच कि कहीं उनके लेख को पढ़कर वे नाराज होंगे, पता नहीं उनका व्यवहार कैसा होगा आदि-आदि। पर ऐसा कुछ नहीं हुआ। टंडन जी बाबू जी से उनका परिचय कराकर उनकी सेवा-सुश्रुषा में लग गए और आचार्य जी एक कुर्सी पर बैठ गए। कुछ देर बैठे रहने के बाद भी जब बाबू जी ने चर्चा के लिए कोई पहल नहीं की, तो आचार्य जी उठे और प्रणाम कर चलते बने, मन में यह सन्तोष लिए कि चलो हिन्दी के एक बड़े विद्वान के दर्शन तो हो गए।

आचार्य जी ने अगले विद्वान की मुलाकाती के रूप में बाबू जगन्नाथ प्रसाद भानु का उल्लेख किया है। ये मध्यप्रदेश सरकार की सेवा में थे और सहायक सेटलमेंट कमिश्नर पद से सेवानिवृत्त हुए। भानु जी हिन्दी में छन्दशास्त्र पर छन्द प्रभाकर और अलंकार शास्त्र पर काव्य प्रभाकर जैसे ग्रंथ लिखकर काफी ठोस काम कर चुके थे। सेठ कन्हैयालाल पोद्दार ने काव्य प्रभाकर की काफी तीखी आलोचना की थी, जो भानु जी को बिलकुल अच्छी नहीं लगी थी। लेकिन छन्द प्रभाकर के विषय में आचार्य जी लिखते हैं इस विषय पर यह अनन्तिम ग्रंथ है। ये राष्ट्रवादी विचार-धारा के पोषक थे। जब लोग हिन्दी की चर्चा करना पसन्द नहीं करते थे, उस समय रायबहादुर पं. श्याम बिहारी मिश्र, रायबहादुर पं. शुकदेव बिहारी मिश्र और रायबहादुर बाबू जगन्नाथ प्रसाद भानु जैसे लोगों ने सरकारी नौकरी में रहते हुए भी हिन्दी की सेवा की और हिन्दी के प्रति लोगों को आकर्षित किया। यह देखकर लगता है कि देश की स्वतंत्रता के लिए जितने बड़े आन्दोलन और संघर्ष किए गए, हिन्दी के उत्थान के लिए भी विद्वानों ने उससे कम संघर्ष नहीं किए। आचार्य जी ने भानु जी की महानता और हिन्दी सेवा की काफी प्रशंसा की है।

आचार्य जी की पत्नी अपने पिता पं. कन्हैयालाल मिश्र के पास बिलासपुर में थीं और आचार्य जी उन्हें लिवाने गये थे। अचानक उन्हें पता चला कि भानु जी वहीं रहते हैं, तो मिलने का मन बनाया और पता आदि की जानकारी करके मिलने चल दिए। भानु भवन पहुचने पर परिचय आदि की औपचारिकता के बाद काफी उदारता पूर्वक उन्होंने आचार्य जी का स्वागत-सत्कार किया। फिर थोड़ी देर तक उनके ग्रंथ काव्य प्रभाकर और सेठ कन्हैयालाल पोद्दार द्वारा की गयी उसकी आलोचना पर चर्चा हुई। भानु जी ने सेठ जी पर व्यंग्य करते हुए उन्हें ब्राह्मण-सेवी बनकर अपना काम सिद्ध करनेवाला कहा। आचार्य जी ने इसका तात्पर्य समझा कि शायद सेठ जी को इस विषय की जानकारी होगी और विद्वानों की सेवा करके कुछ लिखते-लिखाते होंगे। अतएव उन्होंने तत्कालीन अलंकार ग्रंथों की आलोचना करते हुए एक लम्बा लेख लिखा जिसमें सेठ जी द्वारा लिखी पुस्तक काव्य-कल्पद्रुम भी थी। वैसे आचार्य जी लिखते हैं कि अन्य पुस्तकों पर काव्य-कल्पद्रुम की श्रेष्ठता को स्वीकार करना पड़ा था। यह लेख माधुरी में छपा था, जिसका उत्तर भी सेठ जी ने इसी पत्रिका में प्रकाशित कराया। बाद में सेठ जी से मिलने के बाद आचार्य जी को उनके प्रति बनाई अपनी धारणा पर काफी पश्चाताप हुआ।

काव्य-कल्पद्रुम का जब अगला संस्करण छपने को आया तो उसे दोषरहित बनाने के लिए सेठ जी ने आचार्य जी को सादर आमंत्रित किया। सेठ जी मथुरा में रहते थे। आचार्य जी उनके निमंत्रण को स्वीकार करके उनके अतिथि बने और करीब 15 दिनों तक वहाँ ठहरे। इस बीच काव्य-कल्पद्रुम के विभिन्न स्थलों पर आचार्य जी ने सुझाव दिए। पर सेठ जी उनके सुझावों को इतनी आसानी से स्वीकार नहीं कर लेते थे। उस पर बड़ी ही सूक्ष्मता से तर्क-वितर्क, आलोचना-प्रत्यालोचना, विभिन्न ग्रंथों का अवलोकन-विलोकन करने के बाद पूरी तरह सन्तुष्ट होने पर ही वे मानते थे। तब आचार्य जी को पता चला कि काव्यशास्त्र पर सेठ जी की कितनी गहरी पकड़ थी और उनके पास ग्रंथों का अच्छा संकलन था। काम पूरा होने के बाद सेठ जी ने पूछा कि आप अपने लेख में लिखी बातों से आज भी सहमत हैं। आचार्य जी ने कहा नहीं। पुनः उन्होंने पूछा क्या वे अपने इस नये अनुभव को प्रकाशित करेंगे। आचार्य जी ने हामी भरी। इस यात्रा के वृतांत पर उन्होंने एक लेख लिखा और इसमें अपनी पुरानी भूल को स्वीकार भी किया।

आचार्य जी मथुरा आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के गाँव दौलत पुर से गए थे। आचार्य जी लिखते हैं श्रद्धेय द्विवेदी जी ने उन्हें एक चिट्ठी लिखकर उनके कामों की प्रशंसा करते हुए प्रोत्साहित किया था। उनमें नीचे गिरे लोगों को ऊपर उठाने की प्रवृत्ति थी। आचार्य जी उन्हें परम आदरणीय मानते थे। उनके गाँव की कई बार यात्राएँ कीं, उनके साथ रहे और घूमे-फिरे। उनके व्यक्तित्व तथा वात्सल्य से इतने प्रभावित थे कि उन्होंने आगे चलकर आचार्य द्विवेदी की जीवनी आचार्य द्विवेदी और उनके संगी साथी नाम से लिखी। अपने अंतिम दिनों में आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने अपनी समस्त संचित साहित्यिक सामग्री- पुस्तकें, पत्राचार एवं अन्य दस्तावेज तथा संशोधन की हुई पांडुलिपियाँ नागरी प्रचारिणी सभा काशी को पैकेट बनाकर दान कर दी इस निर्देश के साथ कि वे पैकेट उनकी मृत्यु के बाद ही खोले जाएँ। रिसर्च करनेवाले छात्रों के लिए वे दस्तावेज बड़े ही उपयोगी हो सकते हैं।

कुछ समय बाद उन दस्तावेजों का कुछ अता-पता ही साफ हो गया जिन्हें पुनः प्रकाश में लाने के लिए आचार्य जी ने नागरी प्रचारिणी सभा काशी के पदाधिकारियों के नाम लीगल नोटिस तक दे डाली थी। वे लिखते हैं यह उनका गुरु-ऋण था जिसे वे चुकाना चाहते थे और अपने अथक प्रयासों से वे उसमें सफल हुए।

इस अंक में बस इतना ही।

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7 टिप्‍पणियां:

  1. यह श्रंखला आचार्य जी के नितांत के अनछुए जीवन दृश्यों से साक्षात्कार करा रही है। आपके प्रयास सराहनीय हैं। आभार,

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  2. सार्थक एवं महत्वपूर्ण पोस्ट.आभार.

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  3. आचार्य किशोरीदास वाजपेयी जी से संबंधित यह शृंखला हमें आचार्य जी के जीवन-चरित के साथ-साथ उनके अद्-भूत गुणों से भी बखूबी बता रहा है...

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  4. सही जानकारी देती सार्थक रचना |बधाई |
    आशा

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  5. आचार्यवर के बारे में आपकी पोस्ट से विस्तृत जानकारी मिल रही है।

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  6. जारी आपका लिखना भी…हमारा पढ़ना भी…

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